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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 169

From जैनकोष



पुढवीपिंडसमाणा पुव्वणिबद्धा दु पच्चया तस्स ।

कम्मसरीरेण दु ते बद्धा सव्वे वि णाणिस्स ।।169।।

कर्म की कार्माण शरीर से बद्धता―ज्ञानी जीव के पूर्वकाल में बंधे हुए जो कर्म हैं वे यद्यपि आत्मा में अपनी सत्ता रखे रहते हैं तो भी वे पृथ्वी पिंड के समान हैं, वे सबके सब कर्म कार्माण शरीर से बंधे हैं। आत्मा से नहीं बंधे हैं। देखिए एक गाय को आप बांधते हैं तो किस प्रकार बांधते हैं ? एक हाथ से गाय का गला पकड़कर रस्सी के एक छोर से दूसरे छोर को बांधते हैं। क्या गाय के गले को रस्सी से बांधते हैं? नहीं। रस्सी का एक छोर पकड़कर दूसरे छोर से बांधते हैं। अगर गाय के गले को आप रस्सी से बांधे तो गाय मर जायेगी। रस्सी का एक छोर दूसरे छोर में ऐसा बांधते हैं कि गाय का गला बिल्कुल सुरक्षित रहता है। तो रस्सी से गाय नहीं बंधी है, बल्कि रस्सी से रस्सी बंधी हैं। किंतु इस प्रकार की रस्सी का निमित्त पाकर गाय बंधन को प्राप्त हो जाती है ऐसी ही बात इस अपने आत्मा की देखिए।

ज्ञानी के पृथ्वीपिंडवत् कर्मों का सत्त्व―यह आत्मा आकाश की तरह अमूर्त समस्त परद्रव्यों के लेप से रहित है । ये कर्म बंधते हैं तो कर्मों मे कर्म बंधते हैं । चाहे अज्ञानी जीव के कर्म बंधन हो, चाहे ज्ञानी जीव के कर्मबंधन हो, कर्मों से ही कर्म बंधते हैं । पर उस बंधी हुई हालत में अज्ञानी जीव ने बंधन को अपना लिया है, इसलिए अज्ञानी का बंध कहलाता है, और ज्ञानी ने उस बंधन को नहीं अपनाया, ज्ञान भाव को ही अपनाया है । अत: उस परिस्थिति में भी ज्ञानी जीव मुक्त रहता है, अबद्ध रहता है । जितने भी अज्ञान से पापकर्म बंध गये थे द्रव्यास्रवरूप कर्म अर्थात् पुद्गल कार्माणवर्गणाओं के कर्म जो मिथ्यात्व अविरति कषाय और योग के करने में निमित्तभूत हो सकते हैं, सो तत् तत् विषयक ये सब द्रव्यकर्म ज्ञानी जीव के द्रव्यांतरभूत हैं, अचेतन पुद्गल के परिणमन हैं । इस कारण पृथ्वीपिंड के समान ही ये वहाँ पड़े हुए हैं । वे सभी कर्म स्वभाव से ही कार्माण शरीर से संबद्ध होते हैं पर जीव के साथ बद्ध नहीं होते हैं । इस कारण ज्ञानी जीव के द्रव्यास्रवभाव का अभाव स्वयमेव ही स्वभाव सिद्ध है ।

यह जीव ज्ञानबल से भावास्रव से दूर रहता है, ये धन कुटुंब तो मेरे हैं ही नहीं, यह तो मोटा भेदविज्ञान है, किंतु आत्मा में ही उपाधि कर्मों का निमित्त पाकर उत्पन्न होने वाली विभाव तरंगें भी मेरे नहीं हैं, ऐसा भेदविज्ञान ज्ञानी जीव के निरंतर रहता है । तब भावास्रव कहाँ रहा? जैसे लोग कहते हैं कि तुमने हमें गाली दिया और हमने एक भी न लिया तो वह गाली कहाँ रही? इसी प्रकार इन द्रव्य कर्मों के उदय में रागादिक विकार आत्मा पर आये, किंतु ज्ञानी ने ग्रहण नहीं किया तो रागादिक विकारों के आने का प्रयोजन क्या रहा? बस यही स्थिति भावास्रव के भेद की कहलाती है ।

ज्ञानी की निरास्रवता―जो जीव राग-द्वेष भावों को भी अपना नहीं मानता है वह द्रव्यास्रवों से तो स्वत: ही भिन्न हो जाता है । ज्ञानी जीव सदा ज्ञानमय एक भावरूप होता है । वह ज्ञानी निरास्रव है । ज्ञानी को निज सहज ज्ञानस्वरूप की दृढ़ श्रद्धा बनी रहती है । मेरा तो यह मैं ही हूँ । इसके अतिरिक्त जितने भी विभाव हैं, रागादिक विकार हैं ये सब मैं कुछ नहीं हूँ । ऐसे परिणाम वाले ज्ञानी पुरुषों को निरास्रव ही समझना चाहिए । अब यह पूछा जा रहा है कि ज्ञानी जीव निरास्रव कैसे होता है? तो उत्तर में कहते हैं कि―


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