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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 160

From जैनकोष



सो सव्वणाणदरिसी कम्मरएण णियेणावच्छण्णो ।

संसारसमावण्णो ण वि जाणदि सव्वदो सव्वं ।।160।।

यह आत्मा स्वभाव से सबको जानने वाला और देखने वाला है, तो भी अपने कर्म-रूपी रज से आच्छादित होता हुआ, संसार को प्राप्त होता हुआ सर्व प्रकार से सब वस्तुवों को नहीं जानता है । कहना तो यह था कि कर्म ही बंध स्वरूप है और कह क्या दिया कि निज कर्मों से अवच्छन्न होकर मायने ढक कर यह सबको नहीं जान सकता है । इसमें दो बातें आई । अपने गुणों का विकास न हो पाना, यह बंधन है, सुख दु:ख भी बंधन है और अपने स्वभाव के अनुकूल काम न हो पाना यह भी बड़ा बंधन है ।

इच्छा का बंधन―जैसे किसी बालक को यह इच्छा हो जाये कि यहाँ से उठो और घर चलो । और माँ नहीं उठती तो बच्चा कितना तड़फता है । अरे बालक तुम को क्या दुःख हो गया? लो मिठाई खा लो, फल खा लो, अच्छे गद्दे पर सो जावो, तुझे क्लेश क्यों हुआ? उसके क्लेश नहीं मिटाये मिटते हैं चाहे जितने अच्छे पलंग पर सुलावो । उसके तो मन में एक बात आ गई कि घर जायें और आजादी से रहें । यहाँ रिश्तेदार के घर में बैठे हैं तो आजादी से दिल नहीं लगता, यहाँ खेलने को मन नहीं करता, तू घर चल । अपने मन के माफिक बात पूरी न बनना भी बंधन है ।

अज्ञान का बंधन―जीव का स्वभाव सब वस्तुवों के जानने देखने का है, इस मर्म को नहीं जान पाना कि यही विकट बंधन है । क्योंकि यहाँ निज कर्मों से ढक गया । अर्थात् आत्मा में जो विकार भाव होता है वह ही कर्म है और उन विकारभूत कर्मों से यह जीव दबा है इसलिए गुणों का विकास नहीं हो सकता । है तो यह स्वयं ज्ञानस्वभावी ज्ञानरूपी । सर्व विश्व को सामान्यरूप से और विशेषरूप से जानने का स्वभाव आत्मा में है पर अनादि काल से अपने पौरुष न किये जाने के अवरोध से प्रकृत्या जो कर्ममल हैं, रागादिक विकार हैं, उन कर्ममलों से ढका हुआ होने के कारण इस बंध अवस्था में सर्व ओर से आत्मा को न जानता हुआ यह जीव अज्ञानभाव से ऐसा ही ठहर रहा है । इससे यह निश्चित होता है कि ये कर्म स्वयं बंधन है ।

ज्ञानगम्य भावात्मक अमूर्त आत्मा का भौतिक पदार्थों से बंधन का अभाव―जीव है भावात्मक । इसको लंबे चौड़े निगाह से परखों तो अनुभव में न आयेगा । इसे किसी पिंडरूप की निगाह से देखो तो यह अनुभव में न आयेगा । इसको किसी अवस्था के रूप से देखो, यह क्रोधी है, यह मन वाला है इस तरह से देखो तो जीव अनुभव में न आयेगा, किंतु जीव का सहज स्वलक्षण जो चैतन्य भाव है उस चैतन्य का क्या स्वरूप है? मात्र प्रतिभास, केवल जानकारी, इस रूप से यदि जीव को निरखो तो जीव अनुभव में आयेगा । तो ऐसा भावात्मक यह मैं आत्मा सोने चांदी से बंध जाऊँ तो यह असंभव है । जो आत्मा है वह वज्र में से भी निकल जाये और हानि न पहुंचे ऐसा सूक्ष्म है, आकाश की तरह अमूर्त है । कुछ ईंट पत्थर से बंध सकता हैं क्या? नहीं । इसका बंधन तो भ्रम व राग ही है ।

रागजाल का प्रयोग―कोई वश में आपके न होता हो, आपके बंधन में न पड़ता हो तो एक उपाय ऐसा बता दें कि आपके बंधन में आ जायेगा, आपका दास बन जायेगा । ऐसा उपाय बता दें । सुनना है आपको? जो आपके बंधन में न आए, आपके कब्जे में न आये वह आपकी गुलामी में ही पड़ा रहे ऐसा मंत्र बताएंगे । आप लोगों को जानने की इच्छा है? है । क्यों इच्छा न हो, आप तो इस जगत को अपने अधिकार में करना चाहते हैं । अच्छा सुनो, उसका मंत्र है कि उसकी प्रशंसा कर दो, उसको ऊंचा कह दो, अच्छा बोल दो, तनिक विनयपूर्वक बोल दो इतनी सी बात है फिर तो दिनभर जो चाहे काम करा लो । यह है उसका मूल मंत्र । करते बने तो करके देख लो । मगर इस पर द्वेष की प्रभुता इतनी विकट है कि जिस जीव पर द्वेष आ जाता है उससे अच्छा बोलने की मंशा ही नहीं होती है । और कोई यदि चतुर हो तो वह अच्छी तरह बोल ले तो उसके सारे कंटक सब खतम हो जायेंगे । राग ही विकट बंधन है । वह राग के बंधन में पड़ गया, तो अपने आपके आत्मा में जो रागभाव होता है बस यह राग ही बंधन है । हम किसके आधीन हैं? सब आपने आप में उठते हुए विकल्पों के आधीन हैं ।

राग में होने वाली कल्पना का बंधन―किसी को आपने दो चार हजार का ड्राफ्ट उधारी में दे दिया । ड्राफ्ट दे दिया, अब कल्पना हो गई कि ये तो कुवे में गए । अब दुबारा नहीं मिलने हैं । अब देखो यह भीतर में कितना दु:खी हो रहा है? उसको क्या कागज ने दु:खी किया ? ड्राफ्ट ने दुःखी किया ? अरे उसने राग की कल्पना बनाई सो यह इतना हताश हो गया कि दिल थामे-थामे फिरता है कि हार्ट फेल न हो जाये । तो कौन ने दु:खी किया? खुद की कल्पना ने । तो खुद में उत्पन्न हुआ विकार भाव है यह ही जीव को बुरी तरह से सता रहा है । तो यह विकाररूपी कर्म ही स्वयं का बंधन है जिसके बंधन में पड़ा हुआ जीव अपने ज्ञान, दर्शन गुण के पूर्ण विकास को नहीं प्राप्त होता है ।

अभीष्ट न पा सकने की अशक्ति की परिस्थिति का बंधन―आपकी इष्ट चीज तीन हाथ दूर पर रखी है जिसे आप हड़पना चाहते हैं और किसी मनुष्य ने आपको रोक रखा है, दूर कुछ नहीं है, तीन हाथ दूर का फर्क है, मगर इतनी तकलीफ आप पा रहे हैं । क्यों पा रहे हैं कि जो इष्ट चीज है और बिल्कुल नजदीक है उसको ही तुम नहीं पा सकते तो इसमें मुख्य बंधन क्या है? उस चीज को नहीं पा रहे हैं―यह एक बड़ा बंधन बन गया जिससे तुम दु:खी हो रहे हो । उस चीज को तुम नहीं पा रहे हो इसका कारण बना तुम्हारी अपनी कमजोरी, जो तुम दूसरे से अपने की छुटाकर एकदम उस वस्तु के पास नहीं पहुंच सकते । इस कमजोरी व परवशता में जो हमारी यह परिणति बनी है, उसका निमित्त बना है

वह दूसरा पुरुष । इसी प्रकार हमारा वह ज्ञानविलास समस्त विश्व को एक साथ स्पष्ट जान ले इस ज्ञान विलास को जो मेरे में ही मौजूद है शक्ति रूप से अपना ही विकास है उसको हम नहीं पा रहे हैं तो अंधेरे में रहकर हम दु:खी हो रहे हैं । यह एक बड़ा बाधक है । हम क्यों नहीं पा रहे हैं अपने उस ज्ञानविकास को, अनंत आनंद की निधि को, कि हम स्वयं कमजोर बन गए हैं । रागादिक विकारों के कारण इस कमजोरी में रागादिक विकारों की जो स्थिति बनी है उसका कारण है कर्मों का उदय । तो ऐसे बहिरंग और अंतरंग साधनों में फंसा हुआ यह जीव प्रभु नहीं हो पाता है ।

संकट नाना, संकट मेटने का उपाय एक―भैया ! कितने संकट हैं इस जीव पर, एक बतावें, दो बतावें, अनंत संकट हैं । ज्ञान नहीं हो पाता, सही ज्ञान सिद्ध नहीं होता, इष्ट वस्तु नहीं मिलती, अनेक प्रकार की इच्छाएं होती, अनेक राग-द्वेष आते, जो चाहते हैं उसकी सिद्धि नहीं होती । कितने संकट हैं इस जीव पर, किंतु उन सब संकटों के छूटने का उपाय एक है । जैसे कोई मनुष्य अर्द्ध निद्रा में सो रहा हो और 10-5 लोग ऊधम कर रहे हों, बातचीत कर रहे हों तो आप यह कहते हैं कि भैया गप्पें मत करो, नींद आ रही है । जब नहीं मानते हैं तो अपनी चादर तानकर पैर तनिक कड़े बनाकर आँखें मींचकर, टन्नाकर सो जाता है । इसी प्रकार ये संकट हम पर बनते हैं और इन्हें बहुत समझाते हैं, भैया तुम ऐसे न परिणमो, तुम जल्दी मेरे पास से जावो, अथवा कभी न बिछुड़ो, सबको मनाया, पर ये नहीं मानते तो अब अपने ही उपयोग की चादर तानकर उसके भीतर अपने आपकी ओर झुककर विश्राम से कुछ क्षण ठहर जावो, सारे संकट अपने आप समाप्त हो जायेंगे ।

संकट भी वस्तुत: मात्र एक बहिर्मुखता―भैया! इन संकटों के मिटाने का एक ही उपाय है । बंधन भी एक है बहिर्मुखता और बंधन से मुक्त होने का उपाय भी एक है अंतर्मुखता । अंतर्मुखता एक तरह की होती है और बहिर्मुखता भी एक तरह की होती है और विषय नाना हैं, इसलिए उसके नाना भेद हो जाते हैं । वैसे तो अंतर्मुखता भी एक ढंग की है और बहिर्मुखता भी एक ढंग की है, और बाहर में विषय नाना हैं, इसलिए उसके रूपक नाना बन जायेंगे । बंधन है तो वह बहिर्मुखता का है और मुक्ति है तो वह अंतर्मुखता के द्वारा है । इस तरह जितने भी हमें बंधन हैं वे राग के बंधन हैं ।

कषाय के रंग में सफाई की डींग―कभी-कभी घर के धर्मात्मा अपनी सफाई पेश करते हैं । अजी हमें तो किसी से कुछ मतलब ही नहीं, कुछ संबंध ही नहीं, घर में तो हमें रहना पड़ता है । वह छोटा लड़का है उसकी वजह से थोड़ा घर में रहना पड़ता है कि वह पल-पुष जाये तो अच्छा हो जाये और हम तो बिल्कुल बेदाग हैं । कितनी सफाई देते हैं? कुछ सफाई देते हैं कि हम क्रोध नहीं करते हैं, हम तो मुँहफट हैं, जो मन में आता उगल देते हैं । कितनी सफाई देते हैं? अरे यह मुँहफट होना, उगल देना यह सब कषाय है । उन छोटे बच्चों को तुम दया करके पालते हो या राग में अंधे होकर, उनके दास बनकर पालते हो? यदि आपमें दया है तो और भी तो गाँव के बालक हैं, उन पर क्यों दया नहीं आती? एक घर में ही पैदा हुए बालक पर भगवान जैसे तुम निर्दोष होकर दयालु बन गए । तो यह सब विषय कषायों का रंग है । सफाई से क्या होता है?

सफाई का लोगों को धोखा देने से कर्मबंधन में धोखा का अभाव―सफाई से तो इस चेतन को धोखे में डाल सकते हैं पर ये कर्म बेचारे तो जड़ है, इसलिए ईमानदार हैं, उन्हें धोखे में नहीं डाल सकते हैं । जो समझदार हैं, चेतन हैं उनकी तो आँखों में धूल झोंक दें मगर कर्मों की आँखों में धूल नहीं झोंक सकते हैं । उनको तो जैसा निमित्त होना चाहिए वैसा निमित्त मिल गया तो वह अपना कर्मरूपी बंधन बना लेगा । इस आत्मा का बंधन वास्तव में आत्मा का विकार है ।

राग के बंधन का क्लेश―पुराणों में जो चर्चा मिलती है और देखने में भी जो घटनाएँ मिलती हैं कि कोई पुरुष किसी स्त्री पर मोहित होकर अपनी जान गवां देता है, युद्ध करता है, लड़ाइयों में मरता है, अपने को बड़ी आपत्ति में फंसा लेता है । वह है क्या? वह है राग का बंधन । एक राग के बंधन से बंधकर रावण ने अपना सर्वनाश कर लिया, और था क्या? बतलावो सारा मामला दूर-दूर, एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में अत्यंताभाव । किसी पदार्थ से किसी अन्य पदार्थ का रंच संबंध नहीं? सब अपने-अपने घर में बैठे हैं, अपने प्रदेश से बाहर कोई पदार्थ नहीं है, लेकिन अपने आपमें ही अपनी कल्पना बनाकर हम दुःखी होते हैं । अब कर्म मोक्ष के हेतु के तिरोधायी हैं, दबाने वाले हैं, इस प्रकार के निर्णय को बताते हैं―


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