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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 314

From जैनकोष



जा एस पयडीअट्ठं चेदा णेव विमुंचए।

अयाणओ हवे ताव मिच्छादिट्ठी असंजओ।।314।।

जया विमंचए चेदा कम्मफलमणंतयं।

तया विमुत्तो हवदि जाणओ पासओ मुणी।।315।।

मिथ्या आशय―जब तक यह जीव पदार्थों के प्रतिनियत लक्षणों का ज्ञान न होने से अपनी प्रकृति के स्वभाव को जो कि अपने आपके बंधन का कारण है नहीं छोड़ता तब तक इसे स्वपर का एकत्व ही ज्ञात रहता है इस कारण अज्ञानी ही कहलाता है। हमारा स्वभाव है ज्ञाता दृष्टा रहना और प्रकृति का स्वभाव है कि अपने को बंधन में और दु:ख में डालना। कैसा बिगाड़ हुआ है इस जीव का कि इस जीव में एक विचित्र प्रकृति भी पैदा हो गयी भावप्रकृति, जिसके बंधन में पड़ा हुआ यह जीव निरंतर आकुलित रहता है। अपने और पराये पदार्थों में उस एकत्वरूप का ही विश्वास बनाए है जिसके कारण यह जीव मिथ्यादृष्टि है। मिथ्यादृष्टि का अर्थ है संयोगदृष्टि। मिथ्या, मैथुन, मिथुन, संयोग ये सब एक ही अर्थ के बताने वाले हैं मिथ् धातु का अर्थ है। संबंध। संबंध की दृष्टि हो, इसे कहते हैं मिथ्यादृष्टि।

मिथ्यात्वनाश का उपाय―मिथ्यात्व कैसे मिटे ? इसके लिये यह ध्यान में आए कि किसी पदार्थ का किसी पदार्थ के साथ संबंध नहीं है। तो मिथ्यात्व मिट गया। जो जैसा है उसे वैसा ही मान सके , लो मिथ्यात्व मिट गया। जो जैसा है उसे वैसा न मान सके, सो मिथ्यादर्शन है। निज निज ही है और पर पर ही है, इनमें विविक्तता न समझकर स्व, पर को एक ही बात मानें, इसके मायने है मिथ्यादर्शन। यह गृहस्थावस्था अनेक विकल्पजालों से भरी हुई है। किसी भी सुख चैन की जरा स्थिति पर पहुंच भी जाय तो कुछ नये विकल्प और खड़े कर लेता है। तो संबंध मानने का नाम है मिथ्यादर्शन। मिथ्यादर्शन कहो, मोह कहो, अज्ञान कहो एक ही बात है। बस संबंध न मानिये, यही मिथ्यात्व नाश का साधन है।

अज्ञान और मोह मिथ्यादर्शन के नामांतर―एक ही चीज को भिन्न–भिन्न पर्यायों से देखते हैं तो भिन्न-भिन्न शक्लें मालूम होती हैं, इस विपरीत आशय से हमें ठीक ज्ञान नहीं होता, इसी ढंग में जानते हैं तो इसका नाम है अज्ञान। इसी विपरीत आशय को इस प्रकार देखो कि यह संबंध माने हुए हैं इस दृष्टि से देखते हैं तो उसका नाम है मिथ्यादर्शन। इस विपरीत आशय को जब इस ढंग से देखते हैं के देखो यह कैसा बेहोश है कि ज्ञानानंदनिधान निज तत्त्व का इसे परिचय ही नहीं हो पा रहा है। तो इसका नाम होता है मोह।

मोह के परिहार की कठिनता―यह मोह परिणाम ही इस जीव का घात करने वाला है और यही छोड़ा जाना कठिन हो रहा है। जैसे चूहों की सभा में सम्मिलित होकर बिल्ली के उपद्रवों का बखान करलें, चर्चा करलें कि बिल्ली के गले में घंटी बंधी होती है तो उसके आ जाने पर अपन लोगों कोखबर हो जाती । बिल्ली जबआयेगी तो घंटी की आवाज सुनकर अपन बिल में घुस जायेंगे, सुरक्षित हो जायेंगे, इसी तरह मन में खूब आता है सबके कि इस मोह में बड़े उपद्रव हैं। इस मोह उपद्रव को समाप्त करना चाहिए। अरे लगता क्या है? घर ही बैठे रहें, केवल जानना भर है सही। किंतु सही न जानकर पर-पर में ही लग रहे हैं और उनकी ही ओर बहे जा रहे हैं। यह मोहत्याग ही तो एक कठिन लग रहा है, पर कठिन है नहीं।

आत्मावधान का ध्यान―जहाँ यह कहा गया है कि जैन सिद्धांत का लाभ लेना है तो अपरिग्रह बुद्धि रखो। पर परिग्रह बुद्धि और जकड़ जा रही है जहाँ यह बताया गया है कि कीड़े मकोड़े एकेंद्रिय आदि जीवों पर भी करुणा बुद्धि रखो, वहाँ पंचइंद्रियों का भी गौरव न रखने का भाव रखकर बरबाद हुए जा रहे है। कितनी विपरीत प्रवृत्ति आज के जगत में हो रही है ? जैसे सरकारी स्थानों पर अच्छे सुंदर अक्षरों में लिखा रहता है भ्रष्टाचार पाप है इसके करने से देश की हानि है। ऐसा लिखा रहता है फिर भी उसी जगह भ्रष्टाचार होते रहते हैं। इसी तरह यह मनुष्य बातें बहुत कहता है धर्म के लिए, पर जग नहीं पाता है। ऐसा मोह का तीव्र नशा पड़ा हुआ है।फल क्या होगा, पछतावा मिलेगा। वियोग होगा। कहीं को कोई, कहीं को कोर्इ चलाजायेगा, और इस मोह की नींद में इस मायामय मूर्तियों को निरखकर विकल्प बनाए गए हैं जिनमें आकुलता भरी रहती है। भैया ! यह जीव विकल्प करके दु:खी होता है। जब अज्ञान लगा हुआ है और मिथ्यादृष्टि हो रही है तब स्व और पर की एकतारूप से परिणमन भी यह जीव कर रहा है। कर नहीं सकता एक भी परिणमन किंतु विकल्प में मान रहा है यह इस तरह यह जीव असंयमी होता है और तभी तक पर और अपने में एकत्व का निश्चय करने से कर्ता बन रहा है।

कर्तृत्व का आशय की नि:सारता―एक सेठ ने बहुत बड़ी हवेली बनायी थी , हवेली बनाकर उसके महान उद्​घाटन का प्रोग्राम रखा। समस्त नगरवासियों को बुलाया गया। बड़े ढंग से सभा की गयी। कवि-सम्मेलन विद्वानों के भाषण, धार्मिक समारोह आदि अनेक प्रोग्राम रखे। उनके बीच वह सेठ बोलता है कि भाई इस हवेली में यदि कोई त्रुटि हो तो बतलावो उस त्रुटि को निकलवा दें । चाहे कोई हवेली का हिस्सा गिरवाकर ठीक करना पड़े, वह भी ठीक करवा दिया जायेगा। अभिमान पोषने के अनेक ढंग होते है। कोई अभिमान विधिवचन कह करके पोषता है, कोई मना करके भी। अजी मैं क्या करता हूँ, आप सबकी कृपा है। ऐसे आशय में भी यह बात बनी हो सकती है कि ऐसा तो ये जान रहे ही हैं कि इन्होंने यह चीज बनाई, अब साथ ही यह भी जान लें कि देखो इतना बड़ा काम करके भी कितना नम्र पुरूष है। तो कहाँ बचकर जाय। यदि अंतर में कषाय का उदय है तो उसी के अनुरूप तो प्रवृत्ति होगी। सो सबने कहा कि सेठजी यह तो बहुत ऊंची हवेली बनी है, इसमें कोई त्रुटि नहीं है, सब जगह बड़ी शोभा हैं, बड़ी सुंदरता है। एक मानो कोई जैन ही उठा और बोला सेठजी ! हमें तो इसमें दो गलतियाँ जबरदस्त मालूम होती हैं। सेठ अपने इंजीनियर से कहता है कि इनकी बात सुनो। ये दो गलतियाँ बताते है, उनका जल्दी सुधार करो। अच्छा साहब । अब वह गलती बताना शुरू करता है। सेठजी इसमें पहिली गलती तो यह मालूम हो रही है कि यह हवेली सदा न रहेगी । अब इंजीनियर लोग सुनकर दंग हो गए। इस गलती को कैसे मिटाए ? अच्छा बतावो श्रीकृष्ण जी की हवेलियाँ महावीर स्वामी की हवेलियाँ, रामचंद्र जी की हवेलियाँ किसी ने देखी हैं। रही भी हैं क्या ? खूब पक्के मकान बनवायें होंगे, पर आज उनका पता भी है क्या ? तो सेठजी एक गलती तो यह है कि यह हवेली सदा न रहेगी। सेठजी और इंजीनियर आंखें फाड़ फाड़कर सुन रहे है, पलक ही नीचे को नहीं गिरती। आश्चर्य भर गए। अफसोस में आ गए कि यह गलती कैसे मिटाई जाय ? अच्छा भाई एक त्रुटि तो यह है, दूसरी त्रुटि बतलावो। सेठ जी, इसमें दूसरी त्रुटि यह है कि मकान का बनाने वाला भी सदा न रहेगा।

त्रुटि और नखरा―भैया ! प्राय: सब ही के साथ ये दोनों त्रुटियां लगी हैं। किस पर नखरा बगराया जाता है। किस पर अभिमान पोषा जाता है। नखरा किसे कहते हैं जानते है आप लोग। न खरा इति नखरा। जो बात खरी न हो उसका नाम नखरा है। कितना अभिमान पोषा जा रहा है। अभिमान के आश्रयभूत बातें 8 होती हैं। एक तो ज्ञान का सबसे बुरा अभिमान है, जो ज्ञान अभिमान के नाश करने के लिए हुआ करता है उस ही ज्ञान से अभिमान पोषा जाय तो कितना बड़ा अभिमान है ? केवलज्ञान होने से पहिने किसको कहा जाय कि यह पूर्णज्ञानी है। सब अधूरे हैं। अभिमान का दूसरा साधन है प्रतिष्ठा। दसों आदमी बात पूछने लगे तो अब लंपा की तरह ऐठे जा रहे हैं, और यदि न उदय होता इतना अच्छा तो हाथ जोड़-जोड़कर मरते या नहीं मरते, बतावो। मिल गया सुयोग तो उसका क्या अभिमान करना ? तीसरी अभिमान की बात होती है अच्छे कुल में पैदा हो जाना। लोग श्रेष्ठ कुल में पैदा होने का भी तो अभिमान करते है। अजी मैं अमुक कुल का हूँ। अरे जो जिस कुल में उत्पन्न होता है उसका कुल भले ही नीच हो, अत्यंत नीच की बात छोड़ो जिसमें पैदा हुआ पुरूष भी मान सके कि हम छोटे कुल में पैदा हुए है, किंतु प्राय: सभी अपने कुल को श्रेष्ठ मानते हैं। तो कुल का अभिमान, जाति का अभिमान। जाति क्या कहलाती है ? मां जिस घर में पैदा होती है उस घर का जो कुल है वह जाति कहलाती है। मेरी मां बड़े ऊंचे घराने की है, ऐसा अभिमान होना यह जाति का अभिमान है। बल का अभिमान मैं बलवान हूँ, इसी प्रकार तप का अभिमान, ऋद्धि का अभिमान, शरीर की सुंदरता का अभिमान।

अभिमान कटुफल―भैया ! इन सब अभिमानों के कारण एक दूसरे को तुच्छ गिनते हैं, और जहाँ एक दूसरे को तुच्छ गिना वहाँ विवाद और विपदाएं खड़ी हो जाती हैं। सामर्थ्य होते हुए भी उस सामर्थ्य का उपयोग न कर सके, यह फूट राक्षसी का प्रसाद है और व्यर्थ की कुबुद्धि, जिससे सर्वसंपन्नता होकर भी उसका आराम नहीं भोगा जा सकता है। ये एक ही धर्म के मानने वाले भी भाई-भाई गोत्र गोत्र भिन्न-भिन्न जाति का ख्याल रखकर परस्पर में एक दूसरे को किसी प्रकार तुच्छ देख देखें तो बहुत ही खेद की बात है। हम दूसरों का आदर करेंगे तो दूसरे भी आदर करेंगे। हम दूसरे को तुच्छ गिनेंगे तो दूसरे भी तुच्छ गिनेंगे। भला आप किसी से सत्कार से भरे सत्कारपूर्ण वचन बोले और वह आप से कटुता से पेश आए, ऐसा प्राय: नहीं होता है। और आप किसी के प्रति कटुता से पेश आए और वह आपको फूलों की माला पहिनाए, यह भी कठिन बात है।

विचार की सावधानी―यह तो हुई वचनों की बात, जिसका असर सीधा पड़ता है पर ऐसी ही बात मन की होती है। आप सबके सुख की बात सोचेंगे तो सब आपके सुखकीबात सोचेंगे, और आप सबके क्लेश की बात सोचेंगे तो सब भी क्लेश का दाब देखेंगे। इन सब पर्याय बुद्धियों को समाप्त करके एक अपने आनंदमय ज्ञानपुंज सहज स्वभाव का दर्शन तो मिले, हिम्मत बनाकर भूल जावो इन समस्त बाह्य चेतन और अचेतन के संग को। आपका एक अणु भी कुछ नहीं है, रंचमात्र भी कोई पदार्थ अपना नहीं है। वस्तु के स्वरूप को देख लो।

आत्मा का विशुद्ध स्वरूप―इस सर्वविशुद्ध अधिकार में सबसे पहिले मूलभूत यह बात बतायी गयी है कि प्रत्येक द्रव्य जिस-जिस पर्याय से परिणत है, वह उस-उस पर्याय से ही तन्मय हो सकता है, किसी अन्य पदार्थ की पर्याय से रंच भी नहीं मिल सकता है। इस मूल उपदेश ने सारे विवाद को खत्म कर दिया। जब वस्तु की स्थिति ऐसी है तो वहां संबंध की गुंजाइश क्या और कर्ता कर्म मानने की गुंजाइश क्या ? मैं ज्ञानमात्र हूँ, केवलज्ञान की क्रिया करता हूँ, पर इसके अतिरिक्त और कुछ करने में समर्थ नहीं हूँ।

भेदविज्ञान का प्रताप―जब ही यह जीव भिन्न-भिन्न स्वलक्षणों का ज्ञान होने से प्रकृति स्वभाव को छोड़ देता है, तब हीयह जीव निज को निज पर को पर जानने से ज्ञानी होता है। और ऐसा ही भिन्न-भिन्न स्वतंत्र-स्वतंत्र निरखने से सम्यग्दृष्टि होता है; और फिर पर से उपेक्षित होकर अपनी शुद्ध वृत्ति से परिणम कर यह संयमी बनता है, जब पर और निज के एकत्व का अभ्यास नहीं करता तब यह जीव अकर्ता हो जाता है। अपने से शुद्ध केवल ज्ञानमात्र निहारना, यह यदि बन सका तो इससे बढ़ कर न कुछ संपदा है और न कुछ पुरूषार्थ है। इस कारण सर्व यत्न करके विनाशीक तन, मन, धन, वचन को न्यौछावर करके एक अपने आपके अंतरंग स्वरूप का भान करने में लग जायें, इस आत्मज्ञान से ही इस नरजन्म की सफलता है। सब कुछ पाया पर एक यह आत्मज्ञान न पाया तो सर्व बेकार है।

प्रभुताबाधिनी अज्ञानवृत्ति―इस प्रकरण में यह बताया जा रहा है कि आत्मा तो स्वरूप से सर्व विशुद्ध है। इसमें एकेंद्रिय, दो इंद्रिय आदिक पर्यायों की बात लपेटना और रागद्वेषादिक विभावों की बात कहना, इसकी प्रभुता को बरबाद करना है। यह आत्मा अपने आप अपने सत्त्व के कारण केवल ज्ञानज्योतिर्मय अनंत अनाकुलता स्वरूप अकर्ता, अभोक्ता, बंध मोक्ष की कल्पना से रहित केवल ज्ञानपुंज है। अनादि से अनंत काल तक केवल शुद्ध चैतन्यस्वरूप है। शुद्ध का अर्थ है किसी परद्रव्य को ग्रहण किए बिना अपने स्वरूप मात्र होना। सो इस आत्मा का स्वरूप सदा अंतर में एकरूप चला आ रहा है। परंतु यह कितनी अज्ञान की विचित्र महिमा है कि सारा इसका चमत्कार विपरीत हो गया है। सारा मामला उल्टा हो गया है। जैसे कोई बात करता जाय, सही सही बात हो, फिर भी कोई ऐसी अधिक चूक बन जाय किसारा मामला उल्टा हो जाय, इस तरह यह सब विपरीत मामला चल रहा है जीव का।

विडंबना और कल्याण काहेतु―ये सब विडंबनायें एक अपराध के ही कारण हैं। वह क्या कि निज को निज पर को पर न जान सका और जब निज को निज पर को पर जान लिया तो सारे उलटे किए हुए अनादि के मामले एकदम सही रूप में परिणत हो जायेंगे, ये सब संकट टल जायेंगे। जैसे कोई वकील हो, न्यायालय में कुछ बात कहता जाय, यदि सारी की सारी बातें अपने पक्ष के विपरीत हो जायें और मामला खराब हो जाय। शुरू से अंत तक यहाँ वहाँ की बकता रहा। नशे में था, था ज्ञानी। जब वह नशा कम हुआ और चेत आया कि मैंने तो सारी बातें उल्टी कह डाली तो जज से कहता हैं कि सुनिये जज साहब हमारे पक्ष के विरूद्ध कोई भी वकील जितनी बातें कह सकता था उतनी बातें अभी बतायीं, अब उन सबका निराकरण सुनिए, लो अब सारी की सारी बातें सही हो जायेंगी। तो इसी तरह अनादिकाल से स्व और पर के एकत्व का अभ्यास करके यह जीव कुयोनियों में जन्ममरण के दु:ख भोग रहा था। एकाएक ज्ञानज्योति चमकी, सत्यस्वरूप जाना, वस्तु की सीमा पहिचानी, परभाव का त्याग किया, अपने स्वभाव में आया कि अब इसका सब कल्याण रूप प्रवर्तन होने लगा।

अज्ञान और ज्ञान में आदर का विषय―भैया ! अज्ञान दशा में विकल्पों का आदर था, चेतन अचेतन संग का आदर था, परंतु ज्यों ही उसके निर्विकल्प अवस्था में हित की बुद्धि प्रकट हुई और नि:शंक अत्यंत एकाकी स्वरूप में रहने का भाव हुआ, अब वह अपने स्वरूप में समाने की धुनि में लग गया है। तो जब तक यह जीव अज्ञानी रहता है तब तक तो यह कर्ता और भोक्ता है और जब अज्ञान दूर हो जाता है, वस्तु की स्वतंत्रता पहिचान लेता है तब इसका कर्ताकर्मभाव समाप्त हो जाता है और जैसे कर्तापन जीव का स्वभाव नहीं था पर अज्ञान से कर्म का कर्ता बन गया, इसी तरह भोक्तापन भी जीव का स्वभाव नहीं था किंतु अज्ञान से यह कर्मफल का भोक्ता बन रहा है। अज्ञान न रहे तो यह स्वरस का भोक्ता होकर अपने अनंत आनंद में मग्न हो जायेगा। बस, दो ही तो निर्णय हैं। एक ज्ञान का विलास और एक अज्ञान का विलास।

अज्ञान में अस्थिर कल्पनायें– आज जो लड़का आपके घर में है और पड़ोसी के यहाँ मरकर जन्म ले ले तो उससे तो आपकी प्रीति नहीं रहती। और आज ऐसे लड़के से जिससे कि नफरत है, आप जिसे पराया जानते हैं मरकर आपके घर में जन्म ले तो आप उससे ममता करने लगते हैं। अरे जो अच्छा हो उसे ही अपना मान लो। पैदा हुए व कुछ बड़े हुए बच्चे का कुछ अच्छेपन का तो पता पड़ेगा, किंतु अच्छा हो या बुरा हो कैसा ही हो, पैदा होने से पहिले ममता हो गयी। हमारा बच्चा होगा। तो जब तक यह अज्ञान रह रहा है तब तक यह जीव दु:खी है।

चैतन्यमहिमा―यह आत्माराम केवल चैतन्यमुद्रा का धारी है और अपने आप में बसा हुआ जो ध्रुव धर्म है ज्ञानप्रकाश, उसका अधिकारी है। यह औपाधिक भाव से परे रहने के स्वभाव वाला है। कर्मफलों के भोगने का इसका स्वभाव है ही नहीं। जो इसे पहिचानते हैं उनको यह प्यारा है, यह केवलज्ञान से जाना जाता है। ऐसा ह्रदय इस आत्मस्वरूप को नहीं जान सकता कि जाप भी दे रहे, पूजा भी कर रहे, पर घर की खबर आ रही है; धन की, परिवार की भी खबर आ रही है। ऐसी परदृष्टि की तीव्रता वाले पुरूषों के यह ज्ञाननिधान आत्मा भगवान प्रकट नहीं होता। यह समस्त परपदार्थों से भिन्न है। जो इस आनंदमय अपने स्वरूप को तक लेता है वह इस जगत से विरक्त रहता है, उसके ममत्व नहीं होता।

वस्तुविज्ञान―भैया ! वस्तुस्वरूप के विज्ञान की महिमा अतुल है। यदि यह वस्तुविज्ञान न मिले तो यह सर्वत्र दु:खी ही दु:खी है। ठहर तो सकता है नहीं यह अपने में, शांति पायेंगा कहाँ ? जो जीव शांति पाते हैं वे अपने आप में समाते हुए की पद्धति से पाते हैं। परकी और झुके हुआ कोई संतोष नहीं प्राप्त करता। तो पर से उपेक्षा करके अपने इस आत्मस्वरूप को देखो और इन सर्वजालों से उठकर मुक्त होओ। प्रभु वीर के भक्त हम तब कहायेंगेजब प्रभु वीर के उपदेश पर हम चलें। उनका उपदेश यही तो है कि ऐसा ज्ञान प्राप्त करो जिससे विषय और कषाय उपयोग दूर हों। यही मुक्ति का उपाय है। धनकी तृष्णा करने के बजाय ज्ञानकी तृष्णा करो। देखो जिसकी जिसमें रूचि है वही तो उसे प्रिय है। कोई कहता है कि शक्कर मीठी होती है, कोई कहता है कि दाल मीठी है, कोई कुछ मीठी बताता है, तो जिसका जहाँ मन लग गया वही मीठा उसे लगता है। जरा ज्ञान की उन्निनीषा उत्पन्न तो हो, देखो कितना आनंद आता है ?

ज्ञान की हितकारिता व स्वाधीनता―भैया ! धन की कमाई तो है पराधीन, पर ज्ञान का अर्जन है स्वाधीन। धन की कमाई तो है शंका, बीच में नष्ट हो जाय, कोई छुड़ा ले,, लूट ले, पर ज्ञान की कमायी में शंका नहीं, कोई लूट नहीं सकता है। तो जरा धन और ज्ञान इन दोनों का मुकाबला तोकरो। ज्ञान में तो आदि से अंत तक लाभ ही लाभ है और धन में लाभ नहीं है। मान लिया कि मैं अच्छा हूँ, मेरी इज्जत है, पोजीशन है और धन से क्या हो सकता है ?मानपोषण । अभी जो भिखारी लोग भीख माँगते हैं वे 20-50 जब इकट्ठे होते हैं तो उनमें जो अच्छे ढंग से भीख मांगना जानता है, जिसने सबसे ज्यादा भीख मांग लिया वह उनमें से अपने को महान् समझता है। वह समझता है कि ये सब मुझसे छोटे हैं। तो कहाँ अपना सुख ढूंढ रहे हो, मुकाबला तो करो जरा धन का और ज्ञान का।

लक्ष्मी व सरस्वती का प्राय: अमिलन―पंडित विद्वान कवि लोग ये फक्कड़ देखने में लगते हैं, किंतु संतोषधन से भरपूर हो सकते हैं ये। कहते हैं ना कि लक्ष्मी और विद्या की हमेशा लड़ाई रही, जहाँ उल्लू वाहन हो वहां हंसवाहन नहीं रहता। लक्ष्मी की सवारी क्या बतायी ? लक्ष्मी उल्लू पर सवार रहती है और सरस्वती हंस पर सवार रहती है। ऐसे विरूद्ध सवारी वाले ये दोनों इकट्ठे कहां मिलेंगे ? अभी कुछ यहीं देख लो कि संतुष्टि अंत:प्रसन्नता सरस्वती याने ज्ञान की ओर झुकने में रहती है या लक्ष्मी की ओर आँख फाड़ने में रहती है ? अरे कोई यह सुनकर बुरा न मानें, वे समझलें कि हम लक्ष्मी वाले हैं , नहीं तुम अपने आपको यह समझ लो कि हम लक्ष्मी वाले हैं ही नहीं। फिर बुरा कैसे लगे ? अपने से विशाल धनिकों पर दृष्टि दो फिर आप किसे कहेंगे कि यह धनी है ? नाम फिर बतावो भैया, आप लोग कोई कमेटी बनालो निर्णय करलो कि किसको धनी कहा जाय ? कर लो निर्णय । और निर्णय हो जाय तो हमें भी बता दो, क्योंकि हमें जगह-जगह जाना पड़ता है तो हम लोगों को सुना देंगे। क्या आप लाख वाले को धनी कहेंगे ? जरा लाख वाले के सामने किसी करोड़पति को खड़ा कर दो तो लो वह लखपति उसके सामने गरीब हो जायेगा।

ज्ञान में सर्वदा निराकुलता―भैया ! धन के अर्जन में आदि से अंत तक कहीं चैन नहीं ,किंतु ज्ञान के अर्जन में आरंभ से अंत तक लाभ ही लाभ है। अनंत कर्म कटे, आनंद मिले, जरा भी क्लेश न रहें। धन में केवल कल्पना से जरा सा सुख मानते हैं, सोवह सुख भी क्षोभ के काल में हो रहा है। भैया ! विषयों का सुख शांति से कोई नहीं भोगते, क्षोभ करके आकुलता करके भोगते हैं। आकुलता दोनों जगह है। सांसारिक सुख में और विपत्तियों में। बस केवल नागनाथ और सांपनाथ जैसे शब्दों का भेद है। इंद्रियों को कोई बात सुहावनी लग गयी तो क्या वहां अनाकुलता प्रकट होगी ? खूब देख लो। कोई विषय इंद्रियों की असुहावना लगेगा। तो क्या उस इंद्रिय सुख से कोई ऊंची नीची दशा पा लिया ? क्या उस सुख में दु:ख से कोई ऊंची दशा पाली ? दोनों ही जगह आकुलता प्राप्त हुई।

आराम व संकट दोनों में आकुलता―आप लोग जैसे मान लो भिंड से कहीं जाते हैं तो टिकट लेने में आकुलता, गाड़ी आने पर सीट लेने में आकुलता, फिर अच्छी सीट मिलने पर आकुलता, गरीब लोग खड़े हैं आप सीट पर पड़े हैं पर पैर अच्छी तरह फैला न पाने में आकुलता। पैर भी पसर गये तो अहंकार कर करके आकुलता मचाई जाती है। जगह-जगह देख लो आकुलता ही भरी है। दूसरे से अपने को बड़ा मानने में भी आकुलता हैं। अब तो हमें अच्छी जगह मिल गयी ऐसा हर्ष मानने में भी आकुलता है, और जब बेकार बैठ गये ना, दु:ख न रहा तो विकल्पों की कूदाफांदी चलने लगी, देखलो सब दशावों में उनकी आकुलता। खाने पीने में भी देख लो, कौन शांति से कौर उठाता और मुंह चलाता है ? अशांति से ही उठाता है। शांति होती तो कौर उठाने की क्या जरूरत थी ? सभी इंद्रियों के भोग आकुलता से भोगेजाते है।

ज्ञान की अर्ज्यता―भैया ! ये वैभव तृष्णा के योग्य नहीं है। तृष्णा के योग्य हैं, जिसे कमावो खूब, ऐसी कोई चीज है तोवह है ज्ञान। तो जब वास्तविक वस्तुस्वरूप का ज्ञान होता है तो इस जीव को अनाकुलता होती है। जानता है कि मेरा कहीं कुछ बिगाड़ नहीं हैं। घर गिर गया तो क्या, कोई गुजर गया तो क्या, किसी के इज्जत न की तो क्या ?यह सब पर पदार्थों का परिणमन है। किसी ने मेरा नाम नहीं लिया तो क्या ? ये सब परपरिणमन है। यहां करने के योग्य तो कुछ काम ही नहीं है। किया भी नहीं जा सकता ।

आत्मा की परिपूर्णता―यह मैं आत्मा परिपूर्ण हूँ, कृतार्थ हूँ। क्या मैं अधूरा हूँ जो कुछ बनने को पड़ा हूँ ? नहीं, मैं तो सत् हूँ, परिपूर्ण हूँ। हममें जब जो परिणमन होता है वह पूरा ही होता है। अधूरा कोई भी परिणमन नहीं होता है। बुरा परिणमन में तो पूरा का पूरा परिणम गए, अच्छा परिणमे तो पूरे के पूरे परिणमे। हम अधूरे हैं कहाँ ? मैं पूर्ण हूँ, और मुझमें से जो निकलता है वह पूर्ण ही निकलता है और देखो पूर्णों की परंपरा कि दूसरा पूर्ण निकलता है तो पहिला पूर्ण, पूर्ण विलीन हो जाता है। पूर्ण विलीन हो जाता है, फिर भी यह पूर्ण रहता है और इस पूर्ण आत्मतत्व में से पूर्ण-पूर्ण परिणमन चलता रहता है। यहाँ और क्या नाता है किसी से ?यह मैं आत्मा न पर का कर्ता हूँ, न पर का भोक्ता हूँ। यह मैं प्रभुवत् ज्ञान और आनंदस्वरूप ही हूँ। जिसका कार्य ज्ञाता दृष्टा रहना और आनंदमग्न होना है।

ज्ञानप्रतिगमन―भैया ! किसी भी परपदार्थ से हठ कर लिया जाय, यह कितना उल्टा काम है ? किसी क्षण यह जीव अन्य सभी को भुलाके केवल ज्ञानज्योति का ही दर्शन करे तो इसके अनाकुलता होगी।बोलते हैं ना, तमसो मा ज्योतिर्गमय। हे ब्रह्मस्वरूप  ! तू अंधकार से उठा और मुझे ज्योति में ले चल। मा का अर्थ है मुझको। यह मा निषेधात्मक शब्द नहीं है। अंधकार है मोह का और ज्योति है यथार्थ ज्ञानका। तो उस अंधकार से निकालकर हे आत्मन् ! अब तुम उस ज्योति में ले चलो, ज्ञान में ले चलो।

मोही के मोह की अरूचि का अभाव―देखो तो भैया ! जो बात भोगते भोगते पुरानी हो जाती है या जिस मित्र से मिलते-मिलते बहुत दिन हो जाते हैं उससे अरूचि हो जाती है। जैसे पाहुनों की यह दशा है। पहिले दिन रहा तो पाहुना, दूसरे दिन हे तो पई, तीसरे दिन रहे तो बेशरम सई। तो बहुत दिन रहने के बाद उसका उतना आकर्षण नहीं रहता। उससे अरूचि जग जाती है। मगर यह जीव अज्ञान के साथ अनादि से रह रहा है, पर इसे अज्ञान से अरूचि नहीं होती। मोह मोह में ही पल रहा है पर मोह से अरूचि नहीं होती।

संकट सहकर भी संकट के आश्रय का मोह―घर के बब्वा चाहे कितना ही दु:खी हो जायें, पोता मारें, नाती मारें, सिर पर चढ़े, बच्चा रोनेभी लगे, पर कितना ही समझावों कि बब्बा क्यों दु:खी हो रहे हो। अरे घर छोड़ दो, देखो आश्रम में रहो, अमुक संग में रहो, तुमको बच्चे दु:खी कर रहे हैं। बहुवें भी तुम्हें अच्छी तरह नहीं रखती, खाने का टाइम आया तो कह दिया कि लो, ठूंस लो सारे क्लेश हैं। अरे जरा घर छोड़ दो, आराम से रहो आश्रम में सत्संग में। तो बब्बा उत्तर देंगे कि वे बच्चे, लड़के, पोते हमें चाहे मारें, चाहे पीटें, पर वे हमारी नाती पोते मिट तो न जायेंगे। हम उनके बब्बा ही बने रहेंगे, वे हमारे नाती पोते ही बने रहेंगे। बब्बा को यह पता है कि हमारे नाती और पोते का संबंध सारी दुनिया जानती है, भगवान के यहाँ रजिस्ट्री है। ये तो न मिट जायेंगे। मोह में पगे रहते हैं।

पर्याय का व्यामोह―भैया ! मुनिराज से एक राजा ने उपदेश सुना। राजा ने अपना भव मुनिराज से पूछा। तो मुनिराज ने बताया कि फलाने दिन इतने बजे मरकर फलानी जगह तुम संडास में कीड़ा बनोगे। राजा इस बात को सुनकर बड़ा दु:खी हुआ। लड़कों से कहा कि देखो अमुक समय पर अमुक जगह में मैं विष्टा का कीड़ा बनूंगा, सो मुझे मार डालना। विष्टा का कीड़ा होना मुझे पसंद नहीं है। अच्छा दद्दा। वह राजा मरकर कीड़ा हुआ। लड़का उसी स्थान पर उसी समय पहुंचा। उसने टट्टी में वह कीड़ा देखा। जब कीड़े को मारना चाहा तो वह कीड़ा उसी मल में घुस गया उसने मरना नहीं चाहा। इसी तरह जो जीव जिस पर्याय में पहुंचता है वह उस पर्याय में मोही हो जाता है। अब यह बतलावो कि गैया के जो बछड़े हैं वे उस गैया के लिए अच्छे हैं या तुम्हारे लड़के ? गैया के बछड़े ही अच्छे हैं। गैया से पूछो कि उसे कौन अच्छे लगते है? तो उसे तो अपने ही बछड़े अच्छे लगते हैं। तो यह जीव जिस जगह जाता है उसी जगह के समागम में मोह में आसक्त हो जाता है। तो जरा ज्ञान को संभालो अपना कहाँ कुछ नहीं है। पर कुटेब ऐसी लगी है कि छोड़े नहीं जा रहे हैं। छोड़कर तो सब कुछ जाना ही पड़ेगा। अपने ही आप पर दृष्टि दें और इस दुर्गम समागम से लाभ उठावें।

जैनसिद्धांत का अतुल मूल उपदेश―बंधुवों ! चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्म-जयंती आज मनायी जा रही हैं। जैनधर्म के संबंध में और महावीर भगवान के संबंध में पूर्ववक्तावों ने बहुत कुछ कह ही दिया हैं। जैसे कि पंडित सुमतिचंद्रजी शास्त्री ने बताया कि जैनधर्म के संस्थापक भगवान महावीर नहीं थे किंतु अनादि से ही यह धर्म चला आ रहा हैं। जैनधर्म कहो, वस्तुधर्म कहो, आत्मधर्म कहो सबका अर्थ एक हैं। तो कोई पूछे कि जैनधर्म की वे विशेषताएँ तो बतावो जो सबसे निराली विशेषताएँ हों और जिनके बिना हमें कोई शांति का मार्ग न मिल सके तो, वह विशेषता है केवल एक वस्तुविज्ञान की। पापों का छोड़ना सभी कहते हैं, तपस्या में लगना सभी कहते हैं, और यह जैनधर्म में भी बताया है। राग-द्वेष कषाय बुरी चीज हैं। जिसके कारण परेशानी रहा करती है। सब सुखी हैं, पर जहाँ राग का कोई भाव आया और किसी से बैर विरोध का भाव आया वहाँ दु:खी हो जाते हैं। तो रागद्वेष हटना सब कहते हैं पर ये सारी चीजें कैसे बनें ? उसका मौलिक उपाय क्या हैं ? वह उपाय साधु संतों ने बताया हैं। सो जो पारखी होता हैं, जौहरी होता हैं, वह उनके मर्म को और गुणों को जानकर हर्षोल्लसित हो जाता हैं। मूल उपाय यह बताया है कि तुम जगत के सभी पदार्थों का यथार्थ ज्ञान तो कर लो।

वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञान―यथार्थ ज्ञान के मायने यह हैं कि कोई भी पदार्थ अपने आप अपनी ओर से अपने अस्तित्व के कारण स्वयं कैसा है, यह जान लिया तो सारे क्लेश मिट जायेंगे। आज जो इतने अन्याय हो रहे हैं और सभी कर रहे हैं पूर्व वक्तावों ने बताया और जगह भी कहते हैं कि जैन समाज परिग्रहवाद में मस्तहैं, या कदाचित् कभी ईमानदारी से गिर जाते हैं। हम तो देखते हैं कि यह दुष्काल का प्रभाव है कि जैन ही क्या सभी लोग प्राय: ईमानदारी से हट कर कुदृष्टि में मस्त हैं। व्यापार करने वाले व्यापार के ढंग से अपना दाव बनाकर अन्याय करते हैं तो सर्विस वाले रिश्वत लेकर मस्त होते है। जिनसे रिश्वत लेते हैं जो रिश्वत देते हैं उनके दिल से पूछो कि उन्हें दु:ख होता है या नहीं। और एक-एक की बात कहें तो किसी को बुरा मानने की बात नहीं है। सभी की बात कही जा रही हैं। इन अन्यायों का मूल वस्तुस्वरूप का अज्ञान हैं।

परिज्ञान का दुरूपयोग―वकीलों का धर्म था कि सच्ची घटना हो तो उसकी पैरवी करें। और जान रहे हैं कि यह घटना झूठ है तो भी उसे हटा नहीं देते कि हम वकालत न करेंगे और हम ईमानदारी से वकालत करेंगे। बात झूठ भी है फिर भी कहते हैं कि अच्छा तुम्हारा काम ठीक हो जायेगा। तो जानबूझ कर झूठी घटना सही साबित करने की कोशिश करना, रिश्वत लेना, क्या इसे ब्लैक न समझेंगे। उनकी बात अच्छा छोड़ो, अफसर लोग क्या रिश्वत नहीं लेते हैं। वैसे हम इन बातों में घुसे नहीं हैं पर हम तो समझते हैं कि काल के प्रभाव से ऐसा ही सर्वत्र प्राय: होता हैं। हमीं त्यागी लोगों को देखो-जैसी भीतर में बात है उसके अनुसार ही कहाँ बाहर में अपनी वृत्ति रखते हैं। तो यह क्या हम त्यागी लोगों का ब्लैक नहीं है? यह दुष्काल का ही प्रभाव है कि ऐसा ब्लैक चल रहा है। हम सबकी कह रहे हैं बुरा नहीं मानना। अफसर डॉक्टर त्यागी संयमी, सर्विस वाले सभी लोग ऐसा करते हैं।

साक्षिता की मट्टीपलीत– कहते हैं कि गवाह का दर्जा जज से भी बड़ा होता है। गवाह उसे कहते हैं जो साक्षी हो। जैसा देखा हो वैसा ही कहने वाला हो। किंतु जज स्वयं कह देता है कि अरे तुम्हारा गवाह भी हैं ? इसका पूछने का मतलब है कि तुम्हारे पक्ष की कोई बात कहने वाला हैं? नहीं तो यह कहता कि तुम्हारा इस घटना का कोई गवाह है। वादी प्रतिवादी से न पूछकर सत्य क्यों नहीं पूछता कि इस घटना का कोई गवाह है क्या ? जज जबयह पूछता कि तुम्हारा गवाह कोई भी है तो वह कहता है कि हां हां ठहरो 5 मिनट, अभी गवाह बाहर से लाते हैं। वह गया बाहर किसी से कह दिया कि यों कहना हैं तुम्हें 2) देंगे। वह दो रूपये लेकर वैसा ही कह देता हैं। तो क्या यह ब्लैक नहीं है ?

वीतरागधर्म की मान्यता वालों में अन्याय की खटक―भैया ! अपराध की बौछारों से अब अधिकतया जैनियों को ही परेशान किया जा रहा है, उन्हें ही लोग कहते हैं इसका कारण क्या है ? इसका कारण यह है कि जैनधर्म के प्रति दुनिया की निगाह स्वच्छता की भरी हुई है। इसलिए दुनिया की निगाह जैनियों पर ही जाती है कि ऐसा ऊँचा तो धर्म है, फिर ये क्यों करते हैं? एक-एक सुधरे तो सब सुधरें। अब हम तो तुमसे कहें और हम खुद न सुधरें, तुम तीसरे से कहो और खुद न सुधरो तो इसका मतलब है कि एक भी नहीं सुधरा और क्रम क्रम से एक-एक सुधरे तो सुधरने की संख्या ज्यादा मालूम पड़े। लोग यह सोचते हैं कि दूसरों से बातें खूब कहे, अपन न सुधरे तो क्या हुआ, 10 लोग और तो सुधर जायेंगे। पर ऐसा ही सब सोच रहे हैं कि मैं न सुधरूँ और ये सुधर जायेंगे तो कौन सुधरा ? बतलावो।

प्रत्येक के दुर्विचार में सामूहिक विडंबना―एक बार किसी राजा ने मंत्री से पूछा कि मंत्री यह तो बतलावो कि अपने नगर में सभी प्रजा लोग सच्चे आज्ञाकारी है या नहीं और भक्त हैं या नहीं तो मंत्री कहता है कि महाराज न कोई भक्त हैं और न कोई आज्ञा मानने वाला है। राजा ने कहा कि ऐसी बात नहीं है। हम तो जब नगर में जाते हैं तो प्रजा लोग मार्ग में हमारे सामने हाथ जोड़कर सिर नवाते। मंत्रि ने कहा कि अच्छा हम दो दिन में परिचय करायेंगे। मंत्रि ने नगर में इत्तला करा दिया कि महाराजा को 5-7 मन दूध की जरूरत है तो आज रात्रि को आँगन में जो हौज है उसमें सब लोग अपने अपने घर से एक-एक लोटा भर दूध डाल दीजिए। सभी घर में बैठे-बैठे सोचते हैं कि सब लोग तो दूध ले ही जायेंगे। अपन एक लोटा पानी ले चलें तो वह पानी उस सारे दूध मेंखप जायेगा। सभी ने ऐसा सोच लिया। सभी ने एक-एक लोटा पानी डाला। पानी से सारा हौज भर गया। सुबह देखा गया तो सारा का सारा पानी था।

हित की आवश्यकता―भैया ! क्या यह ब्लैक नहीं है ? जो धर्म के नाम पर खूब भाषण झाड़े और उसके अनुरूप अपना सुधार न करें। बोलने के समय अपनी शांतमुद्रा बनालें और अभी बैठे-बैठे गुस्सा हो रहे थे। तो क्या यह ब्लैक नहीं है ? तो यह सब काल का प्रभाव है। पर चिंता कुछ नहीं करना है। इस संसार में न तो कोई आपको जानता है और न कोई हमें जानता है। यहाँ तो चुपचाप अपने में घुसकर अपने में कल्याण की भावना करके अपना सुधार करलें और बिदा हो जायें। यह काम करने का है, बाहर में निगाह डालने का, पैर पसारने का काम नहीं है। ऐसा कोई कर सके तो वह है आत्मवीर और जिसका भवितव्य ठीक होगा वह ऐसा कर सकेगा।

यहाँ यह बात कह रहे हैं कि जिन शासन की सबसे प्यारी देन है वस्तुविज्ञान। पदार्थ स्वयं कैसी है, जो विज्ञान से सिद्ध हो, युक्ति से सिद्ध हो, बाबा वाक्यं प्रमाणं में बहाना न पड़े वह वस्तुविज्ञान है। हाथ में रखकर सामने चीज रखकर देख लो खूब कि प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र है। पदार्थों में मिला जुला जो है उसकी बात नहीं कह रहे है। जो एक है। जैसा एक एक जीव है और एक-एक अणु है आदि। ये दिखने वाले सब धोखा है, मिटने वाले हैं। एक-एक अणु एक-एक जीव ऐसे सभी पदार्थ ले लो। वे सब पदार्थ जो अपना परिणमन करेंगे, अपनी अवस्था बनाएंगे। वे पदार्थ अपनी अवस्था में ही तन्मय होते है, दूसरे की अवस्था में तन्मय नहीं हुआ करते हैं। खूब निगाह रखकर देख लो। प्रत्येक पदार्थ अपनी नई अवस्था बनाते हैं पुरानी अवस्था विलीन करते हैं और वे वहीं के वहीं बने रहते है। जो पदार्थों का स्वभाव पड़ा हुआ है इसी को सत्त्व रज तम कहो, इसी को उत्पाद व्यय ध्रौव्य कहो, यही पदार्थ का स्वरूप है।

शांति का मूल वस्तु का सम्यक्ज्ञान―पदार्थ का यह परिपूर्ण स्वतंत्र स्वरूप जानने में कमाल क्या है ?चमत्कार क्या है कि जहाँ यह समझ में आ गया कि प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप से बाहर नहीं जा सकता। न बाहर किसी का कुछ काम है। यदि ऐसा ही मैं अपने को जानूँगा तो मोह न रहेगा, बैर किसी से न मानूंगा, किस पर बैर किस पर राग ? जब राग और बैर की भावना है तो ब्लैक और क्या चीज हैं? जब तक अंतर में ज्ञान न जग सके, अपने को आकिंचन न मान सके तब तक ब्लैक नहीं मिट सकता। इसलिए भाई अपने-अपने में सुधार की बात में लगें, इसी में भलाई है और इसी से ही दुर्लभ नरजीवन की सफलता है। बाहर कहाँ देखते हो, किसको देखना है ? यह काम कर सके तो समझ लो ठीक है। यहाँ दिखाना नहीं, बनाना नहीं, सजाना नहीं किंतु गुप्त ही गुप्त अपने आप में अपना हित सोचकर अपने में श्रद्धा, दर्शन, ज्ञान बनाएँ और अपने आपके आत्मा का आचरण बनाए तो इससे ही सिद्धि होगी, अन्य प्रकार सिद्धि न होगी।

वस्तु निरख की दृष्टियां―पारखियों के परखने की दृष्टियां चार होती हैं-परमशुद्ध निश्चयनय, शुद्ध निश्चयनय, अशुद्ध निश्चयनय और व्यवहारनय। परमशुद्ध निश्चयनय में पदार्थ का शुद्धस्वरूप , मात्र स्वभाव देखा जाता है। उसके न बंध है, न मोक्ष है, नसंयोग है, न वियोग है, न कर्तापन हैं, न भोक्तापन है, सर्व प्रकार की कल्पनावों से रहित केवल शुद्ध चैतन्य स्वरूप का जो परम शुद्ध निश्चयनय बताया है वह अनादि अनंत सर्व आत्मावों से अंत:प्रकाशमान हैं। जो जीव परिणमन में अशुद्ध भी हो रहे हैं वे जीव भी स्वरसत: परमशुद्ध निश्चयनय के विषय के अनुसार अंत:स्वरूपी है।

हित का वास्तविक आश्रय―जीव अशुद्ध है वर्तमान में और यह वस्तु का स्वरूप है कि जीव किसी पर का आलंबन नहीं कर सकता। परपदार्थ इसके उपयोग के विषयभूत तो होंगे पर किसी परपदार्थ का आश्रय नहीं किया जा सकता क्योंकि अपने आपसे बाहर अपना आश्रय नहीं बन सकता। बाहर अपने प्रदेश हैं नहीं, तो किसके आश्रय रहें ? सो पर पदार्थ में यद्यपि अरहंत व सिद्ध अनंत प्रभु हैं किंतु किसी परपदार्थ का कोई अन्य वस्तु आश्रय नहीं कर सकता। भक्त तो केवल अपने गुणों का परिणमन बनाकर रह जाता है, गुणों का स्मरण रूप परिणमन करके रह जाता है किंतु किसी परमात्मा का हम आश्रय नहीं कर पाते हैं, उनमें हम प्रवेश नहीं कर सकते हैं, उनका हम अपनी ओर आकर्षण नहीं करा पाते हैं तो पर से तो विविक्त हो गए और हैं खुद अशुद्ध। यदि इस अशुद्ध को देखें तो शुद्ध का विकास नहीं हो सकता। अशुद्ध के दर्शन से अशुद्ध के प्रत्यय और आलंबन से अशुद्ध परिणमन ही होगा। तब किसका आलंबन लें जिससे हमारा मोक्षमार्ग प्रकट होवे? वह हैं निज शुद्ध आत्मतत्व का आलंबन।

पारखी के सारभूत वस्तु का आदर―एक राजा की सभा में किसी विद्वान कवि का, विद्वान का अधिक आदर न होता था तो एक विद्वान कहता है कि हे राजन् ! यदि तुम इन लोगों में मंद आदर वाले हो गए हो तो क्या तुम ही एक हमारे प्रभु हो ? यदि उन भिल्लनियों ने जिनको गुन्चियों का ही परिचय है वे यदि मोतियों को पैर घिसने में काम लाती हैं तो क्या वे ही मोतियां पटरानियों के गले में शोभा को नहीं प्राप्त होती ? इसी तरह यदि ज्ञानपुंज इस आत्मतत्व का अज्ञानी जनों ने जो किसी प्रतिकूल उदय के कारण अपने सच्चे आशय से जुदा हुए हैं, विषय-कषायों में आसक्त हैं उन्होंने यदि इस शुद्ध सहज आत्मतत्त्व का आदर नहीं किया हैं तो क्या यह सहज आत्मतत्त्वयोगी पुरूषों के उपयोग में विराजमान नहीं होता ?

जैन सिद्धांत का सारभूत यदि कुछ उपदेश है तो वह यह ही है कि अपने अज्ञान को मिटाना। लोक में कोई किसी के द्वारा बंधा हुआ नहीं। किसी के द्वारा कोई परिचित नहीं, किसी के परिणमाए परिणमता नहीं, किसी से रंच संबंध नहीं, फिर क्यों यह अपने स्वरूप से चिगकर, बाह्य पदार्थों में दृष्टि देकर अपने क्षण निष्फल खो रहा है ? इस प्रभु के महात्म्य को अंतर में देखो और अंतर में ही निवास करके प्रसन्न रहो अर्थात् निर्मल रहो। ऐसा यदि हम आप नहीं कर पाते हैं तो यह हो-हल्ला का नदी का वेग की तरह बहता चला जा रहा है। यह वापिस लौटकर नहीं समय आने का है।

शुद्धनिश्चयदृष्टि की नजर―इस शुद्ध स्वभावी आत्मतत्व में यदि यह विकार आ रहा है अनादि से तो अपने अज्ञान सेआ रहा है। ज्ञानी का परम शुद्ध निश्चयनय वहाँ भी केवल अखंड आत्मस्वभाव को ग्रहण करता है। इस शुद्धस्वभाव के अनुरूप विकास की ग्रहणिका दूसरी दृष्टि है शुद्ध निश्चयनय की। शुद्ध निश्चय नयका विषय है शुद्ध प्रकाश। अरहंत और सिद्ध प्रभु का जो शुद्ध विकास है उस शुद्ध विकास को यदि इस अपेक्षा से न देखें कि यह कर्मों के क्षय से हुआ है और केवल उनके ही आत्मा को देख कर ही शुद्ध विकास निरखें तो यह विकास का निरखना शुद्ध निश्चयनय का विषय है।

अशुद्धनिश्चयदृष्टि की नजर―अशुद्ध निश्चयनय देखता है पदार्थ की अशुद्ध परिणति। यद्यपि ये पदार्थ परनिमित्त को पाकर ही विभावरूप परिणमते हैं पर निमित्त पाये बिना केवल अपने आप अपने स्वरूप से अपने ही सत्व के कारण विभावरूप नहीं परिणमते, फिर भी अशुद्ध निश्चयनय की दृष्टि किसी पर को न निरखकर केवल एक को देखने की है। इस अशुद्ध परिणत एक की इस दृष्टि में जो जीव रागी है, द्वेषी है, विभावरूप परिणमने वाला है, यह निरखा जाता है। इसे निश्चयनय इसलिए कहते हैं कि उपाधि के निमित्त से पर को नहीं देखता यह।

व्यवहारनय की नजर―व्यवहारनय का विषय है वैज्ञानिक विषय। निमित्तनैमित्तिक भाव देखना, संबंध निरखना, उनका कार्यकारण भाव देखना यह सब है व्यवहार का विषय। कर्मों के उदय का निमित्त पाकर आत्मस्वभावरूप परिणमता हुआ कैसा यह व्यवहारनय का विषय है ? व्यवहारनय में यह बात ज्ञात होती है कि ये रागादिक भाव जीव के नहीं हैं। पुद्​गलकृत हैं, नैमित्तिक भाव हैं, पौद्​गलिक हैं।

नयों के निर्णय से कल्याण मार्ग में सहयोग―इन चार दृष्टियों से जो चार प्रकार का निर्णय होता है ये चारों ही निर्णय आत्मा को कल्याणमार्ग में प्रेरणा देते हैं। परम शुद्ध निश्चयनय तो स्पष्ट कल्याण मार्ग दिखाता है। देखो इस अपने अंतर में विराजमान शुद्ध चैतन्यस्वरूप को, इसकी दृष्टि के प्रसाद से सर्व मल दूर हो जायेंगे, गुणों का विकास होगा। तुम तो परमार्थत: जैसे हो वैसे मान लो। क्या फल होगा इसका कुछ विचार न करों। परम शुद्ध निश्चयनय कल्याणमार्ग की सीधी प्रेरणा देता है। शुद्ध निश्चय नय जैसा शुद्धस्वभाव के अनुरूप शुद्धविकास हुआ है उस शुद्धविकास को देखकर अन्य की दृष्टि हटाकर उस शुद्ध विकास की दृष्टि के मार्ग से शुद्ध स्वभाव में पहुँचाता है। यह कोमल प्रक्रिया है, सुकुमार पुरूषों की औषधि है, उन्हें खेद न हो, शीघ्र शुद्ध स्वभाव में उनकी पहुंच बने इसके लिए परमात्मस्वरूप का स्मरण है। जैसा वह स्वरूप प्रकट हुआ है ऐसी ही वह शक्ति है, अत: उस परम शुद्ध निश्चयनय के विषय में पहुंचना सुगम होता है।

अशुद्ध निश्चयनय के मार्ग से भी साधक का कल्याण की ओर गमन―तीसरे अशुद्ध निश्चयनय की दृष्टि में भी प्रयोजन यह है कि निज अखंड स्वभाव में पहुंच बने, पर यह कुछ कठिन मार्ग है। नीचा ऊँचा मार्ग है, जिस शुद्ध स्वभाव के विपरीत यह परिणमन है, इस विपरीत परिणमन को निरखकर हम शुद्ध स्वभाव में पहुंच जायें, इसमें बड़ा बल चाहिए। असंभव नहीं है, किंतु कठिन है। असंभव तो यों नहीं हैं कि मार्ग निश्चय का अपनाया है। इस अशुद्ध निश्चयनय की दृष्टि में भी इतनी शुद्धता है कि किसी पर पदार्थ को नहीं देखा जा रहा है और इस शुद्ध नीति के कारण इस मार्ग से इस नय की मल पद्धति से परम शुद्ध अखंड स्वभाव में पहुंच सकते हैं।

अशुद्धनिश्चयनय की गतिविधि―यहाँ देखा जा रहा है कि यह आत्मा रागरूप परिणम गया। यह आत्मा अमुक विभावरूप परिणम गया। ईमानदारी यह हुई कि कल्पना में भी निमित्त या आश्रयभूत परपदार्थ की दृष्टि नहीं होती। सो अशुद्ध निश्चयनय प्रयोजन में सफल हो सकता है। जहाँ पर की दृष्टि हटे, तो यह राग परिणमन तो परदृष्टि रूपी जल को पाकर ही हरा भरा हो रहा था, सो जब उसके पालन पोषण का जरिया खत्म कर दिया गया तो यह कब तक बना रह सकता है। इस अशुद्ध निश्चयनय की दृष्टि में प्रथम अशुद्ध परिणमन नजर आता है, मगर यह अशुद्ध परिणमन कहाँ से उठा है, किस उपादान से चला है ? वह कौनसा ध्रुव तत्व है जहाँ से यह अशुद्ध परिणमन गिरा हैं ? उसकी दृष्टि आ जाना प्राकृतिक बात है। क्योंकि अशुद्ध निश्चयनय में भी शुद्ध नीति बनी हुई है।

शुद्धनीति का बल―जो मनुष्य अपनी शुद्ध नीति से चिग जाता है विडंबना उसको ही हुआ करती है। यहाँ अशुद्ध निश्चयनय की दृष्टि में उपासक ने अपनी विविक्तता की नीति नहीं छोड़ी। तो अंदर ही अंदर गुप्त ही गुप्त जिसे स्वरूप की जिज्ञासा हो, चाहे कैसी ही गति हो कि राग परिणमन कुछ हो गया, पर उसके तो जिस पदार्थ से राग परिणमन का उद्​गम हो वह पदार्थ मुख्य हो गया और इस प्रकार इस अशुद्ध निश्चयनय मार्ग से भी यह जीव अखंड शुद्धस्वभाव पर पहुंच जाता है।

व्यवहार का कल्याण की प्रयोजकतारूप में उपयोग―अब रही चौथी दृष्टि व्यवहार नय की। व्यवहारनय का मार्ग भी उस अखंड अद्वैत स्वभाव में पहुंचाने का प्रयोजन रखता है। जैनेंद्र उपदेश में कोई भी ऐसा वचन नहीं है जो कल्याण मार्ग के लिए न हुवा हो, जैसे आगम में छोटे बच्चों की बालबोध किताब से लेकर बड़े योगियों के समयसार ग्रंथ तक समस्त ग्रंथों के अवलोकन में पद-पद पर वीतरागता का प्रयोजन मिलेगा। जिस धर्म की जो नीति है वह हट गयी तो वह उस धर्म का ग्रंथ ही नहीं रहा। तो जैसे हमें वहाँ प्रतिपाठ में वीतरागता का उपदेश मिलता है इसी प्रकार प्रभु के उपदेश से सभी नयों में हमें कल्याण का मार्ग मिलता है सो है ही, मगर कुनय के परिज्ञान से भी हमें कल्याण का मार्ग मिलता है। कैसे मिलता है सो अभी बतावेंगे।

व्यवहारनय से शिक्षा―व्यवहारनय ने यह बताया कि ये रागद्वेष भाव पुद्​गल का निमित्त पाकर उठे हैं। इनसे हमें शिक्षा क्या लेनी है कि ये मेरे स्वभाव से नहीं उठे हैं। मेरा स्वभाव तो शुद्ध ज्ञानस्वरूप है। इस शुद्ध ज्ञायकस्वरूप का आलंबन कराने के लिए व्यवहारनय का उद्​गमन हुआ है। कुनय के परिज्ञान तक से हम किसी प्रकार कल्याणमार्ग पर जा सकते हैं। कुनय को कुनय समझ लें तो कल्याण के मार्ग पर जा सकते हे और कुनय को यदि हम सुनय समझलें तो मेरी फिर दृष्टि में कुनय है ही नहीं, फिर उस दृष्टि से हितमार्ग में नहीं जा सकते हैं।

उपचरितोपचरित असद्​भूतव्यवहार से शिक्षा―एक कहलाता है उपचरितोपचरित असद्​भूत व्यवहारनय । शरीर मेरा है, यह तो उपचरित असद्​भूत व्यवहारनय है। इसमें आश्रय-आश्रयी का संबंध है। पर धन मकान मेरा है यह तो तेज महा मोह का नशा है। उपचार में भी उपचरित ऐसा झूठ यह कथन है, यह बात यदि मालूम पड़ जाय तो इस कुनय के यथार्थ ज्ञान से कल्याण नहीं होगाक्या ? झूठ को झूठ जान लीजिए तो उस झूठ के उपदेश से भी हमें शिक्षा मिली। तो जो कुछ जिनवाणी है वह सब कल्याण के लिए है।

निर्विकल्प पद का उद्यम―भैया ! व्यवहार में कर्तृत्व है, भोक्तृत्व है, बंध है, मोक्ष हैं, किंतु अपने आप के केवल अपने आपको निरखने पर न बंध है, न मोक्ष है, न कर्तृत्व है, न भोक्तृत्व है, किंतु वहाँ केवल ज्ञातृत्व है। आगमों का खूब अभ्यास करलें, खूब जान जायें, क्यों अभ्यास करें ? यों कि जानकर उन सब विकल्पों को छोड़कर आप खाली और सूने बन जायें। लोग कहते हैं कि हम पहिले से ही खाली बने हैं तो आगम के अभ्यास की जरूरत क्या है ? हम यदि पहिले से ही लट्ठपाड़े रहें तो अच्छा है। जब हमें सब कुछ पढ़ लिखकर योनी कुल मार्गणा गुणस्थान सारी बातें सीख-सीखकर, द्रव्यगुणपर्याय भेद, काल की रचना आदि सारी बातें सीख कर फिर सब भूलकर एक ऐसे शुद्ध, पर से शून्य चिन्मात्र जहाँ तरंग नहीं, विकल्प नहीं, सांसारिक प्रयोजन नहीं, ऐसे तत्त्व पर जाना है क्यों आगम का अभ्यास करें । तो भाई आगम के अभ्यास बिना, उसका विविध ज्ञान किए बिना इस अद्वैत अथवा शून्य ज्ञानमय चित्स्वरूपमात्र निज तत्त्व पर नहीं आया जा सकता है।

यहाँ यह बतलाया जा रहा है कि जीव का स्वभाव कर्मफल का भोगना नहीं है क्योंकि कर्मफल का भोगना अज्ञान का स्वभाव है। इसी बात को कुंदकुंदाचार्य देव इस दोहे में कहते हैं।


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