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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 151

From जैनकोष



परमट्ठो खलु समओ सुद्धो जो केवली मुणी णाणी ।

तम्हि ट्ठिदा सहावे मुणिणो पावंति णिव्वाणं ।।151।।

ज्ञान की मोक्षहेतुता―ज्ञान ही मोक्ष का कारण है, क्योंकि ज्ञान न तो पुण्य बंध का कारण है, न शुभ कर्म का कारण है, न अशुभ कर्म का कारण है, न पापबंध का कारण है । इसलिए ज्ञान में ही मोक्ष की कारणता सिद्ध होती है । जितना भी बंधन लगा है जीव को वह रागद्वेष और मोह के कारण लगा है और ज्ञान के कारण रूप परिणमन अर्थात् समस्त पदार्थों के ज्ञाता दृष्टा रहने में रागद्वेष मोह होता नहीं है, इस कारण ज्ञान परिणमन में बंध नहीं बताया, मोक्ष ही होता है । यह ज्ञानपरिणमन समस्त कर्मों की जाति से जुदा है । रागादिक विभाव भी जात्यंतर हैं । और ज्ञानावरणादिक कर्म तो जात्यंतर हैं ही । और यह परमात्मतत्त्व चैतन्य जातिरूप है ।

अंतर्बाह्य मल के अभाव में स्वच्छता―जैसे साफ सुंदर चौकी हो उस चौकी पर बहुत से धब्बा लगे हों चिड़िया के वीट के अथवा स्याही के धूल के बहुत धब्बे लगे हुए हों और दोपहर की धूप में रखी हो सो गर्म भी काफी हो गई, उस समय इस चौकी में दो तरह का मल आ गया । एक तो मल आया है गर्मी का । चौकी के स्वभाव में ऐसी गर्मी नहीं है । वह तो धूप का संयोग पाकर इसमें गर्मी आई है और एक दोष है इस पर धब्बा लगने का । इसी प्रकार आत्मा में दो दोष आते हैं, एक तो गर्मी के मानिंद रागद्वेष मोह भाव होने का और एक धब्बे के मानिंद ज्ञानावरणादिक कर्मों के लगने का । इन दोनों दोषों में ज्ञानावरणादिक कर्म तो प्रकट जात्यंतर हैं । जीव की चैतन्य जाति है और कर्मों की पुद्गल जाति है । किंतु जो रागद्वेष मोह का दोष आया है वह भी जात्यंतर है । रागद्वेष तो जड़ हैं, वे जानने वाले नहीं हैं । जानने वाला तो ज्ञान है । तो एक चैतन्य भाव ही चेतन की जाति का है । ये रागद्वेष भाव मोक्ष के हेतु न होंगे । मोक्ष का हेतु तो ज्ञानभाव ही है । चाहे चैतन्य-स्वरूप कहो, चाहे परमार्थ आत्मा कहो, एक ही बात है ।

आत्मा के समय नाम की सार्थकता―इस ही का नाम समय है अर्थात् एक साथ एक भाव रूप से परिणत होने वाले ज्ञान में सम्यक्त्व होता है । इसलिए इस आत्मा का ही नाम समय है । सम एकत्वेन अयते गच्छति इति समय: । जो एक रूप से गमन करे उसको समय कहते हैं । देखो लोगों ने इन घड़ी घंटों का नाम समय रख लिया, मिनट सैकंडों का नाम समय रख लिया, क्योंकि यह समय भी एक रूप से गमन करता है । कोई कहता है कि आजकल पंचमकाल है इस वजह से मोक्ष नहीं होता । तो क्या काल का परिणमन जो समय है उसमें कोई दोष आ गया कि जिससे मोक्ष नहीं होता । समय होता तो सब एक रूप है । चाहे चौथा काल हो, चाहे किसी काल का समय हो । समय की ओर से तो सब समय एक समान हैं पर जिस काल में मनुष्य हीन योग्यता के हों, हीन संहनन के हों, हीन बल बुद्धि के हों तो दोष तो है इस पुरुष का और नाम लगता है समय का कि पंचम काल है सो मोक्ष नहीं होता । तो अपराध है मनुष्य का, पर अपराध लगा समय पर । तो समय भी एक रूप से गमन करता है । जब देखा जाता कि समय एक रूप से गमन करता है इसी प्रकार यह आत्मा भी अपने शुद्ध कार्यों में एक रूप से गमन करता है । इस आत्मा का शुद्ध कार्य है जानन ज्ञाता-द्रष्टा रहना मात्र । उसमें एक रूप से ही इस आत्मा का गमन है इसलिए इसको समय कहते हैं ।

आत्मा के परमार्थ नाम की सार्थकता―यह आत्मा परमार्थ है, यह तो पहिला विशेषण है । परमार्थ उसे कहते हैं जो समस्त कर्मादिक जात्यंतर से जुदा रहता हो और मात्र चैतन्य जाति स्वरूप हो उसको कहते हैं परमार्थ । सो यह परमार्थ आत्मा ही है । यह आत्मा अपने स्वरूप से समस्त परद्रव्यों से और परभावों से जुदा स्वच्छ ज्ञानज्योतिमात्र है । जिसकी चर्चा की जा रही है, ध्यान से सुनिये―अपने आपमें बसे हुए आत्मस्वरूप की चर्चा की जा रही है । जिस आत्मा को जान लेने पर यह निश्चय हो जाता है कि मैं न पुरुष हूँ और न स्त्री हूँ । जो पुरुष है वह अपने को पुरुषपने से मना कर सके, इतना ज्ञान जगे तो समझ लो कि मोक्ष का मार्ग मिला । जो स्त्री जाति में हैं वे अपने को स्त्रीपन से मना कर सकें कि मैं स्त्री नहीं हूँ ऐसा दृढ़ निर्णय कर लें तो समझें कि अब वह धर्माद्रष्टा आत्मा है । जब यह निर्णय हुआ कि मैं पुरुष नहीं हूँ, मैं स्त्री नहीं हूँ तब अंतर में विराजमान इस परमात्मस्वरूप को देख सका यह तो केवल ज्ञानप्रकाशमात्र है । इसमें हाथ, पैर, हड्डी, चमड़ी नहीं, कोई पिंड नहीं । यह आत्मा तो आकाश की तरह अमूर्त निर्लेप ज्ञानज्योतिमात्र है । वह तुम हो, यह मैं हूँ । तो यह आत्मा क्या स्त्री है अथवा क्या पुरुष है? निर्णय करो अपने आप में । इन इंद्रियों को संकोच कर आँखों को बंद कर सबकी दृष्टियां छोड़कर अंतर में देखो जरा―यह मैं आत्मा ज्ञान ज्योतिमात्र हूँ, इसके तो शरीर ही नहीं है फिर पुरुष और स्त्रीपना होगा ही क्या? यह आत्मा अपने शुद्ध कार्यों में एक रूप से गमन करता है । यह दूसरा विशेषण परमात्मस्वभाव का दिया गया है ।

आत्मा के शुद्ध नाम की सार्थकता―अब तीसरा विशेषण देखिये । यह शुद्ध है । आज की चर्चा कुछ कठिन लग रही होगी, पर यह चर्चा तुम्हारी ही है, दूसरे की नहीं है । तुम्हारी बात तुम्हें कठिन लगे, यह तो खेद की बात होना चाहिए । और वह घर गृहस्थ कुटुंब परिवार और वह दाल, चावल जो तुम्हारी चीजें नहीं हैं वे तुम्हें सरल लगती हैं इसका तो खेद होना चाहिए । तुम्हारे ही अंतर के पते की बात कही जा रही है । हे आत्मन् ! तू शुद्ध है । कैसा शुद्ध है? केवल ज्ञानप्रकाश मात्र है । इसमें इसका कारण न कोई तरंग है, न कोई रंग है । विकल्प उठते हैं, विचार चलते हैं, चिंताएं होती हैं, इष्ट-अनिष्ट भाव होता है । यह सब तू नहीं है । ये औपाधिक भाव तेरे नहीं हैं, मायाचार तेरे सत्त्व की कला नहीं है । तू शुद्ध ज्ञानमात्र है । तू समस्त नय पक्षों के मेल से रहित है । तू एक ज्ञानमात्र है, तू शुद्ध है । ऐसी शुद्धता को देखोगे तो समझ लो कि धर्म किया । और ऐसा शुद्ध परमार्थ परमात्मतत्त्व दृष्टि में न हो, केवल मूर्ति ही नजर आए, केवल मंदिर ही नजर आए, केवल आने-जाने वाले लोग ही दृष्टि में आएँ तो तू अभी धर्म में नहीं लग रहा है । धर्म में तो तब दृष्टि है जब मंदिर आने जाने वाले लोग सब भूल जायें और एक ज्ञानमूर्ति जानें ꠰ यह आत्मा के सही पते की बात कही जा रही है । तू शुद्ध है ।

आत्मा के केवली नाम की सार्थकता―चौथा विशेषण कहते हैं कि हे आत्मन ! तू केवली है तू केवल है, प्यौर (Pure) है, खालिस है । जिसमें न दूसरे पदार्थों का संबंध है और न दूसरे पदार्थों का निमित्त पाकर कोई तरंग या रंग होने का स्वभाव है । केवल चैतन्यमात्र वस्तु है । पानी मिले हुए दूध को आप समझ जाते हैं कि इसमें इतना दूध है और इतना पानी है । इतनी कला तो है ना आप पर । जब दूध खरीदते हो तो देखकर बता देते हो कि इसमें तो आधा दूध है और आधा पानी है । इस जानने में तो आपकी कला है ना । इसी तरह मिले हुए आत्मस्वभाव में राग-द्वेष विभावों में यह विभाव है, यह स्वभाव है यह कला जिसके जग जाती है उसे धर्मात्मा कहते हैं । धर्म कितनी गहरी चीज है । और इसे समझने वाले जगत में कितने हैं? धर्मात्मा का टाइटिल तो लाखों को लगा होगा । कोई साधुवों के पास ज्यादह बैठता हो, मंदिर में ज्यादह रहता हो, कोई लोगों के उपहार के लिए लाखों का धन खर्च करता हो, कोई मंदिर, धर्मशाला वगैरह बनवा देता हो, तो इतने मात्र से लोकव्यवहार में धर्मात्मा का टाइटिल मिल जाता है पर आचार्य महोदय यहाँ कह रहे हैं कि जिसने परमार्थ से शुद्ध, केवल का परिचय पाया है वह धर्मात्मा है ।

शुभोपयोग की अपने स्थान में कार्यकारिता―भैया ! जगत के जीव अनंतकाल से विषय कषायों के संस्कार में पड़े हुए हैं । अच्छा है कि किन्हीं पुरुषों को गुरुवों के साथ रहने का, मंदिर में पूजा पाठ करने का, दूसरों के उपकार में द्रव्य खर्च करने का भाव हो जाये तो भला है, मगर यह उतना भला है जितना कि 104 डिग्री बुखार के बाद 100 डिग्री बुखार रह जाये तो 100 डिग्री का बुखार रह जाना भला है । 104 डिग्री के ज्वर की पीड़ा, वेदना नहीं रही इस कारण वह 100 डिग्री टेंपरेचर भला है । पर क्या वस्तुत: 100 डिग्री के टेंपरेचर वाले को हम निरोगी कह सकते हैं? नहीं । बड़ी सावधानी रखनी पड़ेगी, नहीं तो 100 डिग्री से फिर अधिक बढ़ जायेगा, फिर आफत पड़ जायेगी । इसी प्रकार उन तीव्र विषय कषायों के भावों के मुकाबले में गुरुसंग, भगवत्भक्ति, परोपकार, जीव दया ― ये भले हैं किंतु इनसे भी सावधानी रखनी पड़ेगी । क्योंकि यह अस्थिरता की वृत्ति है, औपाधिक भाव हैं । वहाँ यह पता नहीं पड़ता है कि ऊंट किस करवट बैठेगा? कदाचित कोई ऐसी धुन घर कर भी इस कहलाए गए धर्मात्मापन से चिगकर महापाप में लग सकता है । अभी इस आत्मा को धर्मात्मा नहीं कहा जा सकता । धर्मात्मा वह है जिसको अपने धर्म का, स्वभाव का परिचय हुआ । यह आत्मस्वभाव कैवल्य है ।

आत्मा के मुनि नाम की सार्थकता―इस प्रकार चौथा विशेषण कहने के बाद 5वां विशेषण कहा जा रहा है कि आत्मा मुनि है अर्थात् मनन मात्र भावमय है यह । आत्मा कर क्या रहा है अंतरंग में पड़ा हुआ? मनन कर रहा है, अपने ज्ञानादिक गुणों का अनुभवन कर रहा है और शुद्ध रूप में तो यह आत्मा चैतन्य प्रतिभास मात्र परिणमन कर रहा है और उस ही परिणमन को आत्मरूप समझकर तृप्त और आनंदमग्न हो रहा है । इस कारण मननमात्र भाव होने कारण इस आत्मा को मुनि कहा गया है ।

आत्मा के ज्ञानी नाम की सार्थकता―अब छठा विशेषण कहते हैं कि यह आत्मा ज्ञानी है । यह स्वयमेव ज्ञानस्वरूप है । ज्ञानातिरिक्त इस आत्मा में क्या भाव जान सकते हैं? भेददृष्टि से चाहे ज्ञान कह दो, चाहे ज्ञानी कह दो, चाहे आत्मा कह दो, सब एक पर्यायवाचक शब्द हैं । जो जाननभाव है वह ही आत्मा है । अपने को जाननभाव के रूप में निहारिये । इसरूप में अपना अनुभवन न कर सके तो नाना भावरूप अनुभवते हैं तो वह नागनाथ और सांपनाथ जैसा कहने भर का अंतर है । स्वभाव से तो चिगे हुए हैं ।

आत्मा की ज्ञान स्वभावता―यह आत्मा ज्ञानी है, ज्ञान को लिए हुए है और वह ज्ञान जिसके पास हो उसे ज्ञानी कहते हैं ऐसा अर्थ यहाँ नहीं लेना । यह अर्थ एक सिद्धांत में कहा जरूर गया है कि आत्मा का स्वरूप मात्र जानना है । उसमें जब ज्ञान का संबंध होता है तो उसे ज्ञानी कहते हैं, पर आत्मा के ज्ञानी होने की यह पद्धति नहीं है । आत्मा स्वयं ज्ञानस्वरूप है । इस कारण उसे ज्ञानी कहते हैं । यहाँ मोक्ष का हेतु बतलाया जा रहा है कि मोक्ष का हेतु कौन है? हम किसकी शरण जायें, किसका आलंबन लें, किसकी कृपा पायें, किसकी दृष्टि करें कि हम संसार के सब संकटों से दूर हो सकें, वह प्रभु है यह ज्ञानस्वभाव ।

आत्मा की स्वस्वभावमात्रता―यह अपने स्वभावमात्र है । इसको स्व स्वभाव कहते हैं । अर्थात् स्व होना मात्र ही यह आत्मा है । स्व है चित् । सो चैतन्य का होना मात्र ही यह आत्मा है । यह आत्मस्वभाव या प्रभु का दरबार कुछ कहिए, यहाँ पहुँचने पर एक अलौकिक स्थिति में पहुंच जाते हैं । जहाँ सर्व विलक्षण ही दर्शन का अनुभवन हुआ करता है । तो इस प्रकार आत्मा का हेतुभूत जो ज्ञानभाव है उस ज्ञानभाव को विशेषणों द्वारा देखो । किसी भी विशेष्य को समझने के लिए विशेषण सहायक होते हैं । यह आपकी खुद की बात कही जा रही है । आपके महल की बात कहें तो वह आपकी बात नहीं है, वह जड़ पुद्गल की बात है । आपके शरीर की बात कहें तो वह आपकी निजी बात नहीं है वह जड़ पुद्गल की बात है, आपके धन के उपयोग सेवा भाव की बात कहें तो यह भी आपकी निजी बात नहीं है । यह तो चिदाभासों की बात है, घर की बात है । आपके अनादि अनंत अहेतुक अशरण चैतन्यभाव की महिमा गायें तो यह आपकी बात है । यह बात केवल आपकी ही न रहेगी, यह सर्व जीवों की बात है । और जैसे जिस विशेषण के द्वारा हम अपनी बात समझ सकते हैं वह विशेषण सर्व जीवों में निमग्न हो गया है । इस कारण इन जीवों से अलग कुछ नहीं है । यह स्व लक्षण की बात कही जा रही है । आनंद के अनुभव के लिए तो आप सब जुदा हैं, मगर जिस स्वलक्षण से जीव का परिज्ञान होता है उस स्वलक्षण की दृष्टि में हम और आप अपनी जुदी सीमा नहीं बना पाते । इसी कारण उस अद्वैतवाद ने सब एक ब्रह्म स्वरूप मान लिया । स्याद्वाद भी इसका लक्ष्य कराता है पर वह अपनी पद्धति से ही कराता है । यह आत्मा स्वस्वभावमात्र है ।

आत्मा के कथित विशेषणों का उपसंहार―यह आत्मा परमार्थ है क्योंकि समस्त परद्रव्यों और परभावों से रहित उत्कृष्ट स्वरूप वाला है । यह आत्मा समय है क्योंकि एकसाथ एक रूप से ज्ञान में गमन करता है । यह आत्मा अपनी ओर से भिन्न-भिन्न रूपों से ज्ञान नहीं किया करता है, वह आश्रयभेद, उपाधिभेद से भिन्न-भिन्न ज्ञान होता है, पर यह तो स्वरसत: एक स्वरूप ही ज्ञान में चलता है, सबसे न्यारा है केवल है, मनन को लिए हुए है, ज्ञानानंदमय है, अपने भावों की भावना मात्र हैं ऐसे आत्मस्वरूप में पहुंच हो जाये जहाँ कि वे साधुजन निर्वाण को प्राप्त करते हैं । निर्वाण मायने कैवल्य, खालिस रह जाना । खालिस रह जाना तो कोई चाहे और वह निरपेक्ष सत्त्व की भावना न करे तो वह खालिस कैसे बन सकता है? कैवल्य बनना हो तो अपने को केवल निहारने लगो, केवल बन जावोगे । और यदि निहारो द्वैत को, सर्व मायामय पिंडों को, एक दूसरे के संबंध को और चाहो कि हम केवल बन जायें तो नहीं बना जा सकता है । केवल बनने का उपाय कैवल्य को शुद्ध आत्मतत्त्व को देखना है ।

इस प्रकार जब यह प्रश्न किया गया था कि पुण्य और पाप कर्म तुम तो इन दोनों को हेय बता रहे हो, यह मोक्ष के कारण नहीं हैं, तो फिर मोक्ष का कारण है क्या? इसके उत्तर में यह गाथा आई है कि मोक्ष का कारण तो एक ज्ञानस्वभाव है, कैवल्य है, उसकी ही दृष्टि से, आलंबन से धर्म होता है और उसकी वृद्धि हो होकर केवलज्ञान होता है । अब इस ही ज्ञान को उसके प्रतिपक्ष रूप से बतलाते हैं ।


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