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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 79

From जैनकोष



एकस्य कार्यं न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ ।

यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।।79।।

754―जीव के कार्यत्व व अकार्यत्व का दिग्दर्शन―एक नय की दृष्टि में यह विदित होता है कि जीव कार्य है और एक नय की दृष्टि में यह विदित होता कि जीव कार्य नहीं है, ऐसा दो नयों की दृष्टियों में दो प्रकार के पक्षपात हैं, किंतु जो तत्त्ववेदी है, पक्ष से रहित है वह निष्पक्ष होकर स्वानुभव के साथ में बढ़ते हुए स्वानुभव की स्थिति में समझता है और अनुभव करता है कि जो चित् है सो चित् ही है । तो यहाँ पहला पक्ष क्या बताया जा रहा कि जीव कार्य है । जीव किसी पर द्रव्य का कार्य है यह तो यहाँ कहने का प्रसंग ही नहीं है क्योंकि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य की परिणति का त्रिकाल भी कर्ता नहीं है न कभी हुआ और न हो सकेगा । यदि ऐसा न होता तो आज यह दुनिया में कुछ न होता । कैसे? मानो चौकी ने पुस्तक का कार्य दिया तो अब यह चौकी चौकी रूप रही कि पुस्तक रूप । कार्य तो तन्मय होता है । हो जायेगा । यों होते-होते कोई वस्तु न रहती, पर ऐसा है ही नहीं । ये संसार के इतने पदार्थ दिखते हैं यही इसको प्रमाणित करता है कि एक वस्तु दूसरी वस्तु रूप कभी नहीं परिणमी । इसी का अर्थ है कि एक दूसरे को करता नहीं है, तो एक की दृष्टि में जीव कार्य है । व्यवहार नय से देखा जा रहा कि जीव में जो परिणतियां जगीं वह भी तो जीव है । वह जीव कार्य है, शुद्धनय की दृष्टि में कार्य है ऐसा नहीं है ।

755―ब्रह्म का आश्रयकर जीव से आत्मा व आत्मा से परमात्मा होने की प्रक्रिया―देखो शब्द को सावधानी से कोई प्रयोग करे और उस दृष्टि से देखें तो जैसे और लोग कहते हैं कि जीव भिन्न है, आत्मा भिन्न है, जीव न्यारा है, आत्मा न्यारी है, आत्मा सर्व व्यापक है, जीव तरंग है जैसे कि अन्य दार्शनिक कहते हैं । तो शब्दों की दृष्टि से देखो―जीव, आत्मा और ब्रह्म । जीव, आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म ये चार शब्द है । यों सामान्यतया किसी भी शब्द से कह लो, ब्रह्म भी जीव, परमात्मा भी जीव, आत्मा भी जीव । जीव-जीव ये सब आत्मा । कैसा भी कह लो । अगर शब्दशास्त्र से या उसके कुछ और मर्मों को लेकर कहा जाये तो यों कहो―जीव मायने बहिरात्मा । आत्मा मायने अंतरात्मा । परमात्मा मायने परमात्मा और ब्रह्म मायने चित्स्वरूप । इस तरह के फर्क देखिये । देखिये हर बात जैन शासन में यह जरूर समझना चाहिए कि यह किस मैदान में खड़े होकर बोला जा रहा? जो इतनी बातचित्त में न लाये उसके लिये कुछ उपदेश कार्यकारी नहीं होते । किस मैदान में, किस स्थान में स्थित होकर यह बोली जा रही है, इतनी परख कुशल श्रोताओं को होती है तो जीव कार्य है मायने इन-इन परिणितियों में बसा हुआ जो एक जीव नामक पदार्थ है वह, जीव उपादान का कार्य है, एक तो यह अर्थ है, दूसरा चूँकि यह पुद्गल कर्मविपाक का सन्निधान पाकर इस-इस प्रकार के परिणामों से परिणमता है इसलिए कार्य है । कार्य स्थूल रूप से वह समझा जाता है कि जिसमें देखो यह न था यह हो गया, ऐसा विषमपना नजर आये तो उसे कार्य कहा जाता है । शब्द की भाषायें हर जगह समझना चाहिए । किस प्रयोजन से कौनसी बात है, और यह कार्यपना विकार में विषम परिणाम होता है और विषम परिणाम का ही यह जिकर चल रहा है । यद्यपि यह भी कह सकते कि जो मुक्त जीव हैं उनमें भी कार्य प्रति समय होता ही रहता है, क्योंकि परिणतियां होती हैं, मगर उनकी परिणतियों में यह स्पष्ट न समझ में आयेगा कि देखो यह न था यह हो गया, विलक्षण बात हो गई । विलक्षण बात होना उसे कार्य की समझ रूप से संज्ञा है । तो जीव में कार्य की बात जब देखी जा रही है―नारकी, तिर्यंच, मनुष्य, देव होना, क्रोधी होना, मानी होना, मायावी होना,....। यह कार्यरूप है जीव, यह बात गलत तो नहीं है । देखो व्यवहारनय असत्य नहीं होता, किंतु व्यवहारनय अनुसरणीय नहीं हैं, क्यों अनुसरणीय नहीं हैं? क्योंकि वह भेद विकल्पबहुल है । और, इस नाते से तो निश्चयनय भी अनुसरणीय नहीं, क्योंकि निश्चयनय भी एक विकल्प है, और उन ही दोनों विकल्पों का यहाँ जिकर चल रहा ।

756―निष्प्रमाद होकर उत्कृष्ट भाव में आने के पौरुष का स्मरण―यह जो अध्यात्म में गंभीर वर्णन हुआ है वह इसलिए है कि उसे सुनकर क्यों नहीं भाव ऊंचे निष्प्रमाद होकर उड़ते? स्वच्छंदता की शिक्षा क्यों लेते? इसलिए ऊपर उठ-उठकर निष्प्रमाद होकर कल्याण में लगें । सत्य होकर भी अनुसरणीय नहीं । यह बात सब यहाँ देखते जाना, और उपचार का कार्य यहाँ कहा नहीं जा रहा । हालांकि कोई उपचार भाषा बोले तो क्या अपराध? उपचार भाषा में बोले बिना लोगों का काम भी नहीं चल रहा । वह है संक्षिप्त भाषा जिसमें प्रयोजन जानना चाहिये और उस भाषा में लट्टू न होना चाहिये । अगर उपचार में भी प्रयोजन कुछ न हो तो यह बतलावो कि लोग अटपट क्यों नहीं बोलते? एक ढंग से क्यों बोलते? उपचार में भी कोई पागल की तरह यों नहीं बोलता कि जैसे पागल कभी माँ को मां कह देता तो कभी माँ को स्त्री कह देता । इसी तरह रसोईघर में भी घी के डिब्बे को कोई यों तो नहीं कहता कि चने का डिब्बा ले आओ या वह टीन का डिब्बा ले आओ । ऐसा तो कोई नहीं बोलता । सभी कहते घी का डिब्बा ले आवो । तो उपचार भाषा में प्रयोजन ही एक द्रष्टव्य है और भाषा का जो रूप है वह अनुसरणीय नहीं, तो सब समझ जायेंगे । तो उपचार भाषा में यह नहीं कहा जा रहा । यहाँ व्यवहारनय, और निश्चयनय दो के पक्ष चल रहे । कार्य है अर्थात् पुद्गल कर्मविपाक का निमित्त पाकर होने वाला यह विकार परिणाम है यह व्यवहारनय ने देखा अथवा जीव पूर्वपर्याय से गुजरकर उत्तर पर्याय में इस प्रकार से रहा है यों यह कार्य है । उपादेय और नैमित्तिक दोनों कार्य हैं लेकिन निश्चय की शुद्धनय की दृष्टि में जीव कार्य नहीं है । देखो जिस समय यह जाना कि जीव कार्य नहीं है जीव अहेतुक है, जीव की अहेतुकता स्वभावदृष्टि में आकर समझना चाहिए । मगर स्वभाव अहेतुक है ये दोनों पक्षपात हैं । ऐसे ही आत्म स्वभाव क्या है जिसको निरखने की कोशिश की जा रही है? और जिसकी कोई बदल नहीं । देखो बदल है इन सबमें । आप कह रहे हैं कि जीव रागी है तो भाई किस नय से कहते? निश्चयनय से । क्यों निश्चयनय से कहा । जो एक द्रव्य की बात उसही में कहे सो निश्चयनय, स्वाश्रित वर्णन करे सो निश्चयनय । मगर वह है अशुद्धनिश्चयनय । तब और बढ़े जीव केवलज्ञानी है, किस नय से बोलते? निश्चय नय से । तो इसके बोलने पर पहले का जो बोल था वह व्यवहार बन गया । व्यवहार से तो यों है, निश्चय से यों है और जब कहा कि जीव चैतन्य स्वभावमात्र है जीव में सहजज्ञान, सहजदर्शन ये शक्तियां हैं तो लो जीव केवलज्ञानी है यह व्यवहार बन गया और जीव में सहज ज्ञानस्वभाव है यह निश्चय बन गया । अच्छा और जीव ज्ञानमात्र है, जब यह बोला तो जीव में सहज ज्ञानस्वभाव है यह व्यवहार बन गया और जीव ज्ञानमात्र है यह निश्चय हो गया, मगर अनुभव की दृष्टि में यह भी विकल्प है वहाँ तो गटागट अमृतपान बसा हुआ है । उसको तो चित् चित् ही है ।

757―ज्ञानानुभव की परमप्रेयता व परमश्रेयता―अच्छा एक बात बतलावो दुनिया में ऐसी कौनसी वस्तु है जो सबसे प्यारी हो? पहले सर्वाधिक प्रिय का लक्षण भी तो समझो । सर्वाधिक प्रिय उसे कहते हैं जिसकी बदल नहीं होती । जैसे जीव चिन्मात्र है इस दृष्टि में कभी कोई बदल नहीं । भले ही वह बोलनेरूप व्यवहार है, पर निरखनेरूप व्यवहार नहीं । ऐसी चीज बताओ जिसकी बदल नहीं । जिसकी बदल हो जाये वह प्रिय वस्तु नहीं । जैसे जब कोई दो चार छ: मास का या साल भर का बच्चा होता है तो उसे सबसे प्रिय होती है अपनी माँ की गोद । उसे जरा भी कोई उठाये तो वह झट माँ की गोद में छुपकर अपने को रक्षित अनुभव करता है । उसे माँ की गोद से बढ़कर कुछ भी चीज प्यारी नहीं होती । वही बच्चा बढ़कर जब 4-5 वर्ष का हो जाता है तो अब उसे माँ की गोद भी प्रिय नहीं रहती । उसे प्रिय हो जाते हैं खेल खिलौना । माँ जबरदस्ती पकड़ कर गोद में बैठालती पर वह उठकर भाग जाता । वही बच्चा जब कुछ और बड़ा होता तो उसे विद्या प्रिय हो जाती । उसे अब खेल खिलौने भी प्रिय नहीं रहते । वह नई-नई बातें सीखने में खुश रहता है । वही बालक जब कुछ और बड़ा होता तो फिर उसे विद्या भी प्रिय नहीं रहती । उसे डिग्री प्रिय हो जाती है । चाहे जैसे हो डिग्री मिले । कुछ और बड़ा होने पर उस स्त्री प्रिय हो जाती है, डिग्री भी प्रिय नहीं रहती । जब कुछ वर्ष बीतते, कुछ बाल बच्चे हो जाते तो अब उसे भी स्त्री प्रिय नहीं रहती । उसे बाल बच्चे प्रिय हो जाते हैं, स्त्री कभी उन बच्चों को डाटे, मारे तो वह उस स्त्री को भी भला बुरा कहता है । उसे अब स्त्री प्रिय नहीं रही, बच्चे प्रिय हो जाते हैं । मान लो उसके दो चार बच्चियाँ हो गई, उनके शादी ब्याह की बात सामने खड़ी हो गई हो अब उसे वे बाल बच्चे भी प्रिय नहीं रहते । उसे धन प्रिय हो जाता है । देखो कैसी प्रिय की दशा बदलती रहती है । मान लो जिस जगह वह काम करता था वहाँ टेलीफोन पहुंचा कि जल्दी घर आवो, घर में आग लग गई, तो वह झट बड़ी जल्दी-जल्दी से घर भागा । और दिन तो रास्ते में मिलने वालों के पास ठिठक जाया करता था, उस दिन किसी से बोला नहीं, किसी तरह घर पहुंचा । घर जाकर देखा कि भयंकर आग जल रही है । खैर किसी तरह से सब सामान निकाला, बाल बच्चे निकाला, रूपया पैसा निकाला, पर बाद में आग अधिक बढ़ गई और एक बच्चा घर के भीतर ही रह गया । उसके निकालने की उसकी हिम्मत न पड़ी । अब वह किसी भाई से कहता है भैया हमारा बच्चा घर के भीतर से निकाल दो । अगर निकाल दोगे हम तुम्हें 10 हजार रूपया देंगे ।....बताओ अब उसे क्या प्रिय रहा? धन भी प्रिय न रहा, उसे अपने प्राण प्यारे हो गए । वही पुरुष कदाचित् उस घटना में विरक्त हो जाये तो उसे प्राण भी प्रिय नहीं रहते, उसे चाहे कोई मारे, छेदे भेदे, कुछ भी करे पर उसे प्राणों की भी परवाह नहीं रहती । वह तो अपने ज्ञानस्वरूप में मग्न रहता है । तो अब उसे प्राण प्रिय न रहे । उसे प्रिय हो गया अपना ज्ञानस्वरूप अब इसकी कभी बदल नहीं है ।

757―ज्ञानस्वरूप की प्रियता पाने के बाद उसकी बदल का अनवकाश―ज्ञानस्वरूप की प्रियता के बाद क्या बदल होती तो आप लोग बताओ । यहाँ तक तो हम ले आये अब इसके बाद तुम लोग बताओ । हमी-हमी कहाँ तक बतायें? तो सबसे अधिक प्रिय चीज है ज्ञान, जिसकी कभी बदल नहीं होती । इस जगह एक घटना याद आयी कि किसी घर का मालिक सेठ गुजर गया, उसकी स्त्री अकेली बुढ़िया घर में रह गई । वह एक दिन पंचों के पास जाकर बोली, पंच भाइयों हमें इस बात का दुःख है कि हमारी ये जो पचासों दूकानें है इनका किराया भाड़ा अब कौन वसूल करेगा, कौन लेगा, क्या होगा? तो एक पंच बोला―बुढ़ियाँ माँ तुम इसकी फिकर न करो, अब हम सब सम्हाल लेंगे ।....और यह जो 70-80 बीघा जमीन है उसका क्या होगा? उसकी भी फिकर न करो, वह भी सम्हाल लेंगे ।....जो सैकड़ों की संख्या में गाय, बैल, भैंस आदि पशु घर में बंधे हुए हैं उनका क्या हाल होगा? बढ़िया माँ तुम इसकी भी फिकर मत करो, यह भी हम सम्हाल लेंगे । ....यह जो लाखों का धन है इसे कौन सम्हालेगा?....माँ इसकी भी तुम चिंता न करो, हम सम्हालेंगे ।....और यह जो 10-5 लाख का कर्जा है इसे कौन सम्हालेगा ?....अरे तो क्या हमी-हमी बोलते जायें? यहाँ तक तो हमने सम्हाल दिया अब कोई दूसरा भाई बोले । यह भी कहां तक सम्हालने की बात कहते जाये? तो भाई ज्ञान प्रिय हो गया इसके बाद तो इसकी बदल ही नहीं है, कोई कहेगा ही क्या?

759―अपने उपयोग को उसके स्रोत में पहुंचाने पर विश्राम―देखा होगा कि गर्मी के दिनों में जो जल समुद्र में से भाप बनकर ऊपर उड़ जाता है यत्रतत्र डोलता फिरता है वही जल समय पाकर बरस कर पुन: उसी समुद्र में आकर मिल जाता है । उसकी भी कितनी ही बदल हो जाती है । ऐसे ही सहज ज्ञानस्वरूप भगवान आत्मा एक आनंदसागर, ज्ञानसागर में डूबा हुआ है, पर उसमें जब परदृष्टि के कारण संताप आता है तो यह अपने ज्ञानस्वभाव को छोड़कर बाहर में यत्र तत्र डोलता फिरता है । पर संग बिना जीव में विकार होते नहीं । ये सहेतुक हैं, ये यदि अहेतुक हो जायें तो फिर जीव में सदा रहेंगे । कभी मिट नहीं सकते । पर होता क्या है ? बताया ना पुद्गल क्रोध प्रकृति का उदय हुआ उसमें तो वहाँ प्रकृति-प्रकृति के ही विपाक हुआ और उसका उसमें

ही अनुभवन हुआ । लेकिन उसको प्रतिफलन हुआ तो वह ऐसा आक्रमण है, ऐसा विघ्न है कि यह जीव क्रोध से उपयुक्त हो गया । क्रोध तो था मूल में कर्म का और नैमित्तिक में था प्रतिफलनरूप मगर उपयोग में प्रतिफलन जुट गया तो वह क्रोधी हो गया । ऐसा निर्णय होता है विकार का । वह तो ठीक ऐसा स्पष्ट है जैसे कि आप रसोईघर की बात लायें, रोटी रोज-रोज सिकती है ना आग में । आग का सन्निधान पाकर रोटी सिक रही है । अगर आग से हटा लेते हैं तो रोटी कच्ची रह जाती है । इतना होने पर भी प्रत्येक वस्तु का परिणमन खुद का खुद में हो रहा, निमित्तनैमित्तिकयोग को मना किया ही नहीं जा सकता । और परकर्तृत्व कभी लादा नहीं जा सकता । तो इस तरह इस जीव में ये सब कार्य हो रहे, विकार हो रहे । तो कार्य बन तो गया जीव मगर यह सब दिख रहा है व्यवहारनय के पक्ष में । जब स्वभाव को देखने चलते हैं तो जीव कार्य नहीं । वह तो एक स्वभाव है । कब परखा, कब जाना हमने अपने अंतस्तत्त्व को? जब उसका अनुभव आये, असली जानन तब है । यह आत्मस्वभाव पर पदार्थ से जुदा है, ठीक है, पर रागमय तो है । नहीं-नहीं, परभाव से भी जुदा है....ठीक है मगर ज्ञानमय तो है, जिन ज्ञानों को हम जानते हैं । नहीं-नहीं, वह छुटपुट ज्ञानरूप नहीं है, वह पूर्ण ज्ञानमय है । हाँ तो केवलज्ञानमय है । नहीं-नहीं, वह अनादि अनंत है । वह सादि ज्ञानवाला नहीं है । हाँ ठीक समझ गए । वह है एक चैतन्यस्वरूप । कहो कि नहीं-नहीं, अभी तुम नहीं समझे । जब तुम्हारे चित्त में से वह है एक चैतन्यस्वरूप ऐसा एकपना भी मिट जाये, ऐसी स्थिति आये तो समझो कि हां आत्मस्वभाव यह है । यह तो द्वैत से हटकर अद्वैत में जो ले जाया गया, वह द्वैत से हटकर सहज तत्त्व का परिचय करने के लिए है । यह तो अद्वैत को भी नहीं मानता अगर अनुभव में पहुंचा है तो । स्वानुभव में चले तो एक के सिद्धांत में तो जीव कार्य है और एक की दृष्टि में जीव कार्य नहीं है ऐसे दो नयपक्ष कहां ?

760―विवादबीज नयपक्ष से अतिक्रांत होने में ही परमसमाधान―देखो कैसे जाने नयपक्ष को? ऐसी चर्चा में अगर लड़ाई की संभावना है तो समझो नयपक्ष है । क्या कहीं लड़ाई प्रमाण में होती है? अनुभव में तो लड़ाई का काम ही नहीं । जब कभी धर्मचर्चा के नाम पर लड़ाई होती है तो समझो कि सब नयपक्ष में पड़े हैं, नहीं तो स्वभाव में विवाद क्या? अनुभव में विवाद क्या? और अनुभव के वर्णन में विवाद है क्या? नहीं । और नय में भी विवाद नहीं मगर उसकी शर्त है कि सापेक्ष हो तो विवाद है। कहीं पर धर्म के नाम पर जब लड़ाई हो रही हो तो समझो कि ये निष्पक्ष नय वाले हैं, सापेक्ष में कहीं विवाद नहीं और अनुभव में तो विवाद का अवकाश ही नहीं, मगर समझो कि हमारे मन में कषाय जगती, क्षोभ जगता, कोई एक लगाव में यह ठीक नहीं, यह गैर ठीक, यों कितने ही विवाद जगते तो समझो कि निरपेक्ष नय तत्त्व है और जो मार्ग बताया है आचार्य संतजनों ने उस मार्ग पर अनुभव चले तो उसे बाधा भी नहीं और अपना निर्वाध कल्याण भी करेगा । हम अन्य-अन्य प्रकार के तो व्यसन करें, पाप करें, झगड़ा करें, तीर्थविच्छेद करें, बड़ी तेज बात करें तो यह विषम स्थिति कैसे टलेगी ज्ञानी श्रावकजनों की अथवा प्रमत्त अवस्था तक जो तीर्थ प्रवृत्ति है उसके अंदर ही रहते हुए हम अपने स्वभाव की आराधना करके अपने आपको कल्याण मार्ग में आगे बढ़ावें । तो यहाँ ये दो पक्ष बताये गए । एक की दृष्टि में जीव कार्य है, एक की दृष्टि में जीव कार्य नहीं है, इन दोनों से अतिक्रांत होकर स्व का अनुभव करना चाहिए ।


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