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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 59

From जैनकोष



ज्ञानाद्विवेचकतया तु परात्मनोर्यो, जानाति हंस इव वा:पयसोर्विशेषं ।

चैतन्यधातुमचलं हि सदाधिरूढो जानीत एव हि करोति न किंचनापि ।।59।।

574―ज्ञानबल से उद्भूत―पहले छंद में बताया गया था कि निज में और पर में स्वरूपविषयक भेद विज्ञान न होने से यह कर्ता होता है और आकुलित होता है । अब इस छद में बतला रहे हैं कि जब ज्ञान हो जाता है निज और पर में, तो यह विवेचक होता है । ज्ञान क्या? मैं क्या हूँ? सहज ज्ञानस्वरूप । इससे बाहर किसी भी चीज को ज्ञानी आत्मा स्वीकार करने को तैयार नहीं होता । मैं हूँ सहज ज्ञानस्वरूप याने अपने आप अपनी सत्ता के कारण पर के संबंध बिना, उपाधि के बिना अकेले में जो इसका स्वरूप हो सकता है, स्वभाव हो सकता है उसे कहते हैं सहज ज्ञानभाव, तो सहज ज्ञानस्वरूप ही मैं हूँ, मैं अन्य कुछ नहीं हूँ । बस यह जिसके विश्वास में नहीं है, यह बात जिसकी प्रतीति में नहीं है, एक अज्ञान है उसके जरा-जरासी बातों में जरा-जरासी घटना में क्रोध उमड़ेगा, घमंड आयेगा, मायाचार होगा, लोभ कषाय बढ़ेगी और जिसको इस रहस्य का पता है कि मैं तो सहज ज्ञान ज्ञान ही हूं, अन्य कुछ नहीं हूँ, बड़े दृढ़ निर्णय के साथ जिसकी यह आस्था बनी है वह बाहर में कुछ भी घटना घटे, वह तो ज्ञाता द्रष्टा रहता है कि इस पदार्थ का ऐसा परिणमन बन रहा यह अज्ञानवश ऐसा बोल रहा है, यह अज्ञानवश ऐसी चेष्टा कर रहा है, क्योंकि खुद वश में है नहीं, ज्ञान की दृष्टि है नहीं, तो अज्ञान में तो विडंबना ही होती है, और देखो अज्ञानी जीव मानता तो यह है चित्त में कि मैं बड़ा चतुर हूँ, बहुत कुशल व्यक्ति हूँ, मगर लोग उसकी अज्ञान भरी चेष्टाओं को निरखकर यह समझते हैं कि कितनी अज्ञानभरी चेष्टायें इसकी चल रही हैं, पर अज्ञानी स्वयं अपने में यह मानने को तैयार नहीं होता कि मैं भूल कर रहा हूँ, जब भूल नहीं रहती, अज्ञान नहीं रहता, ज्ञान बना है तो यह चूंकि विवेचक बन गया, भेद करने वाला बन गया तब यह जानता ही है, कैसा विवेचक बना? जैसे हंस पक्षी अपनी चोंच से मिले हुए दूध पानी में दूध को अलग और पानी को अलग करता है, उसमें कहीं यह बात नहीं है कि हंस अपने आपकी बुद्धि रखकर पानी और दूध को अलग-अलग करता हो, उसकी चोंच में ही ऐसा गुण है कि, जिससे दूध और पानी अलग-अलग हो जाते हैं । कुछ रसायन भी ऐसे हो सकते जो दूध और पानी को अलग-अलग कर दें । इतना तो आप भी देखते कि दूध में नींबू का रस डाल दो तो उसका पतलापन अलग हो जाता और गाढ़ापन अलग हो जाता । तो जैसे रसायन या हंस जल और दूध में एक भेद कर देते हैं ऐसे ही ज्ञानी जीव निज में और पर में भेद करता है और वह निज को निज जानता है, पर को पर जानता है । मैं हूँ यह सहज ज्ञानस्वरूप देखो एक ही बात हृदय में जरा रट तो लो, बराबर ख्याल में तो लावो, जीवन सफल हो जायेगा । हर समय, किसी भी समय जरा यह ध्यान में लावो कि मैं तो सहज ज्ञानस्वभावी हूँ इसमें राग को काम नहीं, द्वेष नही, विचार नहीं, विकल्प नहीं, केवल जाननहार प्रतिभास हो जाये ऐसी जिसकी शुद्ध वृत्ति है, ऐसा ज्ञानस्वभाव मात्र मैं हूँ, बारबार अभ्यास करें इस भावना का और अपने आप में इस प्रकार का अनुभव बनाइये, मैं यह ज्ञानस्वरूप हूँ, सहज ज्ञानमात्र हूँ । इसके बाद फिर यह ध्यान आयेगा कि इस मुझको तो कोई पहिचानने वाला भी नहीं । घर के कुटुंबी लोग इस सकल सूरत इस भौतिक देह को देखकर यह ध्यान बना लेते हैं कि यह मेरा अमुक आ गया और जो वास्तविक जीव है इसको पहिचानने वाला तो कोई है ही नही । लोग तो इस मूर्तिक देह को देखकर रीझते हैं, रुसते हैं, नाना तरह के अपने विकल्प किया करते हैं । जो मैं अविनाशी ज्ञानस्वरूप हूँ, सहज ज्ञान स्वरूप हूँ, उसे तो कोई देख ही नहीं रहा है । ज्ञानी जान रहा है कि मैं यह सहज ज्ञानस्वरूप हूँ । जिसका कि कोई जाननहार भी नहीं है, और जो पहिचानहार होगा वह स्वयं जाता द्रष्टा हो जाता है, मुझसे प्रीति और अप्रीति कैसे करेगा? जिसे देखते हैं, जिससे देखते हैं, वह तो पौद्गलिक ही दिखेगा, आंखों से अमूर्त ज्ञानमात्र ज्ञायकस्वभाव न दिखेगा । क्या दिखेगा? यह जो हाड़, मांस, खून, पीप वगैरह पिंडोला दिख रहा है, और लोग उसी में ही अपना सम्मान अपमान समझते हैं । यहाँ की जरा-जरा सी बातों में अपमान महसूस करते शरीर में आत्मबुद्धि होने से और यहाँ से मरकर नरक निगोद आदि की नीची गतियों में पहुंच गए तो फिर वहाँ अपना क्या अपमान महसूस करेंगे? बस वहाँ तो उसे मारा इसे मारा उसे पीटा यही चलता रहेगा अथवा घुट-घुट कर जन्म मरण होता रहेगा, नरक निगोद की तो बात जाने दो, यहीं गधा, सूकर आदि हो गए तो फिर क्या सम्मान अपमान चला लेंगे । सूकरों को तो लोग जीवित ही पकड़कर, बर्छी वगैरह कोई शस्त्र मारकर जान ले लेते हैं अथवा जिंदा ही अग्नि में भून डालते हैं । एक थोड़े से मांस खाने के लोभ में सूकरों की निर्मम हत्या करते हैं । गधे भी जब तक बोझा ढोने लायक रहते तब तक रूखा-सुखा भुस पा जाते और जब असमर्थ हो जाते, कमर छिल जाती अथवा कूले सूझ जाते तो जहाँ चाहे पड़े रहते, उनकी कौन पूछ करता? यहाँ तो मनुष्य भव में जरा-जरासी बात में अपमान महसूस करते, वहाँ कैसे यह बात चल पायेगी? तो भाई यहाँ जो अपने ज्ञान को सम्हाल न पायेगा वह तो संसार में रुलेगा, दुःखी होगा उसका उद्धार न होगा उसका मोक्ष बहुत दूर है ।

575―समीचीन ज्ञान जगने पर विपदा मेघपंक्ति का विघटन―ऐसा ज्ञान बनावें कि समस्त बाह्य पदार्थों से निराला है मेरा अंतस्तत्त्व और उसकी स्वच्छता पर प्रतिबिंबित होने वाला यह कर्मविपाक भी यह मुझसे निराला है, मैं तो एक ज्ञानमात्र तत्त्व हूँ । सो मैं हूँ ना । सो मैं हूँ के नाते, सत्त्व के नाते अपने में निरंतर परिणमता रहता हूँ, और परिणमना कैसे? जब मैं ज्ञानमय हूँ, तो ज्ञान ज्ञानरूप से ही तो परिणमेगा, ऐसा परिणमता हुआ भी चूंकि कर्मरस की यहाँ झलक है, मिश्रण है, आक्रमण है, निमित्त है तब यह ज्ञान अन्य-अन्य विकल्प रूप से परिणम रहा । तो जब सही ज्ञान बन गया, यह जीव विवेचक हो गया, भेद विज्ञान हो गया तब यह केवल जाननहार बन जाता है, जान लिया, बस । जीव में हठ तो बहुत होती है मगर इस बात पर हठ कर लें कि मुझे राग द्वेष कतई नहीं करना है, मुझ हर्ष विषाद कतई नहीं करना है, मैं तो केवल जाननहार रहूंगा तो इसकी सब विपदायें दूर हो जावेंगी । देखो जो बड़े से बड़े पापी अंजनचोर या और और भी राजा माँसलोलुपी, सातों व्यसनों के सेवनहारे, सो जितने वेग से वे पापों में बढ़े, सुलटने पर उतने ही वेग से विशुद्धि में भी बड़े तो आग्रह का मोड़ बना लें इन सांसारिक बातों में पंचेंद्रिय के विषयों पर, इन पर आग्रह मत बनावो । आग्रह करें अपने आपके अंतस्तत्त्व की दृष्टि पर, तो ऐसा सत्याग्रह कौन कर सकता जिसको ज्ञान जगा, जिसने निज और पर में भेद समझा वही पुरुष जानेगा कि मैं तो एक चैतन्य धातु रूप हूँ, अचल हूँ, जो कभी चलित न हो, अनंत काल निगोद में रहा, पर वहाँ भी यह चैतन्यस्वरूप चलित न हुआ । चैतन्यस्वरूप वही पहिले रहा, वही अब है, वही अनंत काल तक रहेगा, जरा अपनी गई बीती दशाओं को तो समझो । जो है वह क्या किसी दिन से बना है? किसी दिन से कोई सत् बना हो, यह तो कभी बात है ही नहीं । जो भी वस्तु है वह किस दिन से है इसे क्या कोई बता देगा? पर्याय में तो बता देंगे कि यह पर्याय अमुक दिन से है, मगर आत्मा के सत्त्व के लिए कोई न कह सकेगा कि आत्मा की सत्ता अमुक दिन से है, वह तो अनादि अनंत है, तो ऐसा जो अनादि अनंत अंतस्तत्त्व है वह चैतन्य धातु अनंत है, आनंदधाम है, इसकी रुचि ही कल्याणमार्ग बना देती है ।

576―देह में व कर्मधारा में आत्मत्व स्वीकार करने के विकट दंड से बचने का संदेश―अज्ञान में क्या-क्या कुगतियाँ होती हैं जीव की, अनंत काल तो निगोद में रहा, वहाँ से बड़ी कठिनाई से निकला, तो त्रस पर्याय में आया, मनुष्य भव में आया । अब मनुष्यभव में आ तो गया, विकास तो हो गया, बुद्धि तो कुछ मिली, मन भी मिला, मगर यहाँ भी वही पुरानी आदत, पुराने ही संस्कार यहाँ रागद्वेष में प्रवृत्ति करा रहे हैं, अज्ञान में बुद्धि बना रहे हैं तो मनुष्य बनकर भी लाभ क्या मिला? सोचने को तो ये झोंटे, गधे क्या अपने को बुद्धिमान नहीं समझते? वे कभी अपने को हीन नहीं समझते, मैं चतुर हूँ, ठीक हूँ, ठीक चल रहा हूँ, बहुत बढ़िया काम कर रहा हूँ, यों वे झोंटे गधे वगैरह भी अपने को बड़ा कुशल समझ रहे हैं, तो अपनी बुद्धि में अपने को चतुर मान लेने मात्र से कहीं संसार से निपटारा न हो जायेगा, यह तो भेद विज्ञान से ही निपटारा बनेगा, जान लो सही-सही, मैं चैतन्य धातु हूँ, धातु क्यों कह रहे हैं कि जैसे किसी भी धातु से कितनी ही चीजें बन जाती हैं, एक चाँदी धातु है तो उससे ही देख लो, कितने ही प्रकार के आभूषण बन जाते हैं, तो ऐसे ही यह चैतन्य भी एक धातु स्त्रोत है, उसकी पर्यायें निकलती रहती हैं, मैं अचल हूँ, उस पर आरूढ़ होता हुआ ज्ञानी पुरुष मायने उस चैतन्यस्वरूप का आश्रय करता हुआ यह ज्ञानी पुरुष जानता ही है, वह किसी पदार्थ का कर्ता अपने को नहीं मानता, क्योंकि उसकी बुद्धि सुलझ गई है, ये सारी बातें जान ली गई ना, कि जो भी पदार्थ है वह अपनी परिणति से परिणमता है, कोई पदार्थ किसी दूसरे को परिणमा नहीं सकता, मैं भी किसी पर पदार्थ में कुछ करने में समर्थ न था, न हूँ और न हो सकूँगा, जान रहे हैं सब, अचेतन पदार्थों में जैसा निमित्तनैमित्तिक योग है वैसा उनमें काम चल रहा है, सिद्ध होना हो तो सिद्धविधि का काम चल रहा, और जिनके अज्ञान छाया है वे अपने उस अज्ञान के अनुसार उसका ही सहारा ले लेकर मन, वचन, काया की खोटी चेष्टायें किया करते हैं, जिसको ज्ञान हो गया वह अपनी ज्ञानरूप चेष्टा कर रहा है, अज्ञानी के अज्ञानमय ही सारे वचन निकलेंगे, चेष्टा होगी शरीर की, मन भी उसी तरह से बनेगा और ज्ञानी जीव के वचन भी सम्हले हुए निकलेंगे, शरीर की चेष्टा भी भली बनेगी, मन के विचार भी स्व-पर सुखदायी बनेंगे । यह तो मूल की बात है, जैसे नीचे अगर सीधी पतेली रख दें तो उसके ऊपर सब सीधे-सीधे ही बर्तन आयेंगे और नीचे औंधी पतेली रख दें तो उसके ऊपर सब औंधे-औंधे ही बर्तन रखे जा सकेंगे । ऐसे ही अगर यहाँ भाइयों को अज्ञान छाया है,तो कर्मों के वशीभूत हो गए, अज्ञान बना कि कर्मों के वशीभूत हो गए, यद्यपि यहाँ भी यह वशीभूत हुआ है अपनी परिणति से मगर हो तो गए वशीभूत, अब यह अपने ज्ञान से वृत्तिमान तो न रह सकेगा, जो कर्मों के वशीभूत हैं ऐसे अज्ञानी जीव इस लोक में बाहर में बस विकल्प चक्र ही किया करते हैं, किंतु जो ज्ञानी है वे कर्ता नहीं होते ।

577―सहज ज्ञानस्वभाव मात्र अपने को निरखने पर कल्याण की निश्चिति―देखो भैया ! एक ही बात चित्त में रख लो और सदा उसका ही ध्यान रखो―ज्ञानी किसे कहते हैं? जो अपने को ऐसा मान रहा है कि मैं तो सहज ज्ञानस्वभाव मात्र हूँ, और कुछ मैं नहीं, और तो उपाधि के संबंध से बिगड़ी बातें हो गई, मैं बिगड़ा, नहीं, मैं तो सहज ज्ञानस्वरूप हूँ, ऐसा भीतर में जिसने अपने आपकी भावना बनायी उसका नाम है ज्ञानी । कहीं शब्द बोल देने से ज्ञानी नहीं बनता, कहीं लोगों पर अपना रोब गाँठने से ज्ञानी नहीं बनता, ज्ञान होने का बस एक यह चह्न है, लक्षण है कि अपने आप में यह आस्था होना चाहिए कि मैं सहज ज्ञानस्वभाव रूप हूँ, मैं अन्य कुछ नहीं हूँ, अन्य तो सब पर प्रसंग के विकल्प हैं, मैं पर नहीं, मैं पर प्रसंग नहीं, मैं विकल्प नहीं, मैं तो वह हूँ जो अनादि अनंत शाश्वत हूँ, उसमें कष्ट का काम नहीं, दुःखी वह पुरुष होता जो दुःखरहित स्वभाव की सुध नहीं रखता, संसार में वह पुरुष रूलता जो भवरहित इस ज्ञानस्वभाव में आस्था नहीं रखता, जन्म मरण वही पुरुष करता जो जन्म मरण से रहित ज्ञानस्वभाव मात्र निज अंतस्तत्त्व की आस्था नहीं रखता । भाई केवल अपने को पहिचानो, अपना कैवल्य स्वरूप देखो और वहाँ ही चिंतन मनन करो कि मैं तो वह हूँ जो अपने आप सहज सत्त्व के ही कारण जो मेरे में बात है सो मैं हूँ, अन्य कुछ मैं नहीं हूँ, सारी जिंदगी भर यह ही चिंतन यह ही मनन, यह ही भावना बनायें और किसी समय यह फिट बैठ जाये, दृढ़ हो जाये कि मैं सहज ज्ञानस्वरूप हूँ तो समझ लीजिए कि यह मनुष्य जीवन पाना सार्थक हो गया और एक इतनी सी रुचि प्रकाश किरणें अपने ज्ञान की नहीं बनती हैं तो समझ लीजिए कुछ से कुछ मन, वचन, काय की चेष्टायें करते जाने पर भी इसका जीवन व्यर्थ । मरने के बाद जहाँ कहीं भी जन्म लेगा उसके लिए यहाँ का यह सब कुछ, जिसमें चित्त लगा लगाकर बड़ी परेशानी भोगी, यह कुछ भी उसके लिए नहीं रहता, तो असार क्षणिक बेकार जिनसे कोई प्रयोजन नहीं, जो मेरे आत्मा से अत्यंत भिन्न हैं उनमें बेसुध आसक्त होना, उनका लगाव रखना और उस लगाव के कारण अपने ज्ञानस्वभाव की सुध भूल जाना, यह इस जीव पर कितनी बड़ी विपदा है, इस विपदा से बचने के लिए आओ अपने आपके अंत: स्वरूप में, सारे ख्याल छोड़ दो बाहर के और एक सच्चा विश्राम लेकर यह अनुभव करो कि मैं तो यह सहज ज्ञान ज्योति मात्र अंतस्तत्त्व हूँ, इसका आश्रय लें, इस रूप अपना अनुभव बनावें, तो नियम से संसार से पार हो जायेंगे, संकटों से छूटने का दूसरा उपाय अन्य कुछ नहीं हो सकता ।

578―कर्मरस व ज्ञानरस का ज्ञान द्वारा पार्थक्य―जब निज अंतस्तत्त्व व पर एवं परभाव का भेद ज्ञात होता है कि यह अनाद्यनंत अंत: प्रकाशमान ज्ञायकस्वभाव अंतस्तत्त्व तो मैं हूँ, शेष औपाधिक भाव, उपाधि, बाह्य पदार्थ ये सभी पर हैं, जब यह भेद ज्ञात होता है तब यह ज्ञानी पर को निज नहीं बनाता व निज को पर नहीं बनाता ऐसी स्थिति में यह स्वयं ज्ञानमयीभूत हुआ है । सहज ज्ञानस्वभाव में आत्मत्व स्वीकार किया है ज्ञानी ने, इस कारण यह ज्ञानी कर्मों का कर्ता नहीं होता । निज की परिणति को निज में निज की परखने वाला, ज्ञान भाव वाला व्यामोही कैसे बन सकता है । जैसे कभी ठंडा पानी छूने वाला विवेकी व्यक्ति समझता है कि यहाँ जो ठंडा स्पर्श है सो जल में ही है, जल से अभिन्न है, इस ठंडे स्पर्श का मुझमें रंच भी प्रवेश नहीं है, हाँ, पर ज्ञान होने में यह ठंडा विषयभूत है । सो भले ही लोकदृष्टि से यह ठंडा स्पर्श ठंडा ज्ञान, अनुभव कराने में समर्थ है, तो भी उस प्रकार का ज्ञान अनुभव तो इस समय मुझ आत्मा से अभिन्न है सो यह अनुभवन जल से अत्यंत भिन्न है । प्रत्येक पदार्थ की क्रिया प्रत्येक पदार्थ का परिणमन उस ही एक से अभिन्न है, उसका दूसरे पदार्थ से कुछ भी संबंध नहीं है । ऐसा भेदज्ञान होते ही अब यह विवेकी खूब दृढ़ निर्णय किये हुए है कि मैं कभी ठंडा रूप परिणमा ही नहीं जा सकता अतएव वह अपने में व्यवस्थित संतुष्ट है । इसी प्रकार ज्ञानी जानता है कि क्रोध मान माया लोभ कषाय प्रकृति पुद्गल कर्म में क्रोध विपाक आदि उदित होता है सो यह पुद्गल की अवस्था है इससे मैं अत्यंत भिन्न हूँ, हाँ इस कषाय विपाक का मुझमें, मेरे उपयोग में प्रतिफलन हुआ है व ज्ञान विकल्प में मेरा उस प्रकार विपरिणमन हुआ है सो लोकदृष्टि से क्रोधादिविपाकानुरूप अनुभव बना है सो यह पुद्गल परिणाम उस प्रकार का अनुभव कराने में समर्थ है तो भी पुद्गल कर्म में हुआ कर्मविपाक पुद्गल कर्म से अभिन्न है और आत्मा से अत्यंत भिन्न है तथैव जो आत्मा में विषादानुभव हुआ है वह आत्मा से उस समय अभिन्न है और पुद्गल कर्म से अत्यंत भिन्न है । ऐसा भेद ज्ञान करनेवाला ज्ञानी पुरुष क्रोधादिरूप से जरा भी न परिणमता हुआ, और पुद्गल क्रोधादिरूप है इसका ज्ञाता होता हुआ क्रोधादि कर्म का कर्ता नहीं होता है और उसको तो यह ज्ञान विरुद्ध तक रहा है । इस प्रकार ज्ञानी कर्मरस का ज्ञाता मात्र है कर्ता नहीं है ।


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