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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 55

From जैनकोष



आसंसारत एव धावति परं कुर्वेहमित्युच्चकैः दुर्वारं ननु मोहिनामिह महाहंकाररूपं तम: ।

तद्भूतार्थपरिग्रहेण विलयं यद्येकवारं व्रजेत् तत्किं ज्ञानघनस्य बंधनमहो भूयो भवेदात्मनः ।।55।।

542―जीव में विभावों का प्रधावन―इस जीव पर अब तक क्या छाया जाता रहा और क्या छाया हुआ रहता और कितनी जल्दी छा जाता है, इसको समझने के लिए पहले एक दृष्टांत लीजिए । जैसे दर्पण में क्या छाया रहता है? जो सामने वस्तु हो उसका आकार, उसका प्रतिबिंब सदा छाया रहता है, आप संदूक में बंद क त् देवें दर्पण को तो संदूक का ढक्कन प्रतिबिंबित हो जायेगा, आप कपड़े में बाँधकर रख दें तो कपड़े का प्रतिबिंब आ जायेगा । तो जैसे दर्पण में सामने आनेवाली वस्तु का प्रतिबिंब छाया रहता है ऐसे ही इस जीव पर अब तक जो कमोदय आता रहा कर्म का अनुभाग फूटता रहा वह उसका प्रतिफलन छाया आता रहा और कितनी जल्दी छाता रहा सो बताओ? दर्पण के सामने अगर दो हाथ दूर कोई चीज आ जाये तो दर्पण में कितना जल्दी प्रतिबिंब आ जाता? प्रतिबिंब में गति नहीं हुआ करती । वह तो एक निमित्तनैमित्तिक योग है, तो ऐसा लगता कि जैसे प्रतिबिंब तुरंत दौड़कर आ गया, दौड़कर भी क्या आ गया? उसमें गति कही? सामने चीज है, दर्पण में प्रतिबिंब तुरंत हो गया । बिजली की गति में चाहे फिर भी देर हो, बटन दबाया और कोई 500 गज की दूरी पर बल्ब लगा है तो चाहे वहाँ देर हो जाये मगर दर्पण में प्रतिबिंब आने के लिए कुछ भी देर नहीं है, फिर भी हम उसे यों ही कहेंगे कि प्रकृष्ट रूप से तेज दौड़कर आ गया । दौड़ा कुछ नहीं प्रतिबिंब, निमित्त जिस समय पाया उसी समय प्रतिबिंब हुआ, मगर पहले न था, अब हुआ इस कारण से तेज दौड़कर प्रतिबिंब आया, यों कहना पड़ता है । ऐसे ही आत्मा में पूर्वबद्ध कर्म का प्रतिफलन हुआ वह तुरंत दौड़कर आया, दौड़ने को बात यहाँ नहीं मन । वैसे तो तुरंत ही जीव पर अंधेरा पहले न था, अब आया, उस निमित्त को पाकर होने वाला अंधकार अज्ञान रागद्वेष, विकल्प पहले न था, अब आया, इसलिए कहा जाता कि बड़ी तेजी से दौड़कर ये संकल्प विकल्प आये ।

543―ज्ञानतिरस्कार में मुग्ध प्राणी की विडंबना―अच्छा, और जब यह कर्म का अनुभाग फूटा तो जीव ने अपनी वैभाविक शक्ति के प्रयोग से विपरिणाम किया । अस्वभाव भाव, आत्मा में नाना तरह का संकल्प विकल्प यह क्या है? यह ज्ञान और कर्मरस इन दोनों का मिश्रण है । हो रवा ए खुद का खुद में ही कार्य, मगर जैसे सफेद उजेला जल रहा हौ और वहाँ लाल कागज लगा देवे तो वह उजेला लाल हो जाता है तो क्या वह उजेला लाल है? उजेला तो स्वच्छता का काम है । लाल होने पर भी जो स्वच्छता की बात है वह तो उजेला है और जो ललाई की बात है वह उपाधि का प्रभाव है, तो ऐसे ही इस जीव पर संयोगवश नाना तरह की मलिनता रही है । स्वभाव भाव ढक गया, विभाव आविर्भूत हो गया और अज्ञान से ही मुग्ध हो गया, अब यह भेद नहीं कर पा रहा है सो इस ही अपने विकल्प को मानता कि यह मैं हूँ । मनुष्य को क्रोध क्यों आ जाता? अगर, कोई गाली देता है या अटपट बोलता है तौ मनुष्य का क्रोध क्यों आ जाता? इस जीव में क्रोध कैसे आ गया? बात यह हुई कि जीव अगर यह समझता होता कि मैं तो चेतना मात्र स्वरूप हूँ तो उसे क्रोध नहीं आता, पर समझ क्या बैठा? कर्मरस को आत्मरस । पुद्गल कर्म का उदय होने पर जो यहाँ विभाव प्रतिफलन विकल्प, जो यहाँ ज्ञान का विकल्प जगा, रागद्वेष का भाव हुआ उसको मान लिया कि मैं यह हूँ और फिर उस मैं में फर्क पड़ गया है । दूसरा कोई गाली दे रहा तो यह सोच रहा कि यह मेरे विरुद्ध कह रहा, क्योंकि राग तो है और तरह का और वह बात कर रहा और तरह और राग में मान लिया कि यह मैं हूँ, तो उसे क्रोध आ जाता है । कषायें दूर होने की औषधि सहज आत्मस्वरूप का परिचय करना है, और कोई उपाय नहीं है कि जिससे कषायें दूर हो सकें । जितना भी क्लेश है वह सब कषायों का क्लेश है । और, कषाय बढ़ते हैं कषाय को अपनाने से ।

544―ज्ञान का महत्त्व समझने पर विडंबनाओं का पलायन―कषायों को आत्मतत्व न मानें तो ये कषायें बढ़ नहीं सकती । कषायें हो नहीं सकती, मिट जायेंगी । जैसे वृक्ष कट गया तो वह कब तक हरा रहेगा । सूखने की ओर है । ऐसे ही जब कषायों की जड़ खतम हो गई तो कषायें कहाँ से हरी रहेंगी? सोचो कषायों की जड़ क्या है? कषायों को आत्मस्वरूप मानना यह कषायों को हरा करने की जड़ है । ज्ञानी जीव कषायों को आत्मस्वरूप नहीं मानता । विषयों से भिन्न केवल ज्ञानमय अपने आपको अंगीकार करते हैं, तो कथायें कब तक रहेंगी? लेकिन ? अज्ञानी जीव इन विभावों में, कषायों में और आत्म के सहज स्वरूप में भेद ही नहीं समझ रहा है और मान

रहा उन कषायों में उपयोग देकर कि यह मैं हूं, सो उसको विडंबना चलती है । भला बतलावें, जन्म मरण क्या आत्मा की चीज है? जन्म में कौनसा आनंद आता; मरण में दुःख प्रगट नजर आता । जन्म में भी दुःख, मरण में भी दुःख । कल्पना करो, यदि हमारा इस भव में जन्म न होता, कहीं भी जन्म न होता और मैं जो हूँ सो अकेला ही होता तो भला बतलाओ ये कोई कष्ट आते क्या? और मोटी बात यह देख लो कि अगर हम इस मनुष्य जन्म में उत्पन्न न होते और न जाने किस जगह और क्या होते, कीड़ा मकोड़ा कुछ भी होते तो यहाँ की कोठी, यहाँ का शहर, यहाँ के लोग, वैभव आदि इनमें कोई राग बनता क्या? मोह बनता क्या? और क्या न होता । यदि कहीं भी जन्म न हो और मैं अकेला ही होऊँ तो वहाँ दुःख का काम नहीं ।

545―विषयार्थी जनों की करतूत―जन्म में दुःख, मरण में दुःख । किसी बालक का जन्म होते समय घर के लोग तो खुश होते हैं और जब बालक पेट से निकलता है तो उसे बड़ा कष्ट होता है, पर मोहियों को क्या, वे तो अपनी कषाय के अनुरूप आनंद मना रहे । और जिसके लिये आनंद मना रहे, वह तड़फ रहा, रो रहा । जन्म का बड़ा कष्ट होता है; तो यहाँ दूसरे की किसे पड़ी है, सबको अपनी-अपनी पड़ी है । नहीं तो बतावो वह बच्चा तो पैदा होते समय बड़ी वेदना पा रहा, रो रहा, और कभी-कभी तो फंस जाने पर बुरी तरह से निकाला जाता । उसे तो कष्ट हो रहा और कुटुंब में खुशियां मनायी जा रहीं, ढोल बज रहे । तो कोई किसी का किसी बात में साथी नहीं है, और न कोई किसी का वास्तव में कुछ है । क्या छा रहा इस जीव पर पूर्व में बाँधे हुए कर्मों का अँधेरा छा रहा है । जो ज्ञानी है वे ऐसा ज्ञान प्रकाश उजालते हैं कि अंधेरा दूर भाग जाता है । जो अज्ञानी हैं उनमें ज्ञानप्रकाश का सामर्थ्य नहीं, तो अँधेरा गहरा होता जाता है । तो इस जीव ने अब तक किक क्या? अनादिकाल से मैं करता हूँ मैं करता हूँ इस प्रकार क्रिया की होड़ में बड़ी तेज दौड़ इसने लगाया । अगर एकेंद्रिय हुआ तो वह कर्मफल में ही मैं यह हूँ, मैं भोगता हूँ, इसी मैं के लिए दौड़ लगायी त्रस जीव हुआ तो कर्म व कर्मफल दोनों चेतनाओं के लिये दौड़ लगायी । मैं करता हूँ, मैंने किया था, अमुक काम किया, अमुक काम कर दूंगा, यह भोग रहा हूँ, इसे भोगा, यह भोगूंगा । खूब शान के साय कहते हैं मोहीजन कि अगर मेरा यह नाम है तो इसका खप्पर-खप्पर बिकवा दूंगा । अगर न बिकवा दूं तो मेरा नाम न कहना । वाह कैसी शान है अगर इस नाम को ही आत्मा समझ रखा, जो इस जीव का कलंक है उस शान को ही आत्मा मान लिया त् इस जीव का गुजारा कैसे बने ? इस जीव ने अनादि काल से मैं करता हूँ, मैं करूंगा, ऐसी ही तेज भावनाओं में दौड़ मचा रखी हुँ । अब जरा यहाँ मनुष्यों को ही देख लो, मैं करूंगा, मुझे करना है इस ख्याल में, इतनी तेज दौड़ लग रही कि किसी को यह धीरता नहीं कि क्या हर्ज है, स्टेशन जाना है यहाँ हैं कोई तीन फर्लांग दूर है अभी थोड़ी देर में पहुंच जायेंगे,सो नहीं, बस, अभी पहुंचना है तुरंत पहुंचना है, कितनी तेज चाल चल रहे हैं, जैसे मानो किसी चौहट्टे पर बहुत सी गिजाइयाँ निकली हों वे गिजाइयाँ खड़ी नहीं रहतीं, वे चलेगी, सरसरायेगी, उपर चलेंगी, नीचे चलेंगी । तो यहाँ भी जैसे बहुत दो पैर वाली गिरजाइयां निकली सी हैं सो उनका मचमचाना रहता है इस तरह से आज इस लोक में देखो तो किस-किस प्रकार से लोग कहते किस-किस काम को कि मैं करता हूँ करूँगा इन भावों से तेज दौड़ लगा रहे हैं, चिलबिला रहे हैं छटपटा रहे हैं ओर उसी में अपनी मौज मान रहे हैं जैसे तेज चरपरे लाल मिर्च खाने वाले लोग लाल मिर्च भी खाते जाते, मुख से सी-सी भी करते जाते आंखों से अश्रु भी बहते जाते फिर भी कहते कि थोड़ी और दे दो, तो जैसे लाल मिर्च के खाने में मौज भी मनाते जाते, व्यग्र भी होते जाते उसी प्रकार इस मोह के कारण दु:खी भी होते जाते और उसी में मौज भी मानते जाते ।

546―मोह की करामत―एक कथा है चारुदत्त सेठ की । वह बड़े सरल पुरुष थे, उन्हें दुनिया की कोई खुरापात की बात न मालूम थी तो घर वाले उनसे परेशान हो गए कि यह तो स्त्री से बोलता भी नहीं, यह तो उसके कमरे में ही नहीं जाता । इसे कुछ पता ही नहीं । तब घर वालों में चाचा ने एक योजना बनायी―क्या कि एक हाथी वाले से कह दिया कि देखो हम लोग अमुक वेश्या के मकान वाली सकरी गली से आयेंगे, तुम उसके सामने में थोड़ी देर के लिए अपना हाथी चला देना, सब समझा दिया । तो जब चारुदत्त निकला उस वेश्या की गली में उस जगह हाथी को तेज चलता देख डर के मारे चाचा व वह चारुदत्त उस वेश्या के घर में घुस गये । यह तो कराना ही था उन घरवालों को । अब क्या था, वेश्या के घर जो वेश्या की लड़की थी उसके संग शतरंज, तास वगैरह खेलने बैठा दिया । धीरे-धीरे उसका खेल में मन रम गया, और भी अनेक प्रकार के ऐब आ गए । चाचा अपना काम कर घर वापिस आ गया । लेकिन चारुदत्त वहाँ ही रहा । अब वह उस वेश्या के ही घर जब चाहे बना रहे । धीरे-धीरे अपना सारा धन चारुदत्त ने बरबाद कर दिया । जब धन खतम हो गया तो उस वेश्या ने चारुदत्त को अपने घर से बाहर निकाल देने के लिए अपनी लड़की से कहा । वहाँ उस वेश्या की लड़की ने यही कहा कि अब मैं वह वेश्या नहीं हूँ मेरा कुछ दूसरा भाव नहीं है । मैने तो इन्हें सच्चे मन से अपना स्वीकार कर लिया है । आखिर उस वेश्या ने चारुदत्त को एक संडास में ढकेल दिया । होगी कोई बड़े मुख वाली संडास, सो वह उसके अंदर घुस गया, विष्टा से भिड़ गया, वहीं एक सुवर आया, उसे चाटने लगा । वहाँ भी उस चारुदत्त ने यही समझा कि मुझे तो वह वेश्या की लड़की प्रेम से छू रही है, बड़ा अनुराग कर रही है । तो देखिये । ऐसी दुर्गति हुई उस चारुदत्त की, बाद में वह सुधरा यह बात अलग है । तो पाप कर्मों का तीव्र उदय जब होता तब कैसा विकट अंधेरा छा जाता है इस जीव पर कि यह न जाने कैसी-कैसी दुर्गतियाँ पाता है ।

547―अहंकार से प्राणी की विडंबितता―बस मैं करूंगा, मैं करता हूँ, इस ही धुन में यह जीव बड़ी घुड़दौड़ लगाये चला जा रहा है । सो यह मोहांधकार बड़ा दुर्निवार है, मुश्किल से हटाया जा सकता है । जैसे, दुराचार की ओर यह मनुष्य बहुत जल्दी लग सकता है, मगर सदाचार की ओर लगने में उसे कठिनाई महसूस होती है । आज धर्मों की जो और प्रगतियाँ चल रही हैं वे किस कारण चल रही हैं? बड़ा सस्ता धर्म कर दिया, मांस भी खाना, अंडे भी खाना, शराब भी पीना, गांजा, भांग वगैरह नशीली चीजों का भी सेवन करना और धर्मात्मा भी कहलाना । जहाँ कोई संयम नहीं, जहाँ कुछ कष्ट न करना पड़े जैसा चाहे रह लिया, अपने को बड़ा मान लिया, बड़ा धर्मात्मा । कितना सस्ता धर्म का नुस्खा बता दिया जिससे कि अनेक प्रकार के और और मजहब बढ़ रहे, और जो धर्म की सच्ची बात कहता है, जिसमें व्रत, तप, संयम का आदर दिया हुआ है, बस उसका अब पूछने वाला कोई नहीं । और हो भी पूछने वाले, तो वे भी घट जायेंगे अगर उनको सस्ता धर्म कोई समझ में आता है तो । यह बड़ा दुर्निवार है अहंकार अंधकार । सो बात यहाँ छा रही है, भीतर निरख मेरे पर क्या बीत रही? मैं यह शरीर नहीं । जो शरीर के ऊपर देखे कि क्या बीत रहा है । ऊपर से धोती, कुर्ता, टोपी सजे लगे हैं, कुछ नहीं बीत रहा । अरे भीतर में तो निरखो, यहाँ क्या बीत रहा? संकल्प विकल्प, अहंकार ममकार, यह करना वह करना बस “करिष्यामि करिष्यामि करिष्यामीति चिंतितं । मरिष्यामि मरिष्यामि मरिष्यामीति विस्मृतम्” याने मैं करूँगा, करूंगा, यह बात बिल्कुल भूल रहे । तो पर पदार्थों में कुछ करने का जो परिणाम है यह घोर अंधकार है इसमें बुद्धि काम नहीं देती । भैया श्रद्धा सत्य रखें फिर गृहस्थी में जो कुछ करना पड़े तो वह इस प्रकार का करना बनेगा कि जैसे किसी कैदी पर कोई सिपाही सवार होकर कह रहा है कि तुम यह काम करो, उस कैदी को वह काम करना पड़ रहा, मगर चित्त से वह उस काम से विरक्त है अर्थात् करना तो नहीं चाहता । बस ऐसे ही इन कर्मों के कैदी गृहस्थ को करना पड़ेगा सब कुछ, दूकान धंधा करे, सारे काम करे, घर बसाये, व्यवहार रखे, मगर ज्ञानी गृहस्थ तो यह जानता है कि किसी भी पर पदार्थ में कुछ भी कर सकने में मैं समर्थ नहीं हूँ । हो रहा है सब प्राकृतिक, आटोमेटिक, निमित्तनैमित्तिक, पर प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें ही अपनी परिणति कर सकता है । दूसरे में कुछ नहीं कर सकता ।

548―भूतार्थ का आश्रय कर विडंबना से दूर रहने का अनुरोध―यह जीव अब तक पर तत्त्वों में, मैं यह करता हूँ, मैं वह करता हूँ इस प्रकार की दौड़ के कारण यह महान अहंकार, अंधकार में फँस गया । अच्छा फंस तो गया किंतु जैसे यहाँ हरएक कोई सोचता है चाहे कितना ही फँस जाये फिर भी यह सोचता कि अब तो बच लें, अब तो मार्ग दृढ़ बना लें, अब तो कुछ सुलझेरा बना लें, तो अपने को ऐसा सोचना है कि है यह हालत, मगर अब क्या करना चाहिये? कैसे इन झंझटों से छूटे? उसका उपाय क्या है? देखो जिस भाव से, जिस विकल्प से हम दु:खी रहा करते हैं उस भाव को हमें नष्ट करना चाहिये । कैसे नष्ट हो? बस कैसे कष्ट आया था बताओ? इन विकल्पों में यह मैं हूँ ऐसा अज्ञान रखने के कारण यह विकल्प आया था । अरै तो सीधी औषधि है उन विकल्पों में यह बुद्धि लावे कि यह मेरा स्वरूप नहीं, यह मेरे स्वभाव की चीज नहीं । यह नैमित्तिक छाया है । मैं तो सहज ज्ञान स्वरूप हूँ । ऐसे एक भूतार्थ तत्त्व का याने शुद्धनय के विषयभूत इस सहज आत्मस्वरूप का अगर एक बार भी ग्रहण किया जाये, परिग्रहण किया जाये तो फिर यह बंधन न ठहरेगा, बोलो क्या करता, इस विडंबना से छूटने के लिये क्या उपाय करना है? जो भूतार्थ तत्त्व है याने अपने आपमें सहज अनादि अनंत जो भाव है उस भावरूप अपने को स्वीकार करना है कि मैं यह हूँ, सब विडंबना दूर हो जायेगी । यदि एक बार भी इस सहज ज्ञानस्वरूप को स्वीकार करने के कारण ये संकल्प विकल्प, यह अज्ञान अंधकार दूर हो जाये तो ज्ञानघन इस आत्मा का फिर बंधन न होगा । एक बार अज्ञान मिट जाये तो बस वह मिट चुका । अब अज्ञान में रहने वाली व्यग्रता न होगी ।

549―सत्यस्वरूप के परिचय के प्रकाश का महत्त्व समझने के लिये एक लौकिक दृष्टांत―बाजार में एक चित्र छपा कार्ड आता है जिसमें वृक्षों के दो तीन चित्र बने रहते हैं, उन चित्रों के विषय में कोई किसी से पूछता कि बताओ इन चित्रों में जीव पदार्थों के भी चित्र है क्या? तो वह बहुत-बहुत देखता, खूब देखकर हैरान होता और कह देता कि इसमें तो किसी भी पशु का चित्र नहीं है । इसमें तो केवल पत्ती वाले वृक्षों के चित्र है । तो कोई पुरुष कहता है कि देखो इन वृक्षों के बीच में यह जो खाली (Blank) जगह दिख रही, इसमें यह देखो मुख बना है, ये देखो पैर बने हैं, यह देखो पेट का हिस्सा बना है, ये देखो कान बने हैं, इधर यह देखो पूछ बनी है तो यह खरगोश बन गया ना ?....हां बन तो गया खरगोश । अ वह भली भांति समझ गया कि हाँ इसमें इस तरह से खरगोश बना है । फिर उसी चित्र में दूसरी खाली जगहों में दिखाता है तो उसमें कोई चार-पांच खरगोशों के चित्र मिल गए । देख लिया कार्ड में खरगोश के चित्र । अब उसे कोई वैसे कितने ही कार्ड वे दिखा दे तो झट वह बता देगा कि ये देखो 4-5 खरगोशों के चित्र बने हैं । उसे अब खरगोशों के चित्रों को देखने में किसी प्रकार का विलंब नहीं लगता । उनके देखने में किसी प्रकार की व्यग्रता नहीं होती । कोई दिखाने पर तुरंत ही उन चित्रों को दिखाकर बता देता ।

550―सत्यस्वरूप के परिचय के प्रकाश का महत्त्व―यह ज्ञानानंद निधान सहज परमात्मतत्त्व भगवान आत्मा जो ज्ञान से परिपूर्ण सहज अनंत आनंदमय है इसका तो हमें पता नहीं है और आनंद सो चाहिए इसे जरूर, कोई मनुष्य यह धैर्य नहीं रखता कि अजी मुझे आनंद की क्या जरूरत ? मत मिलो, मुझे जानने की क्या जरूरत ? जानने में मत आये, हर एक के चित्त में जानने और आनंद की धुन लगी है । जानना चाहता है और आनंद पाना चाहता है, पर ज्ञान और आनंद का जो स्वरूप है, निधान है, स्वयं है उसकी इसको सुध नहीं, पता नहीं तो खोजने में व्यग्र हो रहा, यहाँ मिलेगा आनंद, घर में मिलेगा आनंद, इस चीज के खाने में आयेगा आनंद, अमुक से प्रीति रखने में आयेगा आनंद, कैसा डोल रहा, क्या-क्या संग्रह कर रहा, आनंद पाने के ख्याल में व्यग्र हो रहे ? और आनंद मिल नहीं रहा, ऐसी स्थिति में कोई गुरु ज्ञानी संत बतायें कि देखो तुम्हारा आनंद हम बताते हैं, जहां है, हम तुमको वहाँ लिए जाते हैं । बड़ी अच्छी कृपा होती महाराज ।....अच्छा बैठ जाओ स्थिर आसन से सीधे, तुम्हारा आनंद नहीं मिलेगा । तुम बाहर की सब बातों को छोड़ दो, क्योंकि बाहर के किसी भी पदार्थ में तुमने आज तक आनंद तो नहीं पाया । सबने दगा दिया ना ? सबका वियोग हुआ ना ? उनके संबंध में कष्ट पाया ना ? तो अब एक बार इतना साहस बनायें कि उन सारे पदार्थों को भूल जावें, सबका ख्याल छोड़ दें और अंतर में देह का भी ख्याल छोड़कर आंखें मींच लो, इंद्रिय की कोई भी तर्कणा न रखो, बहुत भीतर आओ, इस देह का भी भान छोड़ दो, समग्र बाह्य पदार्थों का भान छोड़ दो, बस विश्राम से बैठ जाओ कि जब हमें कहीं भी आनंद न मिला तो सबका एक साथ परित्याग कर दें, ज्ञान द्वारा ख्याल छोड़ दें, विश्राम से बैठे और इस हृदय प्लेटफार्म को बिल्कुल क्लियर कर लें, कुछ यहाँ न रहे, तो देखो यह तो स्व रहेगा, यह तो हटाया नहीं जा सकता, बाकी सब हटा दिया तो जो स्वयं है, ज्ञानघन है बस वही उड़ेलकर बड़े प्रवाह से, वेग से इसको जब दर्शन देगा । यह अपने ज्ञान में उस सहज ज्ञानस्वरूप का अनुभव करेगा । ऐसा अगर एक बार भी इस सत्य तत्त्व के प्रकाश से यह विकल्प जाल विलय को प्राप्त हो जाये तब फिर ज्ञानघन इस आत्मा का फिर बंधन नहीं हो सकता और जो निर्बंध है सो ही कल्याण, सो ही आनंद, सो ही शांति । तो दृष्टि यह होनी चाहिए अपने आपमें कि मैं सहज ज्ञान ज्योति स्वरूप हूं, अन्य कुछ नहीं हूं ।


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