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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 164-165

From जैनकोष



मिच्छत्तं अविरमणं कसायजोगा य सण्णसण्णा दु ।

बहुविहभेया जीवे तस्सेव अण्णणपरिणामा ।।164।।

णाणावरणादीयस्स ते दु कम्मस्स कारणं होंति ।

तेसिं पि होदि जीवो य रागदोसादि भावकरो ।।165।।

आज का यह विषय कुछ कठिन पड़ेगा । कुछ उपयोग संभाल कर यदि इसे सुनोगे तो पता ठीक लगेगा । आज का प्रकरण बड़े काम का है ।

संसार संकटों का कारण―हम संसार में क्यों रुल रहे हैं और संसार से छूट जाने का उपाय क्या है? यह बात बड़े मर्म के साथ यहाँ बताई जा रही है। इस जीव को दुःख देनेवाला आस्रव है । एक पद्य में भी कहते हैं―आस्रव दुःखकार घनेरे । आस्रव महा दुःखदायी चीज है । वह आस्रव क्या है? उसका स्वरूप यहाँ कहा जायेगा । गाथा का अर्थ तो सीधा यह है कि मिथ्यात्व अविरति कषाय और योग ये ही आस्रव हैं । ये दो-दो प्रकार के होते हैं―चेतन और अचेतन । चेतन मिथ्यात्व और अचेतन मिथ्यात्व, चेतन अविरति और अचेतन अविरति, चेतन कषाय और अचेतन कषाय, चेतन योग और अचेतन योग । और ये बहुत-बहुत तरह के हैं । चेतन मिथ्यात्व आदिक तो चेतन में चेतन के अभिन्न परिणमन हैं और वे ज्ञानावरणादिक कर्मों के कारण होते हैं और उनके भी कारण रागद्वेषादिक भावों को करने वाला जीव है ।

आस्रव, आस्रव हेतु के विवरण की उत्थानिका―अब इसका कुछ वर्णन यों जानें कि आस्रव कहते हैं कर्मों के आने को । इस जीव के ज्ञानावरणादिक कर्म आवे उसका नाम आस्रव है । लाभ वाली बात कठिन हुआ करती है । सर्व संकल्प विकल्प छोड़कर अपने आपको अकेला, असहाय जिम्मेदार जानकर भगवंत जिनेंद्र प्रणीत उपदेश सार को सुनिये । यहाँ कहा जा रहा है कि जीव का आस्रव है कौन? वास्तव में दुःखदायी जगत में है क्या? लोग कहते हैं न कि ये 8 कर्म जीव के साथ लगे हैं । खूब सुना होगा । ये 8 कर्म जीव में आ कैसे जाते हैं? कर्मों के आने के जो तरीके हैं उनका ही नाम आस्रव है । और वे ही तरीके हम को दुःख देने वाले हैं ।

दृष्टांतपूर्वक आस्रवहेतु का विवरण―इस विषय में जरा एक दृष्टांत से सुनिए । किसी मालिक के साथ एक कुत्ता लगा है । रास्ते में किसी उद्दंड पुरुष के ऊपर कुत्ते ने हमला किया पर मालिक ने जब छू छू किया तभी हमला किया । खुद कुत्ते में किसी के काटने की दम नहीं होती । एक डंडा उठावो भाग जाये । कुत्ते ने हमला उस उद्दंडी पुरुष पर किया, वहाँ अपराध किसका माना जायेगा? कोई कहे कि कुत्ते ने ही हमला किया तो कुत्ते का ही अपराध है । ठीक है । अपराध तो कुत्ते का है पर उस कुत्ते की इतनी हिम्मत बनी कैसे, इसका भी तो कारण बतलावो । इसका कारण है मालिक की सैन, छू छू करना । तो वास्तव में अपराधी कौन हुआ? वह मालिक जिसने सैन दिया । इसी तरह हम आप सब पर आक्रमण किया है कर्मों ने । ठीक है । कर्मों के निमित्त से हम आप दुःखी हो रहे हैं, पर यह तो बतलावो कि उन कर्मों के बंधने की ऐसी सामर्थ्य आई कहाँ से? यह प्रभु, मालिक जब तक राग द्वेष की सैन नहीं करेगा तब तक कर्म नहीं बंधेंगे । तो मूल में अपराधी राग-द्वेष आदिक भावों का करने वाला यह जीव स्वयं है ।

रागादि की उत्पत्ति का हेतु―जीव में ये राग-द्वेष आते कैसे हैं? जीव में स्वयं उपाधि का निमित्त पाकर । एक अज्ञानपरिणमन बन गया है । उस जीव के अज्ञानपरिणमन के कारण राग-द्वेष-मोह भाव होते हैं । सो राग-द्वेष-मोह बतलावो जड़ हैं कि क्या कहे जायेंगे? जैसे किसी का पुत्र बदचलन, उद्दंड, कुपूत हो जाये, कोई उसके बाप से ही पूछे कि यह पुत्र किसका है, तो बाप क्या जवाब देगा? क्या बतलाये, क्या उत्तर दे, कुछ समझ में नहीं आता । किंतु मेरा पुत्र है―यह तो कह नहीं सकता क्योंकि बदचलन है, उद्दंड है । उसके कुल में अभी तक कोई ऐसा पैदा ही नहीं हुआ हैं । और मेरा पुत्र नहीं है यह भी कैसे कह दे? इसी प्रकार ये राग द्वेष मोह बतलावो ये चेतन हैं कि अचेतन? क्या बतलाएं भाई ये राग-द्वेष विकार चेतन हैं―यह कहते हुए तो जीभ नहीं हिलती क्योंकि मैं परमात्मस्वरूप के सदृश एक चैतन्यस्वभावमय हूँ, परमब्रह्म हूं, मुझमें से ऐसे विकार निकलने का कारण ही नहीं है । और मना भी कैसे करूँ? ये राग-द्वेष विकार चेतन नहीं हैं, क्या यह कर्मों की परिणति है, क्या यह ईंट, पत्थरों की परिणति है? यह आत्मा की परिणति है।

आस्रव दुःखकार घनेरे―आज क्या बात कही जा रही है थोड़ी नींद छोड़कर सुनो । जिसे तुम छहढाला में पढ़ा करते हो आस्रव भावना―जो योगन की चपलाई तातै ह्वै आस्रव भाई । आस्रव दु:खकार घनेरे, बुधिवंत तिन्हें निरवेरे ।। जो मन, वचन, काय की चंचलता है उससे उपद्रव होते हैं । याने शरीर खूब हिलाया जाये, मन भी खूब चलाया जाये, वचन बकवादी भी बहुत किया जाये तो इनसे कर्मों का आना होता है । ये आस्रव बड़े दु:ख देने वाले हैं । बुद्धिमान् पुरुष इनको दूर किया करते हैं । कोई एक डेढ़ साल का बालक अगर अच्छा आसन मारकर बैठ जाये, हिले ढुले नहीं, मुंह चापकर बैठ जाये तो कितना सुहावना लगता है और वही बालक रो दे या बोलने लगे तो सारी कलई खुल जाती है कि यह तो अज्ञानी है, नासमझ है । और जरा अच्छे ढंग से बैठें तो कितना ही आप उसके विषय में अर्थ लगाते जायें? यह बड़ा समझदार मालूम होता है । यह कुछ ध्यान कर रहा है । यह कुछ तत्त्व-चिंतन कर रहा है, यह बड़ा गंभीर है । कितने ही अर्थ उसकी मुद्रा से निकल जायें । और यदि वह शरीर हिलाने डुलाने लगे और कुछ वचन बोलने लगे या दूध पप्पा मांगने लगे तो वे सब अर्थ ढपले में पड़ जाते हैं । तब इसी तरह समझो हम और आप जितना शरीर हिलाएं डुलाएँ, व्यर्थ की बातें बोला करें और जितनी जिस चाहे के संबंध में कल्पनाएं उठाया करें तो इससे दुःख होता है, आस्रव होता है, संसार का बंधन होता है । हम आपको चाहिए कि व्यर्थ की काय चेष्टाएं न करें । जितनी बात बोलने को हमारी प्रकृत हो उतनी ही बात बोला करें । और जिस चाहे जीव के संबध में कल्पनाएं न उठाया करें, यह जीवन में हम और आपका कर्तव्य है ।

जीवविकारों की चिदाभासता―बारह भावना में आप बोलते हैं―मोह नींद के जोर, जगवासी घूमे सदा । कर्म चोर चहूं ओर सरवस लूटैं सुध नहीं ।। इसमें मोह की प्रधानता दी है । मोहनिद्रा के वश में यह जीव अचेत पड़ा है और कर्म चारों ओर से आकर इसे लूटते हैं, इसे कोई सुध नहीं है । यह परिवार वैभव को पाकर हर्ष के मारे फूला नहीं समाता, किंतु हो क्या रहा है? मोह की नींद में अचेत इस प्राणी के कर्मचोर चारों ओर से लूट रहे हैं । अपनी दया ही नहीं है इसे, अपनी फिक्र नहीं है इसे । तो ये रागादिक विकार बतलावो चेतन हैं या अचेतन? इन्हें न चेतन कहा, न अचेतन कहा, किंतु चेतनाभास कहते हैं । ये विकार चिदाभास हैं । यह पुत्र पुत्राभास है । यह पुत्र कपूत है, मेरा नहीं है । मेरा होता तो मेरे माफिक चलता । उसे आप मना कर डालते हैं । इसी प्रकार ये राग-द्वेष विकार मेरे नहीं हैं । यदि मेरे होते तो मेरे आनंद के लिए बनते । किंतु जब ये उत्पन्न होते हैं तो क्लेश पहुंचाकर ही उदित होते हैं । यह तो हुआ चेतन आस्रव, किंतु मिथ्यात्व नामक प्रकृति का बंध होता है, ये आते हैं और प्रत्याख्यानावरण, अप्रत्याख्यानावरण ये कषाय जो चारित्र नहीं होने देते हैं और अनंतानुबंधी आदिक समस्त कषाय और योग जो पिंड समागत है वे सब हैं अचेतन आस्रव । ये पुद्गल के परिणमन हैं ।

जीवविभाव व पुद्गलविभावों का निमित्तनैमित्तिकसंबंध―ये विकार जितने होते हैं ये जीव के परिणमन हैं, कर्म पुद्गल परिणमन है । जीव और पुद्गल का निमित्त नैमित्तिकभाव चल रहा है । कर्मों का उदय आये तो जीव बिगड़ जाये । जीव बिगड़ जाये तो कर्मों का बंध हो, और इस परंपरा में हम आप सब घसीटते चले जा रहे हैं । यहाँ के मजा भोगों को नहीं छोड़ पाते हैं । उनमें आनंद मानते हैं, पर उनके फल में जब सजा मिलती है उस समय याद आती है । घर, कुटुंब, पर के हेतु अन्याय और पाप किए जा रहे हैं पर इस अन्याय पाप के फल में जब नरकादिक गतियों को जाना पड़ेगा और वहाँ विवेक होगा तो यह पछतावा होगा कि जिस कुटुंब के कारण मैंने इतने पाप किये, वे अब कोई साथी नहीं होते हैं । यह सारा फल अकेले को ही भोगना पड़ रहा है।

मौज मारने का फल―एक सेठजी का नौकर था । सेठजी का पलंग बहुत बढ़िया सजाता था, कोमल स्प्रिंगदार पलंग पर गद्दा बिछाता था, उस पर सफेद पोस बिछाता था, उस पर फूलों की पंखुड़ियां डालकर पलंग को सजाया करता था । एक दिन नौकर ने सोचा कि पलंग बिछाते-बिछाते बहुत दिन हो गए । थोड़ा देख तो लें इस पर लेट कर कि कितना मजा आता है? दो मिनट के बाद में ही उठ जायेंगे । एक बाईं करवट बदल कर देख लें, एक दाईं करवट बदल कर देख लें और थोड़ा सीधा पड़कर देख लें । जो उस पलंग पर लेटा तो सवा मिनट बाद ही नींद आ गई । अब 20 मिनट हो गए, सेठजी आए, देखा यह बड़ा चालाक नौकर है । उसे नौकर पर गुस्सा आ गयी । बेंत उठाकर 10, 20 लगाए । तो सेठ बेंत मारता जाये और वह नौकर खूब हँसे । तो सेठ कहता है कि इतना मारता हूं पर तू हंसता क्यों है? वह हंसकर बोला कि हम तो 15 मिनट ही इस पर लेटे तब तो हमारे बेंत लग रहे हैं, आप तो रोज-रोज लेटते हो तो न जाने आपकी क्या दशा होगी? जो विषयों में मस्त रहेंगे, जो आत्मस्वरूप को भूल जायेंगे तो नियम से उनकी दुर्गति है । कैसी दुर्गति होगी?

खोटे परिणामों का परिणाम―भैया! ये सारे संसार के जीव दिख रहे हैं, इनको देखकर अंदाज कर लो कि आत्म असावधानी के कारण ऐसी दुर्गति होगी । एक शराबी शराब की दुकान पर गया । बोला, आज तो यार बहुत बढ़िया शराब दो । हाँ हाँ बहुत बढ़िया देंगे । अजी ऐसी नहीं, बिल्कुल बढ़िया । हाँ हाँ बिल्कुल बढ़िया देंगे । अजी नहीं, रोज से बढ़िया । तो वह दुकानदार बोला कि अपने इन बाबा चाचों को देखो जो ये बेहोश पड़े हैं और इन पर कुत्ते मूत रहे हैं । इनको देखकर विश्वास बना लो कि यहाँ बढ़िया शराब है । तो जगत में कीड़े, मकोड़े, पेड़, पौधे, पशु, पक्षी, गधा, सुअर इनको देखकर यकीन तो कर लो कि खोटे परिणामों का क्या फल हुआ करता है? चाहे कितनी ही मुसीबत आ जाये मगर दूसरों को धोखा देने, दूसरों को सताने का परिणाम न आना चाहिए ।

कौन अपना और कौन पराया―भला आज जो तुम्हारे घर में नहीं हैं, इन चार-पाँच जीवों के अतिरिक्त ये सब जीव हैं, ये क्या तुम्हारे कुटुंबी कभी नहीं बने? और आज जो तुम्हारे घर में आ गए हैं क्या ये कभी बिछुड़ेंगे नहीं? क्या ये गैर नहीं बनेंगे? फिर कौन अपना और कौन पराया है? परमार्थ से विचारो तो सही । समस्त जीव परिपूर्ण हैं, अपने स्वरूप में तन्मय हैं । उनसे मुझमें कुछ नहीं आता । हमारा उनमें कुछ नहीं जाता । क्या संबंध है फिर? क्यों इतना मोह किया जा रहा है कि आपकी निगाह में घर के 4 आदमी हैं सब कुछ । जितना भी श्रम किया जाता है, जितनी भी कमाई की जाती है घर के उन चार जीवों के लिए ही की जाती है, 24 घंटे घर के उन चार जीवों का ही विकल्प बनाए रहते हैं । एक तराजू के दोनों पलड़ों में एक पलड़ा में तो घर के चार जीव रख लिए जायें और एक पलड़े में जगत के समस्त मनुष्यादिक रख लिए जायें तो भी घर के उन चार जीवों का ही पलड़ा भारी होता है और शेष उन अनगिनते जीवों की कीमत नहीं करते । इसको क्या कहा जाये? महान् व्यामोह । भगवान जिनेंद्रदेव के शासन में ऐसे व्यामोह की बड़ी निंदा की है ।

आत्मक्रांति―अब कुछ क्रांति लाइए और अपने को अकेला, अपने को अपना जिम्मेदार मानकर कुछ प्रगतिशील भावों में चलिए । इस मायामय जगत में किसी का कुछ नहींनिहारना है । किसी से कोई आशा नहीं रखना है । यह जीव स्वयं जैसे परिणाम करता हैवैसे ही सुख दुःख पाता है । यह आस्रव की थ्यौरी का प्रकरण चल रहा है । इन आस्रवोंमेंअनंत कार्माणवर्गणायें ठसाठस भरी हैं । और संसार में प्रत्येक जीव के प्रदेश में विस्रसोपचयरूप और कर्मरूप अनेक कार्माणवर्गणायेंभरी पड़ी हैं । यह इतना बड़ा मैल, इतना बड़ाजमाव आ कैसे गया? यह आ गया खुद की गल्ती से । कोई बूढ़ा पहिले तो अपने पोतों से बड़ा प्रेम दिखाता है और जब वे पोतापोती उस बूढ़े पर खेलने लगते हैं तो उस बूढ़े को तकलीफ होती है । कभी सिरपर चढ़ गए, कभी कांधे पर चढ़ गए, कभी रोते हैं तो उस बूढ़ेके ऊपर आफतसी आ जाती है । तो उस बूढ़ेने यह आफत अपने आप डाल ली । अब दुःखीहो रहा है । यह कर्मों का जो जमाव हम और आपपर बन गया है वह अपनी गलती से बनाहै । अपने स्वरूप की कदर न करके अपने को दीन-हीन समझ रहे हैं । हम तो न कुछ हैं । हमारे पालने वाले दूसरे हैं, हमारी रक्षा करने वाले दूसरे हैं । हम में तो कोई शक्ति हीनहीं है । अरे तुझमें तो प्रभुवत् अनंतज्ञान शक्ति है, अनंत आनंद की शक्ति है । तू अपनीशक्ति को नहीं समझता इसलिए भूले हुए सिंह की तरह बंधन में पड़ा है ।

भ्रम की अंधेरी―चैत के महीने में शाम के समय एक जमींदार खेतोंपर मजदूरों से कहरहा था कि जल्दी काटो, शाम हो रही है, अंधेरी आ रही है । जितना शेर का डर नहीं हैउतना डर तो अंधेरी का है । यह बात सुन लिया किसी पेड़ की ओट में बैठे हुए शेरने । शेरसोचता है कि हम से भी कोई बड़ी चीज अंधेरी है । खैर, आदमी तो सब चले गए । उसीदिन एक कुम्हार का गधा खो गया था तो वह गधा खोजने निकला अंधेरी रात में । सिंह बैठाथा । कुम्हारने समझा कि यही है मेरा गधा । सो निःशंक होकर उसके कान पकड़कर पहिलेतो 5-7 डंडे जमाए । जब 10-5 डंडे जमाये तो सिंहने सोचा कि अब आ गई अंधेरी । सो अंधेरी के डर के मारे पूछ दबाये रहा । कुम्हार कान पकड़कर अपने घर ले आया औररस्सा से बांध दिया । कुम्हारने तो फिर अच्छी तरह से नींद ली और शेरने समझा कि हायमुझपर अंधेरी आ गयी, सो उसे चैन न पड़े ।

अरे! बतलाओ तो सही कि शेरपर क्या अंधेरी आ गई जिसके डर के मारे सिंहदुःखी है? कुछ पकड़ ले जाने की चीज या खा जाने की चीज वह अंधेरी थी और वह सिंहकेवल अंधेरी के ख्याल में दुःखी हो रहा है । इसी प्रकार परमात्म सदृश यह ज्ञानस्वरूप भगवान आत्मा अनंतशक्तिमय है, किंतु अपने आपके स्वरूप को भूलकर एक बहम ऐसा बनालिया, भ्रम बना लिया कि मैं कुछ नहीं हूँ, मेरी रक्षा तो इन बाह्य पदार्थों से है, मेरीसत्ता तो इन पर पदार्थों के कारण है । यह भ्रम छा गया और इस भ्रम में दीन, हीन, भिखारी बन रहा है । सो किसी की ओर मत निहारो, कोई मदद नहीं करता है । अपने आपके अंतरंग में कुछ प्रभुता तो देखो और अपने आपको ज्ञानमात्र निहारो ।

प्रकृत का उपसंहार―यह मैं केवल जाननस्वरूप मात्र हूं―ऐसा अपने में बराबर मनन करते जाओ । केवल यह जाननस्वरूप जब जानने में आयेगा, उस समय जो अलौकिकआनंद प्रकट होगा उस आनंद में यह सामर्थ्य है कि इन आस्रवोंको, कर्मों को क्षणमात्र में ध्वस्त कर देगा । ये ज्ञानावरणादिक कर्म आते हैं,इन कर्मों के आने का कारण तो उदय में आने वाला कर्म है । और उदय में आने वाले कर्म में नवीन कर्मों का आस्रव करने का निमित्तपना बन जाये, इसका कारण है जीव का राग-द्वेष मोहभाव । तो वस्तुत: यह राग-द्वेष मोहभाव ही आस्रव है और इन आस्रवों केकारण ही संसार में रुलना पड़ता है । तो ऐसा यत्नकीजिए कि ये राग-द्वेष-मोह अज्ञान तुमसे विदा हो जाएं । ऐसा कर लिया तो जैनशासन से और मनुष्य जीवन से लाभ प्राप्त कर लिया ।

आस्रवता का तात्पर्य―इस प्रकरण का सारांश यह है कि जीव में जो नये कर्म आतेहैं उन नवीन कर्मों का साक्षात् निमित्त कारण अर्थात् उदय में आने वाले कर्म हैं । औरउदय में आने वाले कर्म नवीन कर्म बंध के निमित्त बन सके, ऐसा उनमें निमित्तपना आयेइसका निमित्त है राग-द्वेष-मोह परिणाम । इस करण कर्मों के निमित्तपने का निमित्त होने से राग-द्वेष-मोह ही वास्तव में आस्रव हैं और राग-द्वेष-मोह अज्ञानियों के ही होता है । इस प्रकरण में तात्पर्य निकला । अब यह दिखाते हैं कि ज्ञान पुरुष के आस्रव का अभाव होता है ।


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