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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 201-2

From जैनकोष



परमाणुमित्तयं पि हु रागादीणं तु विज्जदे जस्स ।

ण वि सो जाणदि अप्पाणयं तु सव्वागमधरो वि ।।202।।

अप्पाणमयाणंतो अणप्पयं चावि सो अयाणंतो ।

कह होदि सम्मदिट्ठी जीवाजीवौ अयाणंतो ।।203।।

राग की अपनायत में सम्यग्दृष्टित्व का अभाव―जिस जीव के परमाणुमात्र भी राग है रागादिक विकार का अंश मात्र भी है, वह समस्त आगमों का धारी होकर भी आत्मा को नहीं जानता है । यहाँ किस राग का निषेध किया जा रहा है? जिनकी श्रद्धा भी राग से रँगी है अर्थात् जो राग की कणिका मात्र को भी आत्मा का स्वरूप या हेतु जानते हैं, रागरहित शुद्धज्ञानस्वरूप का परिचय नहीं पाते हैं, ऐसे जीव जितने सर्व आगम को द्रव्यलिंगी मुनि भी ज्ञात कर सकते हैं इतने सब आगम धारण करके भी वे आत्मा को नहीं जानते हैं । और जब अपने आपके स्वरूप को नहीं जानते हैं तो अनात्मा को भी वे नहीं जानते हैं । जो जीव आत्मा और अनात्मा को नहीं जानता है अर्थात् जीव और अजीव को नहीं जानता है वह सम्यग्दृष्टि कैसे हो सकता है ?

वस्तुस्वरूप जाने बिना लौकिक यथार्थ ज्ञान की भी परमार्थत: असमीचीनता―इस टीका में पूज्य श्री अमृतचंद्र जी सूरि कहते हैं कि जिस जीव के रागादिक अज्ञानमय भावों का लेश भी सद्भाव है, वह श्रुतकेवली की तरह भी हो तो भी ज्ञान भाव का अभाव होने से वह आत्मा को नहीं जानता है । और जो आत्मा को नहीं जानता है वह अनात्मा को भी नहीं जानता है । यथार्थतया उसे किसी का बोध नहीं है । एक ज्ञानी सम्यग्दृष्टि पुरुष बाह्य पदार्थों को, जैसे कि हो तो रस्सी और जान ले साँप कुछ अंधेरे उजेले में तो उसे सम्यग्ज्ञान से रहित नहीं कहा जायेगा । और एक मिथ्यादृष्टि पुरुष खंभे को खंभा जान रहा, चौकी को चौकी जान रहा, जो कुछ सामने आता है वह ठीक-ठीक जान रहा है, और व्यवहार के अनुकूल भी जाने तो भी वह सम्यग्ज्ञानी नहीं हो पाता है । सम्यग्ज्ञानी पुरुष पुद᳭गलों को पुद्गलों की जाति में कुछ भी हो जाये किंतु उसे द्रव्य गुण पर्याय के संबंध में रंच भी शंका नही है । कारणविपर्यास स्वरूपविपर्यास व भेदाभेदविपर्यास उसके उपयोग में नहीं समा पाते हैं ।

दृश्यमान पदार्थ में सम्यग्दृष्टि का बोध―ज्ञानी ने जान भी लिया कि यह सांप है, किंतु वस्तुस्वरूप में भ्रम नहीं है । ये सब जो मूर्तिक नजर आते हैं वे पुद्गल पिंड हैं अनंत परमाणुओं के पिंड हैं, अनंत परमाणुवों की ये व्यंजन पर्यायें है और साँप हैं तो क्या, अन्य कुछ है तो क्या है तो वह दृश्यमान एक व्यंजन पर्याय जीव है तो उसमें जो गुण हैं उन गुणों का वहाँ विकृत परिणमन है, सर्व कुछ सम्यक् ज्ञान है, मगर उसके प्रति विपर्यासपन नहीं आ पाता है ऐसा शुद्ध बोध है ।

वस्तु के प्रायोजनिक ज्ञान से ज्ञानित्व पर दृष्टांत―जैसे कोई पुरुष ज्ञानी संत से कहे कि चलो जी मैसूर चलेंगे, वहाँ कृष्णसागर बड़ा अच्छा बना हुआ है, वहाँ अमुक अजायबघर ठीक है अथवा आगरा का ताजमहल और लाल किला प्रसिद्ध है चलो दिखा दें, तो वह कहता है कि मैंने सब कुछ देख लिया । अरे तुमने तो देखा नहीं और कहते हो कि देख लिया । हाँ देख लिया । वहाँ पुद्गल पिंड है, रूप, रस, गंध, स्पर्शमय है, वे सब पर हैं, उनसे मुझमें कोई बात नहीं आती है, भिन्न वस्तु है, उनसे मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है । वे अप्रयोजनीय हैं । इतनी ही तो बात है उनमें । सो वह कहता है कि हम देखने नहीं जायेंगे, जो कुछ देखना था देख चुके । इसी प्रकार स्व को स्व के रूप से और स्वातिरिक्त समस्त विश्व को, पदार्थों को अनात्मारूप से जिसने जान लिया, यही प्रायोजनिक ज्ञान है । जिसने जान लिया है उसको तो संतोष है कि मैं सबको जानता हूँ ।

आत्मत्व व अनात्मत्व के ज्ञान बिना सद्दृष्टित्व असंभव―श्री नेमिचंद जी सिद्धांत चक्रवर्ती ने द्रव्यसंग्रह में जो मंगलाचरण दिया उसमें प्रथम ही कहते हैं कि ‘‘जीवमजीवंदव्वं’’। जीव और अजीव को जिसने निर्दिष्ट किया, शुरू से ही ‘‘मुत्त ममुत्तं’’ नहीं कहा मूर्तिक अमूर्तिक में भी सब द्रव्य आ जाते हैं तो भी ऐसा न कहकर जीव अजीव का मर्म यह है कि अजीव से हटना और जीव में आना । जो प्रयोजन होता है उसके ही माफिक पुरुष प्रारंभ में ही वचन निकालता है । जिसने आत्मा को और अनात्मा को नहीं जाना तो समस्त मोक्षमार्ग के आधारभूत तो यही भेदविज्ञान है । आत्मतत्त्व और अनात्मतत्त्व को ही न जाना तो आगे बतायेंगे कि वह सम्यग्दृष्टि कैसे होगा? यह आत्मा है यह अनात्मा है ऐसा भेदपूर्वक ज्ञान तब होता है जब स्वरूप की सत्ता और पररूप की असत्ता के माध्यम से एक वस्तु का निश्चय किया जाता हो ।

अनेकांत की अनिवार्यता―भैया ! अनेकांत टाले भी नहीं टाला जा सकता । जो अनेकांत को मना करता है वह अनेकांत के प्रयोग से ही जबरदस्ती हठपूर्वक अनेकांत को मना करता है । कोई भी वस्तु हो या कोई सा भी सिद्धांत स्थापित किया जाये वह सिद्धांत है ऐसा कहने में ही यह बात आपतित होती है कि इससे भिन्न अन्य कुछ सिद्धांत नहीं हैं । इससे भिन्न सिद्धांत भी हो तो यह सिद्धांत यहाँ नहीं ठहर सकता । किसी भी पदार्थ को सिद्ध करने में उसके अन्य पदार्थों का नास्तित्व तो आ ही जाता है । इस तरह प्रारंभ में ही अस्तित्व की स्थिति में अनेकांत बसा हुआ है।

रागांध के सम्यग्दृष्टित्व का अभाव―अपने आत्मा के ज्ञानस्वरूप की सत्ता का निर्णय हो और समस्त पर की व परभाव की आत्मा में असत्ता है ऐसा निर्णय हो तो आत्मा और अनात्मा का सही परिज्ञान कहा जा सकता है । जो आत्मा अनात्मा को नहीं जानता है, जो रागादि परभावों को आत्मस्वरूप मानता है वह जीव और अजीव को भी नहीं जानता । वह तो रागरूप अजीवतत्त्व में आत्मत्व की प्रतीति रखता है । यद्यपि आत्मा को जीव और अनात्मा को अजीव कहते हैं तो भी यह पुनरुक्त नहीं होता । यहाँ आत्मा माना निज को और अनात्मा माना अनिज को । जो आत्मा अनात्मा को नहीं जानता उसे द्रव्य, गुण, पर्याय पिंडरूप जीवको और जीव के द्रव्य गुण पर्याय के पिंडरूप अजीव को नहीं जाना । और जो जीव अजीव को नहीं जानता है वह सम्यग्दृष्टि ही नहीं होता है । इस कारण रागी पुरुष के ज्ञान का अभाव होने से सम्यग्दृष्टि नहीं होता है ।

असंयतों व देशसंयतों के निरास्रवत्व की जिज्ञासा व प्रथम समाधान―यहाँ प्रश्न किया जा सकता है कि चौथे और पांचवे गुणस्थान वाले तीर्थंकर अथवा जो राजा राजकुमार, भरत आदि चक्रवर्ती, राम, पांडव आदि महापुरुष वे सब अपने जीवन में बहुत सा राग करते थे, घर में रहते थे, राज्य चलाते थे तो क्या वे सम्यग्दृष्टि न थे? यहाँ तो कहा जा रहा है कि जो राग का अंश भी रखता है वह सम्यदृष्टि नहीं है । भैया ! उत्तर इसके कई आयेंगे, जिसमें प्रथम उत्तर यह है कि मिथ्यादृष्टि की अपेक्षा इस सम्यग्दृष्टि को निरास्रव है तो यह 43 प्रकृतियों का बंध नहीं कर रहा है । जिसमें दो तो बंध के अयोग्य ही हैं । 41 प्रकृतियों का बंध नहीं होता है । यह सराग सम्यग्दृष्टि होता है क्योंकि चतुर्थ गुणस्थानवर्ती जीव के अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ जनित और मिथ्यात्व उदय जनित रागादिक नहीं होते हैं, जो पत्थर की रेखा आदि के समान होते हैं । ऐसा राग लेश भी हो तो वह सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता है ।

सम्यग्दृष्टि के निरास्रवत्व का द्वितीय समाधान―इस ग्रंथ में पंचम गुणस्थानवर्ती जीव के ऊपर के गुणस्थानवर्ती साधु संत वीतराग सम्यग्दृष्टि जीव को मुख्य रूप से ग्रहण किया गया है उन्हें लक्ष्य में लिया गया है और सराग सम्यग्दृष्टि पुरुष को गौणरूप से लक्ष्य में रखा है । इस ग्रंथ का स्वाध्याय करते समय यह ध्यान में रहना चाहिए कि कुंदकुंदाचार्यदेव मुख्य रूप से निर्ग्रंथ साधुओं के प्रति संबोध करके सब कुछ कह रहे हैं और जो उन्हें कहा जा रहा है वह सब गृहस्थ जनों में भी चूंकि एक ध्येय के हैं सो लागू होता है किंतु संबोधने में उपदेश में मुख्य लक्ष्य है निर्ग्रंथ साधु का । उनका मुख्यरूप से ग्रहण है और सराग सम्यग्दृष्टि जीव का गौणरूप से ग्रहण है । तब यह ध्यान में रखा जायेगा कि यह सब कुछ उन साधु संतों के लिए कहा जा रहा है कि परमाणु मात्र भी राग हो तो श्रुतकेवली की तरह भी हो जाये तो भी आत्मा और अनात्मा का ज्ञान न होने से वह सम्यग्दृष्टि न होगा ।

सम्यग्दृष्टि के निरास्रवत्व का तृतीय समाधान―तीसरी बात यह है कि सम्यग्दृष्टि पुरुष के रागरहित निजस्वरूप का सर्वथा निर्णय होता है । अपने स्वरूप को सम्यग्दृष्टि यों नहीं देख सकता कि हमारा रंच राग वाला आत्मा है । धर्मकार्यों में आवश्यक कामों में बड़ी सावधानी बर्तकर सब क्रियाएँ करके उन क्रियाओं को करते हुए में वह इतना विविक्त रहता है, जानता है, श्रद्धान करता है कि एक जाननमात्र वृत्ति को छोड़कर अन्य सब ये वृत्तियाँ मेरा स्वरूप नहीं हैं । तो श्रद्धा में रंचमात्र भी जिसके राग बस रहा हो, यह मेरा ही है, वह जीव बहुत शास्त्रज्ञाता हो जाने पर भी सम्यग्दृष्टि नहीं होता है ।

अध्रुव की प्रीति तजने का उपदेश―अनादिकाल से नित्य मत्त हुए कषायों में व्यग्र हुये संसारी प्राणी, ये रागी जीव प्रत्येक पद में, स्थान में, जन्म-जन्म में ये सोते ही रह आये हैं । वे जिस पद में सोते आए हैं उस पद को तुम अपद समझो अर्थात् हे भव्य जीव ! वह तुम्हारे रमने का स्थान नहीं है । हे अज्ञान के अंधजनों ! अब अपने अज्ञान को छोड़ो और वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञान करो । उस पद को छोड़ो और इस निज पद में आवो । जहाँ पर यह चैतन्यधातु यह ज्ञानस्वरूप सिद्ध है, शुद्ध है, सबसे न्यारा है, स्वच्छ है, यह आत्मा का ज्ञानस्वभाव अपने ही लक्षण रस के भार को भरता है, स्थायीपने को प्राप्त हो रहा है । इन अस्थायी चीजों में रुचि मत करो । जो चीज नष्ट हो जाने वाली है उनमें अंतरंग से रुचि करोगे तो उनके वियोग के काल में अत्यंत विषाद होगा । सबसे निराले अपने ज्ञानस्वरूप को समझते रहो तो न संयोग में क्षोभ होगा और न वियोग में क्षोभ होगा । अध्रुव को छोड़कर इस ध्रुव ज्ञानस्वभाव में रुचि करो ।

ध्रुव में परमार्थता की दृष्टि―भैया ! बड़े-बड़े संतों ने कौनसा वह विलक्षण कार्य किया ? जिसके प्रसाद से वे भगवंत हुए । पर में रुचि तो कुछ किया ही नहीं । करने की बात तो जाने दो, बाहर के समागमों का भी जिसने त्याग कर दिया ऐसे ज्ञानीसंत महंतों ने कुछ अपने में ही विलक्षण सुलक्षण स्वलक्षणरूप कार्य किया, जिसके प्रसाद से वे निर्मल स्वच्छ आनंदमय हुए । अपने आपके भावों से ही सद्गति मिलती है और अपने आपके ही भावों से दुर्गति मिलती है । हमारा भवितव्य तो हमारे परिणामों पर ही निर्भर है । मैं अपने परिणामों में बाह्यवृत्ति की हठ करूँ तो उसका फल अच्छा नहीं होता है । यदि मैं अपने परिणामों में अंतरवृत्ति की हठ रखूँ तो चूंकि यह अंतरात्मा मेरे स्वाधीन है, अत: इसकी वृत्ति में आनंद है, शांति है, अध्रुव की प्रीति तजकर एक ध्रुव आनंद ज्ञायकस्वभाव की रुचि करो ।

प्रभु की आंतरिक भक्ति―मंदिर में जिनमूर्ति के समक्ष हमारा यह भाव बने कि हे प्रभो ! तुम्हारी पर्याय और स्वभाव एक सरस हो गया है और मेरा परिणमन और स्वभाव एक रस नहीं हुआ है । यही हम में और प्रभु आपमें अंतर है । पर प्रभु अपने ज्ञानस्वभाव के साथ पर्याय में भी एक रस हो गया है । हम स्वभाव से तो ज्ञानरूप हैं पर पर्याय में परिणमन में अर्थात् जो मुझ पर बीत रही है वह विरुद्ध बात बीत रही है । स्वभावत: सारा विश्व इसके ज्ञान में अनायास आता रहे पर हम चल चलकर, प्रवृत्ति कर करके जानना चाहते हैं, फिर भी हमें जानकारी नहीं हो पाती है । हमारा परिणमन स्वभाव से ऐसा विपरीत चला हुआ है । हम आनंदमय हैं किंतु क्या गुजर रहा है हम पर कि क्षोभ के बिना कुछ समय भी नहीं रह पाते हैं । सांसारिक सुख मिलता है तो वहाँ वह अपना क्षोभ मचाया करता है और कोई क्लेश हुआ करता है तो वहाँ क्षोभ तो होता ही है । कहाँ तो मेरा है आनंदस्वभाव और कहां विरुद्ध चलना पड़ता है । प्रभो ! आप में और मुझमें यही अंतर है । आप अंतर में व बाह्य में भी समरस हो, हम अंतर में तो शुद्ध हैं और बाह्य में परिणमन में विविधरूप हो रहे हैं । यह विविधता मेरी मिटे ।

जीवलोक की ब्रह्मरूपता―कुछ लोग कहते हैं कि यह सृष्टि कैसे बनी? जब ब्रह्मा ने अपने अंतर में विकल्प किया कि एकोहं बहु स्याम् । मैं एक हूँ, बहुत बन जाऊँ―बस इतना सोचने भर का ही काम था कि यह सर्व सृष्टि बन गई । इसका प्रयोजन यथार्थ में यह लेना कि जगत में जितने भी पदार्थ हैं वे सब ब्रह्मरूप हैं । ब्रह्म कहते हैं उसे जो अपने गुणों से बढ़ते रहने का स्वभाव रखे स्वगुणै: वृंह्णाति इति ब्रह्म । सो इस चेतन को देखो कि यह अपने गुणों को बढ़ाने का स्वभाव रखता है । सर्वज्ञ बनने में श्रम नहीं करना पड़ता है । सर्वज्ञता तो इसके स्वभाव की सहज कला है । यह ज्ञानस्वभाव सर्वज्ञता के लिए उद्यत है किंतु इसके आवरण जो पड़ा है उस आवरण के कारण सर्वज्ञता प्रकट नहीं होती है । वह आवरण क्या है? विषय और कषाय के परिणाम । यह विषय कषायों का परिणमन ही सर्वज्ञता का आवरण है । ज्ञानबल से अब विषयकषाय परिणाम सर्वथा निर्मूल हो जाये तब इसकी सर्वज्ञता में अंतर्मुहूर्त से अधिक विलंब नहीं लग सकता । तो यह अपने गुणों से बढ़ते रहने में स्वभाव वाला है, सर्व चेतन ब्रह्म है ।

ब्रह्म की एकरूपता―ये ब्रह्म यद्यपि अनंत हैं तो भी जातिदृष्टि से लक्षणदृष्टि से स्वभावदृष्टि से सब एक हैं । जैसे एक घड़े का पानी 10 गिलासों में अलग-अलग भर दिया तो पानीरूप पिंड 10 जगह है पर ठंडेपन पर जब दृष्टि देंगे कि यह ठंडापन स्वरूप है तो उस स्वरूप को 10 जगह तो कहें क्या वह तो पिंडरूप को भी नजर नहीं करने देता । इसी प्रकार यद्यपि ये जीव सब अनंत हैं किंतु इन जीवों में जो स्वभाव लक्षण अनादि प्रसिद्ध है उस केवल स्वभाव पर दृष्टि दें तो जीव की व्यक्तियां ही नजर नहीं आती । केवल एक चैतन्यस्वरूप दृष्ट होता है । यों ब्रह्म एक हो तो स्वभावदृष्टि से तो एक देखा, किंतु वस्तुत्व गुण के प्रताप से जो अर्थक्रिया चलती थी उसको एक साथ लपेटे रहा । तब यह बात प्रसिद्ध हुई है कि एक ब्रह्म समस्त सृष्टि करता है । देखो भैया ! जरा समन्वयात्मक दृष्टि से निहारिये―सृष्टि होने का जो सिस्टम था वह यह था ना, कि एकोहं बहु स्याम । प्रत्येक जीव अपने आपमें एकत्वविभक्त है, सर्व से न्यारा और अपने आपके स्वरूप में तन्मय है । ऐसा अद्वैत होकर भी जब इसने अपने आप में बहुरूप की श्रद्धा की तो यह सृष्टि चलने

लगी ।

स्वानुभूति का स्रोत―इस जीव की अनुभूति स्वलक्षण के अनुभव से होती है । पदार्थों के पहिचानने की चार पद्धतियां हैं―द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव । जैसे इस चश्माघर को समझना है तो द्रव्य तो यह है । क्षेत्र से इतना लंबा चौड़ा है, काल से इतना पुराना है और भाव से जो इसमें गुण हों उन गुणोंरूप हैं । जीवद्रव्य को भी पहिचानो । यह जीव द्रव्य गुणपर्याय पिंडरूप है । क्षेत्र से असंख्यातप्रदेशी है । काल से जिस-जिस परिणति से परिणत है उस-उस रूप है । और भाव से ज्ञान दर्शन आदिक अनंत शक्तिरूप है । पर जिस एक अनुभूति स्वभाव से जीव का परिचय हुआ है उसका इन चारों में ही जिकर नहीं आया और जिस दृष्टि से स्वानुभूति होती है वह स्वानुभूति का स्रोत न द्रव्य में मिला, न क्षेत्र में मिला, न काल में मिला, न भाव में मिला ।

स्वानुभूति की भावविकल्प से अगम्यता―गुणपर्याय का पिंड आत्मा है, ऐसे दृष्टि की स्थिति में स्वानुभव नहीं जगता । पर परिचय तो किया जाता है कुछ, असंख्यातप्रदेशी इतना लंबा चौड़ा आत्मा है, ऐसी दृष्टि में भी स्वानुभव नहीं जगता किंतु स्वानुभव जगने के लिए जो आत्मा के बारे में प्रथम ज्ञान चाहिए वह होता रहता है । काल की दृष्टि में भी स्वानुभूति नहीं जगती है । अब रह गया भाव, यह भाव दो प्रकार से देखा जाता है, एक भेदरूप से और दूसरा अभेद रूप से । भेदरूप से देखने पर तो अनंत गुण ध्यान में आते हैं । इस आत्मा में ज्ञानगुण दर्शनगुण चारित्रगुण आदिक हैं । सो ऐसे गुणों को देखते जाओ, वहाँ पर भी विकल्प हैं, स्वानुभूति नहीं होती है ।

स्वानुभूति का स्रोत अभेदस्वभावप्रतिभास―किंतु जो एक अभेदभाव है, अभेदस्वरूप है, चैतन्यस्वभाव है जो कि समस्त परभावों से भिन्न है और सर्व ओर से पूर्ण है, पूर्ण था, पूर्ण है, पूर्ण रहेगा । और जिस पूर्ण से पूर्ण ही प्रकट होता है जिसमें जो पर्याय प्रकट होती है वह उसमें पूर्ण है । परिणमन कुछ भी अधूरा नहीं होता है । कोई परिणमन ऐसा उथल पुथल मचाये कि मैं तो अधूरा ही बन पाया हूँ, आधा अगले समय में बनूँगा ऐसा नहीं हुआ करता है । इस पूर्ण से पूर्ण ही प्रकट होता है, और पूर्ण प्रकट होने पर प्रथम परिणमन पूर्ण विलीन हो जाता है । पूर्ण के विलीन होने पर ही यह पूर्ण, पूर्ण ही बना रहता है । ऐसा यह चारों ओर से पूर्ण चित् स्वभाव है, अभेद भाव है । जो आदि, अंत, मध्य कर रहित है सो राग से भी हटे और अपूर्ण स्वभाव परिणमन से भी हटे, मति ज्ञानादिक परिणमन से भी हटे और चूँकि परिणति सब अध्रुव है, स्वभाव परिणमन भी प्रतिक्षण पूर्ण-पूर्ण प्रकट होता रहता है । वह भी मेरा स्वभाव नहीं है, उनसे भी हटकर जब अंतर में देखा कुछ तो एक चैतन्यस्वभाव दृष्ट हुआ । किंतु इस चित्स्वभाव के प्रति भी यह मैं इस एक स्वभावरूप हूँ । ऐसे एक का भी संकल्प कर लेता है तब तक भी स्वभाव नहीं होता । उस संकल्प-विकल्प को भी छोड़कर अभेद प्रतिभास हो तब स्वानुभव होता है ।

अभेद स्वाद का एक दृष्टांत―जैसे कोई बढ़िया भोजन बनाने के बाद उस भोजन को एक चित्त होकर खाता है उस समय उस भोजन की भी चर्चा, कथन, चिंता न आना चाहिए, नहीं तो उस भोजन के सुख में अतिशय नहीं होता । हलुवा खाते जाओ और उसके संबंध में यह विचार करते जाओ कि इसमें अच्छा घी पड़ा है, शक्कर पड़ी है तो इस विकल्प से वह जो एकरस होकर खाने का सुख भोगा जाता है वह स्थिति तो नहीं आ पाती है । यह एक लौकिकता की बात कही जा रही है । इस चैतन्यस्वभाव के अनुभव समय में भी ऐसी ही बात है कि इस चैतन्यस्वभाव को एक अलौकिक ज्ञेय बनाकर लो यह है, यह एक ही सार है, इस तरह की चिंता न रखें तब तक भी रंच अनुभव नहीं होता है । इस एकपने के संकल्प विकल्प का भी त्याग करें तो केवल अनुभवनमात्र स्थिति होती है वह स्वानुभव की स्थिति है । देखो इसमें जो आश्रय रहा, अवलंबन रहा, विषय रहा, ज्ञेय हुआ, वह एक स्थायी भाव है ।

स्वरसनिर्भर स्वपद की दृष्टि के लिये आदेश―हे जगत के प्राणियों जिस पद में अनंत काल से अब तक रमते चले आए हो वह तुम्हारा पद नहीं है । चेतो, समझो और देखो―इस नय की गली से चलकर इस अपने अंत: परमात्मत्व के पद में आओ । यहाँ ही उस चैतन्यधातु का दर्शन होगा जो स्वत: सिद्ध है शुद्ध है अर्थात् समस्त परद्रव्यों से विविक्त है । और अपने आपमें उत्पन्न हुए औपाधिक भावों से भी विविक्त है ऐसा शुद्ध ध्रुव यह चैतन्य धातु अपने रस के भार से स्थायी भाव को प्राप्त होता है ।

ध्रुवस्वभावावलंबन की कला का प्रताप―यह निर्जरा का प्रकरण है । कौनसी कला है जिस कला के निमित्त से भव-भव के बाँधे हुए कर्म क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं । वह कला एक ही है और वह है निजी स्थायी जाननस्वभाव का अवलंबन, इस एक काम करने में अन्य परपदार्थों में कर्मों में कितने ही काम स्वयमेव होते रहते हैं, बहुत लंबी स्थिति वाली प्रकृतियाँ अपने भावों की स्थिति में संक्रांत हो जाती हैं, इसी प्रकार अधिक दूर लंबी डिग्रियों को अनुभागों को थोड़े अनुभाग के वर्ग में प्राप्त हो जाता है और स्वयमेव फिर वह बिना फल दिए अथवा निष्फलवत फल दिए निर्जीर्ण हो जाता है । कितने भवों के? अनंत भवों के भी ।

स्वभावाश्रय कला से अनंतभवकर्मबद्धक्षय―यहाँ शंका हो सकती है कि अनंत भवों के बाँधे हुए कर्म अब कहा हैं इस समय । तो इसका समाधान यह है कि अनंत कई प्रकार के होते हैं, सर्वावधि ज्ञान जितनी लंबी संख्या को नहीं जान सकता उसके भी अनंत कहते हैं । अवधिज्ञान का उत्कृष्ट विषय असंख्यात है । यहाँ वह अनंत नहीं लेना कि जिसका अंत ही न हो किंतु अवधिज्ञान के द्वारा अगम्य अनंत भवों के बांधे हुए कर्म खिर जाते हैं । इतने अनंत तो कोई लाख करोड़ वर्ष तक निगोद में रहे तो उसमें ही हो जाते हैं । वहाँ के बँधे कर्म भी तो अनेक इस समय भी हैं । तो इतने भी कर्म जिस कला के प्रसाद से क्षणभर में ध्वस्त हो जाते हैं वह कला है स्वभाव आश्रय की कला ।

निज चैतन्यधातु की स्थायिता―हे मुमुक्षु जीवों ! अनादिकाल से जिस पद में रमते चले आये हो उस पदकों अपना पद न समझकर वहाँ से हटकर इस निज पद में आओ जिस पद में यह चैतन्य धातु स्थायीपने में विराजता है । जैसे शब्द का मूल धातु शब्द का कारण है और इससे कितने ही शब्द निकलते जाओ । इस प्रकार यह चैतन्यस्वभाव उस वर्ष की तरह है । कितने ही शब्द निकालते जाओ, वह मूल में एक ही रूप है । अथवा सोने चाँदी आदि की जो धातुयें हैं उनके कितने ही गहने बनाते चले जाओ, उन सब गहनों में उस धातु ने अपना धातुत्व नही छोड़ा । स्वर्ण के कितने ही गहने बनाए जायें पर स्वर्णत्व नहीं छूटता । ऐसा यह निज पद है । ऐसी निज पद की सामर्थ्य को सुनकर अब जिज्ञासु शिष्य प्रश्न करता है कि वह पद क्या है? इसके समाधान में आचार्यदेव कहते हैं―


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