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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 211

From जैनकोष



अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो णाणी य णेच्छदि अधम्मं ।

अपरिग्गहो अधम्मस्स जाणगो तेण सो होदि ।।211।।

ज्ञानी के अधर्म का अपरिग्रह―जो इच्छारहित है वह अपरिग्रही कहा गया है । ज्ञानीपुरुष अधर्म को नहीं चाहते हैं । इसलिए वे अधर्म के अपरिग्रही हैं । वे तो केवल अधर्म के ज्ञायक होते हैं । इससे पहले पुण्य की बात कही गई थी कि ज्ञानी जीव पुण्य को भी नहीं चाहता । उसके पुण्य का काम होता है, पर पुण्य को नहीं चाहता है, क्योंकि जानता है कि पुण्य भिन्न चीज है । और पुण्य बँध भी गया तो उसके उदय में कुछ बाह्य समागम ही तो मिले । उन बाह्य समागमों में आत्मा का भाव ही तो पराधीन हुआ । विषय-कषाय के परिणाम ही तो बढ़ेंगे, संसार बढ़ेंगे । पुण्य से मोक्ष नहीं होता । मोक्ष होता है शुद्ध ज्ञानस्वभाव के अवलंबन से । सो वह पुण्य को करता हुआ भी पुण्य का ज्ञायक रहता है ।

ज्ञानी की वृत्ति में ज्ञान की झलक―भैया ! ज्ञानी होने पर भी जब तक अप्रत्याख्यानावरण संबंधी राग है तब तक इस गृहस्थ सम्यग्दृष्टि के विषय-कषाय के परिणाम भी उठते हैं । तो उन विषय-कषाय परिणामोंरूप पाप को करता हुआ भी ज्ञानी पाप की चाह नहीं करना, उससे आसक्ति नहीं करना, बल्कि वियोगबुद्धि से उसमें प्रवृत्ति करता है । जैसे कैदी को जबरदस्ती चक्की पीसनी पड़ती है सिपाही के डंडे के डर से, पर उसके मन में वियोग बुद्धि है कि कब यह छूट जाये? इसी प्रकार विषय कषाय पाप की प्रवृत्ति में ज्ञानी जीव को लगना भी पड़े, लेकिन वह उनमें वियोग बुद्धि से लगता है । तो उस समय भी वह पापों का ज्ञायक रहता है ।

ज्ञानी के अज्ञानमयभाव का अभाव―भैया ! इच्छा को ही परिग्रह कहा गया है । जिसके इच्छा नहीं है उसके परिग्रह नहीं है । इच्छा अज्ञानमय भाव है । अज्ञानमय भाव ज्ञानी के नहीं होता है । ज्ञानी के ज्ञानमय ही भाव होता है । इस कारण ज्ञानी अज्ञानमयभाव के अभाव से अर्थात् इच्छा के अभाव से वह अधर्म को नहीं चाहता, पाप को नहीं चाहता तो ज्ञानी के पाप का परिग्रह भी नहीं है ।

ज्ञानी व अज्ञानी की वृत्ति में शैली―कितने ही पुरुष यह शंका करने लगते हैं कि ज्ञानी पुरुष एक पाप का काम करता है और एक अज्ञानी पुरुष कोई पाप का काम करता है तो उस पाप का दोष ज्ञानी के ज्यादा लगता है । ऐसा तर्क करते हैं कि यह तो ज्ञानी है । और यह कुछ जानता नहीं है इसलिए उसे दोष कम लगेगा । और यह जानता है, ज्ञानी है और फिर पाप करता है तो उसे ज्यादा दोष लगना चाहिए, पर यथार्थ बात इसके विपरीत है । यदि कोई वास्तव में ज्ञानी है, सम्यग्दृष्टि पुरुष है, आत्मानुभव जिसे हो चुका है ऐसे पुरुष को यदि कदाचित् पापकार्यों में लगना पड़ता है तो इसका दोष अधिक नहीं होता है, कम होता है और अज्ञानी जीव यदि वह पापकार्यों में लगता है तो उसके कई गुणा पाप होता है । इसका कारण यह है कि ज्ञानी होने के कारण पापकार्यों में लगकर भी उसके वियोगबुद्धि भीतर बसी है । यदि वियोगबुद्धि भीतर नहीं हुई, हटने की शैली उसके नहीं हुई तो उसे ज्ञानी ही नहीं कहते हैं, वह तो अज्ञानी ही हो गया ।

ज्ञानी की प्रवृत्ति में वियोगबुद्धि―भैया ! जो ज्ञानी होता, सम्यग्दृष्टि होता, उसकी भी प्रवृत्ति कर्मविपाकवश कदाचित् पापकार्यों में होती है । जैसे युद्ध करना पड़ता है, गृहस्थी सम्हालनी पड़ती है, समाज एवं देश की सेवा भी करनी पड़ती है, पर ज्ञानी इन्हें वियोगबुद्धि से करता है । यह मेरा स्वरूप नहीं है ऐसा इरादा उस ज्ञानी पुरुष के होता है । यदि ऐसा ढंग नहीं है और स्वच्छंद होकर पापों में प्रवृत्ति करता है तो उसे ज्ञानी क्यों कहते हैं? वह ज्ञानी नहीं है ।

अज्ञान का महान अपराध―अज्ञानी पापकार्य करता है तो प्रथम तो सबसे बड़ा दोष उसके अज्ञान का है । पापकार्य करने से भी कई गुणा अपराध अज्ञान का माना गया है । यह कोई लोकव्यवहार की बात नहीं है कि भाई इसे जानकारी न थी और अपराध बन गया है तो इसे छोड़ दो, माफ कर दो सहूलियत दे दो । यहाँ तो क्यों नहीं जानकारी हुई, क्यों अज्ञान रहा, यही महान दोष है इस जीव के लिए । अज्ञान का जितना बंध होता है उसके मुकाबले में प्रवृत्तिज पाप करने से जो बंध होता है वह पाप अल्प है । पापरूप प्रवृत्ति करने से बंध जितना होता है उससे कई गुणा बंध अज्ञान का होता है, जानकारी न होने से होता है ।

भावों से प्राकृतिक व्यवस्था―ज्ञानी व अज्ञानी का लोकव्यवहार की बातों से मिलान नहीं किया जा सकता कि भाई लोकव्यवहार में तो यह सुविधा मिल जायेगी कि भाई इसको जानकारी नहीं थी, पाप हो गया है इसे छोड़ दो । जैसे किसी मैदान में शौच और पेशाब करना मना है, और एक अज्ञानी पेशाब कर ले तो सिपाही उसे कह सकते हैं कि भाई इसे छोड़ दो, इसे पता नहीं था । पर यहाँ तो इतनी भी छूट नहीं है । यह तो अज्ञान का महापाप है ।

ज्ञान के साथ वृत्ति की शैली―एक दृष्टांत ले लीजिए―एक पुरुष को मालूम है कि यहाँ अग्नि का छोटा कण रखा है और किसी कारण से अग्नि पर उसे पटके जाने को विवश किया जा रहा है तो वह अग्नि पर धीरे से पांव धरकर निकल जायेगा । और जिसे नहीं मालूम है उसे यदि घसीटकर अग्नि की कण पर पटका जाता है तो वह पैर धीरे से रखता है और उस अग्नि के कण पर पैर को दाबकर रखता है । और वह अधिक जल जायेगा । तो हमें यदि अधिक जानकारी नहीं है तो यह सबसे बड़ा दोष है । तो हर प्रकार की जानकारी का हमें यत्न रखना चाहिए । कोई पुरुष सुनी बातचीत का बहाना करके सोचे कि मैं सब जानता हूँ । यदि उसके कोई वियोगबुद्धि नहीं है, उसे हटाने का आशय नहीं है तो उसे ज्ञानी ही नहीं कहा है ।

ज्ञानी की निष्परिग्रहता―इस ज्ञानी पुरुष को कर्म विपाकवश पापकार्यों में भी कदाचित् प्रवृत्ति करना पड़ती है लेकिन वह तो ज्ञानमय ज्ञानभाव का अनुभवी हो चुका है, सो वह केवल पाप का ज्ञायक ही रहता है । जैसे पाप के संबंध में बात कही गई है यों ही रागद्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, कर्म, नोकर्म, मन, वचन, काय, स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र, इन सबके बारे में यह ही बात लगाते जाइए । वह इंद्रियों का परिग्रही नहीं है किंतु इंद्रियों का ज्ञायक है । वह रागद्वेष का परिग्रही नहीं है किंतु रागद्वेष का ज्ञायक है । इस प्रकार इसके अलावा अन्य-अन्य भी बातें सोच लेनी चाहिए । प्रयोजन यह है कि ज्ञानीपुरुष, सम्यग्दृष्टि पुरुष समस्त पर और परभावों का ज्ञायक ही होता है, परिग्रही नहीं होता है ।


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