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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 161

From जैनकोष



सम्मत्तपडिणिबद्धं मिच्छत्तं जिणवरेहि परिकहियं ।

तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिट्ठित्ति णादव्वो ।।161।।

सम्यक्त्व का प्रतिबंधक निमित्त मिथ्यात्व प्रकृति―सम्यक्त्व को रोकने वाला मिथ्यात्व नामक कर्म है । उसके उदय से यह जीव मिथ्यादृष्टि होता है ऐसा जानना चाहिए । जैसे अंगुली की सीधी पर्याय को रोकने वाली टेढ़ी पर्याय है, टेढ़ी पर्याय को रोकने वाली सीधीपर्याय है इसी प्रकार सम्यक्त्व को रोकने वाली आत्मा की मिथ्यात्व नामक पर्याय है जो कि तत्काल बाधक है । उस मिथ्यात्व परिणाम के होने का निमित्त कर्मप्रकृति का उदय है । उसका निमित्त पाकर जीव अपने में विपरीत परिणाम करता है और सम्यक्त्व से दूर रहता है ।

छुटकारे की विधि―जैसे कारागार में बेड़ी से बंधा हुआ कैदी यदि बेड़ी से छूटनाचाहता है तो बेड़ी से छूटने से पहिले उसे विश्वास होना चाहिए, उस उपाय का ज्ञान होनाचाहिए और उस उपाय को कर लेना चाहिए तब वह बंधनमुक्त होता है । इसी प्रकार इस संसार कारागार से पीड़ित यह कैदी यदि इस बंधन से छूटना चाहता है तो बंधन से छूटने के उपाय का विश्वास होना चाहिए, ज्ञान होना चाहिए और फिर उन बंधनों से छूटने का आचरण बनना चाहिए तब छूटना होता है ।

व्यर्थ का कुटेव―भैया! एक कुटेव भर लगा है । कुटेव छूटे कि लो प्रभु का ही प्रभु है । वह कुटेव नहीं छोड़ा जाता जो व्यर्थ है, असार है, कोई तत्त्व नहीं है । छोड़ने में कष्ट नहीं है बल्कि आनंद है । ऐसा वह राग-द्वेष का कुटेव नहीं छोड़ा जाता है । इतना ही मात्र बंधन है जिससे प्रभु में और मुझमें इतना बड़ा अंतर हो गया है कि वह तो ज्ञानी और अनंत आनंदमय है और यह हम और आप अज्ञानी और दु:खी रहा करते हैं ।

भिखारी का परघरफिरन―परघर फिरत बहुत दिन बीते नाम अनेक धराये । अभी तक यह जीव परघर में ही फिरता रहा, परवस्तु की आशा रखना परघर फिरना कहलाता है । यह उपयोग अपने निज ज्ञायक स्वरूप निजगृह को छोड़कर बाह्य पदार्थरूपी परिग्रह में डोलता रह आया है, इन पंचेंद्रिय के विषयों में रुचि करता आया है । मुझे अब इसमें आनंद मिलेगा । भोजन कर चुके, पेट भर गया, क्षुधा शांत हो गई तो इच्छा होती है कि खुशबूदार इत्र भी लगा लें । अरे इत्र न लगावो तो क्या मरे जाते हो । भोजन बिना तो मरे जाते, पर खुशबूदार इत्र की क्यों मंशा हो रही है? अरे क्यों मंशा न हो? जब मलिनता है तो किसी न किसी रूप में व्यक्त होनी चाहिए । पेट भर गया तो इत्र का शौक होना चाहिए । अच्छा शौक कर लो । पर सिनेमा देखना चाहिए, सरकस, नाटक आदि खेल देखना चाहिए । अरे इनको न देखे तो क्या कोई प्राणों पर संकट आ रहे हैं? पर क्या करें, राग में ऐसा बंधे हुए हैं कि उनके कुछ न कुछ इच्छा जग ही जाती है । लो सिनेमा देख लिया । अब कोई सुरीला राग चाहिए, सुंदर शब्द सुनने चाहिए, लो अब उसकी तलाश में फिर रहे हैं । फिर इतनी देर में भूख लग आई । फिर पेट भरने को चाहिए । यह जीव क्या कर रहा है? सुबह से दूसरे सुबह तक 24 घंटे कोई विवेक का काम, ज्ञान का काम कर रहा है क्या? राग के बंधन में बंधा हुआ, विषयों की ओर झुका हुआ परघर फिर कर यह जीव अपने अमूल्य क्षणों को व्यतीत कर रहा है ।

विषयों की खाज खुजाने में अमूल्य अवसर को गमा देना―जैसे सिर का खजोला अंधा पुरुष किसी नगर में जाना चाहता है तो कोट पर हाथ धर कर चल रहा है, जहाँ दरवाजा मिलेगा वहाँ ही घुस जायेगा । चलता जा रहा है पर हाय रे दुर्देव, जहाँ ही दरवाजा मिला वहाँ ही सिर तेज खुजलाने लगा तो सिर खुजलाने में उतना काल व्यतीत कर दिया, पर पैरोंसे चलना नहीं छोड़ा । अरे खड़े ही खड़े सिर को खूब खुजला लेता, और फिर कोट पर हाथ रखकर चलता, पर उसे इतना गम नहीं है । चल देता है, दरवाजा निकल जाता है, फिर हाथ धर कर चलता है ।

इसी तरह एक शांति नगर में जाने के लिए यह अंधा विषयों का विषैला पुरुष उद्यम करता है । चल रहा है पर जैसे ही मनुष्यभव मिला, जो दरवाजा था शांति नगर में पहुंचने का, बस वहाँ ही इसके खुजलाहट और तेज हो गई । पशु बेचारे राग करेंगे तो वे उजाडूपन से करेंगे, पर मनुष्य राग करेगा तो साहित्य की कला से, बड़ी कुशलता से राग करेगा । तो इसके सिर में खुजलाहट बहुत तेज हो गई, कषायों में आसक्ति हो जाती है, बुद्धि को, ज्ञान को, वचनों को सबको राग में लगा देता है । तो ज्यों ही मनुष्यभव आया था मुक्ति पाने के लिए उस ही मनुष्यभव के दरवाजे पर यह विषयों की खाज खुजलाने लगा । खुजा लो खूब, पर समय तो न जाये । जैसे मान लो 25 वर्ष के हैं तो 25 के ही रह जाएं और विषयों की खाज खुजला लें, सो न होगा । समय तो गुजरता रहता है । निकल गया अब समय । ऐसी स्थिति में विरला ही बुद्धिमान पुरुष होगा जो खाज की पीड़ा को सह लेगा, मगर उसके प्रतिकार में बंधन न होगा ।

अहित से निवृत्त रहने का साधक तत्त्वज्ञान का बल―भैया ! यह बल आता है तत्त्वज्ञान से, सम्यक्त्व से । जिस पुरुष के सम्यग्दर्शन है वह पुरुष पूर्वबद्ध कर्मों के विपाक से किसी राग और भोग में भी लग रहा हो तो भी इतना उत्कृष्ट विवेक है कि उससे हटते हुए लग रहा है । जैसे किसी को मालूम है कि यह आग पड़ी है और किसी पुरुष की जबरदस्ती से अपना हाथ आग पर जा रहा है तो हटते हुए जायेगा, लगते हुए न जायेगा । और पीछे आग पड़ी है, कुछ पता नहीं है और हाथ टेककर आराम लेने की तुम्हारी धुन होती है तोलगते हुए हाथ धरोगे कि हटाते हुए? जोर देते हुए हाथ धरोगे । तो आप यह बतावो कि ज्यादा कहाँ जलेगा? जबरदस्ती किसी की प्रेरणा से आपका हाथ धरा जा रहा है तो चूंकि तुम में भी शक्ति है इस कारण तुम हटाते हुए हाथ धरोगे । इसी प्रकार ज्ञानी सम्यग्दृष्टिजीव में एक ज्ञानबल प्रकट है, जिस ज्ञानबल के कारण यह हटता हुआ लगता है । प्रेरणा है राग की, पूर्वबद्ध कर्मों की, सो उस प्रेरणा के कारण लगना तो पड़ता है ज्ञानी को विषयों में, पर वह हटता हुआ लगता है । वह दोस्ती किस काम की कि मन फटा हो और दोस्ती बनाई जा रही हो, वह विषयों में लगना क्या कि दिल तो हट रहा है और भोगों से अलग रह रहे हैं । यों ये ज्ञानी संत सम्यक्त्व के प्रभाव से सुखी हैं ।

जीव का ज्ञानस्वभाव―जीव का स्वभाव ज्ञान है । ज्ञान के अतिरिक्त जीव की पहिचान का और कोई उपाय नहीं है । जो जानता है वही जीव है । वह जीव कितना है, कितना जानता है? इसकी कोई हद नहीं बांध सकता है । यह जीव दो कोस तक ही जाना करे इससे आगे को न जाने ऐसी सीमा डालने वाला कौन है? जब यह ज्ञानमय आत्मा अपने आपके प्रदेशों में ही रहता हुआ दूर की बातों को जानता है तो फिर इसमें कोई हद नहीं डाल सकता कि यह जीव चार कोस तक ही जाने, या इतने क्षेत्र तक ही जाने । यदि यह आत्मा अपने स्वरूप से उठकर बाहरी पदार्थों में जा जाकर बाहरी पदार्थों को जानता होता तो यह कहना युक्त हो सकता था कि जहाँ तक यह आत्मा पहुंच सके वहीं तक जानेगा । किंतु यह आत्मा अपने ही प्रदेशों में ठहरा हुआ इस देहरूपी मंदिर में ही पड़ा हुआ यहीं से सर्व कुछ जानता रहता है । तब इसके जानने की सीमा नहीं की जा सकती है । लेकिन देखते तो हम आप यह हैं कि किसी का ज्ञान हजार मील तक का है तो किसी का ज्ञान 10 हजार मील तक है, किसी का ज्ञान 10 वर्ष पहिले का है तो किसी का ज्ञान इससे अधिक वर्ष पहिले का है । ऐसी सीमा देखी जाती है । इसके रोकने वाला कौन है ऐसा प्रश्न होने पर यह गाथा कही जा रही है ।


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