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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 200

From जैनकोष



एवं सम्माद्दिट्ठी अप्पाणं मुणदि जाणगसहावं ।

उदयं कम्मविवागं य मुयदि तच्चं वियाणंतो ।।201।।

विकार के त्याग का मूल यथार्थज्ञान―इस प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव अपने आपको ज्ञायक स्वभावी मानता है और यथार्थ तत्त्व को जानता हुआ उदय को अथवा कर्मविपाक को छोड़ देता है । अथवा ऐसा जान रहा है कि यह उदय मेरा स्वरूप नहीं है । यह तो कर्मों का विपाक है । ऐसा समझकर विकार का त्याग कर देता है । इससे पहिले सामान्य रूप से और विशेषरूप से यह बताया है कि रागभाव मेरा स्वरूप नहीं है । इस अज्ञानी जीव को सबसे अधिक किस बात का मोह है इसका विचार करें । कोई कहेगा कि सबसे अधिक मोह घर, धन वैभव का है, किंतु घर और धन वैभव का सबसे अधिक मोह नहीं है । उससे भी अधिक मोह परिवार में है । मोही जीव की कहानी बता रहे हैं । और परिवार में भी सबसे अधिक मोह नहीं है किंतु अपने शरीर में है । अपने शरीर पर कोई आफत आए और घर के लोगों पर कोई आफत आए, जैसे मान लो जान जाने का सवाल है सबका तो यह जीव अपनी जान बचायेगा । परिवार की जान जाने की उपेक्षा कर देगा । तब सबसे अधिक मोह हुआ अपने शरीर का, प्राणों का । किंतु शरीर और प्राणों से भी अधिक मोह होता है अपनी बात का । लोग बात के पीछे अपनी आत्महत्या तक भी कर डालते हैं । दोनो में झगड़ा, हठ, विवाद बात ही बात का है । बात माने रागद्वेषमोह विकार । सबसे अधिक मोह होता है रागादिकविकारों में ।

तत्त्वज्ञान का फल―जिसने रागादिक विकारों से न्यारा अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को जाना है ऐसा पुरुष कर्मों का शिकार नहीं होता । उसकी तो प्रतिसमय निर्जरा होती रहती है । इस सम्यग्दृष्टि जीव ने परस्वभावरूप जो भाव है अर्थात् विकार भाव, कर्मों के उदय के निमित्त से होने वाले जीव के विरुद्ध परिणमन उन सबसे अपने को पृथक करके टंकोत्कीर्णवत् एक ज्ञायक स्वभावरूप आत्मा के तत्त्व को जान लिया है । सो जब यह सम्यग्दृष्टि जीव केवल तत्त्व को जान रहा है तो जानने का फल तो यह है कि जो पर हो, परभाव हो, पराया हो, अहित हो, असार हो, न्यारा हो तो उससे मुख मोड़ लेवे और जो अपना हो, हित हो, सार हो, सुखद हो उसको ग्रहण कर लेवें । सो यह सम्यग्दृष्टि जीव इन सब परपदार्थों को और रागादिक परभावों को तो त्याग देता है और निजस्वभाव का उपादान करता है याने ग्रहण करता है । इस प्रकार स्व के ग्रहण करने से और पर के त्याग करने से निष्पन्न होने वाला जो निज आत्मा का वस्तुत्व है उसकी अपने उपयोग में सिद्धि करता है और कर्मों के उदय से उत्पन्न हुए समस्त भावों को त्याग देता है । इस कारण यह ज्ञानी पुरुष नियम से ज्ञान और वैराग्य से संपन्न होता है ।

ज्ञानी की होड़ में अज्ञानी की फिसाड़―ऐसी सम्यग्दृष्टि की विभूति को सुनकर सम्यग्दर्शन के महात्म्य को समझकर कोई यह कहने लगे कुछ थोड़ा सा सुन लेने के कारण कि यह मैं तो स्वयं सम्यग्दृष्टि हूँ, मेरा कभी भी बंध नहीं होता है । इस प्रकार उठाया है और फुलाया है मुख को जिसने, मुख की मुद्रा जिसने विचित्र बनायी है ऐसा पुरुष, जो अटपट आचरण करे तो करे अथवा ऐसा मोही रागी पुरुष किसी कारण से धर्म की धुन भी रखा करे, महाव्रत भी पाले, समिति में सावधान रहे, बड़ा ऊँचा तप किया करे तो भी यदि उसके आत्मा और अनात्मा का ज्ञान नहीं है तो वह पापमय है सम्यक्त्व से रीता है । यह अंतरंग की बात कही जा रही है । भैया ! कर्म शरीर की चेष्टा देखकर नहीं बंधते हैं, नहीं छूटते हैं किंतु आत्मीय योग को उपयोग का निमित्त पाकर बंधते हैं और छूटते हैं ।

बाह्यतप का क्लेश व अंतर में अज्ञान―यदि कोई पुरुष धर्मोपदेश से जैसा कि उसने समझ रखा है मुनि भी हो जाये, महाव्रत और समिति भी पाले, बड़ा दुर्धर तप करे, किंतु अंतर में यदि ज्ञायकस्वरूप भगवान का अनुभव न हो, जिस अनुभव के कारण रागादिक विकार और समस्त परपदार्थ अत्यंत भिन्न और हेय जाने जाते हैं ऐसा सम्यग्ज्ञान न हो तो वह अब भी पापमय है । मिथ्यात्व से बढ़कर कोई पाप नहीं है । जहाँ विपरीत आशय है, स्वयं के स्वरूप का कुछ भी परिचय नहीं है, बाह्य अर्थों पर अत्यंत झुकाव है, सर्व कुछ बाह्य जगत ही वह अपना सर्वस्व माने हुए है, ऐसा पुरुष अंतर में पापस्वरूप है ।

स्वरूपपरिचय के बिना सर्वत्र अंधता―श्रावक जन भी गृहस्थ के योग्य धर्म कार्य करके भी पूजन, भक्ति, स्वाध्याय, गुरु उपासना आदि अनेक कार्य करके भी यदि अंतर में अपने स्वरूप का पता नहीं पड़ सकता है, ज्ञानमात्र शुद्ध आत्मस्वरूप का अनुभव नहीं किया है तो वह अंतर में अब भी अंधा है, पापमय है । मोक्षमार्ग न मिलेगा । इस कारण यदि सुगति चाहिए, शांति चाहिए, कल्याण चाहिए तो सर्व प्रयत्न करके इस मोह को त्यागो । मोह के त्यागे बिना न शांति मिलेगी, न कर्म झड़ेंगे और पाया हुआ दुर्लभ मनुष्य जीवन बेकार चला जायेगा । भैया ! मोह करना बिल्कुल व्यर्थ की बात है । जगत में अनंत जीव हैं । कोई जीव किसी का कुटुंबी सदा साथी नहीं होता, फिर आज दो चार जीवों में अपनी ममता डालकर क्या यह अंधकार नहीं बना रहे हैं । और जिसमें ममता डाले हुए हो वे अब भी तो अत्यंत जुदा हैं । उनका तुममें अत्यंताभाव है । न उनसे कुछ आपमें आता है और न आपका कुछ उनमें जाता है । ऐसी व्यर्थ की ममता ही हमारे सर्व कल्याण में बाधक है । सर्वप्रथम कर्तव्य तो यह है कि मोह छूटे, समस्त बाह्य पदार्थों से मोह हटाना है, धन संपत्ति से मोह दूर हटाना है, घर महलों से मोह हटाना है, परिवार जनों से मोह हटाना है, शरीर से मोह हटाना है, अपनी बात अपने राग से मोह हटाना है और केवल शुद्ध ज्ञानमात्र अपने आपको अनुभव करना है ।

इस गाथा में सत्पथ के लिये सावधानी दी है कि स्व का अनुभव जगे बिना, सम्यक्त्व पाये बिना यह जीव बाह्य में दुर्धर धर्म के नाम पर, तप के नाम पर काय क्लेश भी कर करके विपरीत आशय के कारण अंतर में अब भी पापमय है । इस कारण भव्यजनो ! सर्व यत्न से आत्मानुभव की प्राप्ति करो । अब इसके बाद यह कथन करते हैं कि रागी जीव सम्यग्दृष्टि क्यों नहीं होता है?


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