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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 78

From जैनकोष



एकस्य हेतुर्न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ ।

यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।। 78।।

443―जीव के हेतुत्व अहेतुत्व के नय पक्ष से तत्त्ववेदी की अतिक्रांतता―एक नय की दृष्टि में जीव हेतु है, कारणभूत है और एक नय की दृष्टि में जीव हेतुभूत नहीं है ऐसा एक चेतन में दो दृष्टियों से दो नय पक्षपात आते हैं । लेकिन जो तत्त्ववेदी पुरुष हैं वे पक्षपात से च्युत होकर एक परमात्मतत्त्व का अनुभव करते हैं । यहाँ पहला पक्ष क्या बताया गया कि जीव हेतुरूप है, कारण है, जीव अपनी पर्यायों का कारण है, यह उपादान की ओर से पक्ष है जीव पुद्गल कर्म की दशाओं का कारण है यह निमित्त की ओर से कथन है । जीव कारणभूत है, यह पक्ष व्यवहार नय ने बताया तो जीव हेतुरूप नहीं है कारण नहीं है अर्थात् अहेतुक है, यह बात स्वभावदृष्टि में आती है । पर्यायदृष्टि में व्यवहारनय में जीव को सहेतुक हेतुभूत याने अपनी पर्यायों का कारणभूत और पुद्गल कर्म की दशाओं का कारणभूत बनाया । निमित्त दृष्टि से एक पक्ष है, उपादान की ओर से एक पक्ष है, ऐसे दो रूप से हेतुभूत है, मगर स्वभावरूप में शुद्धनय में न उपादान का हेतुभूत ही है और न निमित्तरूप से हेतुभूत है, क्योंकि स्वभावदृष्टि, शुद्धनय वह अखंड स्वभाव को निरख रहा है और अखंड स्वभाव में न तो उपादान दृष्टि का कारणपना है और न निमित्त दृष्टि का हेतुभूतपना है इसलिए अहेतुक है ।

744―प्रयोजन, प्रयोग व व्यवहार में सूक्ष्म ऋजुसूत्रनय की अप्रतिष्ठा―यहां यह बात जानना कि पर्याय को ऋजुसूत्रनय भी अहेतुक देखता है, पर ऋजुसूत्रनय की खुली चर्चाओं में प्रतिष्ठा आचार्य ने नहीं की, क्योंकि वह किस प्रयोजन के लिए है? जब आचार्यों ने शंका उठाकर समाधान किया कि ऋजुसूत्रनय ने जब एक ही समय की पर्याय को बताया है तो वह तो गूंगा है कारण की बात कहने में । तो यह किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुआ, यह भी बात नहीं बताता ऋजुसूत्रनय किंतु वह तो एक ही पर्याय को देखता है, और उसकी दृष्टि में कुछ नहीं है । तो कहा कि इस तरह तो व्यवहार का लोप हो जायेगा । तो समाधान दिया कि होने दो लोप । हम तो नय का विषय बता रहे हैं । हम तुम्हारे काम के लिए नहीं बता रहे हैं । ऋजुसूत्रनय का विषय पर्यायार्थिक नय का एक सूक्ष्म विषय है । वैसे पर्यायार्थिक नय 6 प्रकार के होते हैं जैसे नित्य पर्यायार्थिकनय । अब आप सोचेंगे कि क्या कोई ऐसा भी पर्यायार्थिकनय है कि जो अनादि हो और नित्य हो?....हां है, जैसे सूर्य की गति । गमन तो पर्याय है, मगर एक संग्रह दृष्टि से देखें तो अनादि से गमन कर रहा और अनंत काल तक करेगा, और कोई है सादि नित्य पर्यायार्थिकनय । इसका उदाहरण क्या? मोक्ष दशा । उसकी आदि है पर उसका कहीं अंत नहीं, ऐसी चलती हुई अनेक बातें बतायी हैं । तो यहाँ यह जानना कि पर्यायार्थिक नय केवल एक ही समय की बात की बात को कहता सो नहीं, किंतु जब सूक्ष्म ऋजुसूत्रनय को निरखते हैं तब वह एक समय की पर्याय को कहता है । एक बात और व्यापक रूप से समझना चाहिए कि व्यवहारनय द्रव्यार्थिकनय का भेद है, पर्यायार्थिकनय का भेद नहीं है ऐसी बात सुनकर आपको अचरज होगा मगर जिन्होंने तत्त्वार्थ सूत्र पढ़ा है वे जानते होंगे कि नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्दनय, समभिरुढ़ एवंभूत इनमें से नैगमनय, संग्रहनय, व्यवहारनय ये तीन तो हैं द्रव्यार्थिक और ऋजुसूत्रनय, शब्दनय, समभिरूढ़नय और एवंभूतनय ये सब पर्यायार्थिक हैं । अगर सर्वतोमुखी नय का वर्णन करें तो जो नय की विद्या में कुशल नहीं है वह भौचक्का सा रह जायेगा अरे क्या कहा ?

745―नय चक्रविद्या की झांकी―यह नयचक्र की विद्या है, इसको एक गहन वन कहा है । सीधी सादी बात कहा अध्यात्म पद्धति से कि भाई एक द्रव्य को देखे सो निश्चयनय और दो द्रव्यों का संयोग, निमित्त, प्रभाव देखे सो व्यवहार नय । यह एक सीधी सी बात है, मगर नय केवल अध्यात्म दृष्टि से बना हो ऐसी बात तो नहीं है । नयों के कितने ही प्रयोजन होते हैं । अब देखो ये 7 नय इन तीन नयों में आते हैं―ज्ञाननय, अर्थनय और शब्दनय । ज्ञाननय है नैगमनय, अर्थनय है संग्रहनय व्यवहारनय व ऋजुसूत्रनय और शब्दनय में आते हैं शब्दनय समभिरूढ़ और एवंभूतनय । नयों का विवेचन कितने ढंग से होता है और उनके फिर कितने ही भेद होते हैं, यह तो व्यापक होने से मालूम होता है और सबमें कुशल हो जाने पर फिर वह नय विद्या एक कौतूहल बन जाती है । जैसे किसी कुशल खिलाड़ी को गेंद का खेलना एक कौतूहल है, वह बैठे-बैठे, खड़े-खड़े, लेटकर जमीन में गिरकर, एक हाथ से कैसे भी हो सब तरह से बड़ी कुशलता पूर्वक गेंद का खेल खेल लेता है, उसके लिए वह भेद का खेल एक कौतूहल मात्र हैं, एक लीला मात्र है, ऐसे ही जिस ज्ञानी पुरुष को इस नय चक्र में एक व्यापक कुशलता प्राप्त हुई वह हर प्रसंगों से उन नयों का प्रयोग करता है ।

746―प्रयोजन, प्रयोग व व्यवहार में ऋजुसूत्रनय की अप्रतिष्ठा का एक चित्रण―ऋजुसूत्र नय का जब वर्णन किया और यहाँ तक बात आयी कि इस दृष्टि में तो तुम यह भी नहीं कह सकते? देखो यह नय विशेष्य विशेषण को नहीं देखता । कौआ कुल काला कहाँ होता? उसके शरीर के भीतर खून, हड्डी वगैरह तो और और रंग के हैं । तो कौवा काला है यह कहना कहाँ ठीक रहा । आखिर उस सबका ही तो नाम कौवा है, अगर वे सब चीजें भी काली हो तो कह सकते कि कौवा काला होता है । और फिर जितना काला है वह सब कौवा हो तो बताओ काली चीजें बहुत सी होती हैं पर उन्हें कौवा तो नहीं कहते । तो इस नय का विषय बड़ी सूक्ष्मता से बताया है । मानो किसी के पास कपास की दूकान है और मानो उसमें आग लग गई, कपास जलने लगा तो ऋजुसूत्रनय की हठ करने वाला व्यक्ति यह भी न बोल सकेगा कि अरे भाइयो दौड़ो हमारी कपास जल जायेगी । उसके कपास बचाने का कोई उपाय नहीं है, क्योंकि वह कैसे कहेगा कि कपास जल रहा है । जो कपास है वह जल नहीं रहा और जो जल चुका वह कपास नहीं रहा । तो वह तो इतना भी न बोल सकेगा कि वह कपास है । हम ये आगम में दिए हुए उदाहरण बोल रहे । याने सूक्ष्म ऋजुसूत्रनय की इतनी सूक्ष्म दृष्टि है वह विषय मात्र बताने के लिए है ।

747―ऋजुसूत्रनय से भी और सूक्ष्म अंशक दृष्टियां―सूक्ष्म ऋजुसूत्र से भी और सूक्ष्म दृष्टि होती हैं, शब्दनय याने ऋजुसूत्रनय के विषय को हम किसी भी शब्द से बोलें मगर शब्दनय के मूड में आवोगे तो हर एक शब्द से न बोलना चाहिए । कैसे? एक स्त्री शब्द से कह लो, भार्या शब्द से कह लो, कलत्र शब्द से कह लो ऋजुसूत्रनय को शब्द से कहने का कोई नियंत्रण नहीं, मगर शब्दनय यह न स्वीकार करेगा । स्त्री वह है जिसमें गर्भ रहे, भार्या वह है जो घर का सारा भार बोझ सम्हाले । कलत्र उसका नाम है जो घर के लोगों की शारीरिक सेवा करे शरीर की रक्षा करे, रसोई बनाकर व्यवस्था करके सब तरह से घर के लोगों के शरीर की रक्षा करे उसका नाम है कलत्र देखो एक स्त्री में भेद पड़ गया ना शब्द भेद से? पर इससे भी और कोई सूक्ष्म बात है क्या? हाँ है, वह है समभिरूढ़नय । याने शब्दनय से तो इतने विभाग किया था कि भिन्न-भिन्न शब्दों से बोलना चाहिए । किसी भी बात को जिस चाहे शब्द से न बोलना चाहिए । भिन्न शब्दों से बोले तो भिन्न तत्त्व ज्ञान में आयेगा मगर समभिरूढ़नय कहता है कि तुम एक ही चीज को एक शब्द से बोलो तो उसके तो 10-5 अर्थ आते और उस शब्द से तुम उन 10-5 अर्थों को न बोल सकोगे । जिसका अभिरूढ़ हो, रूढ़ि हो, संबंध हो उस ही अर्थ को बोल सकते । लो समभिरूढ़नय से और सूक्ष्म कर दो तो क्या कोई और है इससे सूक्ष्म? वह है एवंभूत । शब्द के 50 अर्थों में एक ही शब्द को बोल पायेंगे, यह तो समभिरूढ़नय ने कैद की । जैसे गौ शब्द का किरण भी अर्थ है, वाणी भी अर्थ है, और गाय भी अर्थ है । मगर समभिरूढ़नय कहेगा कि गौ से गाय शब्द बोलो, पर एवंभूत कहता है कि देखो जब चलती हो तब कहो गाय, बैठी हुई को गाय न कहो क्योंकि धातुओं में गौ गमन करने के प्रयोग में आता है, जो गमन करे सो गाय । तो ये सब धातु की कलायें हैं देखो ये नय कितना सूक्ष्म विषय करने लगे, मगर इन नयों की कोई चर्चा करता है क्या?

748―निश्चय और व्यवहार दृष्टि का आधार अभेद व भेद का प्राधान्य―व्यवहारनय द्रव्यार्थिकनय का भेद है । यह व्यवहारनय पर्याय को जानता है अभेद पद्धति से इसलिए वह द्रव्यार्थिक नय का भेद है । पर्याय निरपेक्ष होकर व्यवहारनय कुछ नहीं और द्रव्यनिरपेक्ष होकर भी व्यवहारनय कुछ नहीं समझ सकता । व्यवहारनय द्रव्यार्थिकनय का भेद इस कारण है कि वह अभेद पद्धति से पर्याय को समझाता है पर भेदपद्धति से पर्याय को समझाये तो वह ऋजुसूत्रनय बनता है तभी तो उसका न कोई उपादान है न कोई निमित्त । बस वह तो एक निरंशवादियों की तरह है । जो उनकी दृष्टि है वहाँ ऋजुसूत्रनय की । दृष्टि में फर्क इतना है कि हमने ऋजुसूत्रनय को अन्यनयसापेक्ष माना । जो यहाँ जीव को हेतुभूत कहे जा रहे हैं सो उपचारित कारणभूत नहीं, कि यह जीव मकान बनाता है, भोजन बनाता है, खाता है, यह भोगता है, देखता है, अमुक यों करता है इस तरह का उपचारित कारण रूप नहीं बताया जा रहा, किंतु यह अपनी पर्यायों का उपादान कर्ता है, व्यवहारनय की दृष्टि में यह बात है । तो शुद्धनय यह बतलाता है कि जीव हेतु रूप नहीं, वह तो एक उपयोग स्वभाव को निरखता है, लेकिन यहाँ यह भी घटा देखते जायेंगे कि कोई व्यवहारनय का एकांत कर बैठे तो वह कौन सा दर्शन बनता है और निश्चयनय का एकांत कर बैठे तो वह कौनसा दर्शन बनता है । कभी पर्यायार्थिकनय का विषय अभेद हो तो निश्चय बन जायेगा और निश्चयनय का विषय भेद हो तो व्यवहार बन जायेगा ।

449―विविध नय जालों का बीज नयों का बाहुल्य―कैसा नयों की दृष्टियों का विचित्र परिणाम है और कैसा क्या, यह नया-नया रंग बदलता है ऐसा जाल क्यों? यों कि इसमें 7 नय नहीं है 4 नय नहीं है । हजार नहीं हैं, लाख नहीं हैं, तो करोड़ नहीं है ।....तो क्या अनगिनते हैं?...हाँ हाँ अनगिनते नय हैं । नय 7 नही हैं, नय तीन नहीं हैं । नय के दो भेद नहीं हैं, नय के भेद हैं असंख्यात । अब इतने नयों को अनगिनते भेदों को एक संक्षेप में बाँधना हो तो यह बंधता नहीं, एक ढंग का न बन पायगा । कभी किसी पद्धति से संक्षेप किया तो 7 बनाये जा सके । एक पद्धति से तीन बने―ज्ञाननय, अर्थनय, शब्दनय । इसका और भी खुलासा समझना हो तो यों समझिये कि जैसे कोई कहता है कि मेरा पुत्र से प्रेम है तो उसके बारे में यह निर्णय करें कि पुत्र तीन तरह के होते हैं―(1) ज्ञाननय का पुत्र (2) अर्थनय का पुत्र ओर (3) शब्दनय का पुत्र । ज्ञानपुत्र, अर्थपुत्र और शब्दपुत्र । कैसे वे तीन हो गए? पु और त्र चाहे बोलकर बोलो चाहे लिखकर बोलो―वह कौनसा पुत्र है? शब्दपुत्र । पु और त्र लिखकर एक कागज में आपके सामने धर दें तो वह कहलाया शब्दपुत्र । और अर्थपुत्र कौन है? जो दो हाथ दो पैर वाला आपके घर में है वह कहलाता है अर्थपुत्र । और ज्ञानपुत्र कौन है? उस पुत्र के बारे में जो भीतर ख्याल बना, विकल्प बना, वह ख्याल वह विकल्प है ज्ञानपुत्र । अब आप यह बतलाओ कि ज्ञानपुत्र से आपको प्रेम होता है कि अर्थपुत्र से होता है कि शब्दपुत्र से? अब एक निर्णय बनाओ । अच्छा शब्दपुत्र से कोई प्रेम करता है क्या? अगर किसी का पुत्र गुजर गया तो कहेंगे कि भाई रोवो मत, हम तुम्हें तुम्हारा पुत्र मिलाये देते हैं, और लिखकर दो शब्द धर दे पु और त्र, तो क्या वह उस शब्दपुत्र से प्रेम करने लगेगा? नहीं करेगा । और अर्थपुत्र से भी कोई प्रेम करता क्या? मायने आपके घर में जो दो हाथ पैर वाला है उससे तो कोई प्रेम कर ही नहीं सकता, क्योंकि वस्तुस्वरूप ही नहीं कि पर से कुछ मिले । कोई किसी दूसरी वस्तु में राग नहीं कर रहा, तो फिर क्या कर रहा? उस पुत्र का आश्रयभूत कारण करके जो यहाँ ज्ञान विकल्प बना उस ज्ञानविकल्प से प्रेम हो रहा । न अर्थपुत्र से प्रेम कर रहा और न शब्द पुत्र से । ज्ञानपुत्र से प्रेम है मायने जो कोई भी रागद्वेष कुछ करता है । तो वह अपने आपकी पर्याय में अपनी पर्याय के प्रति प्रेम करता है, दूसरे पदार्थ में प्रेम नहीं करता । अब देखो शायद आपने अनेक उपायों में ये तीन भेद न भी सुने हो, लेकिन इन तीन नयों का दर्शनशास्त्र में भली प्रकार प्रयोग है । अष्टसहस्री जैसा ग्रंथ बना है आप्तमीमांसा ग्रंथ, पर उसमें बताया है कि “बुद्धिशब्दार्थ संज्ञास्तास्तिस्रोबुद्धयादिवाचका:” बुद्धि संज्ञा और अर्थ ये तीन प्रकार के नय की पद्धति मायने ज्ञाननय, शब्दनय, अर्थनय । सुनते-सुनते बहुत से भाई सोचते होंगे कि आज तो व्याख्यान में कुछ भी पल्ले न पड़ा और लगता होगा कि नयों का जाल कैसा विचित्र है कि हम इसमें से कुछ ले ही नहीं पा रहे, लेकिन इतनी बात तो समझ में आयी ही होगी कि वह नयों का जाल बड़ा विचित्र है इसमें कुछ भी मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा तो ऐसा होता कि एक कूपमंडूक कथा है कि एक हंस पक्षी कहीं से उड़ता हुआ आया और एक कुवें के घाट पर बैठ गया । नीचे सिर करके देखा तो उस कुवे के अंदर एक मेंढक बैठा हुआ था । मेंढक बोला―भाई तुम कौन हो?....हंस....कहाँ रहते हो?....मानसरोवर में ।....वह मानसरोवर कितना बड़ा?....बहुत बड़ा । तो मेंढक ने एक पैर फैलाकर कहा―क्या इतना बड़ा है?....अरे इससे बहुत बड़ा । फिर दूसरा पैर फैलाकर क्या इतना बड़ा?....अरे इससे भी बहुत बड़ा, फिर एक किनारे से दूसरें किनारे में छलांग मारकर....क्या इतना बड़ा?....अरे इससे भी बहुत बड़ा । तो वह मेढक झुंझला कर बोला अरे सब झूठ । इससे बड़ी तो दुनिया ही नहीं है । यह एक कूपमंडूप की

बात बतायी । यों ही जब हम एक संकुचित विधि से चलते हैं तो व्यापक निर्णय नहीं कर पाते ।

750―सर्वनयों से निर्णय किये जाने का स्पष्ट परिणाम―व्यापक निर्णय का बहुत स्पष्ट परिणाम होता है, इसके संबंध में भी एक कथानक आया है कि सेठ के पास काम करने वाले बहुत से पल्लेदार थे और एक मुनीम भी । तो पल्लेदार तो कोई 50-50 रूपये महीने पाते थे और मुनीम कोई 150) महीने पाता था । तो एक दिन वे पल्लेदार सेठ के पास जाकर बोले―सेठजी आपको कुछ विवेक नहीं है, आप बड़ा पक्षपात करते हैं ।....कैसे?....देखो इस मुनीम से हम ज्यादह काम करते हैं । दिन भर सैकड़ों बोरे ढोते और यह मुनीम बस बैठे-बैठे कलम चलाता रहता फिर भी आप उसे 150) महीने वेतन देते जब कि हम लोगों को कोई 50-50) ही महीने में वेतन देते । तो उस समय सेठजी मे कुछ उत्तर न दिया । एक दिन क्या घटना घटी कि पास ही सड़क में से एक बारात जा रही थी तो वहाँ एक पल्लेदार से कहा―जावो भाई पता लगाकर आवो कि इस सड़क में से क्या चीज जा रही । तो पल्लेदार गया और यह जान कर वापिस लौट आया कि बारात जा रही । आकर सेठ को बताया कि कोई बारात जा रही है, उसका और कुछ विवरण वह न दे सका । उतनी ही बात मुनीम से कहा―भाई जावो पता लगाकर आवो कि इस सड़क में से क्या चीज जा रही । तो वह गया और पूछा―किसकी बारात है? कहाँ से आयी है, कहाँ जायेगी, कब लौटेगी....सब बातों की पूरी-पूरी जानकारी करके आया और सेठ से सारी बातें बतायी । तो वह सेठ ने सब पल्लेदारों से कहा देखो तुममें और मुनीम में इसी बात का अंतर है कि मुनीम बुद्धिमान है, तुम लोग बुद्धिमान नहीं ।....कैसे?....देखो उतने ही शब्द तुमसे कहा तो सिर्फ यह जानकर आये कि बारात है, और उतने ही शब्द मुनीम से कहा तो मुनीम ने दसों बातें स्पष्ट विवरण सहित बताया । तो यह अंतर किस बात का है? ज्ञान का । जब ज्ञान बहुत होता है तो छोटी मोटी बातों को बहुत स्पष्टरूप से जान लेते हैं । प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग इन चारों का जो ज्ञाता है उसके लिए अंतस्तत्त्व कैसा स्पष्ट होता है, उसे वैराग्य में बढ़ने की प्रेरणा मिलती और उसमें एक विशुद्धि जागती । अगर बहुत-बहुत ज्ञान कराना लाभदायक न होता तो फिर स्याद्वाद के पाठी क्यों बनते? इसके लिए ज्ञान और धन ये दोनों संतोष की चीज नहीं है । आप यह बात तो जल्दी समझ लेते कि धन संतोष किये जाने की चीज नहीं मायने धन से संतोष न करें मगर ज्ञान की बात समझ में नहीं आती कि यह ज्ञान भी संतोष किए जाने की चीज नहीं । कितना ही ज्ञान प्राप्त हो जाये फिर भी ज्ञान में बढ़ते जावें । उसका सूक्ष्म से सूक्ष्म अध्ययन करें, एक जानने के सिवाय इस आत्मा का क्या रोजगार है सो तो बतलावो केवल यह जानता भर है, जानने के साथ रागद्वेष लगे हैं सो उसके रंग भी लग गया । ज्ञान व रागादि रंग ये दो काम कर पाता यह जीव । और तो कुछ नहीं करता किसी पदार्थ से ।

751―हेतत्व अहेतुत्व का निर्णय और उससे ग्राह्यनिष्कर्ष―हेतु की बात कही जा रही है इस प्रसंग में हेतु किस तरह हैं कैसे नहीं है । हेतु है तो किस ढंग का है उससे क्या स्पष्ट होता है, क्या बात बनती है? इन चार विषयों को अगर संक्षिप्त शब्द में कहें तो विकार की बात कहेंगे सो यह कहना पड़ेगा कि विकार निमित्त से होता नहीं । और निमित्त के अभाव में होता नहीं है । अब इसमें किसकी बात करें सो बताओ? क्या निमित्त उपादान में विकार परिणतियों को कर देता है? यह तो वस्तु का स्वभाव ही नहीं । तो क्या निमित्त के सन्निधान बिना अब तक किसी भी पदार्थ में विकार हुआ है? नहीं हुआ । वह विकार तो पर संपर्क में होता है, दूसरी विधि नहीं, तो हम सब तरह से जान लें और निष्कर्ष निकालें कि हमको लेना क्या है, आश्रय करना क्या है, उसका निर्णय बना लें । आश्रयणीय और सत्य ये एक पर्यायवाचक शब्द नहीं हैं । जो आश्रयणीय नहीं हैं वह भी सत्य हो सकता है और जो आश्रयणीय हैं वह तो सत्य है ही । जैसे राग होता है उसे कोई मना करता क्या? पर्याय में चल रहा संसारी जीव है इसको कोई मना नहीं कर सकता । तो क्या यह असत्य है? रागद्वेष जो भी जगते हैं ये असत्य तो नहीं हैं । सत्य है, नैमित्तिक है, औपादिक है मगर आश्रयणीय नहीं है क्योंकि आश्रयणीय वह तत्त्व होना चाहिए कि जिसका आश्रय करने पर विकल्प क्लेश न हों । सत्य होने पर भी आश्रयणीय नहीं है, इतना मात्र जानकर विकार को असत्य नहीं कहा जा सकता । अनुसर्तव्य परमार्थ सत्य है, जहाँ कि हम आश्रय करके अपने में विकल्प संकटों का अभाव कर सकें । यह ही तो फर्क हो जाता है । एक शब्दशास्त्र से भी बहुत ऊंची मदद मिलती है । अच्छा बतलावो असत्य मायने क्या ? तो लोग कह देंगे―झूठा । और झूठ का क्या अर्थ है? नहीं है वहाँ हाँ कहना । है को नहीं कहना । नहीं को है कहना, विपरीत कहना, ये झूठ के रूप हैं । अब देखो झूठ और असत्य का भेद बतला रहे शब्दशास्त्र की दृष्टि से । तो न को हां बोलने को झूठ कहते हैं, पर असत्य के मायने क्या? जो सत् में न हो सो असत्य । जो सत् पदार्थ में स्वयं अपने आप अपने ही आश्रय से निरपेक्ष हो सो सत्य । तब सत्य क्या रहा? केवल वह अंतस्तत्त्व चैतन्यभाव उसे छोड़कर बाकी चीजें सब असत्य । तो इस असत्य का अर्थ झूठ नहीं है किंतु जो स्वयं सहज निरपेक्ष नहीं होता है उसे कहते हैं असत्य ! तो सापेक्ष भी असत्य, विकार परिणाम भी असत्य मगर इस असत्य का अर्थ इस तरह न करना । यह करना कि स्वयं सहज निरपेक्ष नहीं हुआ ।

752―प्रसंग के अनुसार समझ की दिशा―समझदार श्रोता वह है कि जो प्रसंग को निरखकर छाट ले कि इसमें आचार्यों ने यह कहा है । संस्कृत में एक कातंत्र व्याकरण बना है । संस्कृत को सुगमतया समझने के लिए बहुत उत्तम व्याकरण है । इसके रचयिता एक जैनाचार्य हैं । यह बहुत सुगम है । यह कातंत्र व्याकरण क्यों बनाया, उसकी एक घटना है? एक बार कोई राजा अपनी रानियों के माथ जल में जल क्रीड़ा कर रहा था । जल क्रीड़ा उसे कहते हैं कि पानी में नहाये और एक दूसरे पर छींटा मारे । तो जलक्रीड़ा करते हुए में रानियों की आँखे घबड़ा गई तो रानियाँ बोली मोदकं देहि राजन् । तो राजा ने झट नौकरों को हुक्म दिया कि जावो जल्दी एक टिपारे में भरकर लड᳭डू ले आवो । लो झट एक टिपारे भर लड्डू आ गए । जब रानियों को देने लगा राजा, तो रानियों को बुरा लगा, उन्होंने कुछ मर्म भेदी बात कही । वह बात उस राजा के दिल में चोट कर गई । रानियों ने कहा था―मोदकं देहि राजन् मा उदकं देहि राजन् याने मत पानी डालो राजन् । मा मायने मत, उदक मायने पानी, पर राजा ने क्या समझा? मोदक मायने लड्डू । राजा ने समझा कि ये रानियाँ माँग रहीं हैं इसलिए लड्डू मंगाकर रख दिया । जब वहाँ रानियों ने मर्मभेदी शब्द कहा तो राजा के दिल में बड़ी ठेस पहुंची, राजा को वहाँ नीचा देखना पड़ा । वहीं राजा ने यह प्रतिज्ञा किया कि अब हम संस्कृत सीखकर ही रहेंगे । संस्कृत न समझने के कारण आज हमें नीचा देखना पड़ा । तो राजा एक कातंत्र व्याकरण के रचयिता जैनाचार्य के पास गया । वहाँ जैनाचार्य ने उस राजा को समझाने के लिए जो व्याकरण रचा वह कातंत्र व्याकरण कहलायी । देखो बहुत पहले जब पाटी पढ़ते थे तो ओनामासीधं से शुरू कराते थे । सीदोबन्ना समामनाया, चतुरो-चतुरो दासा ये पाठ कातंत्र व्याकरण के सूत्र के बिगड़े हुए पाठ हैं । शुद्ध सूत्र ये हैं―ॐ नम: सिद्धँ । इसका अर्थ तथ्य ॐ नम: सिद्धेभ्य: से भी ऊँचा है । यद्यपि सिद्धों को नमस्कार दोनों में है, पर सिद्धेभ्य: में भेदपरक नमस्कार है और सिद्ध में अभेदपरक नमस्कार है । सिद्धेभ्य: तो चतुर्थी विभक्ति है जिसका अर्थ है सिद्धों के लिए नमस्कार है । और सिद्धँ द्वितीया विभक्ति है जिसका अर्थ है सिद्ध के अनुकूल होने के लिए सिद्धों को नमस्कार हो । आगे का शुद्ध सूत्र देखिये सिद्धो वर्णसमाम्नाय: इसका अर्थ है वर्णों की परंपरा स्वयं सिद्ध है । लोक व्यवहार से सिद्ध है । तीसरा शुद्ध सूत्र देखिये, तत्र चतुर्दशादौस्वरा: इसका अर्थ है कि उन वर्णों में से आदि के 14 वर्ण स्वर कहलाते हैं । तो इस पाटी से यह अनुमान करिये कि इस जैन व्याकरण का सर्व व्यापक अध्ययन था ।

453―शब्दों के अनुसार अर्थ संघटन होने में अनेक जिज्ञासावों का स्वयं समाधान―शब्दों के अर्थ की बात चल रही है । बताओ मिथ्याशब्द का क्या अर्थ है । लोग कह देंगे कि झूठ अर्थ है लेकिन मिथ्या का अर्थ झूठ नहीं । मिथ्या भाव भी हुआ करते हैं । मिथ्या मिथ धातु से बना है जिससे मिथुन मैथुन आदि भी शब्द बनते हैं, तो मिथ्या का अर्थ हुआ संयोगी भाव । मिथ्या मायने दो का संबंध, दो के संबंध में होने वाली बात का नाम है मिथ्या । मिथ्या का अर्थ झूठ नहीं । यह शब्द की ओर से बतला रहें अगर कहे कि जीव के विकार मिथ्या हैं तो उसका अर्थ लेना कि कर्म संयोग में हुए भाव हैं । कहीं यह अर्थ न लेना कि वे हैं ही नहीं । शब्दों का जो हर तरह से अर्थ जानते, जो अर्थ शस्त्र में कुशल है उनका ही तो यहाँ समझिये कि पांडित्य हो पाता है और समझने में पूर्णतया पात्रता, उसके होती जो हर तरह से उसका अर्थ समझे । हेतु हिनोति इति हेतु: जितने भी शब्द बनते हैं वे धातु से बनते हैं, और जो धातु का अर्थ है उस अर्थ का प्रकाश शब्द में हुआ करता है जो दूसरे को याने दूसरे से मतलब भिन्न वस्तु नहीं जैसे ज्ञान के लिए दर्शन, दर्शन के लिए चारित्र, दूसरे शब्द भिन्न मत में भी आता है, और जो हम कहना चाहते हैं उसके अलावा जो हम कह रहे उसके लिए भी आता है । उसके लिए जो एक आदान प्रदान करे, सयोग करे, कुछ मैत्री निभाये उसे कहते हैं, हेतु तो उपादान दृष्टि से यह जीव अपनी पर्यायों को करता है, यह बात सर्वत्र दृष्टिगत होती है । पूर्वपर्याय संयुक्त द्रव्य उत्तर पर्याय का उपादान कारण होता है, अब उसमें कोई तर्क करे कि पूर्व पर्याय उस समय है नहीं, तो वह कैसे कारण बनता? तो भाई कभी भी उपादान व उपादेय एक साथ नहीं होता । निमित्त तो साथ मिल गया याने जिस समय नैमित्तिकपर्याय है उस समय में निमित्त मौजूद है तो निमित्त का और नैमित्तिक का एक समय में एक साथ रहना बनता है, पर उपादान का अर्थ है उप आदान याने समीप में ग्रहण करना । तो उपादान शब्द ही यह बतलाता है कि उपादान पूर्वपर्याय संयुक्त द्रव्य है । यहाँ हेतु अहेतु निमित्त उपादान सबका यथार्थ निर्णय करके सर्व विकल्पों से अतीत होकर सहज चैतन्य रस का स्वाद पाकर कृतार्थ होता चाहिये यह इस वर्णन का लक्ष्य है ।


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