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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 150

From जैनकोष



रत्तो बंधदि कम्मं मुंचदि जीवो विरागसंपत्तो ।

एसो जिणोवदेसो तम्हा कम्मेसु मा रज्ज ।।150।।

बंधन का कारण राग―जो जीव रागी है वह कर्मों को अवश्य बाँधता है । विरक्त पुरुष इन कर्मों से छूट सकता है । जो बूढ़ा रागी है ना, वह बहुत से पोतों का बंधन बांध लेता है । और उसके राग न हो तो उसके कोई बच्चों का बंधन नहीं । बच्चों के खिलाने का काम बूढ़ों को ही सौंपा जाता है । जब माँ को कोई ज्यादह काम लग जाता है तो बूढ़े से कहते हैं कि लो इन बच्चों को खिलावो क्योंकि बूढ़े और किसी काम के तो हैं नहीं । एक जगह बैठ के सब बच्चों को खिलाएं । यह बच्चों के स्नेह का ही तो परिणाम है कि वह बच्चों से बंध जाता है । और यदि वह जरा बच्चों को टेढ़ी निगाह से देख लेवे, उनसे प्रेम न करे और कभी-कभी बच्चों की चोटी ही खींच लेवे तो वह बंधन से छूट जायेगा । मगर उस बूढ़े को तो बच्चों का ही स्नेह है । सो वह बच्चों से ही बंध गया है । अब जब बंधन में पड़ गया तो रोज-रोज की आफत आ गई । तो उस बूढ़े ने खुद ही तो स्नेह करके आफत लगा लिया । जो सब पदार्थों के साथ इस जीव का बंधन लगा है वह बंधन खुद के भ्रम से ही तो लगा लिया है । कोई बंधन नहीं । सब आत्मस्वरूप हैं । अपने-अपने स्वरूप में सब रहा करते हैं । किसी से किसी का कोई बंधन नहीं है । पर कल्पना में इस विश्व को अपनाकर सर्व बंधन बना लिया है ।

अपने अपराध से बंधन―जो रागी जीव है वह अवश्य ही कर्मों को बांधता है । जो विरक्त जीव है वह ही कर्मों से छूटता है । तो सामान्य रूप से शुभकर्म और अशुभकर्म राग का ही निमित्त है । सो वे सामान्यतया सबको बांधते हैं, बंध के हेतुपने को सिद्ध करते हैं । सो ये दोनों ही कर्म प्रतिषेध के योग्य हैं । बाल-बच्चे परिवार आप को सुहावने लग रहे हैं । इन सुहावने लगने वालों से तुम्हारा क्या पूरा पड़ जायेगा? वे सदा को तो अमर हैं नहीं । मरना तो पड़ेगा ही । क्या परभव में भी ये कुछ मदद कर देंगे? नहीं । परभव की तो बात छोड़ो । इस ही भव में क्या वे कुछ मदद कर सकते हैं? नहीं । सिर का दर्द हो जाये तुम्हें और उन बच्चों से कहो कि देखो हम तुम्हें कितना खिलाते पिलाते हैं । तुम हमारे सिर का दर्द 1 आना ले लो । 15 आने हम भोग लेंगे तो ले सकते हैं क्या? इस वक्त भी कोई तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता है । फिर काहे को बंधन लगा लिया?

बंधन की समानता―भैया ! सब जीवों के स्वरूप को निहारो । सब ज्ञानानंद मात्र हैं । यावन्मात्र क्रिया है, राग है, वह सब बंध के ही कारण है । जैसे यमराज याने कालक्षय चाहे बालक हो, चाहे जवान हो, चाहे बूढ़ा हो, जिस चाहे को एक रूप से तकता है । उसे उतनी दया नहीं है कि यह जवान है, बच्चा है, सुकुमाल है, चाहे गर्भ में हो, चाहे जवान हो, चाहे बूढ़ा हो सबको एक दृष्टि से लखता है । देखो भैया ! इसमें कैसी समता है (हंसी) इसी प्रकार ये कर्म सबको साधारणतया बंधन कराते हैं । चाहे पुण्य वाला हो, चाहे पाप वाला हो, कोई छूट नहीं सकता है । यहीं देख लो ना । गरीब और अमीर में फर्क क्या रहा? गरीब को बल्कि बंधन नहीं है जितना कि अमीरों के बंधन लगा है । गरीबों ने अपने पेट पूजा के लायक कमा लिया उसी में खुश रहते हैं । और किसी चीज की उन्हें परवाह नहीं है । अमीरों को तो रात दिन चिंता सताती है ।

बंधन से सुख की व्यर्थ आशा―भैया ! स्वरूप विस्मरण से होने वाला परप्रीति परिणामरूप बंधन एक बहुत बड़ा बंधन है । चाहे अमीर हो, चाहे गरीब हो, सभी का बंधन एक-सा है, मोक्ष का हेतु है तो केवल एक ज्ञान ही है । ज्ञान के सिवाय और कुछ मोक्ष का उपाय नहीं है । चाहे पुण्य कर्म हो और चाहे पापकर्म, दोनों एक समान हैं । चाहे सोने की बेड़ी हो, चाहे लोहे की बेड़ी हो, बेड़ी तो दोनों ही समान है । बंधनरहित अवस्था तो एक निराकुलता ही है । परस्पर में प्रेम बढ़ा लिया तो लो दोनों के दोनों बंधन से दुःखी हो रहे हैं । और उनमें से कोई एक अपने ज्ञानबल का प्रयोग करे, ज्ञान को निहारे तो उसको बंधन नहीं रहता है । सभी एक समान है, क्या किसी से प्रीति बढ़ाते हो? ज्ञाता दृष्टा रह जावो ।

बंधन के दुष्फल का एक दृष्टांत―कोई मुसाफिर यहाँ से कलकत्ता जाये और जा रहा है किसी भी ट्रेन से, पेसेन्जर से या एक्सप्रेस से । बीच-बीच में कई स्टेशनों पर ट्रेन ठहरे तो रास्ते में बड़े सुंदर-सुंदर स्टेशन मिलते है । छोटा-सा ही स्टेशन सही, पर बड़े ही सुंदर ढंग से सजे हुए, वृक्ष लगे हुए, फुलवाड़ी लगी हुई, कोई स्टेशन बड़ी सुहावनी लगती है तो किसी सुहावनी स्टेशन से यह मुसाफिर प्रेम करने के लिए उतर जाये, उस स्टेशन से ही चिपट जाये । अहा ! स्टेशन तो बड़ा अच्छा है, लो इतने में ही गाड़ी छूट जायेगी । जब गाड़ी छूट जायेगी तो पता लगायेगा कि यहाँ कोई चाय वाला है, यहाँ कुछ खाने को मिलेगा । अब तड़फ रहा है और दु:खी हो रहा है । कहो जी कैसा आनंद मिला? अरे जरा-सी वह स्टेशन सुहा गई और जरा उतर गए उस स्टेशन का सौंदर्य निहारने के लिए । गाड़ी तो दूसरी आठ घंटे बाद आयेगी । और उस स्टेशन पर से बड़ी-बड़ी गाड़ियां निकल रही हैं । मेल निकल रहे हैं, डीजल निकल रहे हैं । कोई गाड़ी खड़ी ही नहीं होती है । खड़ी होने वाली गाड़ी आठ घंटे बाद आयेगी, यह किसका फल है? स्टेशन सुहा जाने का, प्रीति करने का फल है । जाते-जाते कलकत्ता सारा वक्त खराब कर दिया ।

महती यात्रा के मध्य कहीं प्रीति करने का निषेध―इसी तरह हम सब लोगों को जाना कहाँ है? मोक्ष जाना है । हमें भी जाना है, सब लोगों को मोक्ष जाना है । मोक्ष को जाना है पर बीच-बीच में सुहावने स्टेशन मिलेंगे । अच्छा मकान मिल गया, 2-4 घर के लोग मिल गए, यह सुहावना स्टेशन मिल गया । अब यह नादान, मूर्ख, बेवकूफ उन स्टेशनों से प्रीति करने लगा, इतने में गाड़ी छूट गई । होश ही बिगड़ गया । अब दुःखी होता है । बड़ी चिंताएं बन गई । दंद-फंद बढ़ गया । सो इन अध्रुव पदार्थों में प्रीति न करो । इनके ज्ञाता द्रष्टा रहो । बुद्धिमान यात्री हो तो ट्रेन में बैठे ही बैठे वहीं से झांककर उन स्टेशनों को देख ले सो गाड़ी आगे चले तो उसमें बैठा हुआ खुद बढ़ेगा ही । इसी तरह यह चतुर यात्री हो तो अपने आत्मा में ही, अपने आपके भीतर ही बैठा हुआ थोड़ा-सा उपयोग का मुख मोड़कर झांक ले सबको, यह भी इच्छा है तो इसका कोई बिगाड़ नहीं होता है । मगर यह तो अपने स्वरूप के ट्रेन से उतरकर इन सुहावनी स्टेशनों में प्रीति करने लगा सो उसका फल दुःख ही होगा । इन दुःखों का कर्मबंध ही कारण है, सो इन सब कर्मों को प्रतिषेध के योग्य कहा गया है । केवल एक ज्ञानभाव ही मोक्ष का हेतु है ।

मोह की निद्रा में कल्पना―भैया ! खूब गंभीरता से विचार लो । रहता यहाँ किसी का कुछ नहीं है । सब मिट जायेगा, वियोग हो जायेगा । वियोग हो जायेगा केवल अब यह आत्मा रहेगा । स्वप्न में देखी हुई बात स्वप्न में झूठ नहीं मालूम देती । स्वप्न में भयंकर स्वप्न देख लिया तो उसे क्लेश ही होता है । वह यह नहीं समझ सकता है कि मैं तो सजे कमरे में सो रहा हूँ, कमरे में पलंग पर लेटा हूँ, कहां है यहाँ जंगल, कहां है यहाँ शेर और सर्प, कहां हैं यहाँ लुटेरे । मैं तो आनंद से सो रहा हूँ, यह ज्ञात नहीं होता है । स्वप्न के समय में तो जो देखा जा रहा है वह यथार्थ विदित होता है । जब स्वप्न टूट जाता है तब पता पड़ता है अरे वे तो सारी झूठ बातें थीं । इसी प्रकार मोह की नींद में यह स्वप्न सबको आ रहा है कि यह मेरा है, यह वैभव है, ये मित्र हैं, यह सुखमयी है, यह दु:खमयी है, ये सारे स्वप्न आ रहे हैं । जब मोह की नींद टूटे और वस्तु-स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो तब यह पता पड़ेगा कि ये सब झूठे हैं, मेरे मोह के स्वप्न सब झूठे थे । उनमें कुछ न था।

ज्ञान होने पर ही त्रुटि की जानकारी―आपको घर में किसी से प्रीति है और वह गुजर जाये तो 10- 12 दिन के बाद में जब होश-हवास ठीक होता है तब समझ में आता है कि अरे वह तो आया और चला गया । हमने व्यर्थ में उसके पीछे बीसों बातें सोची । क्या मिल गया उन बातों के सोचने से? ठीक-ठीक होश में आता है । सो जब यह ज्ञान जगता है कि मैं तो सबसे न्यारा केवल ज्ञानमात्र हूँ तब इसे ठीक पता पड़ता है कि ओह अब तक मैंने पर से लिपट-लिपटकर क्या अनर्थ कर डाला है, यहाँ पुण्यकर्म और पापकर्म दोनों ही बराबर बंध के कारण हैं । केवल सत्यज्ञान ही आत्मा का हितू है ।

भ्रम का अपराध और क्लेश का बोझ―स्वप्न में एक आदमी को मिल गई 3 हजार रुपये की थैली । तो भैया तीन हजार रुपयों का कितना वजन होगा ? 37।। सेर वजन होगा । यह स्वप्न की बात है । वह उस 37।। सेर वजन की थैली को कांधे पर धरकर चला । 37।। सेर तो बहुत बड़ा वजन होता है । तो स्वप्न में वह कंधा बदलने लगा । एक कांधे पर रखे फिर उसे दूसरे कांधे पर रखे । अब तो उसके पसीना आ गया । उसके नहीं पसीना आ गया, स्वप्न में आ गया । जब कभी तेज स्वप्न आता है तो जैसे स्वप्न में हाथ पैर दुःख रहे हैं उसी तरह जगने के बाद भी हाथ पैर दुखा करते हैं । तो जब उसके कंधे दुखने लगे तो उसकी नींद खुल गई । पहिले तो उसने अपनी थैली टटोला, मिला कुछ नहीं और फिर कंधे दु:ख रहे थे, उन कंधों को यह खूब मसकने लगा । ऐसे ही इन मायामय स्वप्नों में रीझकर मनमाना आचरण बनाते है पर उसका फल कर्मबंध होगा, दुर्गति होगी ।

कषाय में कलह की सुलभता―यह जीव जगत की थोड़ी-थोड़ी बातों पर झगड़ा मचा डालता है । धन पर झगड़ा यह बना लेता है । धन का भी संबंध न हो तो यह बात-बात में ही झगड़ा बना लेता है । वह यह नहीं देखता कि यह सारा जगत असार है । क्या तत्त्व रखा है? सब भिन्न चीजें हैं, ऐसा हो गया तो ऐसा ही सही, पर अपने को राग-द्वेष रहित सुरक्षित रहना चाहिए । वह मनुष्य बुद्धिमान नहीं जो अपनी दो बातों के सिवाय तीसरे दंद में पड़ता है । वे दो बातें कौन हैं? वे गृहस्थ हैं ना, इसलिए कुछ आजीविका कर लें क्योंकि पालन पोषण तो करना है । और बाकी समय आत्मोद्धार में लगावें । इनके सिवाय जो तीसरा दंद-फंद बनता है वह बुद्धिमानी नहीं है ।

गृहस्थ का सार्थक प्रयोजन―भैया ! आजीविका व जीवोद्धार संबंधी अपने दो उद्देश्यों के अंतर्गत ही अपना कार्यक्रम बनाओ ! और कार्य इन दो उद्देश्यों में से किसी भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकते । तीसरा कार्य मत करो । ठलुवा लोग बैठ गए और यहाँ वहाँ की सुनाने लगे, निंदा करने लगे तो उन लोगों में से भी कोई ऊब कर कह देता है ― अरे तेरा तुच्छ हृदय है । निंदा के सिवाय और कुछ मिलने को नहीं है । सबकी दृष्टि में गिर जाता है । तो व्यर्थ की ही बातें करने में क्या पाया? यहाँ वहाँ की चुगली करने में खोटे मार्ग की बात कहने में क्या तत्त्व रखा है? जीने के दो मार्ग है तुम्हारे, एक तो आजीविका का काम करलो और दूसरे आत्मतत्त्व के श्रद्धान में लग जावो । तुम्हें उपकार करना है तो जिस ढंग से दूसरों का उपकार हो वैसा करो । चाहे दूसरों का अनुपकार और तुम उपकार करने में ही तुले रहो कि हमें ऐसा करना ही है, सो तो विवेक नहीं है । ऐसे ही हो तो आपके स्वरूप के संक्लेश और आप उस हठ पर ही उतरे रहो कि मुझे तो ऐसा करना ही है तो यह बुद्धिमानी नहीं है । जैन शासन का शरण सच्चा शरण है । ज्ञानियों ने जो उपदेश दिया है, जो मार्ग बताया है उस मार्ग पर चलो तो नियम से शांति मिलेगी ।

अविवेकपूर्ण उपकार पर तुलने पर एक दृष्टांत―एक ऊँट वाला था । उसके ऊँट ने खा लिया कुम्हड़ा (काशीफल) । तो उसके गले में अटक गया । ऊँट का गला 3-4 हाथ का होता होगा । सो उस ऊँट के गले में वह काशीफल अटक गया । अब सोचा कैसे ठीक हो? बहुत से वैद्य बुलाए, पर न ठीक हुआ । एक चतुर आदमी आया; बोला हम ठीक कर देंगे । कहा अच्छा हम तुम्हें 10 रुपया देंगे ठीक कर दो । वहां लिटा दो, लिटा दिया । गर्दन लिटा दिया और उस गर्दन के नीचे पत्थर रख दिया और ऊपर से दूसरे पत्थर से धीरे-धीरे ठोका । काशीफल फूट गया और ऊंट निगल गया, अच्छा हो गया । अब वह ऊँट वाला सोचता है कि यह तो बड़ा अच्छा वैद्य है । यह सबकी ऐसी ही दवा करता है । सबका एक ही तो इलाज है । इसी इलाज से सारे रोग मिट जायेंगे । अब वह सब जगह जाकर कहता फिरता कि हम बड़े अच्छे वैद्य हैं, हम हर एक रोग की दवा करते हैं । अब एक अधकच्ची या अधपक्की या अधमरी कहो, बुढ़िया मिली । वह बुढ़िया बीमार थी । वैद्य महाराज को बुढ़िया के घरवालों ने बुलाया व कहा―अच्छा कर दो ।....बहुत अच्छा । उसने बुढ़िया के गले के नीचे पत्थर रख दिया और जैसा इलाज ऊँट के हुआ था वही किया । तो उसने एक पत्थर ऐसा मारा कि उसके प्राण निकल गए । लोगों ने कहा कि तुमने बड़ा खोटा काम किया । बोला, अरे खोटा नहीं किया । हमारा ऊँट भी बीमार हुआ था तो वह भी इसी ढंग से ठीक हुआ था । जैसे आप लोग ही डाक्टर से दवा करवाते हैं तो 25 को आराम होता है, 25 को नहीं होता है । किसी को आराम होता है किसी को नहीं होता है । तो ऐसे उपकार में न तुलो कि चाहे दूसरों की जान जाये पर हमें उपकार करना ही है ।

अपने भले हुए बिना दूसरों का भला करना कठिन―भैया ! अपने को अच्छा करो । हम यदि अच्छे हैं तो यह संभव है कि हमारे द्वारा दूसरों का उपकार हो सकता है । यदि हम भले नहीं हैं, बुरे हैं, ज्ञान और आचरण से हीन हैं तो हमारे द्वारा किसी दूसरे का उपकार नहीं हो सकता । तो प्रथम कर्तव्य तो आत्म-उपकार का है । पहिले अपने आपकी बात सोचो तो अपना कल्याण कर सकते हो । यदि तुम काबिल हो तो तुम दूसरों के कल्याण में निमित्त बन सकते हो । यदि खुद ही खुद के कल्याण से विपरीत हो तो दूसरों के कल्याण के निमित्त नहीं बन सकते हो ।

नैष्कर्म्य में सशरणता―यहां शंका में एक प्रश्न करते हैं कि जब तुमने पुण्यकर्म का भी निषेध कर दिया, पापकर्म का भी निषेध कर दिया तो अब हम लोग क्या करें? मानो साधुवों ने प्रश्न किया कि हे आचार्यदेव ! तुमने पुण्य और पाप दोनों कर्मों को हेय बताया है तो अब तो हम निष्कर्म हो गए, जिसे कहते हैं फालतू हो गए, कुछ करने को काम ही नहीं रहा, अब हम लोग अशरण हो जायेंगे । अभी तो हमें कुछ-कुछ काम मिलता था इसलिए सशरण थे । अब तो कोई काम ही नहीं रहा । तो आचार्यदेव उत्तर देते हैं कि ऐसे मुनिजन अशरण नहीं होते । जब पुण्य और पाप दोनों कर्मों का प्रतिषेध हो जाता है तब ज्ञान में ज्ञान लीन हो जाता है, आचरित हो जाता है । जब ज्ञान में ज्ञान प्रविष्ट हो जाये तो उनको परमशरण मिल जाता है । वह अपने ज्ञान में रत होकर परम अमृत का अनुभव करता है ।

पराभिमुख की अशरणता―भैया ! अशरण तो वह है जो बाहरी पदार्थों में अपना शरण मानता है । मेरा भैया, मेरा बच्चा, मेरा अमुक मेरे को शरण है । मेरा दिल लगा रहता है । मुझे अमुक चाहिए । यही मेरा हित है, ऐसी जो बाह्य पदार्थों में अपनी शरण ढूंढ़ता है वही अशरण है । और जो अपने में शाश्वत विराजमान इस ज्ञानमात्र स्वभाव का शरण ढूंढ़ता है वह है शरण । सो जगत के सर्वसंकटों से बचने के लिए स्वयं शरणभूत आत्मतत्व को देखो और ज्ञानमय होकर इस अमूर्त स्वरूप का अनुभव करो । यही अमृतपान कहलाता है ।

ज्ञानी संतों का अमृतपान―लोग कहते हैं कि अमृत के पीने से पुरुष अमर हो जाते हैं । वह अमृत क्या है? वह अमृत बाहर में कुछ नहीं है । न कुछ पानी पनीला है, न कोई लड्डू, आम जैसा है, न वह कुछ शक्कर जैसा है, न पुद्गल है । वह अमृत क्या है? अपने ज्ञानस्वभाव की दृष्टि कर लेना ही अमृत है । यह वास्तविक बात है । अन्य पदार्थों में हितपने का भ्रम करके अपना चित्त न बिगाड़ो । अन्य पदार्थों को अपना शरण मान करके अपने को अधीर न बनाओ । परपदार्थों से तो नीति और न्याय के कारण व्यवहार रखो और अपने आपके स्वभाव की रुचि बनाए रहो । सो समस्त पुण्य पाप का निषेध किया उन ज्ञानी संत महात्माओं ने जो वन में एकाकी विराजमान रहे, उन्हें नैष्कर्म्य की कृपा से ऐसा शरण मिल गया कि जिस शरण के मिल जाने के कारण उन्हें दूसरी वस्तु का संग ही नहीं सुहाया । उन्होंने परमसमता के अनुभवरूप अमृत का पान किया ।

पुण्य-पाप के बंधन की समानता के परिज्ञान से शिक्षा―इस प्रकार इस गाथा में पुण्य और पाप दोनों कर्मों को हेय बताया और अपने आपका जो शुद्ध ज्ञानस्वरूप है उस ज्ञानज्योति मात्र निज तत्त्व में रत होने का उपदेश किया गया है । जो जीव राग करता है वह कर्मों को बांधता है और जो जीव राग नहीं करता है वह कर्मों से छूट जाता है । जिनेंद्र भगवान का यही एक संक्षिप्त उपदेश है । इसलिए हे कल्याणार्थी पुरुषों ! तुम किसी भी प्रकार के कर्मों में राग मत करो । समस्त राग द्वेषों को हेय जानना चाहिए । शुभ हो, चाहे अशुभ हो, एक शुद्ध ज्ञानस्वरूप की लीला को ही अपना परम शरण समझो ।

अब तक यह प्रकरण चला आया है कि पुण्यकर्म और पापकर्म दोनों ही कुशील हैं, संसारबंधन के कारण हैं । इतना निर्णय करने के बाद अब यह प्रश्न किया जा रहा है, तो फिर मोक्ष का हेतु क्या है? मोक्ष का हेतु ज्ञान है, उसकी सिद्धि करते हैं ।


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