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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 209

From जैनकोष



छिज्जदु वा भिज्जदु वा णिज्जदु वा अहव जादु विप्पलयं ।

जम्हा तम्हा गच्छदु तह वि दु ण परिग्गहो मज्झ ।।209।।

देहादिक परद्रव्य के विनाश से आत्मा के विनाश का अभाव―चाहे परपदार्थ छिद जाओ, चाहे भिद जाओ, कहीं जाओ, वियोग को प्राप्त हो फिर भी कोई पदार्थ मेरा परिग्रह नहीं है । शरीर जीर्ण होता है तो शरीर में जीर्ण होता है, मैं जीर्ण नहीं होता हूँ । जैसे वस्त्र यदि फटता है तो वस्त्र ही फटा, मैं फटा नहीं हो गया । वस्त्र पुराना होता है तो वस्त्र ही पुराना हुआ, मैं पुराना नहीं हुआ । वस्त्र नष्ट होता है तो मैं नष्ट नहीं हुआ, इसी प्रकार अन्य-अन्य पदार्थ कुछ भी जीर्ण हो जायें, नष्ट हो जायें तो उससे मैं जीर्ण और नष्ट नहीं होता । ज्ञानी पुरुष को बुढ़ापा आ जाये और उस वृद्धावस्था में शरीर शिथिल हो जाये तो शरीर के शिथिल हो जाने पर भी इस ज्ञानी पुरुष के ज्ञान जागृत रहता है । उसमें अंतर नहीं आता है । और ऐसी शिथिल अवस्था में भी उसके हाथ पैर नहीं चल रहे, अब बैठा भी नहीं जाता, वहाँ पर भी ज्ञानी पुरुष अपने को अशक्त, बूढ़ा, बेकाम अनुभव नहीं करता । वह जानता है कि नहीं हाथ पैर हिलते, न हिलें, पर वह अपने आत्मस्वरूप को ज्ञानमात्र जानकर प्रसन्न रहता है ।

यथार्थज्ञान की संकटमोचकता―भैया ! संकट जगत में कुछ नहीं है । केवल विकल्प ही संकट है, कोई गुजर जाये, किसी इष्ट पुरुष का वियोग हो जाये, और होगा वियोग नियम से । ऐसा कोई अनोखा नहीं है कि जिसके माँ बाप स्त्री पुरुष सदा रहेंगे । वियोग अवश्य सदा होगा । और वियोग के समय में दुःख होगा । जिसका संयोग हुआ उसका वियोग नियम से होगा, चाहे खुद पहिले गुजर जाये, चाहे माँ बाप आदि पहिले गुजर जायें, वियोग अवश्य होता है । वियोग होता है तो हो, वे सब परपदार्थ हैं, यदि मूढ़ बुद्धि बस रही है, जगत के अन्य जीवों में से दो चार जीवों को छांट लिया कि ये मेरे हैं तो उसके फल में उसे दुःख अवश्य होता है । मुझे दुःखी करने वाला कोई नहीं है, सो छिदो, भिदो, कोई कहीं ले जाओ, अथवा नाश को प्राप्त हो, कहीं जाओ तो भी मैं परपदार्थों को ग्रहण नहीं करता । मैं सदा अपने आपके रूप में रहता हूँ, अपनी शक्ति में रहा करता हूँ जिस कारण परद्रव्य मेरे स्व नहीं हैं । तो मैं परद्रव्यों का स्वामी नहीं हूँ ।

शांति का उपाय स्वानुभव―भैया ! जिसने स्वानुभव नहीं किया उस मनुष्य ने जीवन में कुछ नहीं किया । उस मनुष्य में पशु पक्षी से कोई विशेषता नहीं है । क्योंकि जन्ममरण बराबर ही चल रहे है । मनुष्य की विशेषता तो स्वानुभव के जगने में है । जिस भव में स्वानुभव हो वह भव सफल है । स्वानुभव तब हो सकता है जब सबसे निराला अपने को निरखें । अपने को अन्य वस्तुओं में तन्मय देखें और स्वानुभव की आशा करें तो यह नहीं हो सकता है । मुक्ति चाहिए, अनंत आनंद चाहिए तो उस अनंत आनंद का उपाय यह है कि अपने को सबसे न्यारा अपने स्वरूप मात्र देखें । परद्रव्य ही परद्रव्य का स्व है और स्वामी है । मेरा मैं ही स्व हूँ और मेरा मैं ही स्वामी हूँ । मैं इस प्रकार जानूं ।

शुद्धात्मभावना―देखिए धर्म के संबंध में पद के अनुसार अनेक तरह के वर्णन होते हैं । गृहस्थ धर्म में गृहस्थ को कैसे चलना चाहिए? उनके व्यवहार का वर्णन होता है । कैसा परिवार से व्यवहार रखें, कैसे अर्थ व्यवस्था करें, कैसे जनता से संबंध रखें, यही गृहस्थ का धर्म है । और जब मंदिर में आते हैं और प्रभु के समक्ष दर्शन, गुणगान करते हैं उस समय केवल आत्मा के धर्म की बातें होनी चाहिए । वहाँ व्यवहार धर्म, गृहस्थ धर्म, जनता की बातें, परोपकार के अभिप्राय ये सब वहाँ नहीं होना है । वहाँ तो जैसा चैतन्यस्वरूप प्रभु का है वैसा अपने आपको निरखो । और आत्मा के देखने में जैसी अपनी वृत्ति जगे वैसा अभिप्राय बनावो । हे प्रभो ! जैसे आप स्वयं हैं, एकाकी हैं, अपने स्वरूपमात्र हैं ऐसा ही मैं स्वयं हूँ, एकाकी हूं, अपने स्वरूपमात्र हूँ । मुझमें और आपमें परिणमन का जरूर अंतर है पर स्वभावदृष्टि से देखता हूँ तो जो द्रव्य आप हैं वही द्रव्य मैं हूँ । इस तरह अपने आत्मा को प्रभु के स्वरूप के समान निरखते जायें ।

मेरा सर्वस्व मुझसे बाहर नहीं―भैया ! अपने को केवल पवित्र निरखना है कि जहाँ केवल ही मैं दिखूं । मेरे उपयोग में कोई दूसरी चीज न आए । ऐसी दृष्टि बनाने का प्रयत्न करना होता है और यह ही उत्कृष्ट धर्म का धारण करना कहलाता है । यहाँ ज्ञानी जीव सोच रहा है कि मेरा कौन मालिक है? मेरा मैं ही स्वामी हूँ, मैं किसी अन्य पदार्थ का कुछ नहीं कर सकता हूँ । मेरे प्रदेशों से बाहर मेरी गति ही नहीं है । मैं किसी अन्य द्रव्य को छू भी नहीं सकता हूँ । मेरे एक क्षेत्रावगाह में जो-जो भी पदार्थ पड़े हुए हैं उन पदार्थों को छू भी नहीं रहा हूं । मैं केवल अपने स्वरूपमात्र हूँ । मैं किसी अन्य का कुछ न करता हूँ और न भोक्ता हूँ । जैसे मोटे रूप से समझ लो कि पंचेंद्रिय के भोग भोगे तो यह बतलाओ कि भोगों का तुमने क्या बिगाड़ किया? वे जीव पुद्गल हैं, वे किसी भी अवस्था में आ गए, आ गए, वहाँ कुछ बिगाड़ नहीं हुआ । बिगाड़ तो इस जीव का हो गया । तो इस जीव ने भोग क्या भोगा, यह जीव खुद भुग गया । बरबाद जीव ही होता है भोग नहीं बरबाद होता है ।

ज्ञानी की विविक्तता―भैया ! भोगों का विकल्प करके अपने आपको यह जीव भोगता रहता है । मैं किसी भी परपदार्थ का भोक्ता नहीं हूँ । तब मैं सबसे अत्यंत निराला ही हुआ ना । ऐसा सबसे विविक्त केवल चैतन्यमात्र जाननस्वरूप अपने आपकी दृष्टि में यह जीव रहे तब इसको स्वानुभव प्रकट होता है । यही तो बड़ा संकट है जीव पर कि अपने आपके वैभव को तो यह निरख नहीं सकता है और बाह्य अनेक वैभवों को यह निरखा करता है । किंतु ज्ञानी जीव स्पष्ट यह देख रहा है, समझ रहा है कि मैं न किसी का स्वामी हूँ, न कर्ता हूँ, न भोक्ता हूँ, न अधिकारी हूं, न कराने वाला हूँ । जो कुछ हूँ अपने आपमें हूँ, और जो कुछ कर पाता हूँ अपने आपमें ही कर पाता हूं । इस प्रकार से यह ज्ञानी जीव समस्त परिग्रहों का त्याग कर देता है ।

अंतरंग त्याग―जैसे मरते समय कोई मनुष्य शिथिल होने के कारण कपड़ों को अलग नहीं हटा सकता, खाट को अलग नहीं हटा सकता और अपने आपमें ही अपने को सबसे न्यारा जानकर यह संकल्प कर लेता है कि मेरा कहीं कुछ नहीं है, मेरा मात्र मैं ही हूँ, उसने अंतरंग में सबको त्याग दिया । आपने चरित्र में पड़ा होगा कि जब राजा मधु संग्राम में युद्ध कर रहे थे, उसे युद्ध करते हुए में वैराग्य आ गया । इतना अवसर न मिला कि वह हाथी से उतरे और कपड़ों को त्यागे और साधु व्रत अंगीकार करे । तो वहीं हाथी पर चढ़े ही सकल संन्यास का संकल्प कर लेता है और परमसमता भाव में आ जाता है और वहीं समाधि ग्रहण कर लेता है ।

विभाव के नोकर्म का परिहार―सो भैया ! त्याग तो असली ज्ञान से हुआ करता है, बाहरी त्याग को परमार्थत: त्याग नहीं कहते हैं पर बाहरी त्याग हमारे अंतरंग त्याग का साधक है क्योंकि हमारे विकल्पों का आश्रय है बाहरी पदार्थ । पदार्थ छोड़ा तो राग करने का सहारा नहीं रहा, इसलिए राग मिट जायेगा । ऐसा सहकारी कारण है बाहरी त्याग । पर त्याग नाम तो अंतरंग में सर्व परभावों से उपेक्षा करने का नाम है । एक ज्ञानमय आत्मस्वभाव को ग्रहण करो, समस्त परपदार्थों को त्याग करना रूप यही है वास्तविक त्याग । गृहस्थजनों को 24 घंटे में 5, 7, 10 मिनट कभी समस्त परपदार्थों के त्याग की भावना अवश्य बनाना चाहिए । और बाकी जो तेईस, पौने चौबीस घंटे का समय व्यतीत होगा उसमें निराकुलता रहेगी । संकट और कुछ नहीं हैं, केवल मानने के संकट हैं । जहाँ मानना छोड़ा वहाँ संकट छूट गया । तो लो संकटों से मुक्त ज्ञानमात्र अपने स्वभाव को ग्रहण करने का नाम ही परवस्तुओं का त्याग करना है । सो यह सारा परिग्रह स्व और पर के अविवेक का कारण है । इसको यह जीव त्यागता है और शेष बचा हुआ जो कुछ रागादिक अज्ञानभाव है उसे छोड़ने का साहस करके, बार-बार फिर अंतरंग विकल्प परिग्रह को दूर करने के लिए यह तैयार होता है । बाहरी परिग्रह तो छोड़ दिया और अंतर में भी परिग्रह के त्याग का अभाव हो गया । अब बचा हुआ जो कुछ रागभाव है उसे भी दूर करने का यह ज्ञानी जीव यत्न करता है । हम आप सब लोगों के करने के लिए काम यह है कि अज्ञान का त्याग करें और ज्ञान का आदर करें ।


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