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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 85

From जैनकोष



एकस्य नाना न तथा परस्य चिति द्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ ।

यस्तत्त्ववेदीच्युत पक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव ।।85।।

775―नानात्व और नानात्व निषेध के विकल्पों से अतिक्रांत तत्त्वज्ञान का महत्त्व―व्यवहार की दृष्टि में जीव नाना है यह विदित होता है, और निश्चय की दृष्टि में 'जीव नाना है ऐसा नहीं' इस प्रकार से ज्ञान होता है । ये चेतन में दो दृष्टियों के दो पक्षपात हैं, तत्त्ववेदी पुरुष इन पक्षपातों से हटता हुआ रहता है अतएव उसके उपयोग में तो हमेशा ही चित् चैतन्य ही है । पदार्थ सब असाधारण स्वरूप को लिए हुए होते हैं । साधारण और असाधारण गुणमय पदार्थ हैं अर्थात् प्रत्येक पदार्थ में कुछ गुण ऐसे हैं जो गुण (एक जैसे गुण) सभी पदार्थों में पाये जायें, किंतु कोई गुण ऐसा होता है जो उस विवक्षित पदार्थ में ही पाया जाता है । साधारण और असाधारण गुणरूप जो नहीं वह सत् ही नहीं । तो आत्मा में असाधारण गुण है चैतन्यस्वरूप । प्रत्येक आत्मा में अपने-अपने का ही अनुभव होता है, उस अनुभव की ओर से देखो तो जीव नाना है, यह बात एकदम स्पष्ट है एक के सुख से सब सुखी नहीं हो जाते, एक के दुःख से सब दुःखी नहीं हो जाते । जिनका जैसा परिणाम है उनके वैसा ही अनुभव जगता है । तो जीव नाना हैं यह बात एकदम स्पष्ट है । लेकिन जब एक स्वरूप मात्र से देखा गया तो स्वरूप में मात्र सहज ज्ञानस्वरूप ही नजर आता और उस स्वरूप में व्यक्तिपना नजर नहीं आता । अगर व्यक्तित्व नजर आ जाये तो वहाँ स्वरूप वस्तुत: नजर नहीं आता । तो जब निश्चय से देखो, शुद्धनय से देखो तो स्वरूप मात्र ही निरखा गया और उस दृष्टि में जीव नाना नहीं हैं । इस प्रकार जीव के बारे में ये दो पक्ष उठते हैं । पक्षपात शब्द कहा तो है मगर यह तो ज्ञान की ही चीज है । समझना पड़ेगा ऐसा, लेकिन जो विकल्प की हठ करके रहे उसकी भलाई नहीं है । इस कारण उस हठ को पक्षपात शब्द से कहा गया है । तो जीव में ये दो पक्ष उठे, अनुभव की ओर से देखा तो नाना हैं, स्वरूप की ओर से देखा तो नाना नहीं है ।

776―नानात्व व नानात्वनिषेध के विकल्प से स्वानुभूति न हो सकने का कारण―अब नाना है, इस तरह से देखे कोई तो उसने बाहर में ही तो अपना उपयोग दिया, अंत:स्वरूप से हटकर ही तो वह अपनी व्यक्त सीमाओं को तक रहा है । तो नाना है इस प्रकार के पक्ष होते हुए स्वानुभव नहीं जग रहा । अच्छा शुद्धनय अथवा निश्चयनय नाना का निषेध कर रहा है कि नाना नहीं है, तो नाना नहीं है ऐसा निषेध करने में भी नानापन का संबंधित एक विकल्प तो आ ही गया किसी रूप में । तो नाना नहीं है, इस तरह का ध्यान देता रहे, ऐसा विकल्प करता रहे तो उन विकल्पों के समय भी तो स्वानुभव नहीं है । तो जो तथ्य के जाननहार हैं वे विकल्प मात्र का परिहार कर देते हैं । तो यहाँ इन सब पक्षपातों को हटाया और अपने में निष्पक्ष अंतस्तत्त्व का अनुभव किया ऐसे उस अंतर्ज्ञानी के उपयोग की यह बात बिल्कुल स्पष्ट चल रही है कि चेतन तो सदा सहज चैतन्यस्वरूप मात्र है और ऐसे इस चैतन्यस्वरूप मात्र का निर्विकल्पसमाधि में अनुभव जगता है तो वह साक्षात् सहज आनंदस्वरूप है । यही आनंद समस्त संसार के संकटों को मिटाता है और इस ही आनंद के लिए आत्मा का विकास होता है । समस्त रागादिक मल दूर होते हैं । तो दोषों से दूर हटना और गुणों का पूर्ण विकास में आ जाना, बस यह ही तो कल्याण है । तो पक्षपातों से रहित होकर निष्पक्ष ज्ञानमात्र ज्ञान में ही रहे ऐसी एक निर्विकल्प ज्ञप्ति होने पर कल्याण है और ऐसा ही पुरुष बता सकता है कि चेतन क्या चीज है? सो शब्दों द्वारा तो कहा क्या जाये? यही कह सकते हैं कि चेतन तो नित्य चेतन ही है ।


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