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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार कलश - कलश 95

From जैनकोष



विकल्पक: परं कर्ता विकल्प: कर्म केवलम् ।

न जातु कर्तृकर्मत्वं सविकल्पस्य नश्यति ।।95।।

808―कर्तृत्व का तथ्य―यह समयसार ग्रंथ की आत्मख्याति टीका का 95 वाँ कलश है । यहाँ बतला रहे हैं कि कर्ता कौन जीव कहलाता? कर्ता, अज्ञानी, मोही ये सब एक ही बातें हैं । यद्यपि वस्तुत्व दृष्टि से देखो याने सर्व पदार्थों में सामान्य निगाह से देखें तो कर्ता कहते हैं परिणमने वाले को परिणति करने वाले को, याने एक पर्याय से दूसरी पर्याय होने का नाम है कर्तापन, मगर ऐसा कर्तापन तो सब पदार्थों में है, जो अचेतन है, पुद्गल है, धर्म अधर्म है, आकाश, काल है, सभी पदार्थों में परिणमन होता है और जो परिणमता है सो कर्ता है । तो जो बात सब पदार्थों में एक समान हो उस पर चर्चा नहीं होती, विधि निषेध रूप में । कर्ता कौन है और कर्ता कौन नहीं है यहाँ ये दो बातें चर्चनीय चल रही हैं, किंतु जहाँ विशेषता हो वहाँ दो बातें लगा करती हैं । तो यहाँ मलिनता और निर्मलता की अपेक्षा से बात चल रही है । कर्ता कहते हैं अज्ञानी को । अज्ञानी ही कर्ता है, क्योंकि अज्ञानी सदा विकल्प करता रहता है । विकल्प करने वाले को कर्ता कहते हैं । पर द्रव्य का कर्ता यहाँ नहीं समझना । अच्छा बतलावो एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का क्या कुछ कर सकता है? आप ही हो, घर में रहते हुये अनेक बातों पर चिल्लाते भी हो, झल्लाते हो रूसते भी हो, डाटते भी हो, तुमने यों कर दिया, मैं यों कर दूंगा, यों कर दूंगा तो बताओ आप उस समय अपने भीतर ख्याल ही ख्याल कर रहे या चीज को भी बना रहे? किसी भी चीज को आप नहीं बना सकते । निमित्त भले हो कुछ, मगर प्रत्येक चीज बनती है अपने आपकी परिणति से, देखें तो इस निगाह से एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्ता है ही नहीं, चाहे अज्ञानी हो, मोही हो मिथ्यादृष्टि हो, कोई भी जीव किसी दूसरे पदार्थ को कुछ नहीं कर सकता । लोग सोचते कि मैं शरीर को यों तंदुरुस्त बनाऊँगा तो बना लो । मान लो आप 60-70 साल के बूढ़े हो गए तो अब रोक लो इस बुढ़ापा को । शरीर में बुढ़ापा न आने दो, उसे जवान बनाये रहो, क्योंकि आप तो शरीर का सब कुछ कर सकते ना? और अंत समय आये तो यह हठ बना लो कि मैं तो यहाँ से न जाऊँगा । यहाँ तो बहुत हठ बनाया करते हैं, मैं इसको यों करूँगा, मैं मकान खाली न करूंगा, मैं यों करूँगा अब जरा एक यह भी हठ बना लो कि मैं इस शरीर को न छोडूंगा । यह तो हठ आपकी बन जायेगी कि मैं शरीर को न छोडूंगा क्योंकि यह शरीर छोड़ा, नया शरीर पाया, मगर यह हठ तो बना दो कि मैं इस शरीर को न छोडूंगा, इसी शरीर में रहूंगा । यह हठ आपका चल जायेगा क्या? न चल पायेगा । यह शरीर छूटेगा । तो आपका किसी भी वस्तु पर कुछ अधिकार है ही नहीं, आप तो केवल ख्याल ही ख्याल बनाते हैं । तो जो पर वस्तु में कुछ करने या बदलने का ख्याल बनाये उसे कहते हैं अज्ञानी, कर्ता । तो जो विकल्प करने वाला है उसका नाम है कर्ता ।

809―कर्तृत्व अनर्थकारी अहंकार―भैया, चीज को कोई न करेगा, विकल्प को ही करेगा और विकल्प करने से मिलेगा क्या? किसी आत्मा में कोई चीज आ जाये या धरी है, या आत्मा बड़ा बन जाये ऐसा कुछ होता नहीं, केवल ख्याल ही ख्याल होता । जहाँ गया वहाँ विकल्प, जिस भव में गया वहाँ विकल्प, साथ कुछ नहीं है, चीज कुछ नहीं मिलने की । फायदा कुछ नहीं है, मगर अज्ञानी विकल्प कर रहा है । कोई करोड़पति अरबपति भी हो तो उसके पास एक छदाम भी है क्या? एक पैसा भी है क्या? रहेगा क्या, साथ चिपका है क्या? किसी परवस्तु का आत्मा में प्रवेश ही नहीं है । सब जीव एक समान हैं, अकेले-अकेले अपने-अपने स्वरूप को लिए हुए सब जीव हैं, चाहे अरबपति हो चाहे करोड़पति हो, विद्वान हो, सब अपने-अपने स्वरूप को लिए हुए हैं, इससे आगे इसमें कुछ है ही नहीं, पर व्यर्थ का अहंकार, अभिमान, मूढ़ता बन गई है । यह ही रहस्य जिन्होंने जाना चाहे उन्हें कुछ करना पड़े, मगर जो एक तथ्य जाना गया उसे आकुलता नहीं । क्यों आकुलता नहीं? अरे बड़े से बड़े प्रतिकूल कार्य हो जाते हैं वे भी आप देखते हैं, आपको जो प्रिय हो―माता, पिता, स्त्री, पुत्रादिक, वे जब गुजरते तो आप बस देखते ही तो रह जाते । जान गए―यह हो गया । अब विकल्प करके कुछ दिन दुःखी हो ले यह बात तो आपकी अलग है, मगर उसमें आपका कुछ उठता है क्या? तो आपको बड़ी मानी हुई विपत्ति आती है वह भी आप सहते हैं । सहना पड़ता है तो ऐसे ही सब पदार्थों के लिए कोई यह जान जाये पहले से कि जो भी पदार्थ मिले हैं वे सब एकदम भिन्न हैं, भिन्न जाति के हैं, मेरे में उनसे कुछ सुधार बिगाड़ होता नहीं । केवल ख्याल ही ख्याल यह बनता । तो ख्याल में बरबादी है । तो ऐसा तथ्यज्ञानी विकल्प जाल से लगाव छोड़ देता है । कल्याण तो इसमें ही है कि ख्यालात विकल्प छोड़कर एक शुद्ध ज्ञानस्वभावमात्र सामान्य चैतन्य यही उपयोग में रहे, बस रक्षा जीव की इसमें है । बाकी विकल्पों में जीव की रक्षा नहीं है । तो जो विकल्पक है सो कर्ता और विकल्प कर्म है, तो यह कर्ताकर्मपना तब तक चलेगा जब तक यह जीव विकल्प करता रहेगा ।

810―प्रभुभक्ति में दृष्टव्य तथ्य―हम आप भगवान के दर्शन करने आते प्रभुमूर्ति के सामने आते, रोज-रोज आते, दर्शन करके यह धुन, यह विकल्प, यह लगन नहीं बनती कि प्रभो सार काम तो यही है जो आपने किया, जैसे आप अकेले रह गए । केवलज्ञान संपन्न अपने आपमें लवलीन जो आपकी स्थिति है सार तो यही है और मुझे यह ही चाहिए, और कुछ न चाहिए, ऐसी बात चित्त में नहीं उठती और काम सारे कर रहे, जितनी भी क्रियायें हैं, पूजा पाठ, चीज सामान का उठाना धरना, हाथ जोड़ना, सिर नवाना आदि सब कुछ कर जाते हैं मगर चित्त में यह बात नहीं आ पाती कि हे प्रभो सारभूत बात तो यह है कि जो आपकी स्थिति है । और मेरे जैसे आप भी थे आपने उपाय बनाया तो आप इस परमपद में आ गए । मुझे भी आना है, यह ही चाहिए । इतनी बात किसी के मन में आती है क्या दर्शन करके, पूजा करके? अगर नहीं आती तो आप समझ लो―कुछ लाभ पाया क्या? अविकल्प होने की रुचि होनी चाहिए । मुख्य बात यह भी हो कि अपने इन सारे विकल्प विचारों को धिक्कारा दो । जो भी ख्यालात यहाँं आते करते है, उन्हें धिक्कारा दो तब तो आपका ज्ञानपना है और जो ख्यालात विचार आते, उनमें लग जाते और यह समझते कि उनसे तो मैं महान हूँ, कैसी-कैसी बात करते हो, सोचते हो, मैं इतना अद्भुत काम कर लेता हूँ इससे ही सही मेरा बड़प्पन है, अरे भैया जो धिक्कारा की बात थी उसमें बड़प्पन मान लिया । यह इसकी कितनी बड़ी भारी भूल है और फिर यह कहे कि हम भगवान के भक्त हैं तो भला बतलावो वह प्रभु का भक्त कैसे कहा जा सकता है? भगवान की बात न माने, भगवान की स्थिति की सराहना न करे कि आप बड़े अच्छे पद में हैं, मुझे भी आप जैसी स्थिति चाहिये और कहे कि मैं तो भगवान की खूब भक्ति करता हूँ तो इस तरह काम कुछ न बनेगा ।

811―अंतस्तत्त्व के सही समाधान का सर्वोपरि महत्त्व―सहज परमात्मतत्त्व के प्रति एक लगन चाहिए, धुन चाहिए और एक निर्णय बना लेना चाहिए कि इस जीवन में मेरा सब जाये, तो जाये यहाँ की स्थितियों में मेरा गुजारा हो सकता है, मगर आत्मा का श्रद्धान, ज्ञान, आचरण बिना मेरा गुजारा नहीं हो सकता । चने खाकर गुजारा हो सकता, क्या हर्ज है? कई बार पानी पीना पड़ेगा, हाँ दूध घी न मिला । न मिला तो न सही, मगर अनेकों बार पानी पीकर गुजारा कर सकते । सब तरह से गुजारा हो सकता, मगर आत्मा के श्रद्धान, ज्ञान, आचरण बिना इस

जीव का गुजारा नहीं हो सकता । तब आप तराजू के दोनों पलड़ों पर धर कर एक तरफ धर्मध्यान और एक तरफ सोना चांदी वैभव धर लो, बोलो आपको कौन सा पलड़ा महत्त्व वाला जंचेगा? बस जंचना चाहिए―धर्म का पलड़ा महत्त्व का है । अभी कुछ रहे या न रहे एक दिन ऐसा आयेगा कि सब कुछ छोड़कर चले जायेंगे, पास कुछ न रहेगा । तो सब छोड़ने का पूरा निश्चय है कि यह छूटेगा एक दिन, फिर उसमें जो एक लगन लगी―और धन वैभव बढ़ाये, अच्छा हुआ, या किसी समय कुछ घाटा रहा, व्यापार न चला, हाय यह हो गया यह हो गया―अरे ये सब बातें कुछ नहीं । जब शुभ कर्मोदयवश मनुष्य हुए हैं तो इसका गुजारा भी चलेगा । गुजारा कोई भी ढंग से चले वह विशेष चिंता की बात नहीं है । चिंता की बात तो यह है कि मेरे को आत्मा का ज्ञान बने, आत्मा के ज्ञान में ही मेरा उपयोग रहा करे । अगर ज्ञानस्थ कुछ समय गुजर जाये तो अपने को धन्य समझें । बाकी अन्य चीजों से अन्य स्थितियों से अपने को महान न समझें, धिक्कारा दें । तब वह पात्रता जगेगी कि हम अपने निर्विकल्प अभेद चैतन्य स्वभावमात्र परमात्म स्वरूप का अनुभव कर सकेंगे । विकल्पों में क्या रखा? विकल्प जाल तो आफत है । पड़ गया यह जीव चक्कर में । विकल्प बिना काम के हैं, आना जाना कुछ नहीं, रहना कुछ नहीं, अपना कुछ नहीं, मगर विकल्पजाल चल रहा, उस चक्की में दल रहा है और यह जल रहा, झुलस रहा, कर्मबंध कर रहा । यह साहस नहीं बनाता कि कुछ भी हो, उसमें मेरा बिगाड़ क्या? मैं तो अपने स्वरूप को तकूंगा, तृप्त रहूंगा । सोचते हैं अपने लिए कि हम तो सब कुछ कर लेंगे, गरीबी से रह लेंगे थोड़ा खाकर रह लेंगे, सात्त्विक रह लें । सात्त्विक रह लेंगे मगर बच्चों का क्या करेंगे? स्त्री को बच्चों को, इनको सजाकर रखे बिना दुनिया में एक इज्जत न रहेगी । अब बतलाओ कि मायामय पर के लिए इन मायामय पर जीवों में मायामय इज्जत रखने के लिए अपने आपको कितना विकल्पविपत्ति में डाला जा रहा है, होगा सब अपने आप । चक्रवर्ती भी कुछ कमाई कर लेता है क्या? छह खंड का राज्य वह कहीं से कमाकर लाया क्या? अरे उदय आया ऐसा कि सब कुछ उसके वश हो गया । तो जिस वैभव को लोग पसंद करते वह वैभव चाहने से नहीं मिलता, कमाने से नहीं मिलता । देखने में आता कि कमाने से मिलता, मगर आपका पूर्व सुकृत उदय में हो तो मिल जायेगा, नहीं तो नहीं । अरे बाहरी फोकट मिले तो क्या? न मिले तो क्या? अपने इस नग्न स्वरूप को तो देखो । जैसे कपड़े के भीतर शरीर नग्न है ऐसे ही शरीर के भीतर आत्मा नग्न है । आत्मा में क्या चीज रखी हुई है । वह अमूर्त है । इस नग्नस्वरूप को तो देखो यह आत्मा अकेला है, केवल विचार बनाता, ख्याल बनाता, विकल्प करता, और कुछ नहीं करता ।

801―शांति के लिये आत्मसमाधान की मार्गरूपता―अपनी शांति के लिए अपने आत्मा के ही विकल्प विचार में सुधार की आवश्यकता है बाहर में कुछ अन्य की आवश्यकता नहीं । बाहर की बात स्वयं होती है, अपने आपका चिंतन मनन स्वयं के पुरुषार्थ से होता है । तो जब तक जीव विकल्प वाला है तब तक इसके कर्ता-कर्मपने का विभाव दूर नहीं हो सकता, और जब कर्ता कर्म की बात लगी है बाह्य वस्तु में, मैं इसको करता हूँ, मैंने यह कर दिया, मैं ऐसा कर दूंगा, तब सोचिये तो वह जीव कितना अन्याय कर रहा? पहला अन्याय तो यह कर रहा कि कि खुद को अज्ञान में डाल दिया । विकट कर्मबंध किया उसका उदय आयेगा तो क्या आसानी से निपट लिया जायेगा? अरे वह तो बड़ा विकट लगेगा । इस वजह से इन विकल्पों से अपने को महान न समझें महान समझें प्रभु जैसी स्थिति मिले उससे । निर्लेप निरंजन वीतराग अपने आत्मा का अनुभव उससे तृप्त विशुद्ध ऐसा अपना परिणमन बने, उससे महान समझें और वर्तमान में जो कुछ मिल रहा, किया जा रहा, संग है प्रसंग है, इससे अपने को महान न समझें पहली बात यह ही निरखना है । प्रभु के दर्शन करने से, भक्ति करने से, पूजा करने से पहली बात तो यह सीखना है, यह अ आ इ ई है धर्म की और प्रभु भजन की धर्मपथ में एक प्रारंभिक बात है । पहली बात यह सीखो कि प्रभो आपको ही स्थिति सारभूत है और मेरी जो वर्तमान स्थिति है वह सब निःसार है, अहितरूप है मुझे यहाँ ही आना चाहिए मुझे तो यही चाहिए । मुझे तो यही चाहिए जो आपकी स्थिति है, एक अनुभव से यह बात पानी चाहिये । वैसे कुछ भजन बन गये हैं, उन्हें आप बोल तो जाते हैं, यह बात नहीं कह रहे कि आप उन्हें मुख से बोलते नहीं, प्राय: करके आप लोग गाते ही हो―आतम के अहित विषय कषाय, इनमें मेरी परिणति न जाये, यों सब कुछ बोल जाते, मगर भीतर में उसकी लगन नहीं बनती । अपने विकार विचार कषाय, आदि में घृणा नहीं जगती कि ये सब अनर्थ हैं । सार्थक तो प्रभु स्वरूप है, ऐसी भीतर में लगन नहीं बनती तो हमने क्या पूजा की, क्या भक्ति की, क्या दर्शन किया? कहां धर्म किया? विकल्प मात्र जीव के लिए विपदा है ।

802―बाह्यवस्तुविषयक कल्पनायें छोड़कर अखंड सहज ज्ञानानंदमय स्वरूप में रमने के पौरुष का अनुरोध―बाह्य वस्तु के बारे में ख्यालात बनेंगे तो उसका संसार दूर न होगा । कभी भी विकल्प करने वाले के कर्ताकर्मबुद्धि दूर नहीं हो सकती । यह बात इस प्रकरण में चल रही है जहाँ आत्मा की बड़ी सूक्ष्म चर्चायें की जा रही थी कि आत्मा अमूर्त है, सूक्ष्म है, गुप्त है, द्रष्टा है, जाननहार है, ऐसी भली बातें आत्मा के बारें में सोची जा रही थीं, उन विकल्पों को भी बुरा बताया जा रहा कि ये विकल्प भी जब तक हैं तब तक आत्मा का अनुभव नहीं, तब फिर दंदफंद के, मोह के विकल्प हों उनकी तो बात ही क्या कही जाये ! वह तो एकदम स्पष्ट आग है जिसमें झुलस रहे हैं ये संसारी प्राणी । एक इतनी बात तो आनी चाहिए, यहाँ जो कुछ भी बात बन रही है यह मेरा स्वरूप नहीं है, वह तो दूर होना ही चाहिए । और मुझे तो जो सिद्ध स्वरूप है, सहज स्वरूप है, विशुद्ध आत्मतत्त्व है, अकेला केवल रह जाना है, मात्र ज्ञाता दृष्टा रहना है यह स्थिति मुझको प्राप्त हो, ऐसी एक तीव्र लगन बना लें तो दुर्लभ मानव जीवन सफल हो जायेगा और एक यह ही लगन न बनी तो चाहे कुछ भी बात बन आवे, पर उससे आत्मा का कुछ भी भला होने का नहीं है । तो ऐसी स्थिति पाने के लिए सारे जीवन भर, घंटा दो घन्टा प्रतिदिन ज्ञान में, स्वाध्याय में, आत्मतत्त्व के जाननहार की संगति में अपना समय गुजारना चाहिए ।


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