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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 163

From जैनकोष



चारित्तपडिणिबद्धं कसायं जिणवरेहि परिकहियं ।

तस्सोदयेण जीवो अचरित्तो होदि णादव्वो ।।163।।

चारित्र का प्रतिबंधक कषायभाव―ज्ञान का जानना, रम जाना सो चारित्र है । इस ज्ञान का प्रतिबंधक है कषाय । ऐसा जिनेंद्रदेव ने बताया है । उस कषाय के उदय से यह जीव अचारित्री हो जाता है । जैसे एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती है, इसी प्रकार एक उपाय में मिथ्याचारित्र और सम्यक्चारित्र दोनों तरह की परिणतियां नहीं रह सकती हैं । यदि कषायभाव है तो चारित्र से हाथ धोइए और यदि सम्यक्चारित्र है तो वहाँ कषाय नहीं रहसकेगा । इस कषाय का विरोधी सम्यक्चारित्र है और सम्यक्चारित्र का विरोधी कषायभाव है ।

कषायों का दुष्परिणाम―अब इन विषयकषायों का प्रताप तो देखो ! जब यह क्रोध करता है तो कितना दु:खी रहता है और क्रोध करता है मद से । जिस पदार्थपर क्रोध करते हो वह पदार्थ तुम्हारे आधीन नहीं, तुम्हारा हित अहित करने वाला नहीं, वे परपदार्थ अपने स्वरूप को छोड़कर तुम्हारे स्वरूप में आते नहीं, किंतु अपने ही आत्मा में पड़े-पड़े अपने ही गुन्नारे से कल्पनाएं बना-बना कर स्वयं क्रोध किया करता है, दुःखी हुआ करता है । इस क्रोध से आत्मा केसारे गुण जले जा रहे हैं, पर विवेक नहीं है तो क्रोध किए बिना यह रहता नहीं है । जिसे संसार के यथार्थस्वरूप का परिचय नही है वह इन दुर्गतियों में ही भटकता है

मेरे भले बुरे होने का कारण मेरा भला बुरा परिणाम―भैया! क्या करना है अपन को? जैसे बड़े पुरुष छोटे आदमी की गलती को अनसुनी कर देते हैं, इससे मेरा क्या बिगाड़ होता है, इसी तरह ज्ञानी पुरुष परद्रव्यों के परिणमन का अंदाज कर लेता है । इन परपदार्थों के परिणमन से मेरा क्या हित अहित होता है, मैं बुरा होऊं तो मेरा अहित होगा और मैंभला होऊं तो मेरा भला होगा । यह एक पक्का निर्णय है । मेरे बुरा होने का मतलब ही कषायों का लिपटा होना और मेरे भले होने का मतलब है कषायरहित शुद्ध ज्ञानमात्र अपने स्वरूप को निहार कर ज्ञानमात्र परिणमन बनाना, यह है भला होने का परिणमन, सो इस स्वरूप को इन दुष्ट भावों ने दबा रखा है, मोह, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ―इन 6 शत्रुओं ने मेरे इस ज्ञानस्वरूप को बरबाद कर दिया है जो कि अनंतानुबंधी क्रोधादिक के भेद से 25प्रकार के कहे गए हैं । कषाय भाव के उत्पन्न होने से साक्षात् सम्यक्चारित्र का विनाश होताहै । ये सारी बातें रखना, खोटा अभिप्राय रखना, अज्ञान होना, कषाय होना यह आत्मा का ही कर्म है । इन्हें आत्मा ही तो किया करता है । ये कर्म स्वयं मोक्ष के हेतु के तिरोधायी हैं अर्थात् जब हमारा कर्मरूपी परिणमन है तो वहाँ मोक्षमार्गरूपी परिणमन नहीं है । इस कारण समस्त कर्मों का प्रतिषेध किया गया है ।

धर्म भाव की उत्कृष्टता―यह पुण्य-पाप का अधिकार है । इस ग्रंथ में शुभ परिणामों को पुण्य कहा है और अशुभ परिणामों को पाप कहा है, मगर इन दोनों से उत्कृष्ट विलक्षण एकधर्म परिणाम देखिए । जो मोक्ष का साक्षात् उपाय है । शुद्ध वीतराग, ज्ञानमात्र सहज आत्मस्वरूप को निहारना सो धर्म है । इस धर्म का तिरोभाव किया है, विनाश किया है तो इनविभ्रम व कषाय कर्मोंने किया है । चाहे वह शुभ परिणाम हो, चाहे पाप परिणाम हो वह धर्मभाव को रोकता है । इस कारण मोक्ष के हेतु को रोकने के कारण ये पुण्य पापरूप दोनों ही प्रकार के कर्म निषेध योग्य है ।

कर्म के प्रतिषेध में कर्तव्यसंबंधी प्रश्नोत्तर―इस प्रकार समस्त कर्मों को निषेध के योग्य बताने पर एक जिज्ञासु पुरुष को शंका उत्पन्न होती है कि फिर क्या किया जायेगा? हम खोटे भावों को दूर कर दें और तप, व्रत नियम भगवद्भक्ति आदि शुभ परिणामों को भी दूर कर दें तो फिर क्या किया जायेगा? उत्तर―किया जायेगा एक ज्ञानमात्र स्थिति हो जायेगी । देखिए आप सबकी गृहस्थावस्था है । गृहस्थ में शुभोपयोग की मुख्यता है, देवपूजा करिये, गुरुओं की उपासना करिये, स्वाध्याय,संयम, व्रत और तप में लगिए और उदार होकर दान कीजिए । ये 6 प्रकार के काम गृहस्थों को करने के लिए बताए गए हैं । सो गृहस्थों में यद्यपि शुभोपयोग की मुख्यता है किंतु यदि दृष्टि ऊंची नहीं चलती है तो मोक्षमार्ग से तुम वंचित रहोगे । साधु का ज्ञान और श्रावक का ज्ञान चूँकि आत्मा तो वही है, एक सा रहता है मोक्षमार्ग के निर्णय में ।गृहस्थों की दृष्टि ऊंची रहेगी, तब छोटे-मोटे शुभोपयोगरूपी धर्म भी अच्छी प्रकार पलेंगे । यदि शुभोपयोग तक ही दृष्टि रहे तो न शुभोपयोग हाथरहेगा और न शुद्धोपयोग हाथ रहेगा । इस कारण मोक्षार्थी पुरुष के लिए क्या करना चाहिए, इसका वर्णन अब अमृतचंद्राचार्य के एक कलश में कहते हैं ।

कलश 109

संन्यस्तव्यमिदं समस्तमपि तत्कर्मैव मोक्षार्थिना ।

संन्यस्ते सति तत्र का किल कथा पुण्यस्य पापस्य वा ।

सम्यक्त्वादिनिजस्वभाव-भवनान्मोक्षस्य हेतुर्भवन् ।

नैष्कर्म्य प्रतिबद्धमुद्धतरसं ज्ञानं स्वयं धावति ।

पुण्य पापरूप समस्त कर्मों के त्याग का उपदेश―कह रहे हैं कि मोक्ष के चाहने वाले पुरुष के लिए सर्व प्रकार के कर्म त्याग देने चाहिए । कर्म मायने करतूत । पुण्य की करतूत और पाप की करतूत । शुभोपयोग की करतूत को त्यागना चाहिए । कोई पुण्य की करतूत को त्याग दे और पाप की करतूत को न त्यागे तो वह तो सीधा नरक निगोद का पात्र है । इसके अतिरिक्त और कोई गति उसके लिए नहीं है किंतु पाप और पुण्य दोनों को एक साथ त्याग सके तो उस जीव की महिमा है और वह जीव मोक्ष का पात्र है ।

पुण्यपापरूप दोनों कर्मों के त्याग का फल―गृहस्थावस्था में कैसी वृत्ति होनी चाहिए कि पाप का तो त्याग करें और धर्म का लक्ष्य रखें और पुण्य परिणाम होता हो तो होने दें । यह स्थिति होती है गृहस्थावस्था में । तो जब यहाँ मोक्षार्थी पुरुष के लिए पुण्य, पाप दोनों प्रकार के कर्म का त्याग करना बता दिया है तब पुण्य और पाप की तो कथा ही क्या है? जब शुभ और अशुभ व ज्ञान के बदलने रूप तक की क्रिया का त्याग बताया है तब पुण्य और पाप की कहानी कौन कहे? ये तो त्यागने योग्य ही हैं । तब होता क्या है कि जब सब प्रकार के कर्मों को त्याग दिया जाता है तो सम्यक्त्व आदिक जो आत्मा का स्वभाव है उस स्वभावरूप से यह आत्मा होने लगता है । आप कषाय न करेंगे तो शांति झक मारकर आयेगी । आप अभिमान न करेंगे तो कोमलता अपने आप आयेगी, सरलता स्वयं विराजेगी, जब आपके तृष्णा न रहेगी तो पवित्रता स्वयमेव आयेगी, क्योंकि ये सब आत्मा के स्वभाव हैं ।

ज्ञानसंयतिका उत्कृष्ट फल―जब यह जीव समस्त विषयकषायों की इच्छा को त्याग देता है, सर्व प्रकार के कर्मों को त्याग देता है तब सम्यक्त्व आदिक का अपने स्वभाव से परिणमन होता है और उस परिणमन में यह ज्ञान मोक्ष का हेतु बनता है । यह ज्ञानयोगमें, समाधि में स्थित होता है, इस ज्ञान का रस बढ़ने लगता है, और अगर आप बाहर जानने की कोशिश करते हैं तो ज्ञान में कमी रहती है । जब हम बाहर में जानने की कोशिश न करें बल्कि सर्वपदार्थों के जानने का हम अपनी बुद्धि से त्याग कर दें तो अपने आपमें इस ज्ञान के संयत होने के कारण ऐसा ज्ञानरस बढ़ेगा कि तीन लोक तीन काल के समस्त पदार्थ एक साथ जानने में आ जाएंगे । वही तो प्रभु की दशा है।

प्रभुभक्ति की मोहनाशकभावरूप में परिवर्तना―हम प्रतिदिन आकर मंदिर में भगवान स्थापना जिनेंद्र के समक्ष प्रणाम, नमस्कार, पूजन, स्तवन करते हैं तब यह भाव भरें कि प्रभु जो तेरा स्वरूप है वही उत्कृष्ट स्वरूप है, यही मेरे लिए शरण है और ऐसा मैं भी हो सकता हूँ । आपके ध्यान के प्रताप से मुझमें वह बल प्रकट हो कि मेरा मोह दूर हो जाये और आप जैसी उत्कृष्ट अवस्था मेरे में प्रकट हो । इतना भाव यदि इस पूजन, स्तवन के समय नहीं भर सकता है तो समझ लीजिए कि हमने पूजा ही नहीं की । ऐसा उत्साह जगे कि मोह को तो नष्ट ही कर दें ।

ज्ञान व वैराग्यपूर्वक कर्तव्य―घर छोड़ने की बात नहीं आप से कहीं जा रही है । आपके लड़के आपकी दूकान वही है किंतु भीतर से इतनी श्रद्धा कर लेने में आपका कुछ बिगड़ना है क्या? यह जीव है, इसकी भिन्न सत्ता है । ये मेरे कुछ लगते नहीं हैं । ये किसी गति से आए हैं और किसी गति को चले जायेंगे, सदा रहने का यह संयोग नहीं है, ये सब बिछुड़ जाने वाले जीव हैं ऐसी श्रद्धा बनी रहे, लोकव्यवस्था के नाते करना सब कुछ आपको पड़ेगा । दूकान चलाये बिना काम न चलेगा, कोई प्रकार की आजीविका किए बिना कामन चलेगा, गृहस्थी का गुजारा न होगा, पर सच्ची श्रद्धा यदि साथ रह जायेगी तो समझ लीजिए कि हम मोक्षमार्ग में लगे और श्रद्धा विहीन होकर जैसा चाहे तैसा कीजिए । उसका फल तो संसार में जन्ममरण करना है । मनुष्यभव से चिगकर कीड़े मकोड़े, पशु पक्षी आदि में जन्म ले लिया तो इनमें ही जाने में अपना लाभ समझते हैं । अरे लाभ नहीं है । तो कार्य ऐसा कीजिए कि जिससे जब तक मेरा संसार शेष है तब तक धर्म का समागम मिलता रहे और उसमें ही पल पुसकर हम निर्वाण को प्राप्त करें ।

ज्ञान और कर्माविरति का भी क्वचित् युगपत् निवास―जब तक जीव के कर्मों का उदय है और ज्ञान के सम्यक् प्रकार से विरति नहीं होती है ऐसी स्थिति में ज्ञान और कर्म दोनों एक साथ आत्मा में ठहरते हैं । कोई जीव ऐसे है कि जिन्हें ज्ञान तो यथार्थ हो गया, किंतु कर्मों का उदय प्रबल होने से वे क्रिया कर्मों से विरक्त नहीं रह सकते, इसलिए कुछ प्रवृत्ति भी है, ऐसी स्थिति में कुछ जीवों के ज्ञान और कर्म दोनों एक साथ चलते हैं अर्थात् आरंभ परिग्रह में भी लगना, भक्ति भी बने रहना और शुद्ध चैतन्यस्वरूप की प्रतीति, उन्मुखता रहना―ये दोनोंएक साथ रहते हैं । पूर्ण उपयोग नहीं होता, ऐसी प्रवृत्ति चल रही है और उसका यथार्थज्ञान बना हुआ है इसलिए प्रवृत्ति से निवृत्ति की भावना चल रही हैं । जब ऐसी स्थिति होती है कि ज्ञान और कर्मों के इकट्ठा रहने में विरोध नहीं आता, किंतु उस परिस्थिति में भी जितने कर्म है, जितने कर्मभाव है उतने तो वे बंध के लिए है और उसमें जितना ज्ञान भाव है वह मोक्ष के लिए है । जो जानन है वह तो कर्मों से रहित है, राग द्वेष से दूर है । उस कर्म के करने में इस जीव को मालिकाई का अनुभव नहीं होता ।

पर का स्वामी मानना अज्ञान―वह आत्मा अज्ञानी है जो किसी परवस्तु के प्रति ऐसा भाव रखता है कि मैं मालिक हूँ । मकान धन वैभव परिवार मित्रजन सब कुछ अपने से अत्यंत न्यारे हैं । मैं उनमें से किसका अपने को मालिक समझूँ, यह बड़ा मलिन परिणाम है । इसका फल अच्छा नहीं होता । संसार में रुलनाही इसका फल है । ऐसा पवित्र जैनशासन पाकर अपने उपयोग को इतना तो निर्मल बना लो कि यह मैं आत्मा केवल अपने हीस्वाधीन हूँ, किसी परवस्तु का पर का मालिक नहीं हूं । ऐसी अंतरंग में श्रद्धा बना लो । बात भी सही यही है इस कारण कही जा रही हैं । यदि पर का मैं मालिक हूँ, ऐसा ही भावबनाया तो मालिक तो त्रिकाल हो ही नहीं सकता । पर इस भ्रम में जो पाप बंधेगा उसका फल भव-भव में भोगना पड़ेगा पुण्य का उदय है, कुछ ठाठ मिल गया, इसमें आसक्त न हों यह सदा रहने को नहीं है । इसका वियोग होगा । कुछ अपने आत्मा की सुध लो । कर्मों का उदय है, गृहस्थी में रहना पड़ता है पर उनमें मालिकाई का अनुभव तो न करो, इतना तो गम खावो, अन्यथा फिर गति सुलझने को नहीं है ।

मोक्ष का साधक ज्ञातृत्व परिणमन―मोक्ष के लिए तो एक ज्ञानपरिणमन को साधक बताया गया है । तुम सबके ज्ञाताद्रष्टा मात्र रहो । यदि राग होता है तो उसके ज्ञाता रहो । मोक्षमार्ग में जब व्यवहार पद्धति से चलते हैं तो वहाँ ज्ञान और प्रवृत्ति दोनों बने रहते हैं । जैसे गृहस्थजन पूजा करें, गुरु उपासना करें और और प्रकार की समाज सेवा करें किंतु ये सब करते हुए भी अंतरंग में यह ज्ञान रखना आवश्यक है कि है हमारा कहीं कुछ नहीं, मेरा उपयोग विषय कषायों में न लग जाये, इस कारण अपने उपयोग को किसी शुभ स्थान में लगाए । पर पूरा तो पड़ेगा मेरे ज्ञान भाव से ही ऐसी श्रद्धा बनाए रहें । साधु भी तो अपने पद के योग्य सब चेष्टाएँ करके ऐसी श्रद्धा रखता है कि मैं तो चैतन्यमात्र हूं, मेरा लोक में कहीं कुछ नहीं है । यह सब कुछ करना पड़ता है । इस संसार से मुक्त होना है, इसलिए महाव्रत, समिति, गुप्ति―ये सब पालन करने पड़ते हैं किंतु मेरा स्वरूप तो शुद्ध ज्ञानस्वरूप है ।

अज्ञानियों की क्रियाकांडों में ही रुचि―केवल ज्ञाता द्रष्टा रहना मेरा काम है । ऐसी ही बात यथार्थ है, लेकिन कोई अज्ञानी पुरुष ज्ञान और क्रियाकांडों में से केवल क्रियाकांडों का ही आलंबन करे, ज्ञानभाव को छोड़ दे, जो व्रत, तपस्या, नियम आदिक किए जा रहे हैं उनकी ही हठ पकड़ ले ऐसा करने में ही धर्म है, इससे ही मुक्ति मिलेगी । ज्ञान को छोड़ दें तो वह मुक्तिमार्ग का यथार्थ पथिक नहीं है । जैसे यहाँ दर्शन करने आते तो भगवान को जगाने के लिए घंटा ठोका करते हैं । इतना भी ध्यान नहीं होता कि लोग सामायिक या शास्त्रसभा में बैठे है, उनको बाधा पहुंचेगी तो यह एक क्रियाकांड की आसक्ति ही तो है । जिनसाधुजनों ने क्रियाकांडों को ही पकड़ लिया और ज्ञान को छोड़ दिया तो मुक्ति का मार्ग तो यह ज्ञानभाव ही था ।

बाह्यचारित्र की उपेक्षा से हानि―इस ज्ञानभाव को भूल गए तो मुक्ति कहां से पावोगे? कोई पुरुष ऐसा हो कि शास्त्रों में सुन रखा है कि मोक्ष का मार्ग ज्ञान ही है, कुछ करना नहीं है व्रत, नियम, तप वगैरह, सो वह हो गया स्वच्छंद । अब वह उद्यम और पुरुषार्थ करेगाक्या, और गप्पें मारने लगे कि आत्मा है, ज्ञानमात्र है, खाता नहीं, पीता नहीं, चलता नहीं, ये राग हैं, भक्ति करने से पुण्य होता है । पुण्य संसार का कारण है, गप्प मारने में लग गएऔर भीतर में ज्ञायकस्वभावी प्रभु की पकड़ न कर सके तो वह भी स्वच्छंद हो गया और शिथिल हो गया । ये दोनों के दोनों तिर सकने में असमर्थ हैं ।

ज्ञान और अप्रमाद से सिद्धि―जो निरंतर ज्ञानरूप होता है, जो क्रियाकांडों में नहीं पड़ते, जिनके प्रमाद नहीं होता वे सावधान हैं, वे ही लोग इस लोक के ऊपर तैरते हैं अर्थात् समस्त लोक को मात्र जानते हैं, परमात्मा बनते हैं । सर्वत्र मुख्यता है सम्यक की । सम्यक्त्व के समान तीन लोक तीनकाल में श्रेयस्कर पदार्थ कोई नहीं है और मिथ्यात्व के समान अहितकर तत्त्व और कोई नहीं है । मेरा ही आत्मा मुझे आनंद में पहुँचाता है और मेरा हीआत्मा मुझे क्लेश में पहुंचाता है, संसार में पहुंचाता है । मेरा ही आत्मा मुझे मुक्ति में पहुंचाता है । मेरा रक्षक इस लोक में कोई दूसरा नहीं है । जो पद्धति संसार से छूटने की है उस पद्धति से ही संसार से छूटा जा सकेगा और जो पद्धति संसार में रुलाने की है उस ही पद्धति से संसार में रुलना होगा ।

एकांत हठ का निषेध―यहाँ एकांतमत का निषेध किया गया है । जो अपने ज्ञानस्वरूप आत्मा को तो जानता नहीं है और व्यवहार में दर्शन ज्ञान चारित्र के अंग और दर्शन की क्रियाओं को ही, आडंबर को ही मोक्ष का कारण जानकर उसमें ही तत्पर रहे वह कर्मनय का पक्षपाती जीव है । कर्मनय के पक्षपाती जन ज्ञान को तो जानते नहीं और क्रियाकांडों में ही रहकर खेदखिन्न होते हैं । वे संसारसमुद्र में डूबते हैं, तिरने का उन्हें अभी उपाय नहीं मिला । सबसे बड़ा काम तो शांति से रहने का है । वह धर्म क्या है जिस धर्म के पालते हुए की स्थिति में अशांति पैदा हो जाये, क्रोध आ जाये । वह धर्म नहीं है, वे व्रत, नियम, सोध भी धर्म नहीं है, जिनमें क्रोध बना रहे, मान माया बनी रहे । वे कर्मों के चंगुल में फंसे हुए हैं ।

संकटों के बादल―भैया! चारों ओर से इस आत्मा पर संकट छाये हुए हैं । आज मनुष्य है, मरकर पेड़ पौधे बन गए तो समझो कि उनकी क्या हालत है? दुनियावी दृष्टि से देखो उनका क्या हाल होगा? कितने संकट छाए हुए है इसपर? यहाँ घमंड करने का कुछ अवकाश है, क्रोध करने का कुछ काम है । माया, लोभ में रमने से माना लाभ है । अरे चारों ओर से संकट इस जीव पर छाए है । तो हे भव्य आत्मन्, तू उस शुद्ध भगवान के स्वरूप की उपासना में रह और जगत के इन सब जीवों को परमात्मस्वरूप में निरख । इसमें न कोई तेरा साधक है और न कोई बाधक है । ये सब परमात्मतत्त्व हैं,जो ये जगत के जीव रुल रहे हैं ये पुरुष अपने आपको भूलकर रुल रहे हैं । यहाँ तुम्हारा साधक या बाधक कोई नहीं है । तुम अपनी समता से रहो और इस जीवन को मुक्ति के मार्ग में लगाओ ।

यह पुण्यपाप का अधिकार चल रहा है । यह अब समाप्त होने को है । इस समाप्ति के प्रसंग में इस तरह का ध्यान बनाओ कि लो अब तक मैं खूब सुन चुका कि इस जीव का केवल ज्ञाताद्रष्टा रहने मात्र में ही हित है और कल्याण है । इसके अतिरिक्त शुभ भाव करना, अशुभभाव करना ये दोनों ही संसार में रुलाने के कारण है । ऐसा जानकर यह ज्ञान ज्ञानमात्र आत्मा को जाने, यही ज्ञान की उत्कृष्टता है । संसार में अनेक प्रकार के ज्ञान हैं । आविकार का ज्ञान, राजनीति का ज्ञान, व्यापार विज्ञान, अनेक कलाओं का ज्ञान, पर इन ज्ञान बढ़ाने वालों से पूछो कि खूब तुमने कलाएं दिखायी और मायामय लोक के बीच बड़प्पन का भी शौक लुटा, पर तुम्हारी आत्मा में कुछ शांति प्रकट हुई है या नहीं? वहाँ यह उत्तर मिलेगा कि शांति तो नहीं मिल सकी । इसका कारण यह है कि यह पर विज्ञान अपने आत्मा के स्वरूप के ज्ञान को छोड़कर पर में आकर्षित होकर होने वाला विज्ञान निराश्रय है, इन विज्ञानों को ध्रुव आश्रय नहीं मिला सो यह बदलता रहता है और किसी वस्तु के ज्ञान में देर तक रहने में आकुलताएं हो जाती है, क्योंकि संतोष का साधन तो परतत्त्व है नहीं, किंतु अज्ञान जबरदस्ती में ही पर के उपयोग को खींचे जा रहा है तो असंतोष ही होगा । संतोष होगा तो एक अपने आपके शुद्ध ज्ञानस्वरूप के जानने में संतोष होगा ।

आत्मानुभव का यत्न―आत्मा का यथार्थ अनुभव कब होता है जब कि मन में संकल्प विकल्प नहीं रहता । यहाँ के पदार्थों में इष्ट और अनिष्ट का जो उन्माद चल रहा है वह पागलपन है । जिस भ्रम रस के पीने से एक बावले की तरह अनेक पदार्थों को ग्रहण करता और छोड़ता है ऐसे इन सब मिथ्या कर्मों की भूल से उखाड़ देने पर ही उसे ज्ञानप्रभु से भेंट हो सकती है। योगीजन ज्ञानघन आनंदमय पवित्र प्रभु की भेंट छोड़कर रुलने वाले मोही मलिन अज्ञानीजनों से भेंट कर रहे हैं, इन्हें ही अपना सर्वस्व मान रहे हैं, किंतु ये बिल्कुल भिन्न हैं और इंद्रधनुष की तरह तत्सण विनाशीक है । रहेगा यहाँ कुछ नहीं । केवल पछतावा तो हाथ रह जायेगा । तो उस पछतावे से लाभ क्या है? जीवन रहते हुए पछता लेने पर तो कुछ लाभ मिलता है, जीवन जाने पर पछतावा किया तो उससे क्या लाभ मिलेगा?

ज्ञानकला―भैया ! सत्य श्रद्धा जगावो । भीतर की यह बात है । किसी से कहना नहीं है कि यह पुत्र तो निगोद का कारण है, यह स्त्री तो नर की खान है, यह कहना नहीं है । भीतर में यह श्रद्धा रखो कि कर्मोदयवश इनमें लगना पड़ रहा है । स्त्री हो, पुत्र हो, कोई भी हो, यह जो परवस्तुओं का आकर्षण है वह अपने को रीता कर डालता है । खुद में जब भरकमपना नहीं रहता तब यह स्वयं रीता हो गया । शांति और आनंद की धुनि नहीं होती तो यह दर-दर ठोकरें खाकर अपने समय को गुजारा करता है । इस भेद के उन्माद को तजो, एक ज्ञानस्वरूप अपने प्रभु को निरखो, जगत के अन्य जीवों को भी अपने स्वरूप की तरह निरखो, ये किसी भी प्रकार चलें, परिणमें, उन सबसे कर्मों की प्रेरणा समझो, जीवों का दोष न समझो । यों स्पष्ट कर्मों से ज्ञानातिरिक्त भावों को मूल से उखाड़कर अपनी कला को संभालो । तुम्हारी कला है ज्ञान की कला । उसे जान लो और चाहे कुछ न जानो केवल ज्ञाता दृष्टा रहने की कला का प्रयोग करना है

नियम का फल―एक गृहस्थ साधु के पास गया । साधु ने कहा कि तुम दर्शन का नियम ले लो । कहा, महाराज ! मंदिर तो बड़ी दूर है । उतनी दूर जाना मुश्किल है । अच्छा तो तुम्हारे घर के सामने क्या है? कहा महाराज, हमारे घर के सामने एक कुम्हार का घर है सो उस कुम्हार का भैंसा हमारे दरवाजे के सामने बंधा रहता है सो उस भैंसे का चाँद हमें रोज दिख जाता है तो साधु ने कहा, अच्छा तुम उसी के दर्शन करके खाना खाया करो । बोला हाँ महाराज, यह तो हो जायेगा । गप्पें सुनने में तो बड़ा मन लगता है पर धर्मचर्चा की बात सुनने में थोड़ा चित्त को बलपूर्वक लगाना पड़ता है । सो वह रोज उसी चांद का दर्शन कर लिया करे । एक दिन 1 घंटा पहिले ही कुम्हार भैंसे को लेकर खान से मिट्टी खोदकर लाने के लिए चला गया । जब वह वहाँ दर्शन करने पहुंचा तो भैंसा न मिला । पता लगाते-लगाते वह खान के निकट पहुंचा । जिस समय वह पहुंचा उस समय क्या हुआ कि कुम्हार को खान से मिट्टी खोदते में एक अशर्फियों से भरा हंडा मिला । सो उस कुम्हार ने सिर उठाकर देखा कि कोई देखता तो नहीं है । इतने में वह गृहस्थ भी उस भैंसा का चांद देखने पहुंच गया । भैंसे के चाँद को देखा । कुम्हार ने समझा कि सेठ ने देख लिया । कुम्हार चिल्लाता है कि अरे सेठ जी सुनो तो, सेठ ने कहा बस देख लिया । क्या देख लिया? भैंसे का चांद । कुम्हार क्या सोचता है हमारी अशर्फियों का हंडा इसने देख लिया है । अरे तो जरा सुनो तो, बस देख लिया, सब देख लिया । वह तो अपने घर चला गया । कुम्हार भी अपने घर आया और विकल्पों में पड़ गया कि कहीं यह राजा से कह न दे तो पिटाई भी हो और अशर्फियां भी छुड़ा लीजायेगी । सो वह हंडा लेकर कुम्हार उसके घर पहुंचा और बोला सेठ जी, तुमने देख तो लिया सब, पर किसी से कहने सुनने की बात नहीं है, आधी तुम ले लो और आधी हम ले लें । आधी अशर्फियां ले लिया । तो सेठ सोचता है कि एक भैंसा के चांद के दर्शन करने के नियम से इतना धन मिला और साधु महाराज कहते थे कि मंदिर के दर्शन किया करो, यदि वहाँ दर्शन करें तो पता नहीं कौनसी निधि मिले?

श्रद्धापूर्वक भक्ति में सिद्धि निश्चित―भैया! दर्शन का जरा विश्वास कम है इसलिए प्रभुदर्शन से आनंद और निधि मिल नहीं पाती । यदि पूर्ण विश्वास सहित जैसा प्रभु का स्वरूप है उस स्वरूप के दर्शन करें तो उस समय ऐसी स्थिति होगी कि किसी भी परपदार्थ का संकल्प विकल्प नहीं है, कोई चिंता शल्य नहीं है, केवल आनंदस्वरूप उस ज्ञानज्योति का ही मिलन है । उसे ज्ञानमिलन कहें, चाहे जैनमिलन कहें बात एक है । जैनमिलन क्या है? जिनका भाव । जिन कहते हैं उसे जो राग द्वेष मोह जीते । ऐसे जिनकी जो करतूत है अर्थात् ज्ञानमात्र रहना उसको कहते हैं जैन, अर्थात् ज्ञानभाव । उस ज्ञानभाव का मिलन जब होता है तब अनंत आनंद की निधि प्राप्त होती है । ऐसे प्रभु की भेट में ही ये दुष्ट कर्म नष्ट होते हैं । सो यह सम्यग्दृष्टि छद्मस्थ अपने ज्ञान की परमकला के साथ शुद्धनय के बल से अपने आपमें आनंदमय क्रीड़ा को करता है और जब केवलज्ञान उत्पन्न होता है तो साक्षात् इस समस्त विश्व के साथ अपनी ज्ञान क्रीड़ा करता है । उस ज्योति से अज्ञानरूपी अंधकार दूर कर लेता है ।

ज्ञानज्योति का अभ्युदय―यह ज्ञानज्योति समस्त कर्मों को, इन क्रियाकांडों के रागद्वेषादिक भावों को, मोह को उखाड़ कर प्रकट हुई है । ऐसे इस ज्ञानतत्त्व के साथ रमण करो और अपने इस रात दिन के 24 घंटे के समय में 10 मिनट भी तो अपने को इस अपूर्व दया के लिए निर्बाध रखो । निरंतर मोह का विकल्प, राग की कल्पनाएँ बसाए रहने से कुछ लाभ नहीं मिलेगा, यह झमेला मेला है, ये सब विघट जायेंगे और अंत में रुलते हुए अपना समय गुजारना पड़ेगा । तो सर्व प्रयत्न करके अपनी ज्ञानज्योति को जगाओ और ज्ञानरस का आनंद लो । इस प्रकार यह पुण्य पाप नामक अधिकार समाप्त होता है ।


आस्रव अधिकार

गत अधिकार में पुण्य पाप का वर्णन किया था, ये कर्म पुण्य और पाप के रूप से दोभेष बनाकर इस रंगभूमि में आए । जब वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञान किया गया तब यह भेष मिट गया और केवल एक कर्मरूप प्रतीत हुआ और कर्मरूप प्रतीति कराते हुए ये कर्म बनगए ।

आस्रव का भेष―अब इस अधिकार में यह बतलाया जायेगा कि सर्वकर्मों के आने का जरिया क्या था? इस अधिकारका नाम हैं आस्रव अधिकार । अब इस अधिकार का प्रवेश होता है । जैसे नृत्य के अखाड़े में नृत्यकार स्वांग रखकर प्रवेश करता है इसी प्रकार अब ये कर्म आस्रव का भेष रखकर प्रवेश करते हैं । यह अखाड़ा है अपने ज्ञान के उपयोग का । अब इस उपयोगभूमि के रंगमंच पर आस्रव के भेष में कर्म आते हैं । पूज्य अमृतचंद्र सूरिने इसअधिकार के प्रारंभ में एक कलश में बताया है―

कलश 113

अथ महामदनिर्भरमंथरं समररंगपरागतमास्वम᳭ ।

अयमुदारगभीरमहोदयो जयति दुर्जयबोध धनुर्धर: ।।113।।

विजय का साधन सम्यग्ज्ञान―अब इस समय दुर्जय ज्ञानरूपी धनुर्धारी महान् सुभटआस्रव को जीतता हुआ जयवंत होता है । आत्मा की विजय ज्ञान से ही है । यह आत्मा ज्ञानमात्र है । जानने के अतिरिक्त इसमें अन्य कोई स्वरूप प्रतिभास नहीं होता है । यह ज्ञान जब विशेष विशेष तत्त्वों को पदार्थों के जानने में लगता है तब तो यह ज्ञान घट जाता है, निर्बल हो जाता है और जब विशेषकर ज्ञान छोड़करकेवल सामान्य ज्ञानस्वभाव के ज्ञान में लगताहै तो इस केंद्र में पहुंचने से ऐसा प्रताप प्रकट होता है कि कुछ क्षण बादसमस्त विश्व के तीनों काल का ज्ञान हो जाता है । ऐसी यह सर्वज्ञता की शक्ति रखने वाला भेदविज्ञान अबजयवंत होता है ।

सत्य आशीर्वाद―भैया! लोग बड़ों से आशीर्वाद चाहते हैं, प्रभु से आशीर्वाद चाहतेहैं । कौनसा आशीर्वाद चाहने योग्य है? वह यही आशीर्वाद है कि प्रभु मेरा ज्ञान यथार्थजयवंत हो । हे नाथ मैं और कुछ नहीं चाहता हूँ । जगत के धन वैभव ये सब पुण्य के फलहैं । इन्हें कोई कमाता नहीं है । यह भ्रम लग गया है कि मुझमें ऐसी बुद्धि है कि मैं धन को कमाता हूँ, परिवार को सुरक्षित रखता हूँ । हे आत्मन्! तेरे में ताकत नहीं है कि किसी परपदार्थ में तू संयोग कर ले या उसकी अवस्था बना दे । तू तो ज्ञानमात्र है । अपने में ज्ञानकरेगा, भाव बनायेगा । इसके आगे तू अपने में और कुछ नहीं कर सकता । बाहर में कुछकरने का अभिप्राय छोड़ दे । यह अभिप्राय मिथ्या है । इस ही अभिप्राय के कारण आज तकयह जीव संसार में रुलता आया है । हे प्रभो! आपका मुझे यह आशीर्वाद चाहिए कि मेराज्ञान यथार्थ प्रकट हो । और कुछ कामना नहीं है ।

प्रमुख पात्र की पात्रता―यह ज्ञान जो कि उपयोगभूमि पर नृत्य के मंचपर जयवंतहोकर निःशंक प्रकट होता है वह ज्ञान उदार गंभीर और महोदय है । इस आत्मा में कितने नाटक हो रहे हैं । कभी क्रोध हुआ, कभी मान, माया, लोभ हुआ, कभी कषाय के भाव हुए । उस कषाय, रागद्वेषादि विभाव में क्षोभ होता है । इस आत्मा में शुद्ध ज्ञान भी प्रकटहोता है तो इस उपयोग के स्टेजपर कितनी ही परिणतियां नृत्य करने के भेष में उपस्थित होती है । उनसब पात्रों में से उत्तम पात्र एक ज्ञान है । कोई नाटक खेला जाता है तो उस नाटकमें एक आधार मुख्य होता है जो सारे नाटक की जान है । जिस पर सब लोगों की निगाह होती है ।

प्रमुख पात्रों की पात्रता के उदाहरण―जैसे मैनासुंदरी नाटक खेला जाता है । उससमस्त नाटक में मैनासुंदरी के कर्त्तव्य को कितना महान् देखा? सबकी दृष्टि केवल उस मैना सुंदरी के चरित्रपर जायेगी । यद्यपि वहाँ पर पुण्यवान् श्रीपाल भी है, और इस मैनासुंदरी को अपने से भी अधिक महानता की बात श्रीपाल में है, लेकिन दर्शकों की निगाह मुख्यरूप से मैनासुंदरीपर जायेगी । तो नाटक का मुख्य एक पात्र होता है । जैसे सत्यवान राजाहरिशचंद्र का नाटक हो, उसमें हरिशचंद्र की स्त्री, हरिशचंद्र का पुत्र ये अच्छे चरित्र वाले नथे क्या? थे । उन्होंने भी काफी त्याग किया, सरलता से कर्तव्यपालन किया, पर उस नाटकमें नाटक के प्रसुप्त पात्र हरिशचंद्र हैं । सबकी दृष्टि राजा हरिशचंद्र पर जाती है और जबराजा हरिशचंद्र का प्रभाव उस स्टेज पर उदितहोता हैतो एकदम तालियां बजने लगतीहैं । पर नाटक का प्रधानपात्र एक होता है । इसी तरह इस आत्मा के उपयोगभूमि में अनेकनाटक हो रहे हैं पर सब नाटकों में इस नाटक की जान एक ज्ञानपात्र है ।

मुख्य पात्र की तीन विशेषतायें―भैया! उस ही ज्ञानपात्र के संबंध में कहा जा रहाहै कि यह उदार है,गंभीर है और महोदय है । नाटक में जो मुख्य पात्र बनता है उसमें ये तीन विशेषताएं होनी चाहिए तब मुख्य पात्र माना जाता है । सर्व से अधिक उदार कंजूसहोउसकी पात्रता शोभा नहीं देती । किसी का बुरा न मानने वाला हो । सब पर क्षमा और समतापरिणाम रखता हो तो वह प्रशंसा के योग्य होता है और उस नाटक का मुख्य पात्र अधिकारी होता है । इस ज्ञान को भी देखो, यह कितना उदार है? जगत में विभिन्न पदार्थ होते हैं किंतु उन पदार्थों में राग-द्वेष न करो, उदार रहो । जो उदार रहेगा, मात्र ज्ञाता द्रष्टा रहेगा, राग-द्वेष में न पड़ेगा वह जीव अनाकुल रहेगा । उस पर संकट नहीं आया करते हैं ।

उदारता का एक उदाहरण―एक छोटीसी कहानी है किम्वदंती कि ब्रह्मा एक लड़के का भाग्य बना रहे थे । और इसके भाग्य में लिख रहे थे काला घोड़ा और 5 रुपया । वहाँ से निकला साधु । उसने पूछा क्या कर रहे हो ब्रह्माजी!.... कहा भाग्य बना रहे हैं । क्या लिख रहे हो?....काला घोड़ा और 5 रुपया ।.... कहां पैदा कर रहे हो ?....अमुकलखपति के घर में.... अरे तो इतने बड़े घर में पैदा कर रहे हो तो उसके ही अनुकूलभाग्य बनावो ना ।.... जावो―जावो तुम्हें इससे क्या मतलब?....अच्छा तो तुम इसका भाग्य बना लो, हम इसके भाग्य को मेटकर रहेंगे, तुम्हारा लिखा टाल देंगे । इतनी बातचीत ब्रह्मा और साधु में हुई। साधु घर गया । लड़का पैदा हो गया लखपति के यहाँ । 12-13वर्ष में उसकी जायदादसब साफ हो गई । मकान भी बिक गया । केवल झोपड़ी कालाघोड़ा और 5 रुपये उसके अपने गुजारे के लिए रह गये । 14 वर्ष बाद साधु उस नगर से निकला, पता लगाकर उस झोपड़ी में पहुंचा । बालक ने साधु का बड़ा आदर किया। साधुबोला, बेटा जो हम कहें सो करोगे ।.... हां महाराज करेंगेन ।.... तुम्हारे पास क्या है? काला घोड़ा और 5 रुपया ।.... घोड़ा बाजार में बेच आओ । बेच आया 100 रुपये में । जाओ 105 रुपये में घी, आटा, शकर खरीद लाओ । भोजन बनाओ और सबको खिलाओ । उसने ऐसा ही किया । भोजन बनाकर भिखारियों को बांट दिया । दिन गुजर गया । अबकुछ न बचा । रात्रि को ब्रह्मा सोचता है कि 5 रुपया और काला घोड़ा भेजें, क्योंकि भाग्य में लिखा है । दूसरे दिन भेजा 5 रुपये और काला घोड़ा । दूसरे दिन फिर घोड़ा बेचवाकरभोजन बनवाकर सबको बंटवा दिया । इस तरह 15 दिन तक यह होड़ चलती रही । अबब्रह्मा सोचता है कि 5 रुपये तो कहीं से टपका देंगे, पर काला घोड़ा रोज किसका छोड़कर लाएं? हाथ जोड़कर कहता है साधु जी अब माफ करो । जो तुम चाहो सो कर देंगे, पररोज की चकल्लस मेरे से नहीं बन सकती है । अच्छा तो इसका भाग्य वैसा ही लिखो जैसा किबाप का था । लिखा वैसा ही । जो लिखा था वह मेटना पड़ा । यह तो किम्वदंती है ।

उक्त कथा का सारांश―उक्त कथा से रहस्य यह निकालो कि हम जिन पदार्थों में आसक्त होते हैं, पकड़कर रहते हैं वे पदार्थ मेरे कमाने से नहीं आते । पूर्वभव में जो पुण्यकिया था, उदारता की थी उसके फल में ऐसे विशिष्ट पुण्य कर्म बंध से ये सब आते हैं । परइनका करने वाला मैं नहीं हूँ । सो ज्ञाताद्रष्टा रहो, उदार रहो । आए हैं तो जाननहार रहो, आए हैं, ये सदा न रहेंगे । जो वैभव मिला है वह वैभव सदा न रहेगा । अव्वल तो कल का ही पता नहीं कि कल तक टिक सकेगा या नहीं । कुछ दिन बाद में तो ऐसा स्वरूप अवश्यआयेगा कि हम न छोड़ेंगे तो यह वैभव हमें छोड़ देगा । ज्ञाताद्रष्टा रहो, इसी के मायने हैंउदार रहना ।

अलौकिक उदारता का स्वामी―भैया! इन सब भेष बनाने वाले सैकड़ों पात्रों में कौनसा पात्र उदार है? क्या राग उदार है? नहीं । द्वेष मोह आदि उदार है क्या? नहीं । कामादि विकार उदार हैं क्या? नहीं । ये अत्यंत अनुदार हैं । ये दूसरों के जान की भी परवाह नहीं करते और खुद के प्रभु के प्राणों की भी परवाह नहीं करते । ये विकार अनुदार हैं । ये उत्तम पात्र नहीं कहला सकते हैं । नाटक में उत्तम पात्र वही कहला सकता है जो उदारहो । यह ज्ञान उदार है और गंभीर भी है, क्षोभ में नहीं आता । ये रागद्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ काम, ये सब क्षोभ से भरे हुए हैं। यह स्थिर नहीं है किंतु ज्ञानभाव गंभीर हैस्थिर है, धीर है । यहाँ चर्चा चल रही है किइस उपयोग के रंगमंचपर ज्ञानभूमिपर कौन-कौन भाव कितना विचित्र नाटक कर रहे हैं, कैसे-कैसे परिणाम प्रकट हो रहे हैं? कभी शुभ भाव है, कभी अशुभभाव है, कभी वैराग्य में आकर भगवान के निकट पहुंचते हैं, कभीकषाय से पीड़ित हुआ करते हैं, कितने प्रकार के कर्म बताए हैं, कितनी तरह के भेद इसआत्मा में अपना लेते हैं? उन सब परिणमनों में से कौनसा परिणमन उत्कृष्ट पात्र है, उसकी बात यहाँ चल रही है । यह ज्ञान उत्कृष्ट पात्र है, उदार है ।

ज्ञान की महोदयता―यह ज्ञान महान उदय वाला है । यह ज्ञान सर्व विश्वको, लोकालोक को एक ही समय में त्रिकाल पर्याय सहित स्पष्ट जान ले और फिर भी यह ज्ञान ऐसे-ऐसे अनगिनते विश्वों को जानने की सामर्थ रखे, ऐसा महान् उदय आत्मा के और किसपरिणमन में है? क्या राग-द्वेष के परिणमन में ऐसा अभ्युदय है? नहीं । ये राग-द्वेष जहाँ प्रकट होते हैं उसको मलिन और किरकिरा बना डालते हैं । इन रागद्वेषों का ही फल संसार है । ये विचित्र जीव देखे जा रहे हैं―कीड़े मकौड़े, पेड़-पौधे ये सब प्रभु ही बिगड़कर इस अवस्थामें पहुंचते हैं । यह सब किसका प्रताप है? इस मोह का और भ्रम का । इसका महोदय क्या कह सकते है? नहीं । महोदय कहते हैं बड़े उदय वाले को । जिसके मात्र ज्ञानभाव प्रकटहोता है उसको महोदय कहते हैं ।

आत्मा की अतुल निधि―मोही जीव अपने आपमें छिपे हुए ज्ञान और आनंद की कीमत नहीं करते हैं और बाह्य अर्थों में दृष्टि उलझाकर अपने आपको बरबाद कर रहे हैं । अपनी निधि को सम्हालो, उसमें ही दृष्टि दो, यह मलिन, मोही कुटुंब समुदाय, मित्र मंडलीये मेरे लिए शरण नहीं होंगे । ये बाह्य पदार्थ मेरे लिए तब तक शरण होते हैं जब तककि गांठ में पुण्य बसा हो अर्थात् आचरण और ज्ञान सही बना हुआ हो । ये श्रद्धा ज्ञानआचरण ही आत्मनिधि है ।

ज्ञान का प्रताप―यह ज्ञान कितना उदार है, गंभीर है, महान् है, ऐसा यह ज्ञानधनुर्धारी अब जयवंत होता है । जैसे नाटक के मंचपर कोई छोटे तुच्छ आदमी अपना ऊधममचा रहे हो और वहाँ प्रतापी कोई पात्र मंचपर प्रवेश करता है तो वे सब तुच्छ पात्र अपनाऊधम समाप्त करके शरण में आ जाते हैं । इसी प्रकार इस उपयोगभूमि रंगमंचपर इनविषयकषायों के तुच्छ परिणमनोंने ऊधम मचा रखा है । इस मंचपर जब उदार, गंभीरमहान् ज्ञान धनुर्धारी प्रवेश करता है तो इनसब तुच्छ विचारों का ऊधम समाप्त हो जाताहै । मानो इन्हें यह ज्ञान आ जाता है कि आखिर अब बरबाद होने वाले हैं ना सब । ज्ञानपात्र के प्रकट होनेपर ये सब बरबाद हो जाते हैं ।

आस्रव का निर्देशन―यह ज्ञान इन सब आस्रवों को जीतता है। आस्रव क्या है?आत्मा के विभावपरिणाम, मिथ्यात्व के परिणाम । पदार्थ तो हैं जुदा और मिथ्यात्व में मानते हैं कि ये मेरे हैं, पदार्थ तो हैं मुझमें कुछ न कर सकने वाले, किंतु मानते हैं कि ये मेरी रक्षा कर देंगे, ये मेरा पालन कर देंगे, ये सब मिथ्यात्व हैं । वस्तु का स्वरूप तो है और भांति का, हम हैं और भांति के । देव, शास्त्र, गुरु का समूह तो है मोक्षमार्ग संबंधी और मानते हैं रागीद्वेषी । राग-द्वेष की बातों में ही लगने को अधर्म कहते हैं । यह सब मिथ्यात्व का परिणाम है और इस मिथ्यात्वभाव से कर्म आते हैं । ये आस्रव हैं क्रोध, मान, माया, लोभ, कषायप्रकट होता है । तो यह आस्रव है ।

आस्रव की मंथरता―यह आस्रव महान् मद से भरा हुआ होने के कारण मंथर होगया है, उन्मत्त हो रहा है । जैसे शराब पिये हुए पागल पुरुषने बेहोशी छाई हुई हालत में हाथ पैर नहीं चलते हैं, मंथर हो जाता है, इसी प्रकार यह परिणाम भी प्रगतिशील नहींहै । बुझे दिल सब मंथर हैं । तो ऐसे समर रंगपर आए हुए ऐसे आस्रव को यह ज्ञान जीतताहै, हटाता है ।

सुरक्ष्य विचार―भैया! सब चाहते हैं कि मेरी रक्षा हो और उन्नति हो, किंतुजरा चित्त से सोचिए तो सही कि मेरी रक्षा क्या विकारभाव से हो सकेगी? क्या मेरी प्रगतिइस मोहकषाय से हो सकेगी? असंभव है । मेरी रक्षा केवल ज्ञानपरिणाम से हो सकेगी । इसलिए एक बड़ा साहस बनाओ, परिग्रह, परिवार इनके मोह को ध्वस्त करो, ये हैं, इनका सद्व्यवहार करो पर इनकी जिम्मेदारी तुमपर नहीं है । इनकी जिम्मेदारी इन्हींपर है । मोही जीव घर के 10 प्राणियों की भी जिम्मेदारी अपनेपर लाद लेता है । वे मोही प्राणीकह भी देते हैं कि मेरे घर के 10 प्राणियों की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है । हे आत्मन्! वस्तुस्वरूप को तो सोचो, घर के 10 प्राणियों की जिम्मेदारी तुमपर नहीं है । क्या उनका ठेका और जिम्मेदारी तुमपर ही लदी है? अरे उन दस प्राणियों का भाग्य तुम्हारे भाग्य से तेज हैसो तुझ जैसी सामर्थ्य वाले को भी उनका दास बनना पड़ रहा है । तू समझता है कि मैंउनका पालन करता हूँ पर बात यह हो रही है कि उनके पुण्योदय के कारण तुझे उनकी नौकरी करनी पड़ रही है ।

पुण्योदयी की चिंता की व्यर्थता―एक वर्ष का बालक जिसको खड़ा होना भीमुश्किल है ऐसे बालक कीआप कितनी सेवा करते हैं? हाथों हाथ गोद में लेकर उसे खिलातेहैं, बड़ी अच्छी तरह उसकी मुस्कान देखते हैं । आप अब यह बतलावो कि उस 1 वर्ष के बच्चे का पुण्य बड़ा है या आपका पुण्य बड़ा है । एकजिस बच्चे की सूरत की ओर आपदेखते रहते हैं, वह हंसता रहे, यह रोवे नहीं, खेलता रहे, प्रसन्न रहे ऐसा देखने की उत्सुकता बनाए रहते हैं तो आपके पुण्य से उस बच्चे का पुण्य बड़ा है । दरबार में भी तो लोग राजा महाराजाओं को प्रसन्न रखने की चेष्टाएं करते हैं ना,तो उस महाराजा का पुण्यबड़ा है या उन दरबारियों का पुण्य बड़ा है? उस राजा का पुण्य बड़ा है । इसी तरह तुमभी जो बालकों को सुरक्षित रखने और प्रसन्न रखने की चेष्टाएं करते होतो उन बालकों का ही पुण्य आपके पुण्य से बड़ा है । आप उन बड़े पुण्य वालो की फिकर करते हैं और सोचते हैं कि मैं ही इनको पालता हूँ ।

ज्ञान के प्रताप में अज्ञान का विलय―भैया! यह तो उदय की बात है । सबके पुण्य का उदय है, आपके द्वारा कमाई जाने वाली संपदा जिन-जिनके कामों में आयेगी उन उनके पुण्योदय के कारण आप से कमाई बनती है । आपके पुण्य के कारण आपकी कमाई नहीं बनती है । जब यह यथार्थ ज्ञान अपनी महिमा प्रकट करता हुआ, अपना तेज बढ़ाता हुआजब इस उपयोग रंगभूमि पर आ धमकता है तो ये ऊधम मचाने वाले दुष्ट पात्र रागद्वेषविषय कषाय शांत हो जाते हैं, एक किनारे खड़े हो जाते हैं । ऐसा यह दुर्जय ज्ञान धनुर्धारी अब इस उपयोग रंगमंच पर प्रकट होता है ।

भैया! अब भगवान की भक्ति करके गुरुओं की उपासना करके एक आशीर्वाद ले तो यह लो मेरा ज्ञान यथार्थ विकसित हो । यथार्थ ज्ञान का प्रताप ही हमारा रक्षक है औरइसी से कल्याण में प्रगति है । एक यह यथार्थ ज्ञान न हो और तीन लोक का वैभव भी सामनेहो तो भी यह दीन है, दुःखी है, भिखारी है । इस कारण निज सम्यग्ज्ञान के प्रकट होने का आशीर्वाद अपने आपसे चाहिए।

अब आस्रव का स्वरूप कहते हैं ।


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