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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 94

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दूरं भूरिविकल्पजालगहने भ्राम्यन्निजौघाच्च्युतो । दूरादेव विवेकनिम्नगममान्नीतो निजौघं बलात् । विज्ञानैकरसस्तदेकरसिनामात्मानमात्माहरन्, आत्मन्येव सदा गतानुगततामायात्ययं तोयवत् ।।94।।

806―स्वाभिमुख होकर स्वमग्नता पाने में आत्महित―जब ही इस जीव को अन्य सबसे निराले ज्ञानमात्र अपने सहज स्वरूप का अनुभव हुआ तब ही वह अनेक विकल्प जालों में जो भ्रमण कर रहा था उससे दूर हो गया, आंख खुल गई, भीतर का ज्ञान स्पष्ट हो गया । मेरा मात्र मैं हूँ मेरा अन्य कुछ है ही नहीं । जिसने अपने आपके इस सहज स्वरूप का अनुभव किया वह अपने इस तेज से प्रेम किए ही रहता है, जब यह ज्ञानस्वरूप की दृष्टि न थी तो कहीं तो अपनापन मानता ही यह जीव । यह तो इसका गुण है श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र । तो अपनी सुध तो हुई नहीं, अपना परिचय तो हुआ नहीं, तो हुआ क्या कि अपने ही इस स्वरूप में, उपयोग में भूमिका में जो कर्मविपाक के रस झलक रहे हैं उन्हें अज्ञानी अपना मान रहा और जब उन परभावों को अपना मान बैठा तब यह मोही विकल्प गहन में भ्रमण करने लगा । अपने आपका जो एक स्वरूप है उससे यह च्युत हो गया । ऐसा तो रहा आया अब तक, लेकिन ज्ञान का उदय होता तो किस तरह होता कि वह विवेक के द्वारा बहुत निम्न गमन करता अर्थात् अपने आपके आत्मा की ओर अभिमुख होता । बाहर के पदार्थों में उपयोग देना यह कहलाता है ऊपर ऊपर डोलते चढ़ते ऊंचे उड़ गए, लेकिन जब विवेक जगा तो उस विवेक की प्रकृति है निम्नगा अर्थात् वह नम्रता की ओर ले जाता है । तो इस तरह अपने आपके इस ही ओघ में रह गया, जिससे यह उपयोग निकला उसी में ही यह मिल गया । जैसे गर्मी के दिनों में सूर्य के संताप से समुद्र का पानी अपनी जगह छोड़कर ऊपर उठ जाता है, भाप बनकर ऊंचे चढ़ जाता है तो जब तक वह ऊंचे चढ़ा है तब तक वह डोलता रहता है, गरजता रहता है, स्थिर नहीं होता, कहीं का कहीं दौड़ता रहता है, और जब उसका गर्व मिटता है अपने आपमें गंभीर बन जाता है तो वह बरस पड़ता है और उस जल की प्रकृति है निम्नगा, पानी नीचा स्थान मिले उस ओर बहे । तो यों बहकर वह पानी उसी जगह मिल गया जहाँ से वह उठकर बिछुड़ गया था, ऐसे ही यह उपयोग जो पहले अज्ञान संताप के कारण अपने ओघ से, अपने पिंड से, अपने स्वरूप से विकल्पों द्वारा हटकर बाहर उड़ गया था, अब विवेक पाया तो बरस कर अपने से आपमें यह अभिमुख हो गया । तो लो यह ही ज्ञान जो अज्ञान संताप से अपने से हटकर बाहर उड़ गया था, अब विवेक पा लेने से गंभीर बनकर यह अपनी ओर अभिमुख हो जाता ही है और अपने में मिल जाता है । अपना स्वरूप अपने से हटा, लो दुःखी हो गया । अपना स्वरूप अपने में मिला लो शांत हो गया ।

807―ज्ञानैकरस अंतस्तत्त्व की उपासना में समृद्धिसिद्धि―जिस समय आत्मा का उपयोग अपने आपमें आता है तो बस एक ज्ञानरस रहता है, ज्ञानरस के स्वाद में कोई प्रकार का कष्ट नहीं और विकल्पों के तनाव में कष्ट है, बरबादी है । देखो बड़ी सुविधा और मौज की सारी बातें हैं । कष्ट जरा भी नहीं है । अपने स्वरूप को सम्हालें, उसमें अहं का अनुभव करें । और ऐसी प्रतीति से च्युत न हो तो इसका क्या बिगड़ता? गुजारे का कामकाज तो अपने आप चल रहा । गृहस्थी में रहकर सारी बातें इसकी अपने आप उदयानुसार चल रहीं, कष्ट क्या? और एक अपने आपको पाया तो अपने में एक ज्ञानरस बना, शांत रहा, विकल्प नहीं रहते । तो ऐसा यह आत्मा अपने आपमें ही आ जाता है तब इसके सम्यक्त्व का अभ्युदय होता है । मतलब अपने को ज्ञानमात्र स्वीकार कर ले तो सारे कष्ट मिट जायेंगे । मैं अपने आपमें ही सर्वस्व हूँ, इससे बाहर मेरा कुछ नहीं । ऐसा विश्वास से बना लें फिर इसको कोई कष्ट नहीं । तो विकल्पों का क्या करना अपने आपके इस अखंड स्वरूप को दृष्टि में लेना और ऐसा ही दृष्टि में लिए रहना यह ही एक आत्मा के उद्धार का सही उपाय है ।


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