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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 210

From जैनकोष



अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो णाणी य णेच्छदे धम्मं ।

अपरिग्गहो दु धम्मस्स जाणगो तेण सो होदि ।।210।।

ज्ञानी के इच्छा का अभाव―जो इच्छारहित है उसे अपरिग्रही कहा गया है । वास्तव में इच्छा का नाम ही परिग्रह है । आत्मा से क्या चिपटा हुआ है धन वैभव? वह तो अत्यंत दूर है । शरीर भी आत्मा के स्वरूप से अलग है, प्रदेशों के क्षेत्र से अलग है । तो आत्मा को परिग्रही नहीं कहा जा सकता । इच्छा को ही परिग्रह कहते हैं । ज्ञानी जीव किसी भी प्रकार की इच्छा नहीं रखता है । इच्छा में चार चीजें आती हैं―पुण्य, पाप, खाना, पीना । पुण्य-पाप में तो सब भाव आ गए और खाना-पीना लोकव्यवहार में मुख्य है । सो खाना-पीना की बात आ गई । इन सबमें ज्ञानी के इच्छा का अभाव है ।

पुण्य का विवरण―ज्ञानी जीव पुण्य के संबंध में यह जानता है कि पुण्य 2 प्रकार के होते हैं । एक जीव पुण्य और एक अजीव पुण्य । जीव पुण्य तो जीव का शुभभाव है और अजीव पुण्य पुद्गल कार्माण वर्गणाओं में जो पुण्य कर्म हैं वह है । ये दोनों प्रकार के भाव मेरे स्वरूप से पृथक् हैं । कार्माण वर्गणाओं में जो पुण्यकर्म है वह तो प्रकट अजीव हैं, पौद्गलिक हैं और विकार में जो पुण्य भाव है वह भी क्षणिक है, पर्याय है, औपाधिक है, आत्मा के स्वरूप से विपरीत है । जैसे पूजा, भक्ति, दान, पुण्य, परोपकार, सेवा ये सभी पुण्यभाव कहलाते हैं । पर परमार्थ दृष्टि से देखा जाये तो ये जीव के स्वरूप नहीं हैं । यदि ये जीव के स्वरूप होते तो सिद्ध में भी पाये जाते । पर सिद्ध महाराज में तो यहाँ कोई प्रवृत्ति नहीं है । जो सिद्ध महाराज में पाया जाये वह तो है जीव का स्वरूप और जो वहाँ न पाया जावे वह जीव का स्वरूप नहीं है । इस कारण जीव पुण्यकर्म को भी नहीं चाहता ।

ज्ञानी पुण्य का अपरिग्रही―ज्ञानी जीव के जब तक राग शेष है तब तक पुण्य बनता है । पुण्य बनेगा, पर पुण्य को वह चाहता नहीं है । चाहता है वह ज्ञानभाव को । जिस पर दृष्टि रहे, जिसका आलंबन करे, आश्रय रहे उसका चाहना कहलाता है । तो जब पुण्य का भी परिग्रह नहीं रहा तो यह पुण्य का अपरिग्रही कहलाया । यह जीव पुण्य का ज्ञायक होता है पर पुण्य का यह परिग्रही नहीं होता, रागी नहीं होता । इच्छा का नाम परिग्रह है । जिसके इच्छा नहीं है उसको परिग्रह नहीं कहा जा सकता । एक चक्रवर्ती 6 खंड की विभूति वाला, जो हो सम्यग्दृष्टि, तो वह विभूति में इच्छा नहीं रखता । विभूति है पर इच्छा नहीं है । जो इच्छा रखे वह दीन है और जो इच्छा न रखे वह अमीर है । आत्मा इच्छा से ही कुंठित बनता है । इच्छा जिसके नहीं है उसे परिग्रही नहीं कहा जा सकता ।

इच्छा की अज्ञानमयता―इच्छा अज्ञानमय भाव है । अज्ञानमय भाव ज्ञानी जीव के नहीं होता । ज्ञानी के ज्ञानमय ही भाव होता है । जब ज्ञानी के अज्ञानमय भाव नहीं रहा और अज्ञानमय भाव की इच्छा न रही तो वह पुण्य को भी नही चाहता । तारीफ तो तब है जब पुण्य बने और पाप चढ़े ना । पुण्य के चाहने से पुण्य बनने को नहीं है, कोई भगवान की भक्ति इस दृष्टि को लेकर करे कि हे प्रभो ! मेरे खूब पुण्य बने, ऐसी आशा से पूजा किया तो एक रत्ती भी पुण्य न बंधेगा । और यदि कोई एक चित्स्वरूप के अनुरागवश भगवान के गुण रुचते हैं इसलिए भगवान के गुणों पर मुग्ध है और गान करता है, पुण्य का विकल्प नहीं करता है उसके पुण्य बनता है । अनुराग इच्छा है ।

ज्ञानी की निर्मल दृष्टि―कदाचित अनुराग ज्ञानी के होता है, पर वह अनुराग से अनुराग नहीं करता । ऐसा अनुराग मेरे सदाकाल रहे ऐसा भाव ज्ञानी के नहीं होता । वह तो पूजा कर चुकने के बाद अपना भाव स्पष्ट करता है कि हे प्रभो ! आपके चरणों में मेरा मस्तक तब तक रहे जब तक कि मुझे मोक्ष न प्राप्त हो जाये । ऐसी बात कहकर जाता है । अभी और कोई धनी ऐसा सुने किसी गरीब के मुख से । गरीब यह कहे कि तुम्हारे पास तब तक आते हैं जब तक हमारा स्वार्थ पूरा न हो जाये, तो धनी पर क्या असर पड़ेगा? पर भगवान तो वीतराग है, उसे जो चाहे कहो, पर भगवान की जगह पर कोई दूसरा धनी हो, रपट मारे । कहता है कि हमारा मस्तक तब तक तुम्हारे चरणों में रहे जब तक कि मोक्ष की प्राप्ति न हो जाये । यह ज्ञानी बहुत निर्मल परिणाम प्रकट कर रहा है।

अनुराग में अनुराग का अभाव―जैन सिद्धांत में तो सर्वत्र ज्ञान का महत्त्व है । भक्ति करें तो, सामायिक करें तो, कुछ करें तो सर्वत्र ज्ञान की महिमा है । वह यथार्थ बात कह रहा है । उसकी दृष्टि अंधकार में नहीं है । वह जानता है कि मोक्ष प्राप्त होने पर भगवान का अनुराग रह ही नहीं सकता है । ज्ञानी के अनुराग तो होता है पर अनुराग का अनुराग नहीं होता है । जैसे फोड़ा हो जाये तो कैसा प्रेम से उस पर हाथ फेरते हैं, पका है कि नहीं, जोर से न लग जाये, उस फोड़े को कितना प्रेम से स्पर्श करते हैं, पर उस फोड़ा से अनुराग है या अनुराग में अनुराग है? कैसे अनुराग से उस फोड़े का स्पर्श हो रहा है? कैसी विलक्षण बात है? इसी तरह से ये सब फोड़ा हैं आत्मा के शुभभाव और अशुभभाव, तो इसमें संत जन अपनी वेदना का प्रतिकार करते हैं । ढंग से औषधि करना, सब करना, किंतु उन बातों में अनुराग नहीं है ।

ध्रुव निज का आश्रय―बीमार हो जाने पर कितना वह अनुराग करता है―बढ़िया पलंग हो, साफ बड़ा कमरा हो, कमरे में सुगंध आये, यह सब है पर उसका किसी चीज में अनुराग नहीं है । वह तो चाहता है कि जल्दी ही ठीक होऊँ और 2-4 मील का चक्कर लगाऊं । यह ज्ञानी जीव पुण्य को भी नहीं चाहता, क्योंकि ज्ञानी जीव की दृष्टि शुद्धि ज्ञानस्वभाव पर है । आश्रय करो तो अपने आपका करो । पराये का आश्रय करने से तो कुछ लाभ न मिलेगा । और जो मिट जाये उसका आश्रय करने से कुछ लाभ न मिलेगा । जो अविनाशी हो और निज हो उसका अनुराग करो, बस इसी बात को देख लो । ध्रुव हो और निज हो उसको पकड़कर रह जाओ तो संसार से पार हो जाओगे ।

पर के आश्रय में अशरणता―यद्यपि परपदार्थ भी सब ध्रुव हैं उनकी परिणति अध्रुव है । तो अध्रुव परिणति का आलंबन लेने से कुछ लाभ नहीं है क्योंकि वह मिट जायेगा और परपदार्थों में जो उनका स्वभाव है वह ध्रुव है, किंतु पर है । तो पर का आलंबन लेने से उपयोग स्थिर नहीं रह सकता । उपयोग बहिर्मुख रहेगा । तो यद्यपि पर ध्रुव है किंतु पर ध्रुव में हम दृष्टि दें तो हमारी दृष्टि बहिर्मुख होगी । अपने आत्मप्रदेशों से हटकर किसी बाह्य की ओर लग गए तो बहिर्मुख दशा में जीव को अनाकुलता मिलती नहीं, सो बाह्य पदार्थ ध्रुव हों उसका भी आश्रय इस जीव का शरण नहीं बन सकता । जो ध्रुव और निज हो उसकी श्रद्धा करो । वह है अपनी चैतन्यशक्ति, ज्ञानशक्ति । उसकी ही श्रद्धा करने में इस जीव को शांति प्राप्त होगी ।

सुख दुःख पुण्य-पाप शुभाशुभ भाव की अनाश्रेयता―जैसे कि सुख-दुःख की अवस्था जीव की ध्रुव नहीं है, इसी प्रकार सुख-दुःख का कारणभूत जो पुण्य और पापकर्म है, वह पौद्गलिक है, ध्रुव नहीं है और पुण्य-पाप के कारणभूत जो शुभोपयोग और अशुभोपयोग है वह भी ध्रुव नहीं है । सुख दुःख असल में कहते उसे हैं जो इंद्रियों को सुहावना लगे । ख मायने इंद्रिय और सु मायने सुहावना। अर्थात् जो इंद्रियों को अच्छा लगे उसे सुख कहते हैं। और जो इंद्रियों को असुहावना लगे उसे दु:ख कहते हैं । देखो सिद्ध भगवान के सुख को कहीं-कहीं सुख शब्द से कह दिया है―जैसे अनंत सुख । पर इंद्रियजंय सुख का परिचय रखने वाले मनुष्यों को समझाने का उपाय उन्हीं के शब्दों में कहना आचार्यों ने ठीक समझा और कहा । किंतु परमार्थ जो उनमें सुख है उसको आनंद शब्द से ही कहना चाहिए । आनंद शुद्ध होता है, सुख विकृत होता है । भगवान के अनंत आनंद है, अनंत सुख नहीं है । सुख होता है इंद्रियों से और आनंद होता है स्वाधीन ।

त्रैकालिक आनंद गुण―जैसे आत्मा का ज्ञानगुण है, शुद्ध है, सत्य है, चारित्र है, इसी प्रकार एक आनंद नाम का गुण है और जिस ज्ञानगुण की पर्यायें हैं―मति, श्रुति, अवधि आदिक; श्रद्धा गुण के सम्यक्त्व मार्गणाओं की पर्यायें हैं, चारित्रगुण की कषाय मार्गणापर्याय है, इसी प्रकार आनंदगुण के तीन पर्यायें होती हैं―आनंद, सुख और दुःख ।

आनंद परिणमन―आनंदगुण की जो आनंद नामक पर्याय है वह तो है स्वभावपर्याय और अविनाशी है, पर परमार्थ से आनंदपर्याय अविनाशी नहीं है । वह क्षण-क्षण में नष्ट होती है । भगवान का जो आनंद है वह क्षण-क्षण में नष्ट होता है, पर तारीफ वहाँ यह है कि आनंद नष्ट होकर दूसरे क्षण में वही आनंद प्रकट होता है, तीसरी क्षण में वैसा ही आनंद फिर प्रकट होता है । जैसे केवलज्ञान क्षणिक है, ज्ञान की पर्याय है, पर केवलज्ञान क्षणभर में होकर नष्ट होकर दूसरे क्षण में वैसा ही केवलज्ञान होता है तो प्रत्येक क्षण में वैसा ही वैसा केवलज्ञान होता रहता है । जैसे बिजली जलती है, 2 घंटा बिजली जली तो देखने में ऐसा लगता है कि इस बिजली ने क्या काम कुछ नहीं किया? जो काम 2 घंटा पहिले किया वही काम अब कर रही है । पर वस्तुत: देखो तो वह बिजली प्रति सेकेंड नया-नया काम कर रही है । जो प्रकाश उसने दो घंटे किया उसमें प्रति मिनट में जो प्रकाश किया वह अपने-अपने मिनट का पावर लेकर किया । वहाँ दिखता ऐसा है कि वह बिजली वही काम कर रही है, किंतु एक घंटा पहिले जो किया वही बाद में नहीं कर रही है । ऐसा न हो तो यह पावर की यूनिट कैसे अधिक खर्च हो जाती है? नया परिणमन चल रहा है ।

आनंदपरिणमन का अपूर्व-अपूर्व होते रहने का दृष्टांतपूर्वक प्रकाशन―जैसे कोई पल्लेदार है वह दस सेर कोई सामान लिए खड़ा रहे तो मोटे रूप में यह कह देंगे कि घंटे भर पहिले जो काम किया वही काम कर रहा है पर वह तो प्रति पल अपना नया-नया काम कर रहा है, नई शक्ति लग रही है । तो जैसे प्रति पल नया काम कर रहा है, नई शक्ति लग रही है तथा जिस प्रकार केवलज्ञानी ज्ञानावरणादिक का क्षय होने पर जैसा तीन लोक को जाना वैसा ही वह प्रतिक्षण जानता रहता है और प्रतिक्षण नई शक्ति वह लगाता है । इसी प्रकार आनंदपर्याय की भी बात है कि भगवान के प्रति समय नवीन-नवीन शुद्ध आनंद प्रकट होता है । आनंद नाम की शक्ति की तीन पर्यायें हैं―आनंद, सुख और दुःख । आनंद तो शुद्ध पर्याय है, उसका निरंतर सदृशपरिणमन होता रहता है । सुख और दुःख अशुद्धपर्याय है ।

सुख के लगाव का फल―पुण्य के उदय में आनंद नहीं मिलता, सुख मिलता है । उस सुख के लोभ में ऐसा पाप बनता है कि जितना सुख भोगा उससे दूना दुःख मिलेगा । जैसे किसी पुरुष से प्रेम हुआ तो संयोग के समय में जितना सुख माना, वियोग के समय में सारी सुख की कसर निकल आती है । जो आगामी काल में वियोग का दुःख भोगना न चाहे, वह अभी से संयोग में सुख न माने । वह भविष्य में वियोग के समय दुःख नहीं मान सकता है ।

गृहस्थ के दो तप―भैया ! दो तप हैं गृहस्थ के । प्रत्येक गृहस्थ को ये दो तप तो करना ही चाहिए । गृहस्थ का एक तप तो यह है कि जितनी आय हो उतने में ही अपनी सब व्यवस्था बना लें । खान, पान, दान, सब कुछ उसी में कर लें और दूसरा तप उसका यह है कि यह ध्यान रखें कि जो कुछ समागम आज मिला हुआ है वह चाहे जीव का समागम हो, और चाहे वैभव का समागम हो, यह समागम सदा यहीं रहने का है ऐसा ख्याल बनाए रहें । ये दो तप गृहस्थ करते रहें तो फिर वे दु:खी नहीं हो सकते । यद्यपि ये दोनों तप कठिन मालूम होते हैं किंतु निगाह बन जाये तो सरल मालूम होता है । निगाह ही तो बनाना है । सत्संग हमारा बहुत काल तक रहे, सद्गोष्ठी रहे, ऐसी बातें सुनने को मिलें, बोलने को मिलें और उत्तम पुरुषों का ज्ञान का समागम अधिक हो तो निगाह बनती है । हम मोही जीवों में ही बस-बसकर अज्ञानी, बेढब, देहाती जैसा चाहे जीवों के संग में समय गुजारें तो वहाँ आत्मा को सम्हालना कठिन होता है ।

गृह में ज्ञान के वातावरण की उपयोगिता―भैया ! तात्त्विक वातावरण कौन-सी बड़ी बात है, घर में 4 आदमी समझदार हों तो चारों आदमी मिलकर यह चर्चा घर में कर लें कि देखो शास्त्र में यह सुन आए हैं कि गृहस्थ इन दो तपों को यदि करें तो सुखी हो सकते हैं । तुम्हें पसंद है कि नहीं? और तुम्हारे हृदय में यथार्थ बात बैठी है कि नहीं? न बैठी है । तो फिर चर्चा करो जब घर के चार जीवों में यह ज्ञान बैठ जाये तो फिर बाद में यह तप करना बहुत सुगम हो जायेगा । करो चर्चा । जो शांति और आनंद का मार्ग है उस मार्ग की चर्चा करियेगा । जिनसे आपका विशेष राग है उनको धर्मात्मा बनाओ । शास्त्र बताते हैं कि स्त्री को भी और पुत्रों को भी गृहस्थी में ज्ञानी रहना चाहिए । तब बूढ़ों का, बुजुर्गों का निर्वाह धर्मपूर्वक हो सकता है ।

ज्ञानी गृहस्थ की अंतर्बाह्यवृत्ति―जिस गृहस्थ के ज्ञानी के उपयोग में यह सिद्ध हो गया कि जितने भी समागम हैं ये सब बिछुड़ने वाले हैं । और आज अमुक समागम मिला और यह न मिलता और कोई जीव घर में आता जिसको तुम आज पराया मान रहे हो वह ही मरकर यदि घर में आकर बच्चा बन जाये तो जिसे आज आप पराया मानते थे उसमें मोह करने लगते है । और पदार्थ तो वही है जो पहिले था, जीव तो दूसरा नहीं है तो फिर अपना पराया कौन है । अधिक इस ओर गृहस्थ को नहीं लगना चाहिए कि यह गैर है, यह पर है । जितना खर्च अपने कुटुंब पर होता है औरों पर उससे आधा खर्च तो कम से कम करो । यदि नहीं बचत है तो घर का बजट कम कर दो, पर कुछ न कुछ दूसरों के उपयोग में, सेवा में धन लगाना ही चाहिए । अन्यथा वह धन प्रबल हो जायेगा और धर्म गौण हो जायेगा ।

कल्याणमार्ग की शीघ्रकरणीयता―भैया ! पहिले से ही यदि समागम में मोह न रखो तो अंतिम क्षण अच्छे रहते हैं । परीक्षाफल समाधिमरण है । जिंदगी का परीक्षाफल है समाधिमरण । जीवनभर यदि विचार अच्छे रखो तो समाधिमरण हो सकता है । कोई सोचे कि अभी बहुत दिन हैं, मरण काल बहुत दिन बाद में आयेगा, अभी चैन से रहें, फिर सुधार लेंगे तो कठिन काम है । धर्मकार्य के लिए तो सोचने लगते हैं कि ‘‘आज करें सो काल कर, काल करो सो परसों । जल्दी-जल्दी क्या पड़ी है, अभी तो जीना बरसों ।।‘‘ पर कहना व करना क्या चाहिए कि ‘‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । पल मे परलय होयगी बहुरि करोगे कब ।।‘‘ ज्ञानी जीव इन सब समागमों को अहित और विनाशीक जानते हैं । ये सब पुण्य के फल हैं । यदि पुण्यकर्म से ये समागम भी जुड़ जायें तो यह ज्ञानी जीव उन समागमों को नहीं चाहता है ।

ज्ञानी की विशुद्ध वृत्ति―ज्ञानी की प्रवृत्ति कितनी विशुद्ध है? ये पुण्यकर्म बंध जाया करते हैं, बंध जाओ पर चाह करोगे तो फंस जाओगे । सो ज्ञानी जीव के पुण्य का परिग्रह नहीं होता । इससे शुद्ध तो है धर्म । धर्म का अर्थ है पुण्य । परिग्रह उसके नहीं है किंतु ज्ञानमय जो एक भाव है उसका ही सद्भाव होने से यह जीव पुण्य का केवल ज्ञायक ही रहता है, पुण्य का अभिलाषी नहीं रहता है, यह तो बताया है गृहस्थ पुरुषों की तपस्या । अपने आपमें ही व्यवस्था बनें और समागम को विनाशीक मानें ।

ज्ञानी का सर्वोत्कृष्ट तप―भैया ! एक तीसरा यह तप और भी यदि प्रकट हो जाये तो और उत्कृष्टता है । जिस जीव को देखो उस जीव की शकल सूरत पर्याय में दृष्टि न अटक कर उन जीवों में रहने वाले शुद्ध चैतन्यस्वरूप का ध्यान करो । और उस चैतन्यस्वरूप की दृष्टि में करके सबको मान लें । यह उन दो से भी श्रेष्ठ तप है । उन दो को तो जबरदस्ती किया भी जा सकता है । आपकी व्यवस्था हर एक कर सकता है और समागम को विनाशीक यह एक बहुत बड़ी तपस्या है । इसमें तो ज्ञानबल पूरा लगाना पड़ा । सब जीवों को समानस्वरूप वाला निरख सके, यह सबसे ऊँची तपस्या है । ये तीन बातें यदि श्रावक पुरुषों में आ जायें तो यह भी बड़ा उत्कृष्ट है । इस प्रकार जीव पुण्य का केवल ज्ञायक ही रहता है, पुण्य का अभिलाषी नहीं रहता है ।


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