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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 60

From जैनकोष



ज्ञानादेव ज्वलनपयसोरौष्ण्यशैत्स्यव्यवस्था, ज्ञानादेवोल्लसति लवणस्वादभेदव्युदास: ।

ज्ञानादेव स्वरसविकसन्नित्यचैतन्यधातो:, क्रोधादेश्च प्रभवति भिदा भिंदती कर्तृभावम् ।।60।।

598―उदाहरण में ज्ञान से ही शीतपना व उष्णपने की व्यवस्था तथा व्यंजन में नमक के स्वाद की व्यवस्था―ठीक-ठीक सही-सही व्यवस्था ज्ञान से ही होती है, पानी ठंडा है, आग गरम है, यह भेद कौन बनाता है? किसने समझाया कि पानी ठंडा होता, आग गरम होती? यह तो एक ज्ञान ने ही बताया । अग्नि का सन्निधान पाकर पानी गरम हो गया, उस गरम पानी में यह ज्ञान करना कि इसका स्वभाव तो ठंडा है, और गरमाहट अग्नि का संबंध पाकर आयी है, यह भेद कौन बताता है? ऐसी व्यवस्था ज्ञान से ही बनी । अच्छा, पकौड़ियां बनायी नमक बिना तो वे बहुत फीकी रहती; जैसे मानो कोई मिट्टी-सी चबा रहे हों, जिसकी जैसी रुचि हो । नमक पड़ा हो तो पकौड़ी का स्वाद अच्छा लगता है ना? अब उस नमकीन चीज को खाते समय जो अज्ञानी हैं उनको तो जिस नमक के प्रसाद से चीज मीठी लग रही उसका तो ख्याल नहीं होता । चीज पर ही ध्यान होता है, और उस चीज को वह बड़े हापड धूपड के साथ खाता है । उस बेचारे नमक का कोई आभार नहीं प्रकट होता कि धन्य है यह छोटी-सी चीज नमक जिसकी वजह से यह सब भोजन मीठा लगता है । कोई सोचता है क्या? जो चीज हाथ पर है उसी को खाता है और आसक्त होता है । अच्छा तो जरा विवेक करके देखो तो उस व्यंजन के खाते समय में भी दोनों स्वाद ज्ञान में अलग-अलग पाये जावेंगे अथवा केवल नमक की डली मुख पर धरकर स्वाद जानो और नमक बिना केवल उस पकौड़ी का स्वाद जानो । वही पुरुष जब नमकीन पकौड़ी खा रहा है तो उसके यह व्यवस्था बनती है कि इसमें इतना तो नमक का स्वाद है और इतना साथ में उस बेसन का स्वाद है, नमक होता है तीखा और यह बेसन होता है ऐसा साधारण, इस प्रकार के स्वाद के भेद की व्यवस्था किससे बनी? ज्ञान से ही बनी ।

580―कल्पनाओं के जाल का कष्ट―भैया ! और, और भी बातें समझ लो, दुनिया में धर्म की सब व्यवस्था कौन बनाता ? तो भाई खुद जो दुःखी हो रहे हैं सो देखो कष्ट तो इस ब्रह्मस्वरूप में है ही नहीं । और, कष्ट सो पहाड़ जैसा लग रहा है हर एक को, जिसको संसार में जितनी अधिक सुविधा मिली खाने की, पहिनने की, रहने की, इज्जत की, वह कल्पनायें करके उतना ही अधिक दुःख मानता है । उतना ही अधिक क्लेश समझता है, तो कष्ट देखो सब मान रहे, जिसका पुण्योदय है वह भी कष्ट मान रहा; जिसके पाप का उदय है वह भी कष्ट मान रहा, कैसा यह अँधेरा है, कर्मविपाक है कि संसार में यह जीव इस अज्ञान अवस्था में किसी भी स्थिति में सुखी नहीं रह पाता । कैसे सुखी रहे ? दुःख का स्वरूप, दुःख का नित्य स्रोत दुःख का कारण जो अज्ञान है वह तो साथ लगा हुआ है, तो स्वरूप तो मेरा कष्टरहित है, ब्रह्मस्वरूप है जिसे परम ब्रह्म बोलते, परम पारिणामिक भाव, विशुद्ध चैतन्यमात्र बोलते, आत्मा का अपने आपके ही स्वभाव से, बिना पर के संबंध के जो अपने में स्वरूप है वह तो कष्टरहित है, क्योंकि इसका किसी दूसरे पदार्थ से लगाव नहीं है, सत्ता न्यारी है, पर समझता यह उल्टी बात है, मेरा तो अमुक है, मेरा तो घर है, मेरी तो इतनी विभूति है, मेरे तो इतने लोग हैं, समझ रहा है ना उल्टा, भ्रम न लगे तो कोई दुःख नहीं । तो क्या भ्रम किया इस जीव ने जिससे कि यह दुःखी बना, अज्ञानी बना? वह क्या भ्रम है जिससे इसमें शांति की व्यवस्था नहीं हो पाती । अच्छा, भ्रम की भी बात आप समझ लो, पहले यहाँ से शुरू करें, आखिर भ्रम के फल में बीत क्या रहा है दुनिया के जीवों पर, अज्ञानी जीवों पर, देख लो सब समझ में आ जायेगा, बीत रहा है परपदार्थ के प्रति ख्याल और उनमें कुछ से कुछ कर देने का भाव । यह सब पर बीत रहा है, करने का यह काम है―ऐसा करना, यह करूँगा, मेरे करने को यह पड़ा है, मैं इसको यों करूंगा, ऐसा करना, यह करना, बस इसका ही विकल्प इस जीव पर गुजर रहा है याने यह कर्ता बन रहा, कर्ता नहीं है यह जीव वस्तु का, मगर बन तो रहा है, तो कष्ट है ना करने का भ्रम बनने में?

581―कर्ता बनने के भाव की विडंबना―कर्ता बनने में कष्ट है कि नहीं? हाय !मेरे को पड़ा है यह काम, इसी में बीमार चल रहे और इसी में दिल के भी बीमार बन जाते, इसी में प्रसन्नता नष्ट हो गई, लोग खाते तो रोज हैं मगर सुख से खा-पी भी नहीं पाते, काम का विकल्प जो कर रहे । जैसे जब किसी बच्चे के चित्त में यह बात रहती है कि मुझे यह खेलने का काम पड़ा, दसों बच्चे खेल रहे थे, माँ जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ कर ले गई, उसने सबेरे से अभी खाना खाया नहीं, माँ उसे जबरदस्ती खिलाती है, वह खेलने के लिए मचलता है, माँ उसके एक दो तमाचे भी लगाती है, पर उसका तो खेलने में ही चित्त है, किसी तरह जबरदस्ती खिलाने से थोड़ा सा खाता और फिर उसी खेल में पहुंच जाता, यह तो बच्चों के छोटे-छोटे खेलों की बात है, बड़े पुरुषों के साथ बड़े-बड़े खेल लगे हैं, खेल क्या? कामकाज, और बच्चे लोग तो फिर भी जिम्मेदारी महसूस न करते हुए खेल रहे हैं और ये बड़े लोग अपने ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी महसूस करते हुए खेल रहे हैं, चित्त में पड़ा है कि अभी फैक्ट्री का काम पड़ा है, वहाँ मजदूरों से काम कराने जाना है, अब दुकान खोलना है, हिसाब लगाना है, अब उससे मिलना है, यह काम पड़ा है, तो यह भूख मानो हाथ पकड़कर ले जाती, रसोई घर में बैठाती, जबरदस्ती करके खिलाती, मगर चूंकि इसका चित्त लगा है बाहरी-बाहरी बातों में तो जल्दी-जल्दी खाना, खाने में भी हापड़ धूपड़ मचाता, सुख से बैठकर खा भी नहीं पाता और झट काम करने भगता । इसको करने-करने का राग मिटे तो आगे सुख शांति का मार्ग मिले, देखो सब द्रव्य स्वतंत्र-स्वतंत्र हैं, जिनका जैसा योग है उनका वैसा काम चल रहा है, कोई एक ईश्वर ऐसा नहीं है जो हमको नरक में ले जाये, स्वर्ग में ले जाये, मुक्ति में ले जाये, ऐसा मानने वाले लोग संसार से कभी पार नहीं हो सकते, क्योंकि गुजर तो रही है यह कोई घटना, निमित्तनैमित्तिक भाव और मानते कुछ और, जैसे मशीन चलाने का पुर्जा कुछ और है, बंद करने का कुछ और है, अब यह चलाये अन्य पुर्जा से तो काम कैसे बनेगा? ईश्वर तो आदर्श रूप है, बड़ी विशाल महिमा वाला है, वह एक पवित्र परम ब्रह्म जो निर्दोष है और गुण में परिपूर्ण है, ऐसा जो एक उत्कृष्ट आत्मा है वही है परमात्मा, ऐसा स्वरूप जब चित्त में आता और परमात्मा के प्रति भक्ति उमड़ती है तो खुद में एक विकास बनता है, पाप कटता है, पुण्य बढ़ता है, काम जैसे होना है वैसे ही हुआ करेगा अन्य विधि से नहीं होता, तो प्रभु का स्वरूप आदर्श है उसको ध्यान में लो, अपने आत्मा में घटित करो, जिसको आत्मस्वभाव का दर्शन हुआ उससे प्रभु भक्ति असल में बनती है और जिसको प्रभुभक्ति बन गई उसको आत्मदर्शन होता है, हाँ तो हैं तो जीव कष्टरहित; मगर इन पर कष्ट आया है तो यह कष्ट है कर्तृत्व भाव का या भोक्तृत्व भाव का ।

582―कर्तृत्व के भार की बीमारी का चित्रण―देखो, यह मोही अज्ञानी जीव क्रोध करता और क्रोध करता हुआ यह समझ रहा है कि जो क्रोध हो रहा यह ही तो मैं हूँ, मैं और इससे न्यारा क्या? बस अज्ञान भाव को अपनाया इसलिए यह जीव दुःखी हुआ, तो दुःख कैसे मिला? करने-करने का भाव बन रहा उससे दुःख हो रहा । कोई धुनिया विदेश से आया पानी के जहाज में । उस जहाज में आदमी तो दो चार ही थे, परंतु रूई सैकड़ों टन लदी हुई थी । रूई का इतना बड़ा ढेर देखकर धुनिया के मन में ऐसी कल्पना उठी कि अरे इतनी ढेरों रूई हम ही को तो चुननी पड़ेगी, तो उसको इतना गम हो गया कि सिर दर्द हो गया, बुखार भी चढ़ आया, घर पर तो कभी एक किलो, कभी दो किलो रूई ही ठक-ठक ठाँय-ठाँय कर लिया करता था, पर उतना बड़ा ढेर देखकर उसको गम हो जाना स्वाभाविक ही बात थी । आखिर घर पहुंचते-पहुंचते वह बहुत बीमार हो गया, अनेकों उपचार किए गये, पर फायदा न हुआ, एक बार कोई बुद्धिमान पुरुष आया, उसने कहा क्या मैं इन्हें ठीक कर दूं ?―हाँ हाँ, ठीक कर दो, बड़ी कृपा होगी, परिजन बोले । अच्छा तुम लोग यहाँ से जाओ, मैं इसे अभी ठीक किए देता हूँ, सब चले गए, वहाँ वह बुद्धिमान पुरुष उस धुनिया से पूछता है कहो तुम कहां थे किस-किस तरह से आये? तो धुनिया बोला, हम तो समुद्री जहाज से आये ।....उसमें कितने आदमी बैठे थे?....अरे आदमी तो दो चार ही थे पर उसमें सैकड़ों टन रूई लदी थी । ऐसी गमभरी आवाज को सुनकर वह बुद्धिमान पुरुष सब समझ गया कि इसको क्या बीमारी है, सो बोला―अरे तुम उस जहाज से आये, वह जहाज तो अगले बंदरगाह पर पहुंचते ही जहाज में आग लग जाने से रूई सहित जलकर भस्म हो गया, ।....क्या, भस्म हो गया । लो वहीं वह चंगा हो गया, जहाँ उसका यह भाव बना कि अब मेरे करने को यह काम नहीं रहा वहाँ वह चंगा हो गया । तो अपना एक सच्चा ज्ञान बना, भीतर में यह निर्णय बना लो कि इस जगत में मेरे करने को कुछ काम नहीं पड़ा, मैं तो ज्ञानमात्र हूँ, बस अपने भावों को ही करता हूँ पर में कुछ किया ही नहीं जा सकता और परिस्थितिवश घर में रहना पड़े तो वहाँ सब काम करने पड़ते हैं, पर श्रद्धा में यह बात रहे कि जगत में मेरा कहीं कुछ नहीं और मेरे करने को यहाँ कुछ नहीं पड़ा तो जब यह बोध हो जाये कि ये जो कर्मविपाक उठ रहे ये कर्म की चीज हैं, मेरी वस्तु नहीं । मैं तो प्रभुवत् विशुद्ध अंतस्तत्त्व हूँ, तब इसको कहां संकट है । जब यह ज्ञान न हो तो अनेक प्रकार के विकल्प उठते हैं । जिनका कष्ट भोगना पड़ता है ।

583―विकल्पविपदा आने का कारण तथा निर्विकल्प संपदा का पौरुष―क्यों उठते विकल्प कि इसका तो स्वरूप है निर्विकल्प, कुछ न करने का, अकर्तृत्व का, एक ज्ञानघन स्वरूप, अब उस सहज स्वभाव से यह भ्रष्ट हो गया याने इसका उपयोग परभावों में लग गया इसलिए दुःखी हुआ । भाई, यह अपने ज्ञान से क्यों हट गया? इसका जो एक विशुद्ध ज्ञाताद्रष्टा रहने का स्वरूप का व्यापार था वह क्यों नहीं हो रहा? अपने ज्ञानस्वरूप से कैसे हट गया? यों हट गया कि जो कर्मविपाक हो रहा, कर्म की दशा में कर्मविपाक हो रहा, जो कर्म की दशा चल रही है, स्वच्छता होने से वह झलक गया, अब उसमें इसने यह मान लिया कि मैं क्रोध हूँ । अरे क्रोधी आदमी को कोई समझाये कि भाई क्रोध न करना चाहिये, तुम भूल से क्रोध कर रहे हो, तो वह यह समझता है कि यह समझाने वाला तो बेवकूफ है, इसे कुछ असलियत का तो पता नहीं । असलियत तो यह है जो मैं सोच रहा हूँ । अहो !क्रोध में सब गुण भस्म हो जाते हैं । ऐसा क्रोध करके मानता है अज्ञानी कि यह मैं हूँ । जहाँ उसने अपने को व उन परपदार्थों को एकरूप से जाना वहाँ ही तो यह श्रद्धा बनेगी कि यह मैं हूँ । क्योंकि पर को स्व के एकरूप से जान लिया । इस कारण इसको भेदविज्ञान का सामर्थ्य नष्ट हो गया कि हमने अपने ही अज्ञान से उस कर्मलीला को, कर्मविपाक को अपना डाला । यह मैं हूँ । बस सारा पन्ना पलट गया, यह कर्ता बन गया, दुःखी हो रहा । अब न दुःखी होना हो तो मूल में क्या करें? जो चैतन्य धातु चैतन्यस्वरूप है, जो स्वभाव से विकास में उद्यत है तथा अंतरंग में सदा रहने वाला है, अचल है, जो स्वत:सिद्ध सहजसिद्ध है वह मैं अपने स्वरूप में ऐसा परमब्रह्म इन क्रोधादिक भावों से जुदा हूँ । यह ज्ञान बन जाये तो यहाँ जो व्यवस्था बन सकती है उस ज्ञानरूप ही मैं हूँ ना, अब अज्ञानी न बनूँगा । यह सत्पथ दृढ़ हो जायेगा । अब यह जीव उस विभाव से अपने स्वरूप को अलग समझता है और वहाँ कर्तृत्वभाव सब दूर हो जाता है ।

484―परविविक्त अंतस्तत्त्व के परिचय में धर्म का वास―देखो, अपने में परीक्षा करें, अपने आपके स्वरूप को सर्व परतत्त्वों से न्यारा मान पाया या नहीं? समझो । अगर नहीं मान पाया याने मैं चैतन्यस्वरूप अंतस्तत्त्व इस जगत की सारी विडंबनाओं से न्यारा हूँ, यदि ऐसा नहीं समझ पाया तो अभी धर्म नहीं मिला, मुक्ति का मार्ग नहीं मिला । व्यर्थ की करनी से कहीं काम सही न बन जायेगा । ज्ञानपूर्वक क्रिया होगी तो सिद्धि मिलेगी । अज्ञानमयी क्रिया से सिद्धि नहीं होती । जीवन में एक ही मात्र यह काम पड़ा है कि मैं अपने आप में निज सहज चैतन्यस्वभाव को यह मैं हूँ ऐसा समझता रहूँ । जहाँ ज्ञान बनेगा वहाँ उस ज्ञान से ही ये दो भेद पड़ जायेंगे कि मैं चेतन हूँ, ये क्रोधादिक अचेतन हैं, पौद्गलिक हैं । इनका मैं करने वाला नहीं । मैं तो अपने ही आत्मभावों का करने वाला हूँ, यह भेद चाहिए, जब कि संसार के लोग इसके बजाय दौड़ रहे हैं अज्ञान में, मोह में, राग में, और वह बात छूटती ही नहीं । आचार्य संत जन या गुरुजन समझाते हैं, वे समझाते तो उसका महत्त्व जंच नहीं पाता और बच्चा, स्त्री, पिता आदि कोई गप्प की बात कहें तो वहाँ उनका महत्त्व जंचता । जो कल्याण की बात है, आचार्य संतों की कही बात है, गुरुजन जो समझाते हैं वह तो मोहियों की दृष्टि में महत्त्व का स्थान नहीं बन पाता है, किंतु जो मोही परिजन बताते हैं, इशारा करते हैं उसकी आस्था दृढ़ हो जाती है कि हमारा ही तो घर है, और किसका घर है, कोई छुड़ाकर देखे तो सही । नगर पालिका में दर्ज है, तहसील में दर्ज है, रजिस्ट्रेशन हुआ है, रात दिन रहते हैं । यह मेरा ही तो घर है । भ्रम बनता है, अज्ञान बनता है, और दम निकल गई, जिस क्षण जीव चला गया तब क्या रहा? लेकिन मोह ममता नहीं छूटती । यह मेरा ही तो है सब । मेरा ही तो है यह, इस अज्ञान ने इस जीव को संसार में चारों गतियों में रुला रखा है । जिस अज्ञान की चोट पहुंच रही है उसी अज्ञान को आदर दिया जा रहा है । जब तक अज्ञान है तब तक यह जीव कर्ता बनता है, आकुलित होता है, जब इसके ज्ञान जगता है तो कर्ता नहीं होता, आकुलित नहीं होता, मात्र ज्ञाता दृष्टा रहता । तो क्या करना है? ऐसा अपने को बनावें कि यह सब पर वस्तुओं से उदासीन बना रहे ।

585―मोह का अंश भी विकट व्यामोह―कोई कहे कि यह उदासीन तो बहुत ज्यादह है, लगा हुआ तो थोड़ासा ही हैं जैसे मानो इस शहर में 50 हजार घर हैं तो यह कहता है शान में कि देखो हमको एक कम 50 हजार घरों से उदासीनता है, बस एक ही घर से रह गया मोह, बाकी नगर में और जितने घर हैं उनसे तो हम विरक्त हैं । वाह रे वाह, धन्य है विरक्ति । अरे !उन 50 हजार घरों पर इसका कब्जा हो नहीं सकता इसलिए ऐसी गप्प मारे जा रहा, और किसी मकान पर कब्जा होता हुआ दिखे तो सही, फिर यह गम खायगा क्या? जिसको एक में लगाव है उसे सबमें लगाव है । कोई यह मानता हो कि घर में एक जीव से हमें प्रेम है, बस एक से मोह है बाकी से मोह नहीं है तो उसकी यह बात गलत है । अगर एक से मोह है तो सबसे मोह है, क्योंकि बाकी के जो सब हैं उनमें से भी एक किसी से खास पहिचान हो जाये तो मोह हो जायेगा कि नहीं? हो जायेगा । मोह का अंश मात्र भी इस जीव के लिए हितकारी नहीं, तो सोचना चाहिए । इस जीवन में बहुत-बहुत पुण्य साधन पाकर मोह में राग में इस जीवन को बिता दिया जाये तो आगे क्या हालत होगी ।

586―करनी के अनुसार भरनी के निर्णायक का सत्पथ की ओर अभिमुखता―यहां कोई किसी का निभाव करने वाला नहीं, खुद ही खुद का निभाव कर सकता है । इस लोक में भी देखो जिस आदमी की जीभ खराब है, जैसा चाहे मुंह तोड़ जवाब देता हो वह कहीं प्रसन्न रह सकता क्या ? जिसकी क्रिया खोटी हो, दूसरे को दुःख उत्पन्न कराने वाली हो उससे कोई आनंद में रह पाता क्या? जो जैसा करता है वह वैसा ही फल पाता है । भूल में भी यही बात, भीतर भी यही बात । यह जीव अज्ञान करता है तो अज्ञान का फल पाता है, ज्ञान करता है तो ज्ञान का फल पाता है । अज्ञान का फल आकुलता और ज्ञान का फल शांति । जहाँ कहीं भी किसी को भ्रम हो गया, कितने ही घर के लोग ऐसे भी होते, किसी बात पर एक को भ्रम हो गया वह जरा संबंध-अधिक नहीं रखता, कम बोलता, दूसरे को भी थोड़ा भ्रम हो गया, अब उस भ्रम में भ्रम बढ़ने लगा, उसका भी उत्तरोत्तर भ्रम बढ़ने लगा । बात कुछ नहीं, भ्रम का मोह । एक दूसरे की पीठ से पीठ लगी है, सामने नहीं आ पाते, देखो उस भ्रम ने ही तो दुःखी किया । कुछ भी हालत हो, जगत में कोई कैसा ही परिणमें, जिसका जैसा उदय है, भाग्य है, योग्यता है, ज्ञान है, अज्ञान है, उसका वैसा परिणमन होगा, तुम उस पर के परिणमन में दखल देकर, उसमें अपना लगाव जोड़कर कि यह अगर इस तरह बन जाये तो मुझे बड़ा सुख हो, और इस तरह बने तो क्या, उसकी मर्जी, उल्टा चले तो क्या? उसकी मर्जी, थोड़ा कर्तव्य है कि कोई बात समझा दें । हमको आगे आकुलता करने की जरूरत नहीं । यह बात तब ही तो बनेगी जब ज्ञान जगेगा और मोह मिटेगा ।

587―निर्मोह ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व के आश्रय बिना सुख-शांति की असंभावना―मोह मिटे बिना निर्मोह ज्ञानमात्र स्वरूप के परिचय बिना यह जीव शांति सुख का स्थान नहीं बन सकता । बाकी तो सब एक दूसरे को बहकाना मात्र है । जैसे किसी को क्रोध आ जाता तो वह अधिक गड़ा हुआ पत्थर उखाड़कर मारने की चेष्टा बताता है । वह पत्थर उखड़ता नहीं । उसे तो कोई दो चार मजदूर दिन भर में खोदकर निकाल सकते, मगर क्रोध आने पर उस दूसरे पर अपना रोब जमाने के लिए वह गड़ा हुआ पत्थर उचकाता है, ऐसे ही ये जगत के जीव दूसरों पर रोब जमाने के लिए मनचाही प्रवृत्ति, चेष्टा करते हैं, पर रोब थोड़े ही जमता । प्रत्येक पदार्थ अपने आप पर ही रोब जमा सकता, प्रभाव कर सकता । एक पदार्थ दूसरे पदार्थ पर अपना प्रभाव नहीं जमाता । तो भाई सम्यक् ज्ञान बनायें । मैं ज्ञानमात्र हूँ, ज्ञान को ही करता हूँ, ज्ञान को ही भोगता हूँ, ज्ञान से ही ज्ञान की निकटता है । ज्ञान में ही ज्ञान का व्यापार चलता है । बाकी जो कुछ और प्रसंग है, कर्मविपाक हैं क्रोध है, विकल्प है, जो कुछ भी परभाव हैं वे मेरे स्वरूप की चीज नहीं । यह उपाधि का निमित्त पाकर ऐसा एक परिणमन बन गया । यह मैं हूँ, मैं क्रोधादिक अनेक प्रकारों का नहीं हूँ । मैं तो विशुद्ध चैतन्यमात्र हूँ । वहाँ जिसने पहचान बना ली अर्थात् ब्रह्मस्वरूप का जिसने परिचय पा लिया उसको जगत में अब आकुलतायें नहीं सता सकती । वह धीर गंभीर उदार बन गया, जब चाहे स्वरूप में दृष्टि ले जाता और वहीं तृप्त रहा करता । देखो यह सब शांति कैसे मिलेगी? ज्ञान से । इसलिये प्रत्येक पदार्थ के स्वरूप का सही-सही ज्ञान करें, सबसे उदासीन रहें, अपने ही ब्रह्मस्वरूप में तृप्त रहें तो संसार के संकट सदा के लिए मिट जायेंगे, शुद्ध परिणाम प्राप्त होगा ।


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