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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 56

From जैनकोष



आत्मभावान् करोत्यात्मा, परभावान् सदा पर: ।

आत्मैव ह्मात्मनो भावा: परस्य पर एव ते ।।56।।

551―प्रत्येक पदार्थ का अपने-अपने में कर्तृत्व―आत्मा और कर्म इन दोनों का व्यापार जो बन रहा, इसके भीतर जो इन दोनों की क्रिया चल रही है उनके संबंध में विचार किया गया कि आत्मा के भावों को आत्मा करता है और कर्मों के भावों को कर्म करते हैं । भाव याने परिणाम । निश्चय से आत्मा के परिणमन को करने वाला आत्मा और पर पदार्थ के परिणमन को करने वाला वही पर पदार्थ । मोटे रूप से भी देखो तो बाहर में यह ही नजर आयेगा कि एक के काम को वही करता है, दूसरे के काम को वही दूसरा करता है । हाँ विकार में एक निमित्तनैमित्तिक योग की बात जरूर है । कोई जैसे दूसरे का हाथ पकड़कर खींच ले जाता तो कहता कि यह उसे पकड़कर खींच ले गया, मगर निश्चय से देखो तो जितना यह एक है उसका काम उसी में है, दूसरे का काम दूसरे में ही है, तो देखिये आत्मा के भावों को वही आत्मा करता है और पर भावों को पर ही करता है, क्योंकि जो आत्मा के भाव हैं वे आत्मा ही है । जैसे ये दो अंगुली है छोटी बड़ी तो इसमें एक अंगुली दूसरी का क्या कर पायेगी प्रत्येक अंगुली ? अपना ही काम कर पायेगी अपने में मुड़ ले अपने में कुछ भी बदल कर ले । यह छोटी अंगुली अपना ही काम करेगी, यह बड़ी अंगुली अपना ही काम करेगी क्योंकि छोटी तो नहीं बन गई । बड़ी अंगुली जो अपने में परिणमन करेगी

वह यही तो रही, दूसरी तो न बन जायेंगी । यहाँ आप कई मनुष्य बैठे है तो ये सभी पुरुष अपना-अपना व्यापार करते हैं, कोई दूसरे की परिणति तो नहीं करता, आपकी जो चेष्टा है वह आपमें ही रहती है, पर की जो चेष्टा है वह पर में ही रहती है । तभी तो यह कह पाते हैं कि आप आप है, यह दूसरा है । तो जगत् में जितने भी पदार्थ हैं वे सब अपना-अपना ही परिणमन करते हैं, यह बात इस प्रकरण में बतलायी जा रही है । अब जरा यह सिद्धांत आप अपने पर घटावो, मैं यह केवल ज्ञानमय पदार्थ केवल अपना ही काम कर पाता हूं । भाव बनाऊं, ज्ञान करूं, मैं अपना ही काम कर पाता, दूसरे अपना काम करते । जो ऐसा नहीं मानते उनको क्या आकुलता होती कि बात तो है सही यह कि प्रत्येक जीव भिन्न-भिन्न अत्यंत स्वतंत्र हैं, एक का दूसरे पर रंच भी अधिकार नहीं । वस्तुस्वरूप बतला रहा यह, लेकिन यह मोही दूसरे पर अपना अधिकार समझता है, बस यही कारण है कि जो हम चाहें वैसा होता नहीं और जब वैसा होता नहीं तो अपने कारण से दु:खी होते हैं । क्यों दु:खी होवें कोई किसी दूसरे पदार्थ का करने वाला नहीं ।

552―पर व परभाव से भिन्नता समझने के लिये एक दृष्टांत―दृष्टांत लो जैसे यहाँ एक दर्पण है, दर्पण के सामने एक खेलने का हवाई जहाज रखा है, उसका सन्निधान पाकर दर्पण ने उसके अनुरूप अपना प्रतिबिंब बनाया है । अब यहाँ चार बातें समझियेगा । दर्पण, दर्पण में आया हुआ प्रतिबिंब, वह खिलौना, खिलौने का रंगरूप । यहाँ चीजें तो दो हैं―खिलौना और दर्पण । बतलावो दर्पण क्या खिलौने की परिणति करता है ? खिलौने में क्या कोई अदल-बदल करता है ? अरे दर्पण अपनी जगह है । उस खिलौने में ही हो रहा, रंग बदले चले, फूले, जो भी बात बने वह उसका उसमें है, दर्पण का दर्पण में है । अभी स्वच्छता थी, अब सामने उस पदार्थ का सन्निधान पाकर उस स्वच्छता का विकार बन गया, पर दर्पण ने जो कुछ किया सो अपने में ही तो किया बाहर नहीं किया क्योंकि दर्पण का जो प्रतिबिंब हैं वह दर्पण ही तो है । स्वच्छता रूप न रहा, विकार रूप बन गया, और खिलौने में जो रंगरूप है वह वही तो है, उससे अलग नहीं । तो इस निगाह से अगर दुनिया के पदार्थों को निरखा जाये तो इस जीव को तो फिर मोह उत्पन्न न होगा, बेसुधी न रहेगी । यह इसका कुछ कर न सकेगा ।

553―परमार्थ जीव की पर व परभाव से विविक्तता के प्रकरण में जीव के नास्तित्व का निराकरण―उक्त दृष्टांत की भांति ही यहाँ निरखो कि जीव और कर्म ये दो चीजें हैं, जैसे जीव अनुभव में आता है कि मैं कुछ हूँ मैं हूँ, ऐसा सोचते हुए जो कुछ भी भाव होता है, जीव समझता है जिसे कि यह मैं हूँ, वही एक वास्तविक चीज है जीव, की, अनेक लोग तो जीव के बारे में संदेह रखते हैं, कहते हैं कि जीव कोई चीज नहीं, यह तो एक भ्रम लगा रखा है नास्तिक चार्वाक लोगों ने कहा, उनका कहना यह है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु ये मिल गए तो एक जीव बन गया, जीव अलग से कोई वस्तु नहीं, और कहते हैं कि ये चारों बिखर गए तो जीव जड़ से नष्ट हो गया । जीव कोई अलग चीज न था, इनका मिलना और इन्हीं का बिछुड़ना, इसी को ही जीव का जन्म मरण कहते हैं, मगर ऐसा कहने वाले यह तो सोचें कि जीव में तो है चेतनता, ज्ञान, समझ की बात और बाह्य पृथ्वी जल, अग्नि, वायु भौतिक, इनमें चेतना है नहीं तो जड़ पदार्थ कितने ही मिल जाये, कैसा ही उनका मिश्रण बन जाये, लेकिन जड़ पदार्थों से कहीं चेतना की बात आ सकती है? ये जाति दो हैं, चेतन जाति का पदार्थ अलग है, अचेतन जाति का पदार्थ अलग है, अचेतनों का पुंज मिलकर कहीं चेतन नहीं बन सकता है ।

554―पर व परभाव से परमार्थ जीव की विविक्तता के प्रकरण में जीव के क्षणस्थायित्व का निराकरण―कुछ दार्शनिक ऐसे भी हैं कि जो कुछ-कुछ तो जीव की बात मान लेते हैं मगर उसे यथावत् नहीं मान सकते । जैसे क्षणिकवादी उनका कहना है कि जीव उत्पन्न तो होता है मगर वह एक समय को होता है, दूसरे समय वह नहीं रहता, एक समय को जीव आया, दूसरे समय न रहा, समय के मायने एक सेकेंड में अनगिनते समय होते, उनमें से एक समय को जीव उत्पन्न हुआ, दूसरे समय जीव नहीं रहता । उनसे कोई पूछे कि हमको तो ऐसा लग रहा कि मैं तो 50-60 साल का हो गया, वही का वही हूँ जो बचपन में था सो ही अब हूँ, और भूली पिछली बातें याद आती हैं तो वही हूँ तब ही तो याद आती हैं इस प्रश्न पर उनका यह कहना है कि नया जीव उत्पन्न होता है और पुराना जीव खत्म होता है सो वह पुराना जीव अपना चार्ज नये जीव को दे जाता और वह मिट जाता, तो क्या कहना है कि जो जीव खतम हो रहा वह अपनी बात उस नये जीव को सौंप देता, अब उसको वह सम्हालेगा, वह भी तो मिटता, सो वह तीसरे को सम्हाल कर जाता, इस तरह देह में एक ही दिन में अनगिनते जीव पैदा हो जाते हैं, एक जीव नहीं है और वे एक दूसरे को सम्हाल कर चले जाते हैं, लेकिन यह भी कहना उनका जीव नहीं मानने की तरह है, अगर ऐसा होने लगे कि एक जीव दूसरे जीव को सम्हाल जाये तो भला इस ही देह में क्यों ऐसा हो रहा? कोई जीव किसी अन्य देह के जीव को क्यों नहीं अपना चार्ज सम्हाल देता? इस बात का विचार करें तो बात यही आयेगी कि जीव मैं हूँ वही एक, किंतु प्रति समय में उसकी नई-नई अवस्थायें बनती हैं, तो मुझमें जो अवस्थायें बनती हैं उनका करने वाला कोई दूसरा नहीं ।

555―कर्मरस से ज्ञानस्वरस की भिन्नता―यद्यपि ज्ञान विकल्प रागद्वेष ये सद चलते हैं, लेकिन भले ही चलें ये कर्मोंदय का निमित्त पाकर पर उस कर्मोदय के और अपने विषय में ज्ञान इस तरह से ढाल लें कि इस कर्त्तव्य को करने वाला मैं, और कर्म का करने वाला कर्म, और जैसे दर्पण में वैसी ही फोटो आती है जैसी कि चीज सामने हो । हैं दो बातें अलग-अलग, वह चीज अलग है, दर्पण अलग रखा, पर दर्पण में जो फोटो आयी वह दर्पण का ही परिणमन तो है मगर अब उस सामने वाली चीज के अनुरूप जैसा है वह वैसा दर्पण में प्रतिबिंब बना, इसका कारण क्या है? कि दर्पण है एक स्वच्छ पदार्थ उसमें उस ही अनुरूप झलक आयेगी जैसी कि चीज

चीज सामने है, यही बात आत्मा में है, कर्म के अनेक भेद हैं―मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, अज्ञान और उनके भी अनेक भेद, तो जैसे-जैसे वे कर्म हैं उनका सन्निधान पाकर जीव में वैसी ही वैसी फोटो आयी, छाया आयी, प्रतिबिंब हुआ, किस ढंग से? ज्ञान जिस तरह का विकल्प करे, सोचे, उस ढंग से हुआ । तो ऐसा जो स्व व पर में अभेद स्वीकार करना है,यह सब विकट कर्मरस है, ज्ञानरस में मिल गया है इसलिए ऐसा ऐसा विश्वास बना है, जौ जीव कर्मरस से जुदा अपने स्वरूप को माने वह कर्मरस से हट जाता है, भीतर में मिथ्या जो भेद विज्ञान करता है । उस पुरुष को सम्यक्त्व हुआ और वही भव्य जगत के समस्त पदार्थों को भिन्न, अपने लिए अहित व असार समझता है ।

556―पर से लगाव रखने में विडंबना एवं विपत्ति―देखिये―जीवन में दुःख का कारण यह एक ही है-पर पदार्थ के प्रति अपना लगाव रखना, मोह रखना, अज्ञान रखना, यह ध्यान में रहना कि ये सब मेरे ही तो हैं, अरे ! मेरे-मेरे कहने वाले किसी दिन अचानक ही इस देह को छोड़कर विदा हो जावेंगे, यहाँ का कुछ भी समागम साथ न जायेगा । यहाँ से मरकर न जाने कहाँ उत्पन्न हुए और फिर उसके लिए यहाँ की चीजों से क्या मतलब? फिर यहाँ की चीजों से उसे कुछ सुविधा मिल पायेगी क्या? अरे ! कोई सुविधा न मिलेगी । यह जीव अकेला ही जन्मता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही आगे जाता है, और जहाँ-जहाँ जैसा-जैसा संग मिलता वहाँ उस ही में रम जाता । बस यही व्यापार इस जीव का अनादिकाल से चला आ रहा, जब इसको ज्ञान जगे कि यह मैं हूँ, ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व मैं हूँ, अन्य कुछ मैं नहीं, मेरा सर्वस्व यह है, इस ही में मेरी दुनिया है, यहाँ ही मेरी परिणति होती है, ऐसा एक अपने आपके स्वरूप का परिचय बने तो अज्ञान छूट जायेगा, सही बोध होगा । बाहर में मेरा कहीं कुछ नहीं, अंतस्तत्त्व का अनुभव हो, बस मुक्ति का मार्ग मिल गया, शांति का रास्ता उसे मिल गया, कर्तव्य जीवन में एक यही है कि मोह न रहे, बड़े-बड़े सम्राट, चक्रवर्ती हुए हैं, वे 6 खंड का राज्य भोगते हैं किंतु वहाँ भी जो ज्ञानी हैं, उनके रंच मात्र भी मोह नहीं है, हाँ राग तो चल रहा है, पर मोह नहीं है, राग में और मोह में अंतर है । दुःख तो राग में भी है मगर मोह का दुःख कठिन दुःख है, क्योंकि मोह में तो है बेसुधी, अत्यंत लगाव और राग है परिस्थिति वश ।

557―राग और मोह की परिस्थितियों के प्रभाव―परिस्थितिवश प्रेम होने को राग कहते हैं और अज्ञानवश पर पदार्थों में आसक्त होने को मोह कहते हैं, यह बात सब लोग समझ सकते हैं । आखिर बीमार तो प्राय: सभी होते हैं, कहीं कोई बीमारी हुई, कहीं कोई रोग हो गया, तो उस बीमारी के समय में वैद्य से भी राग, दवाई से राग देख लो, उस पलंग से राग रहता कि नहीं, वैद्य को बुलाने के लिए खूब चित्त में प्रेम बनाते कि नहीं? पलंग अच्छा न बिछा हो तो झुंझलाते कि नहीं? उस रोगी को पलंग में राग, औषधि में राग, वैद्य में राग है, मगर मोह नहीं है । अगर इन चीजों में मोह होता तो रोगी के चित्त में यह बात रहती कि बस ऐसा ही पलंग मुझे जीवन भर मिले, ऐसी औषधि मुझे जिंदगी भर मिलती रहे, और यह वैद्य जी जिंदगी भर मेरे पास आते रहें, चाहे 5) प्रतिदिन के बजाय 20) प्रतिदिन खर्च हो, इन सब चीजों से मुझे बड़ा आनंद है, ऐसी बात तो उस रोगी के चित्त में नहीं रहती । उसे परिस्थितिवश उन चीजों से राग करना पड़ता है, उसे उन चीजों में मोह नहीं होता । वह तो चाहता है कि मुझे कब इस रोग से छुटकारा मिले, इन झंझटों से कब बचें और प्रतिदिन एक दो मील जगह टहलने को मिले, तो जैसे दवा पीना जल्दी छूट जाये इसके लिए वह दवा पी रहा इसी तरह से उसे न तो वैद्य से मोह है और न उस पलंग से । हाँ परिस्थितिवश राग जरूर करना पड़ता है, तो ऐसी ही बात उस ज्ञानी पुरुष की है जिसे परिस्थितिवश गृहस्थी के बीच रहना पड़ता है । उस ज्ञानी गृहस्थ को गृहस्थी के अंदर रखी हुई चीजों में राग तो है, उनकी सम्हाल करता है, सुरक्षित रखता है, व्यवस्था बनाता है, क्योंकि घर में रह रहा, खर्च लगा है, कुटुंबीजन हैं, मगर उन सब चीजों में मोह नहीं है ज्ञानी को, वह ज्ञानी यह नहीं समझता कि ऐसा वैभव, ऐसा संग यही मेरा सर्वस्व है और इसी से मैं जिंदा रह रहा हूँ, इसी के कारण मेरी सत्ता बनी है, ऐसा उस ज्ञानी को उन बाह्य पदार्थों में मोह कतई नहीं है, वह ठीक समझ रहा है कि अणु-अणु, प्रत्येक पदार्थ, ये भिन्न हैं मुझसे । मेरा उनसे रंच मात्र भी संबंध नहीं ।

559―शांति का उपक्रम भेदविज्ञान―यह भेद विज्ञान ही एक ऐसा अमृतपान है कि इस ज्ञानी को संकट नहीं आता, जब-जब भी किसी मनुष्य पर संकट आता है तो वह भेदविज्ञान जैसी बात भी चित्त में आती है तो कुछ संतोष मिलता है, क्योंकि यथार्थता की गल्ती यही है । किसी पुरुष का कोई इष्ट गुजर जाये तो दूर-दूर से रिश्तेदार भी आते और उसके प्रति सहानुभूति दर्शाते, पर कुछ जो ना समझ हैं वे तो इस तरह सहानुभूति दर्शाते कि उससे जरा लगाव की बात अधिक बढ़ जाये, जैसे हाय बड़ा अच्छा था, बड़ा कमाऊ था, सबकी रक्षा करता था―तो ऐसी-ऐसी बातों से उसका दुःख मिटने के बजाये बढ़ता है, कोई मझोले समझदार भी होते हैं तो वे समझाते हैं कि भाई वह अपने कर्म से आया था, अपने कर्म के अनुसार चला गया, उससे तुम्हारा इतने ही दिनों का संबंध था आदि कुछ ऐसी बातें कह कहकर कुछ सांत्वना का उपाय करते हैं, मगर जो अत्यंत समझदार जन हैं वे इस प्रकार से कहते हैं कि अरे तुम तो इतने बड़े महत्त्वशाली प्रभु की तरह ज्ञानानंद स्वरूपवान हो, फिर यह क्या बेवकूफी करते, क्या मुग्धता करते, अत्यंत भिन्न पदार्थ मेरा जिनमें न द्रव्यत्व मिले, जिनमें मेरा न क्षेत्र है, न काल है, न भाव है, कोई संबंध नहीं, अत्यंत निराले, जैसे एक पदार्थ का दूसरा पदार्थ यहाँ कुछ नहीं दिखता, औरों के नहीं दिखता, ऐसे ही अत्यंत निराले, जिनसे कोई संबंध नहीं, अनंतानंत जीव, उनमें से कोई आ गए, यहाँ तो जीव आते जाते रहते हैं, किसी का किसी से रंच भी संबंध नहीं, उसके लिए दूसरे विकल्प बनाकर पाप ही बाँधे जा रहे हैं । दुःख की परंपरा ही बनायी जा रही, तब सोचना है कि यहाँ कुछ भी तो बाहर में मेरा नहीं, यह देह तक भी मेरा नहीं, मैं तो केवल एक ज्ञानानंदस्वरूप आत्मा हूं, देखिये यथार्थ ज्ञान से तृप्ति आयी, संतोष हुआ । किसने शांति दी? खुद के ज्ञान प्रकाश ने शांति दी ।

560―किसी भी जीव की अन्य जीव से रक्षा व विनाश की अशक्यता―कोई पुरुष किसी दूसरे की रक्षा करने में समर्थ नहीं, उस ही का ज्ञान उसकी स्वयं रक्षा करता है, दूसरा कोई किसी का साथी नहीं, प्रकट बात है, प्रत्येक आत्मा अपने परिणाम करता है कोई किसी दूसरे का परिणाम नहीं करता । इसके अनेक उदाहरण हैं, श्रीपाल को धवल सेठ ने श्रीपाल की स्त्री के लोभ में समुद्र में गिरा दिया था, धवल ने क्या काम किया? अपने परिणाम खराब किये, पाप का बंध किया इतना ही तो कर सका वह । उसका कोई अधिकार तो न था कि किसी जीव का बुरा भला कर दे, अगर श्रीपाल समुद्र में गिरा तो वह श्रीपाल के पाप कर्म का उदय था, वह एक निमित्त बन गया, आश्रय बन गया, वह बात अलग है, फिर भी उसके पुण्य का उदय भी था कि समुद्र के किनारे आ लगा, बाहर निकल आया, दूसरे राजा को आधा राज्य मिला, कन्या भी मिली, और भी अनेक बातें मिली, तो कोई किसी का बुरा चाहता है तो वह केवल अपने परिणाम ही तो खराब करता है, किसी का बुरा नहीं कर सकता, और अगर कोई किसी का भला चाहता है तो अपने में पुण्य बंध करता है, अपना भविष्य बढ़िया बना लेता है, पर दूसरे का भला चाहने से दूसरे का भला हो ही जाये यह बात तो नहीं है, वह खुद अपना ज्ञान सम्हालेगा तो उसका भला हो पायेगा । जगत में सब जीव अपने-अपने कर्मोदय से सुखी दु:खी होते हैं, समयसार में बंधाधिकार में भली भाँति यह बात स्पष्ट की है, कि जब ऐसी स्थिति है कि प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मानुसार सुख दुःख पाता है तो फिर दूसरे जीव के बारे में इसे सुखी कर दूँ, इसे दुःखी कर दूँ ऐसा सोचना मिथ्या है, कोई किसी के प्रति मोहवश ऐसा भी सोचे कि मैं इसे सुखी कर सकता हूँ, दुःखी कर सकता हूँ, तो वहाँ सुखी दुःखी तो न हो जायेगा दूसरा, यह ही अपने भावों के अनुसार पुण्य पाप का बंध करेगा । तो इस आत्मा को यहाँ संबोधित किया है कि हे आत्मन, तू इन विकार परिणामों में रुचि मत कर । इनमें रुचि करने से तेरा कुछ भला नहीं होता, तू विकार परिणामों से हट कर अपने आप में जो धर्मरूप स्वभाव है उसका अनुभव कर ।

561―प्रभु स्वरूप के परिचय से आत्मस्वभाव की सुध और सन्मार्ग पर चलने का उत्साह―हम आपका और प्रभु का स्वरूप एक समान है, जब प्रभु की पूजा में कहते हैं कि हे प्रभु आपने उत्तम क्षमा प्राप्त की यों प्रभु का गुण गाते हैं, वही गुण क्या मुझमें नहीं? क्षमा का गुण मुझमें भी है मगर अज्ञान और कषाय का जब वेग आता है तो इस क्षमा के गुण को कुचल डालता है और बजाये उसके यहाँ गुस्सा की प्रवृत्ति बनती है और गुस्सा में जो चेष्टा करता है उसमें खुद भी दुःखी होता, दूसरा भी दुःखी होता । बनाकर दुःख मोल लिया करता है जीव । दुःख का स्वरूप तो नहीं है जीव का, मगर यह बना बनाकर दुःख को बढ़ावा दिया करता है, प्रभु में मान कषाय नहीं इसलिए शान, पोजीशन, सम्मान अपमान आदिक के भाव उत्पन्न नहीं होते, और देखिये कितना आनंदमय है, तो ऐसा मार्दव धर्म यह गुण क्या मुझमें नहीं है? मेरे में है, पर अज्ञान का ऐसा अंधेरा छाया है कि हम अपने उस निर्मल स्वरूप का उपयोग नहीं कर पाते, प्रभु सरल हैं, जो अंदर सो बाहर, जो स्वरूप सहज ज्ञान अंतरंग में है वही परिणमन में है, ऐसा गुण क्या मुझमें नहीं है, अज्ञान और कषाय के कारण हम अपने गुणों को कुचल रहे हैं । प्रभु पवित्र, निर्मोह, तृष्णारहित संतोष के आधार, एक पवित्र स्वरूप हैं यह ही स्वरूप तो हमारा है । यह तो कर्म का उदय है, जो ये लीलायें चल रही हैं, ये मैं नहीं, मैं तो भीतर सहज पवित्र हूं, जो प्रभु का स्वरूप सो मेरा स्वरूप । जहाँ कषायों का परिहार हुआ, जहाँ एक सच्चाई प्रकट हुई तो फिर यह जीव अपनी जो ज्ञान किरणें बिखेर रहा था बाहर-बाहर, उन सबको समेटकर एक अपने इस ज्ञानस्वरूप में रत होता है, उसका प्रताप ऐसा उत्पन्न होता है कि जो यहाँ मैल है वह सब जल जाता है, उस मैल के जलने पर जो यहाँ कैवल्य स्वरूप इसका था वही रह गया, अब उसमें दूसरी चीज कुछ न रही, जहाँ इसमें आकिंचन्य प्रकट हो गया, यह मैं वही रह गया, बस वही तो एक ब्रह्मचर्य का उत्कृष्ट रूप है, आत्मा आत्मा में ठहर गया । यह दशलक्षण धर्म एक आत्म प्रगति करने के उपायों का भला संकेत है, किस तरह से हम गिरी अवस्था से उठकर प्रभु जैसी एक ऊँची अवस्था में आ सकें उसके लिए यह दशलक्षण धर्म बतलाया । क्षमा करें, मान न करें, सरल बनें, लोभ का त्याग करें, अपने में सच्चाई प्रकट करें, अपने में संयत हो जावे, तो तप प्रकट होगा, भीतर के प्रताप में त्याग बन जायेगा विभावों का, तब हम रह जायेंगे अकिंचन, अन्य कुछ नहीं, केवल हम ही हम, बस वहाँ पूर्ण ब्रह्मचर्य प्रकट होगा । तो यह सब भेदविज्ञान के प्रताप से बनता है इसलिए हमें भेदविज्ञान और ज्ञानसाधना में बहुत अधिक उपयोग लगाना चाहिए ।


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