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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 170

From जैनकोष



चहुविह अणेयभेयं बंधंते णाणदंसणगुणेहिं।

समए समए जम्हा तेण अबंधो ति णाणी दु ।।170।।

ज्ञानी की अबंधकता का कारण―मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग―ये चार प्रकार के परिणाम ज्ञान दर्शन गुण के विचित्र परिस्थितियों के कारण अनेक भेद वाले कर्मों को बाँधते हैं, किंतु ज्ञानी पुरुष के आस्रव भाव की भावना नहीं है इसलिए वह तो अबद्ध ही कहलाता है । जो अपने विकार को अपनाए सो संसार में रुले । ज्ञानी जीव निरंतर शुद्ध ज्ञानमात्र अपने स्वरूप का विश्वास रखता है । मेरे तो ये रागादिक भी नहीं हैं । शरीर तो मेरा क्या होगा? ये वैभव संपदा तो मेरे क्या होंगे? यह मैं शाश्वत ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व हूँ । ज्ञानी जीव के आस्रव भाव की भावना का अभिप्राय नहीं है, इस कारण वह निरास्रव ही है, निरास्रव है तब अबंधक तो स्वतःसिद्ध हो गया ।

द्रव्यप्रत्यय में विभाव का सहयोग―ज्ञानी के भी जो द्रव्यप्रत्यय होता है, कर्मों का उदय होता है और वह प्रतिसमय अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों को बाँधता है तो वहां ज्ञानगुण का जघन्य परिणमन ही कारण है । ज्ञानी जीव के जो कर्म बँधते हैं वे उसकी रही सही कमजोरी के कारण बंधते हैं । वह प्रकृत्या नहीं बाँधता । इसका तात्पर्य क्या है कि द्रव्यकर्म तो परतत्त्व में आये जिन कर्मों की विनतियों में आप चर्चा करते हैं ये दुष्ट कर्म हैं, ये दुःख देते हैं या दुष्ट कर्म विनाशनाय धूपं । जिन कर्मों के लिए आप कहा करते हैं वे कर्म जब आते हैं तो जीव के ज्ञान और दर्शन गुण रागादिक अज्ञानभाव रूप में परिणम जाते हैं । उस समय रागादिक भाव में परिणमते हुए वे ज्ञान दर्शन गुण बंध के कारण होते हैं ।

विभाव की मलिनता का विस्तार―वस्तुत: रागादिक अज्ञानभाव से परिणमा हुआ भी ज्ञान-दर्शन गुण ज्ञान-दर्शन ही कहलाता है, इसकी जघन्यता का कारण तो विभाव का संबंध है । सो ज्ञान दर्शन गुण जब अज्ञानरूप होते हैं तो वे नये कर्मों को बांधते हैं, किंतु जो भेदविज्ञान है वह कर्मों को नहीं बाँधता । ज्ञान-दर्शन गुण को रंगीला कर देने वाला जो प्रत्यय है वह (भाव) कर्म ही वास्तव में (भाव) कर्म का बंधन है । ज्ञानी जीव तो निरास्रव है । विष की जड़ है मोह भाव ।

विभाव का मालिन्य―घर में रहने वाले दो चार व्यक्ति तो आपके प्रभुतुल्य बने रहें अर्थात् सब कुछ ये ही हैं । जो तन, मन, धन, वचन जो कुछ न्योछावर करना है वह सब इनके ही लिए है । और उन जीवों को छोड़कर बाकी जगत् के मनुष्यादिक जो जीव हैं इन सबके प्रति कृपा भाव नहीं होता । उनको भली दृष्टि से नहीं देख सकते । कुटुंब के लोग चाहे कैसे ही अपराधी है । चाहे कैसे ही अज्ञानी हो उनको अपना सर्वस्व समझते हैं और उनको छोड़ कर बाकी जीवों का कुछ मूल्य भी नहीं किया जा सकता हो तो इसे कितना बड़ा व्यामोह कहेंगे? जहाँ ऐसा तीव्र व्यामोह है वहाँ इस जीव को सत्पथ नजर नहीं आता । ऐसी हालत में हो क्या रहा है मोहियों को कि ज्ञानबल कमजोर है । जब ज्ञान का जघन्य परिणमन हो रहा है तो वह बंध करेगा ही ।

स्वयं की परिणति ही स्वयं का प्रभाव―जैसे कोई छोटा देहाती पुरुष किसी बड़े हाकिम के पास आता है, किसी कारण से जाना पड़ता है तो वह भयभीत शंकित रहता है, उस पर जो इतना प्रभाव पड़ा, भय आ गया, शंका आ गई इस प्रभाव का कारण कौन है? क्या जज ने प्रभाव डाल दिया ? नहीं । वह देहाती स्वयं कमजोर प्रकृति का था, ज्ञान उसका विशिष्ट न था, पहुँच उसकी ऊपर तक न थी, इस कारण वह स्वयं ही कल्पना करके अपने आपमें अपना असर पैदा कर लेता है और भयभीत तथा शंकित रहता है । ये जगत् के सभी जीव जो नाना प्रकार के संकटों में फंसे हुए है आनंद से बहिर्भूत हैं, इनको सताने वाला कोई दूसरा है क्या? नहीं । यह जीव स्वयं ऐसे अशुद्ध उपादान वाला है कि अपनी योग्यता के अनुकूल अपने आपमें कल्पनाएं बनाकर दुःखी हुआ करता है । इसको बेचैन करने वाला जगत में कोई दूसरा नहीं है । ज्ञानी जीव इस सब राज को जानता है, इस कारण उसे निराश्रय ही कहा है ।

ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टि की पद्धति पर एक दृष्टांत―कुत्ता और शेर दो जानवर होते हैं । इन दोनों को ही देखो कुत्ता कितना उपकारी जीव है कि आपकी दो रोटी के टुकड़ों में ही रात दिन आपकी रखवाली करता । यदि आप पर कोई आक्रमण करता तो उसका वह कुत्ता मुकाबला करता । आपके पास बड़े विनय से पूंछ हिलाकर बैठता, वह आपकी रक्षा करता है । और सिंह को देखो यदि उसकी शकल भी दिख जाये तो जान सूख जायेगी अजायबघर में शेर को देखने जाते हैं तो वह लोहे के शिकंजों से बंद है तो भी पास जाते हुए डर लगता है । और अकल्पित कल्पनाएं हो जाती है कि यदि यह लोहे का शिकंजा तोड़कर निकल आवे तो हमारी खैर नहीं है । सिंह इतना अनुपकारी जानवर है ।

इनकी उपमा में लोगों की दृष्टि―किंतु यदि कोई मनुष्य, सेठ जी की या किसी मिनिस्टर की प्रशंसा करने कोई लग जाये भरी सभा में कि यह बड़े उपकारी है, सबके काम आते हैं, इनके गुणों का क्या वर्णन करना है ? ये तो कुत्ते के समान है, अर्थात् जैसे कुत्ता उपकारी होता है, विनयशील होता है, स्वामिभक्त होता है इसी तरह ये मिनिस्टर साहब भी या सेठ जी भी देशभक्त हैं, प्रजा के उपकारी है । उनकी प्रशंसा कोई करने लगे तो सुनने वाले और मिनिस्टर भी क्या खुश होंगे? नहीं और ऐसा कह दिया जाये कि यह तो शेर के समान हैं तो वह खुश हो जायेगा और कहा गया इसमें यह कि जैसे शेर हिंसक होता है, खूंखार होता है, दूसरों का विनाशक होता है इसी प्रकार यह भी हैं, पर सिंह की उपमा को सुनकर तो वह खुश होता है और कुत्ते की जैसी बड़ी अच्छी बात सुनकर दुःखी हो जाता है । इसका कारण क्या है? इसका मूल कारण है ज्ञान और अज्ञान की पद्धति की बात ।

कुत्ता और सिंह में बाह्य व अंतर की दृष्टि―जैसे कुत्ते को कोई लाठी मारे तो उसे यह पता नहीं कि मुझे मारने वाला मनुष्य है, वह तो लाठी को ही मुँह से चबाता है । इस लाठी ने मुझे हैरान किया, मैं इसे तोड़कर रहूँगा, साक्षात् मारने वाला जो पुरुष है यह मेरा बाधक है ऐसी दृष्टि कुत्ते के नहीं जगती, किंतु जो लाठी निमित्त है उस पर ही दृष्टि लगाता है कि इस लाठी ने ही मुझे दुःख दिया । वह लाठी को चबाता है, किंतु सिंह को कोई पुरुष लाठी मारे, तलवार मारे तो सिंह की ऐसी विशद दृष्टि है कि वह लाठी या तलवार को तो देखता ही नहीं, वह मारने वाले पुरुष पर ही सीधा प्रहार करता है । ज्ञानी और अज्ञानी जीव में ऐसा ही अंतर है ।

ज्ञानी और अज्ञानी जीव में अंतरंग और बहिरंग दृष्टि―ज्ञानी जीव तो सिंह के समान अपने बाधक तत्त्व में दृष्टि न डालकर सीधे रागादिक विकारभावों को बाधक समझता है । यद्यपि रागादिक विकारों के निमित्त कर्म का उदय है लेकिन वह उदय मुझसे अत्यंत भिन्न है । उनका कोई गुण या परिणमन या असर इस मुझ आत्मा में नहीं होता । ऐसा ही निमित्तनैमित्तिक मेल है कि कर्मों का उदय हो तो उसे निमित्तमात्र करके यह अशुद्ध परिणम सकने वाला जीव स्वयं की परिणति से रागादिक रूप परिणम जाता है । ज्ञानी जीव की यह दृष्टि है कि उसकी आत्मा का बाधक भ्रम रागद्वेषादि है, किंतु अज्ञानी जीव को यह पता नहीं है । कुछ सुन रखा है सो कर्मों को गाली देता है । ये 8 दुष्ट कर्म मेरे को सता रहे हैं । प्रभो ! इन दुष्ट कर्मों को निकाल दो अथवा जिन्होंने 8 कर्मों की चर्चा नहीं सुनी है वे इन चेतन अचेतन पदार्थों में अपना बाधक साधक मानकर इनके ही निग्रह और अनुग्रह में ही लगे रहते हैं ।

भेदविज्ञान की विशेषता से ज्ञानी जीव की निरास्रवता―बस इस विशेषता के कारण ज्ञानी जीव निरास्रव है और अज्ञानी जीव सास्रव है । दृष्टांत में इतने ऐब के कारण कुत्ते की उपमा कोई नहीं सुनना चाहता है, यद्यपि उसमें गुण अनेक हैं तथा सिंह की उपमा सब सुनना चाहते हैं, यद्यपि उसमें अवगुण अनेक है । यों भेदविज्ञान के प्रताप से यह ज्ञानी जीव रागादिक विकार भावों को नहीं अपनाता है और संसार साधक कर्मों का आस्रव नहीं करता ।

आत्मा का गुण है ज्ञान । यह ज्ञानगुण जब समर्थ विकास में होता है तब इस जीव के बंध नहीं होता । किंतु जब ज्ञानगुण जघन्य अवस्था में होता है तो वह ज्ञानगुण का विभिन्न, विचित्र परिणमन होता है और ज्ञानगुण का परिवर्तन ही कर्मबंध का कारण है । इस पर यह प्रश्न हुआ कि ज्ञानगुण का परिणमन परिवर्तन बंध का कारण कैसे है? इसके उत्तर में कहते हैं।


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