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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 316

From जैनकोष



अण्णाणी कम्मफलं पयडिसहावट्ठिदो हु वेदेदि।

णाणी पुण कम्मफलं जाणदि उदिदं ण वेदेदि।।316।।

प्रकृतिस्वभावस्थिता का परिणाम―अज्ञानी जीव प्रकृतिस्वभाव में स्थित है, इस कारण कर्मों के फल को भोगता है। परंतु ज्ञानी जीव उदय में आए हुए कर्मफल को जानता तो हैं पर भोगता नहीं हैं। भैया ! ज्ञान पाया है, विद्वत्ता पायी है, समझ मिली है तो इन तुच्छ परपदार्थों में चेतन अचेतन में, अन्य पदार्थों में दृष्टि देकर बरबाद करने के लिए नहीं पायी है। कोई भी संकट हों, कोई भी दु:ख हों अथवा न हों, अपने आपके इस ज्ञानसरोवर में अपना उपयोग मग्न करके कषाय मंद कर जब चाहें शांत हो लें, जब चाहें प्रसन्न हो लें। जहाँ अपने स्वभाव से च्युत हुए और पर के स्वभाव में स्थित हुए वहाँ ही कर्मफल भोगा जाता हैं।

प्रकृतिस्वभाव―प्रकृति का स्वभाव है रागद्वेषादिक का परिणमन, अर्थात् प्रकृति के उदय के निमित्त से होने वाले स्वआत्मा का भाव, सो प्रकृति स्वभाव है। उस भाव में जो स्थित है अर्थात् मैं रागरूप हूँ, मैं जैसा चल रहा हूँ वही मैं हूँ। इस प्रकार की जो अपनी हठ किए हुए हैं कर्मफल उन ही को मिलता है, आकुलता और दु:ख उन ही को प्राप्त होते हैं। कोई किसी का साथी नहीं है। फिर क्यों कोई भाव बनाकर अपने आपको दु:खी किये जा रहा है ? कुछ रहा तो ठीक, न रहा तो ठीक। कोई कैसा ही परिणमे उसके ज्ञाता दृष्टा रहना है। कितना उत्कृष्ट पाठ यह जैन शासन सिखाता है, पर हम लोग भिल्लनियों की नाई रतन पाकर भी पैरों को उससे धो-धोकर उसकी कीमत नहीं करते और बुद्धपन में ही अपना जीवन गुजार देते हैं।

उत्तम सुअवसर―यह जिन-धर्म का मर्म परम ब्रह्मस्वरूप का परिज्ञान जिसके लिए बड़े-बड़े योगी जंगल में खाक छानते हैं फिर भी नहीं मिलता है, किंतु हमारे आपके सौभाग्य से बना बनाया भोजन इन ग्रंथों में पड़ा हुआ है। जिन महान् तपस्वियों ने बड़ी साधना करके जो निचोड़ पाया है स्याद्वाद की प्रणाली में उसे ऐसा सही रख दिया है तिस पर भी हम इस ज्ञान की ओर अपनी भावना नहीं बनाते, आकर्षण नहीं बनाते और राग वैर ईर्ष्या वियोग धन संचय और परिग्रह क्या-क्या बताया जाय उनको ही अपनाते रहते हैं। अब अपने आप पर दया करके अपने आपके प्रभु से बातें करिये।

प्रकृतिस्वभाव से अपसरणका उद्यम―क्या ये विभाव अपने हक में कुछ अच्छा कर रहेंहैं ? प्रकृति के स्वभाव में स्थित नहीं होवे। अपने को राग द्वेषादि विभाव रूप मत मान लें। अपने को समझें शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप। यह शरीर भी मेरा नहीं है। यह भी चला जायेगा। और है जब तक यह शरीर बैरी तब तक यह विषयों का आकर्षण करा कर भुलावें में डालकरइस प्रभु पर वैर ही भजा रहे हैं। इस शरीर को जब माना कि यह मैं हूँ तो इस मान्यता के बाद फिर अन्य परपदार्थों से अपना संबंध मानने लगता है। जब अन्य पदार्थों के साथ अपना संबंध मानने लगा तो वे अन्य पदार्थ उसके अधिकार के तो हैं नहीं। उनके परिणमन उनके उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्तता से होंगे, उसकी चाह से न होंगे। तब जैसी चाह किये बाहर में वैसा परिणमन नहीं होता है सो दु:खी होते हैं और जैसी हम चाह किए हुए हैं वैसा परिणमन बाहर में होता है तो भी हम दु:खी होते हैं। एक ओर हर्ष का क्लेश है तो एक ओर विषाद का क्लेश है।

क्लेशहीन कोई परदृष्टा नहीं है। उस क्लेश को मिटाने का कोई अचूक उपाय है तो यही है कि प्रकृति के स्वभाव में स्थित मत हो। अपने को रागादिकरूप न मानकर शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप मानें तो ये सारे संकट टल जायें।

प्रकृतिस्वभावस्थिति से बंधन―अज्ञान उसे कहते हैं जहाँ शुद्ध आत्मा का ज्ञान न हो। अज्ञानी के जब प्यौर (pure) केवल निजस्वरूपमात्र आत्मा का ज्ञान नहीं होता तो वह अपने में और पर में एकत्व का ज्ञान करता है। जब अपना पता तो है नहीं और ज्ञान खाली बैठ सकता नहीं, तो यह ज्ञान किसी को भी जाना करेगा। खुदकी तो मनाही कर दे कि खुद को तो न जानेगा तो पर को जानेगा और इस आत्मा में ऐसा स्वभाव भी पड़ा है कि सदा अहं रूप से अनुभव करे, मगर निरंतर अनुभव बना रहना यह जीव का स्वभाव है। इस ही को कहते हैं श्रद्धान। तो जब स्व और पर में एकत्व का ज्ञान किया और एकत्व रूप से ही देखा और एकत्व रूप से ही परिणमन किया तो अब वह प्रकृति के स्वभाव में बैठ गया। अपने स्वरूप में नहीं बैठा। सो प्रकृति के स्वभाव को भी अहंरूप से अनुभवन करता हुआ यह जीव कर्मफल से बँधता है।

बंधन का लौकिक उदाहरण―जिस मकान को मान लिया कि यह मेरा है उस मकान की दो ईंट भी खिसक जायें तो चित्त से हर्ष खिसक जाता है। ईंट के खिसकने के साथ इस अज्ञान बुद्धि वाले के हर्ष भी खिसक जाता है। यही तो एकत्व परिणमन है। कुछ वस्तुत: एकत्व परिणमन नहीं हो जाता। किंतु परपदार्थ की परिणति निरखकर अपने में हर्ष विषाद करना, अपना विनाश और विलास समझना, यही तो एकत्व परिणमन हैं। सो यह अज्ञानी जीव कर्मफल को अनुभवता है।

ज्ञानी जीव के विभक्त परिणमन का लौकिक उदाहरण―ज्ञानी जीव को शुद्ध आत्मा का ज्ञान हो गया है, इस कारण निज को निज पर को पर इस प्रकार के विभागरूप से जानता है और निज और पर का विभाग रूप से श्रद्धान करता है, निज और पर का विभागरूप से परिणमन करता है। जैसे दूसरे का मकान गिर जाय तो अन्य कोई दूसरा विभाग रूप से परिणमन किए रहता है। मेरा क्या बिगड़ा, मेरा कुछ नहीं गया। यद्यपि यह मोक्ष मार्ग की पद्धति से विभाग परिणमन नहीं है किंतु दृष्टांत कहा जा रहा है। जब तेज वर्षा होती है तो कई जगह मकान गिर जाते है और कोई घर में अकेला ही हो, जवान हो, छोटे-छोटे बालक हों और कदाचित् वही जवान उस मकान तले दबकर मर जाय तो पड़ोसी देखते तो हैं पर वे एकत्व परिणमन नहीं कर पाते, वे विभागरूप से ही परिणमते हैं। कितना खराब काम हो गया, अभी बच्चे छोटे हैं, कथनी भी कर लें और उस परिवार की सेवा के लिए कुछ सहायता भी कर दें, पर विभाग परिणमन रहता है, एकत्व परिणमन नहीं होता।

ज्ञानी जीव का विभक्त परिणमन―भैया ! खुद के सिर में दर्द हो तो उस दर्द का भोगना और दूसरे के सिर में दर्द हो तो उसकी जानकारी करना इन दोनों में कितना अंतर है ? खैर सिर दर्द का तो पता भी नहीं पड़ता। बुखार का तो स्पष्ट पता पड़ जाता है। खुद को बुखार चढ़ता हो तो कैसा एकत्व परिणमन करते हैं, हाय मैं मरा जा रहा हूँ। इससे तो अच्छा था कि कोई ओर रोग हो जाता, या कोर्इ और पीड़ा हो जाती । यह तो बड़ा विकट क्लेश हो रहा है। उसमें वह एकत्व परिणमन किए हुए है और दूसरे का बुखार थर्मामीटर से जान लिया कि इसके 105 डिग्री बुखार है, दया भी करे, उपचार भी करे, फिर भी एकत्व परिणमन नहीं हो सकता। सिर्फ उसके बुखार के जाननहार रहते हैं। यह भी एक लौकिक दृष्टांत है। कहीं ये लोग सम्यग्दृष्टि नहीं बन गए, पर प्रयोजन इतना बताने का है कि जिसको मान लिया कि यह पर है, उसके परिणमन से हर्ष और विषाद नहीं होता है।

ज्ञानी की प्रकृतिस्वभावविविक्तता―ज्ञानी जीव निजआत्मतत्त्व के अतिरिक्त सर्व परपदार्थों को पर मान लेता है। सो स्व और पर के विभाग रूप से परिणमन हो रहा है, प्रकृति के स्वभाव से हटा हुआ है। प्रकृति का स्वभाव है रागद्वेषादिक परिणमन। अपने आप में होने वाले उन विभावों से उपयोग हटा हुआ है। जैसे किसी पुरूष का मन स्त्री पुत्र में नहीं रहा और फिर भी घर में रह रहा है, तो घर में रहता हुआ भी परिवारजनों से हटा हुआ है। यों ही अपने आपमें अपना ही विभाव परिणमन है और फिर भी उन विभाव परिणमनों से हटा हुआ है। देखा होगा कोई पुरूष गलती करने के एक घंटे बाद समझ जाता है कि मैंने गलती की। कोई पुरूष गलती करने के 2 मिनट बाद ही विवेक में आ जाता है कि मैंने गलती की और कोई पुरूष गलती करते हुए के समय ही विवेक में रहता है कि यह गलती की जा रही है। तो जैसे हम लोक में इस तरह के पुरूषों को देखते हैं, यह मोक्षमार्गी हितार्थी पुरूष भी देखो सावधान है कि उसेत्रुटि के समय में त्रुटि विदित होती जा रही है। यही हुआ प्रकृति के स्वभाव से हटना।

अनवधानी का पर में आकर्षण―सो भैया ! प्रकृति के स्वभाव से हटे हुए होने के कारण यह ज्ञानी जीव शुद्ध आत्मस्वभाव को ही अहं रूप से अनुभव करता है। जो ऐसा आत्मावधानी ही है उसका पर में आकर्षण रहता है। अभी भींत में पचासों नाम लिखे हों और आपका किसी का भी नाम लिखा हो तो उसे बहुत जल्दी अपना नाम पढ़ने में आ जायगा और का नाम पढ़ने की अपेक्षा। अपने नाम के अक्षरों को अपने ज्ञान में कैसा बैठाये हुए है ? आधी नींद में हों और कोई धीरे से नाम ले दे तो उसका नाम लेते ही कितनी जल्दी वह जाग जाता है। और उस अधनींद वाले पुरूष कानाम न लिया जाय, उसका नाम लिया जाय जो पास में सो रहा है तो उस अधनींद वाले की नींद नहीं खुलती। तो इन अपने नाम अक्षरों से कैसा यह रंगा हुआ है कि आकुलित रहता है।

नाम व्यामोह―भैया ! जो आपके नाम में जो अक्षर हैं वे ही अक्षर लाखों पुरूषों के नाम में हैं और कहीं हूबहू वही का वही पूरा नाम हज़ारों आदमियों का हो सकता है। जैसे एक भिंडशहर में ही रामस्वरूप कम से कम 5-7 हैं। ज्ञानचंद भी बहुत होंगे, प्रेमचंद भी बहुत होंगे तो हूबहू इस ही नाम के कई पुरूष हों, लेकिन मालूम पड़ जाय कि इस मेरे नाम के और कई लोग हैं तो अपने नाम के आगे दो अक्षर और लगाना पड़ेगा। नहीं तो फिर उस नाम का अर्थ ही क्या रहा ? मान लो जितने मनुष्य हैं सब मनुष्यों का नाम कचौड़ीमल धर दो तो कोई कचौड़ीमल यह न चाहेगा कि हम किसी काम में 5 हजार लगा दें और कचौड़ीमल नाम आ जाय क्योंकि कचौड़ीमल सभी हैं। लोगों की जानकारी में मैं कचौड़ीमल तो नहीं आ पाया। बौद्ध-शास्त्रों में आस्रव के छोड़ने के प्रकरण में प्रथम आस्रव हेतु नाम बताया है और उस नाम के बाद फिर और और कल्पनाएँ चलती हैं।

नामव्यामोहपरिहार की प्रथम आवश्यकता―भैया ! अपने को किस रूप से अनुभव करना, क्या अमुक नाम रूप से अनुभव करना, क्या किसी जाति कुल शरीर रूप से अनुभवना ? नाम जो कोई धराता है सो बढि़या ही धराता है। घटिया नाम धराने का जमाना गुजर गया। जब घसीटा, करोड़े, खचोरे और दमड़ीमल ये नाम रखे जाते थे, अब आज तो ऐसे नाम धराने का जमाना नहीं है। तो जिसका जो नाम है उस नाम का अर्थ लगावो और यहाँ देखो कि सभी का ही यह नाम है, क्योंकि सभी इस अर्थ वाले हैं। नाम का व्यामोह छूटना धर्ममार्ग में बहुत आवश्यक है। अपने को अहंरूप से इस तरह अनुभव करें कि जो ज्ञाता है, दृष्टा है, चेतक है वह मैं हूँ, इस तरह अनुभव करने वाला ज्ञानी पुरूष उदय में आए हुए कर्मफल को ज्ञेयमात्र होने से केवल जानता ही हूँ।

आत्मा की विविक्तरूपता―परभाव को अहं रूप से अनुभवने के लिए ज्ञानी समर्थ नहीं है इसलिए कर्मफल का वह भोक्ता नहीं है। कितनी-कितनी प्रकार के विकल्प करके अपने को अनुभवने लगे हैं किंतु वे विकल्प आप के स्वरूप नहीं है। दूसरा कोई शकल देखकर यदि पहिचान जाय तो ठीक हैं आपके विकल्प। उसके शरीर को देखकर चाहे अमेरिकन हो, चाहे अंग्रेज हो, चाहे भारतीय हो वह देख लेगा जैसा रंग है, जितने लंबे हैं, जो कुछ इसमें हैं, उसको हर एक कोई जान लेगा। हम अमुक संस्था के मैंबर हैं, अमुक कमेटी के कार्यकर्ता हैं, यह तो कोई न जान पायेगा क्योंकि हम यह हैं ही नहीं। अभी तो इस शरीर की ही बात कही जा रही है। फिर प्यौर(pure) आत्मा का तो रहस्य बहुत मार्मिक है।

भगवान के सत् का व सत्य का ज्ञातृत्व―भैया ! भगवान जैसा जानता है वह सब सत्य है। जो असत्य है वह भगवान नहीं जानते। असत्य को असत्य रूप से जान जाय इतनी भी वहां गुंजाइश नहीं है। यों टेढ़ी नाक पकड़ने का क्या प्रयोजन ? जो है, यथार्थ है, परिणमन है वह सब भगवान जानते हैं। पर यह मकान मेरा है, इनका है इस बात को भगवान नहीं जानते, आप जानते हैं। अरे भैया ! भगवान से होड़ न करो। प्रभु को और सूक्ष्मता से देखो तो जो एक-एक द्रव्य है और उनके भूत, भविष्य, वर्तमान जो जो परिणमन हैं वे सब ज्ञात हैं। अनेक द्रव्यों को मिलाकर जो रूपक बनता है वह असत्य है, मायारूप है। भगवान केवल समस्त द्रव्यों को उनकी त्रैकालिक पर्यायों को एक साथ स्पष्ट जानता है। ज्ञानी जीव यहां के अंतरात्मा अशुद्ध पुरूषों को भी जानता है, मगर एक रूप से अनुभव करके नहीं जानता है और अज्ञानी पुरूष अशुद्ध को ही जानता है और उसको एक रूप से अनुभव करके जानता है।

आनंदविघात का हेतु कषाय का भार―जैसे तीन मेंढक हों और एक के ऊपर एक चढ़े हुए हों, चढ़ जाते हैं ना मेंढक एक के ऊपर एक ? तो उन तीनों मेंढकों में सुखी कौन है ? ऊपर का मेंढक और वह कहता है कि-‘हेच न गम’ मुझे कोई परवाह नहीं, अच्छे कोमल गद्दे पर बैठे हैं, तो बीच का बोलता है कुछ कुछ कम। पूरा आनंद तो नहीं है मगर एक ऊपर चढ़ा हुआ है, मेरी इसलिए कुछ कुछ कम चैन है। है थोड़ी थोड़ी जरूर पर नीचे का कहता है कि मरे तो हम। नीचे कंकड़ों पर पड़ा है, जमीन पर पड़ा है और ऊपर से बोझ लदा है, सो ऐसी तीन तरह की परिस्थितियाँ होती हैं जो अशुद्ध को जाने ही नहीं क्या मतलब ? दृष्टि ही नहीं देता है उसको ‘हेच न गम’ और एक अशुद्ध में पड़ गया, परंतु उससे हटा हुआ रहता है वह कहता है कुछ कुछ कम। और जो अज्ञानी बोझ से लदा हुआ है, पर को अहंरूप से अनुभवता है उसकी दशा है मरे तो हम जैसा।

अध्रुव का सदुपयोग―भैया ! आज मनुष्य हैं, पुण्य का उदय है सो जरा सी बात पर इतराते हैं, ऐंठते है दूसरों पर जोर चलाते हैं, किसी हठ पर अड़ जाते हैं और ये जो पेड़ खड़े है यदि ये ही हम होते तो हमारे लिए कहां भिंड होता और कहां ये मकान होते, कहां परिवार होता ? तब तो कुछ नहीं था। तो भाई आज मनुष्य हुए हैं तो हमें सदुपयोग कर लेना चाहिए इस अध्रुव समागम का। विनाशीक चीजें मिली है तो बुद्धिमान् वह है कि जिसने विनाशीक वस्तु के उपयोग द्वारा अविनाशी वस्तु को प्राप्त कर लिया।

शुभ अवसर का सदुपयोग―एक नगर में इस प्रकार राजा बनने की पद्धति थी कि एक वर्ष को बनाया जाय राष्ट्रपति, फिर एक वर्ष बाद उसे जंगल में छोड़ दियाजाय। पैन्शन का झगड़ा न रहेगा। एक साल मौज मानने का नतीजा तय कर दिया गया। सो कई लोग राजा बने और बुरी मौत मरे। एक बार एक चतुर राजा बना। उसने सोचा कि एक वर्ष बाद यह नियम हम पर भी लागू होगा, तो एक वर्ष तक तो हम स्वतंत्र हैं, राजा हैं, जो चाहें कर सकते हैं। सो जंगल में खेतीबाड़ी करवाई, पहिले से ही पचास बैल भेज दिये और छोटा सा मकान बनवा लिया। अब जब एक वर्ष पूरा हुआ तो जंगल में फेंक दिया। तो अब क्या परवाह उसे ? सोभैया ! अवसर पाने का लाभ तो लूटना चाहिए। अब यहां कुछ समय के लिए मनुष्यरूपी राजा बन गए हैं, तो अब राजा बनकर जितने समय को हमें पुरूषार्थ की आजादी मिली है हम पुरूषार्थ कर लें, न करें तो मनुष्य रूपी राजा बनकर यह भी हो सकता है कि हमको नीचे फेंक दिया जाय । मनुष्य से बढ़कर और कहां पहुंचेगा ? सो जंगल में फेंका जाय तो चाहे निगोद बने, चाहे विकलत्रय बने, कोई बुद्धिमान् मनुष्य बन जाय तो जितने समय को मनुष्य है उतने समय के लिए तो इसे स्वतंत्रता है।

तत्काल उचित कर्तव्य की आवश्यकता―एक किंबदंती है कि एक मनुष्य की ऐसी तकदीर बनायी गयी कि वह एक वर्ष तक आनंद से रहेगा खूब दान करेगा, खूब त्याग करेगा और बाकी 49 वर्ष तक दु:ख में रहेगा, दरिद्र रहेगा, दीन रहेगा। बुद्धिमान् था वह। उसने सोचा कि एक वर्ष का मुझे सुख दिया है तो मैं उस सुख के वर्ष का पहिले ही मैं क्यों न उपयोग करूँ ? सो खूब संपत्ति थी, खूब त्याग किया, खूब दान किया, खूब उपकार किया, तो उससे 49 वर्ष की जो बुरी तकदीर थी वह भी बदलने लगी। बस सारा जीवन अच्छा बन गया। किसी किसी मनुष्य की ऐसी आदत है कि थाली में कोई चीज परसी है, भाजी, दाल, रोटी आदि और बूँदी लड्डू आदि भी परसे हों तो वह यह ख्याल करता है कि भाजी रोटी पहिले खा लें और पीछे फिर मुँह मीठा करेंगे। शायद कोई ऐसा भी सोचता होगा कि पहिले मीठे का आनंद लें, पीछे फिर देखी जायेगी। और कहो बीच में बूँदी लड्डू कोई परोसने वाला आ जाये तो जिसकी थाली में नहीं है उसे और मिल गया और जिसकी थाली में पीछे खाने के लिए रखा है उसे न परसा जायेगा तो अच्छे दिनों का उपयोग पहिले करो। बुरे दिन फिर यों ही बिना वेदना के निकल जायेंगे। तत्काल ही तो अच्छा कर लो, भविष्य की क्या चिंता करना ?

सत्य अनुभवन का सुफल–जो योग्य है, विवेकपूर्ण हैं, वह सारा काम उठा लेगा। जो पुरूष अपने को अन्य-अन्य रूप नाना प्रकार अनुभवता है उसके विह्वलताएँ होती हैं। और जो अपने को सबसे न्यारा मात्र ज्ञानस्वरूप निरखता है उसके विह्वलता नहीं होती। इस तरह यह सब निर्णय सुनकर अपने आपको ऐसे पुरूषार्थ में लगाना चाहिए कि हम अपने को अधिक समय तक आकाशवत् निर्लेप ज्ञानानंद स्वरूप एक चैतन्यपदार्थ जो सबसे न्यारा हूँ और कृतार्थ हूँ, मैं अपने आपमें ही जो कुछ करता हूँ सो करता हूँ, मुझे पर में कुछ करने का पड़ा ही नहीं है। निरंतर अपने में परिणमता रहता हूँ। ऐसा विविक्त ज्ञानज्योतिमात्र अपने आपकी श्रद्धा करें तो कर्म फल के भोगों से बरी हो सकते हैं।

सकल विंसवादों का मूल प्रकृतिस्वभावस्थितता―अज्ञानी जीव प्रकृति के स्वभाव में स्थित है अर्थात् प्रकृति के उदय का निमित्त पाकर उत्पन्न होने वाले निज में जो भाव हैं उस प्रकृति स्वभाव को अहंरूप मानकर संतोष किए बैठा है, इसी कारण वह सदा कर्मों के फल का अनुभवने वाला होता है। जड़ एक है और शाखा, पत्ते, फल, फूल कितने बन गए हैं। इसी तरह विसम्वादों की जड़ एक है, उसके सहारे फिर विसम्वाद कितने फैल गए हैं। वह जड़ यही है प्रकृति के स्वभाव में बैठ जाना और उसके विसम्वाद कितने बन गए ?इंद्रिय के विषय में और मन के विषय में आत्महित जान कर कितना तीव्र अनुराग हों गया है ?उसकी सिद्धि के लिए दूसरों का न सम्मान अपमान देखा जाय, न सुख दु:ख देखा जाय, अपने ही अपनेअच्छे भोग उपभोग रूप प्रकृति पड़ने की आफत बन गई है इस मोहग्रस्त अज्ञानी प्राणी को।

अज्ञानियों के महंतों के प्रति रोष की प्राकृतिकता―जैसे कुत्ता कुत्ते को देखकर भौंके बिना रहता नहीं। कोई हाथी निकले तो मनुष्य बड़े चाव से देखेंगे कि आज पशुराज निकले हैं और कुत्ते भौंके बिना रह नहीं सकते। उस हाथी का ये कुत्ते बिगाड़ेंगे क्या ? कोई बहुत बड़ा बलिष्ट कुत्ता किसी दूसरे गांव से निकलता हो तो चार दिन के पैदा हुए पिल्ले भी भौंकने लगते हैं। वह बलिष्ट कुत्ता गंभीरता से धीरता से चला जा रहा है और वे पिल्ले अपनी बुद्धिमानी समझ रहे हैं। मैंने देखो कैसा आक्रमण किया, कैसा शीत युद्ध किया और वे कुछ कर नहीं सकते। इसी प्रकार यह प्रकृति के स्वभाव में निरत हुआ अज्ञानी स्वयं निर्धन है, सो ज्ञानियों को देखकर रोष करता है, मन में ज्वलन करता है, खुद कुछ कम समझने वाला, कम जानने वाला है किंतु हां कुछ जानने की कुछ डींग होती है तो कुछ समझदार पंडित विद्वानों से रोष करता है और क्या एक कहानी कही जाय, जिसका जैसा उपादान है वह अपने उपादान के अनुसार अपनी प्रवृत्ति करता है। उदय है ना ऐसा, सो बाहर में जिस चाहे को आश्रय बना डालता है।

अज्ञानियों को ज्ञानियों के प्रति रोष की प्राकृतिकता―जो प्रकृति के स्वभाव में पड़ा हुआ है, शुद्ध आत्मतत्त्व की दृष्टि से दूर है ऐसा पुरूष ज्ञानी संतों को भी देखकर मन में रोष करता है। जैसे चोर रात्रि में जगने वालों पर क्रोध किया करते हैं, सो क्यों नहीं जाता, क्यों जग रहा, जग रहा तो आंखें क्यों नहीं फूट जाती―इस तरह से व्यर्थ का रोष करते हैं। इसी तरह जो प्रकृति के स्वभाव में पड़ा हुआ है वह बाहर में ज्ञानी संतों को भी करूणा के भोगने की नजर से नहीं देख सकता है और क्या-क्या विष पड़ा हुआ है इस अज्ञान अवस्था में, सो उसके ये सब फल नजर आ रहे हैं। जन्मते हैं मरते हैं, फिर जन्मते हैं।

दो परिज्ञानों की नितांत आवश्यकता―भैया ! और ज्यादा न समझ सको तो सीधी बात इतनी तो जान लो कि यह शरीर है सो मैं नहीं हूँ। इस शरीर को देखकर क्या अभिमान करना और इस शरीर की भी क्या ज्यादा संभाल करना ? जो शरीर है सो मैं नहीं हूँ। इतनी तो मोटी बात ध्यान में लावो। और एक यह बात ले आवो कि मेरा काम तो केवल जानने होता है। जो विचार सुख दु:ख विकल्प जो कुछ भी बातें हुवा करती है वे मिट जाने वाली बातें हैं। मेरा स्वरूप नहीं है। मेरा काम तो मात्र जाननहार बने रहना है। सिर्फ इन दो बातों को अपने ह्रदय में घर कर लें। बड़े की शोभा इसी में है। धनिक हुए हो तो बड़प्पन इसी में हैं, बड़प्पन धन में नहीं है। शरीर अच्छा पाया है, स्वस्थ हुआ तो शरीर का गर्व करने में बड़प्पन नहीं। शरीर से न्यारा अपने आपके शुद्ध ज्ञायकस्वरूप की रूचि करने में बड़प्पन है।

विसंवादों की जड़ अज्ञान―जड़ एक है और विसम्वाद का कितना बड़ा विस्तार है ? जो अपने को कुछ लोक पद्धति में बड़ा दिखता है वह ईर्ष्या का पात्र बन जाता है। ऐसी मिथ्यामति अज्ञानी जीवों की प्राकृतिक देन है। व्यर्थ का रोष क्यों किया जा रहा है ? जरा देखो कौवा तो कुरूप होता है उसे कुछ लेना देना नहीं है हंस बेचारे से , मगर हंस को देखकर कौवों को चिढ़ हो ही जाती है। वह कौवा मन में रोष कर ही बैठता है। यह सब क्या है? अज्ञान की बात है। एक बार हंस और हंसनी दोनों कहीं चले जा रहे थे उड़ते हुए। रास्ते में रात्रि होने लगी तो एक जगह वे ठहर गए। सो ठहरे कहां थे, जहां कौवे बहुत रहते थे। कौवे से कहा कि भाई रात्रि भर ठहर जाने दो। कहा ठहर जावो। ठहर गए, पर जब सुबह हुआ, हंस हंसनी जाने लगे तो एक कौवे ने हंसनी को रास्ते में रोक दिया। हंस से कहा कि तुम हमारी स्त्री कहां लिए जा रहे हो ? हंस बड़ा परेशान हो गया, बोला भाई क्यों अन्याय करते हो, हंसनी को देखो हमारी तरह स्वरूप है, स्त्री हमारी है तुम्हारी नहीं है। तो कौवा बोला, वाह यह क्या नियम है कि काले की स्त्री काली ही होनी चाहिए ? अरे काले की स्त्री गौर भी होती है, गौर की काली भी होती है। रात भर हमने ठहरने दिया और हमारी ही स्त्री लिए जाते हो। अब हैरान होकर बोला-अच्छा भाई पंचायत कर लो। हमारी स्त्री हो तो हमें देना और हमारी स्त्री न हो तो फंस तो हम गए ही, जो तुम चाहो सो कर लो। सो पंचायत करो।

पक्षवश पंचायत में अन्याय―पंचायत में 5 कौवों को चुना, उनमें एक सरपंच बन गया। अब बयान लिए गए दो कौवों ने यह निर्णय दिया कि यह स्त्री हंस की है और दो कौवों ने कहा कि यह स्त्री कौवे की है। अब सारा न्याय सरपंच के आधीन हो गया। सब बहुत गौर से देख रहे थे कि सरपंच महोदय की क्या दिव्य वाणी निकलती है ? सरपंच बोला कि यह स्त्री कौवे की है। अब तो भाई जो कौवा लड़ रहा था कि यह मेरी स्त्री है वह बेहोश होकर गिर गया। उसके किसी तरह से चोंच में पानी डालने से होश आया। तब पूछा―भाई तुम काहे बेहोश हो गए ? तुम्हारे ही तो मन का फैसला हुआ ना ? वह कौवा बोलता है कि हम बेहोश यों हो गए कि एक तो हम अन्याय पर उतारू थे और पंच सरपंच जिसमें परमात्मा बसते हैं वे सरपंच भी अन्याय का फैसला कर दें, इसका हमें अफसोस है। यह स्त्री मेरी नहीं है और दे भी दे वह स्त्री कौवे को तो वह क्या करें ?

निज प्रभु पर अन्याय―यह सारा जगत् अन्याय और अत्याचार से भरा हुआ है। इन सबकी जड़ है अज्ञान भाव, प्रकृति के स्वभाव में स्थित होना, किंतु ज्ञानी जीव प्रकृति के स्वभाव से विरक्त रहता है। कितना बड़ा ज्ञान बल है कि खुद में ही भाव हो रहा है और उस ही समय जिस काल भाव हो रहा है उसी काल में उस विभाव से अपने को विविक्त ज्ञानमात्र की श्रद्धा बनाए हुए हैं। यह कितना बड़ा बल है ? ऐसा ज्ञानी पुरूष कर्मफल का अनुभव करने वाला नहीं होता है। इस ज्ञानी की दृष्टि में स्वर्णपंकवत् विदित होता है। इन सोने चाँदी के गहनों से ही तो कोई शांति न हो जायेगी। नाक को छिदाकर नथ पहिन लिया, तो नाक भी चाहे भरी रहे, सुर्र, सुर्र नाक निकलती रहे, किंतु उसका नाक में पहिनना ही मंजूर है। अरेरूचि न रक्खो आभूषणों की। पहिनना है तो थोड़े पहिन लो, पहिनना चाहिए क्योंकि कोई जरूरत पड़े तो काम आए। पर दृष्टि में तो यह बात बनी ही रहे कि ऐसे श्रृंगार करना ठीक नहीं है।

ज्ञानी की रूचि―भैया ! इस शरीर को ही अपना भगवान रूप जान कर श्रृंगार में मत लगो। कई लोग भगवान का श्रृंगार करते हैं। इस तरह अपने शरीर का श्रृंगार तो मत करो। हो गया साधारणतया। अपनी अधिक दृष्टि रखो अपने आपमें बसे हुए सहज ज्ञायक स्वरूप भगवान की उपासना में। किसी क्षण एक साथ भूल जावो सबको। उससे ऐसा अलौकिक आनंद प्रकट होगा कि फिर ये सब नीरस लगने लगेंगे। ज्ञानीपुरूष को सिवाय एक ज्ञानमय प्रभु के दर्शन करने और अपने आपमें मग्न रहने के और कुछ नहीं सुहाता।

ज्ञानीपन की उपासना―जैसे कामी पुरूष को स्त्री के अनुराग के सिवाय और कुछ नहीं सुहाता, इसी प्रकार ज्ञानी पुरूष को निज ज्ञायकस्वभाव की रूचि के सिवाय और कुछ नहीं सुहाता। कितना अंतर है ज्ञानार्थी और धनार्थी में ? जैसे तृष्णा वाले पुरूष को धन संचय करते रहने के सिवाय और कुछ नहीं सुहाता इसी तरह आत्मगुणों के पारखियों को अपने गुणों के शुद्ध विकास में बने रहने के सिवाय और कुछ नहीं सुहाता। ज्ञानी पुरूष कर्मफल का भोगने वाला नहीं है। दु:ख और सुख का फैसला ज्ञान और अज्ञान पर निर्भर है। धन कन कंचन के जोड़ने पर निर्भर नहीं है। जो ज्ञानस्वभाव में स्थित है, अपने को ज्ञानमात्र विश्वास किए हुए है वह पुरूष ज्ञान का ही भोगने वाला है, शांति का ही अनुभवने वाला है, वह कर्मफल का भोक्ता नहीं है। ऐसा नियम जान कर निपुण पुरूष को ज्ञानीपना भावना चाहिए और एक शुद्ध ज्ञानज्योति मात्र जहां केवल ज्ञान का प्रकाश है, विकल्पों का जहां संबंध नहीं है, ऐसे शुद्ध आत्मस्वरूप में अपने महान् तेज में निश्चल होकर ज्ञानीपने का सेवन करना चाहिए।

संकटों के विनाश का सुगम उपाय―जैसे जमुना नदी में ऊपर मुँह निकाले हुए कछुवे पर पचासों पक्षी टूटने लगते हैं तो ये सारे बखेड़ा, सारे झंझट मिट जाना केवल कछुवे की पककला पर निर्भर है कि पानी में 5 अंगुल नीचे डुबकी लगा ले। उसके सारे क्लेश दूर हो जायेंगे, उन पक्षियों का सारा आक्रमण विफल हो जायेगा। इसी तरह दु:ख अनेक लग रहे है इस जीव को, निर्धनता का दु:ख, लोगों से गाली सुनने का दु:ख, घर में भी स्त्री पुत्र आज्ञाकारी नहीं है उसका दु:ख, समाज में भी लोग हम से आगे बढ़-बढ़कर चलते हैं इसका दु:ख, दूसरे के सम्मान अपमान का दु:ख इस तरह इन दु:खों से सब परिचित है, अनेक दु:ख तो ऐसे हैं कि जिनकी न शकल है, न रूप है, वे दु:ख भोगे जा रहे हैं। किंतु उन सब दु:खों के मिटाने की एक कला है कि इस ज्ञानसरोवर में इस अपने उपयोग को जरासा डूबा लो।

ज्ञानकला का प्रताप―मैं ज्ञानमात्र हूँ, और कुछ हूँ ही नहीं, बाहरी परिग्रह छिद जायें, भिद जायें, कहीं जीव विलय को प्राप्त हो, वह तो मेरा कुछ ही नहीं, उसका परिग्रह नहीं है, ऐसा निर्णय रखने वाला जो ज्ञानी पुरूष अपने को अपने में ले जाय तो सारे दु:ख संकट ये उसके एक साथ समाप्त हो जाते हैं। उनमें यह क्रम भी नहीं होता कि पहिले अमुक दु:ख मिटेगा, फिर अमुक दु:ख मिटेगा। एक इस कला का अभ्यासी अपने को बनाना, यही काम करना है। बाहरी बातों को उदय पर छोडिये क्योंकि जब चाहते हुए भी चाहने के अनुसार बाहर में कुछ काम होता नहीं है तो उस काम के पीछे क्यों पड़ा जाय, उसे छोड़ो उदयानुसार, जो काम स्वाधीन है, आत्महित के कर्मों की ओर दृष्टि दीजिए।

प्रवृत्ति में भी निवृत्ति―जो अपने उपयोग को अपने ज्ञानसरोवर से बाहर-बाहर बनाए है उसके ऊपर सैकड़ों उपद्रव आते हैं। जो अपने उपयोग को अपने ही इस आनंदमय गृह में बसाये हुए है उसको सताने वाला कोई नहीं हो सकता है। अज्ञानी जीव ही कर्मफल का भोक्ता है। ज्ञानी को भोक्ता नहीं कहा। भोक्ता है तिस पर भी भोक्ता नहीं है। जानता है तिस पर भी जानने वाला नहीं है। 5-7 वर्ष के बच्चे को मार पीटकर स्कूल ले जाते है, वह रोता चला जाता है पर उसके अंदर के प्रभु की आवाज तो देखो, क्या वह स्कूल जा रहा है? नहीं जा रहा है। जाता हुआ भी नहीं जा रहा है। खाता हुआ भी नहीं खा रहा है। या तो बड़ी रंज हो या बड़ा आनंद हो तो ऐसी स्थिति बनती है कि जाता हुआ भी नहीं जा रहा है। खाता हुआ भी नहीं खा रहा है। ज्ञानी पुरूष को सबसे बड़ा रंज है इस विभाव के कब्जे में पड़ जाने का। उस रंज के मारे बेचारा खाता हुआ भी नहीं खा रहा है। इस ज्ञानी जीव को सबसे बड़ा आनंद है ज्ञानस्वरूप के अनुभव से उत्पन्न हुआ विलक्षण आनंद। उस आनंद रस को जिसने भोग लिया है वह ज्ञानी इस नरजीवन के लिए खा रहा है तो भी खाता हुआ नहीं खा रहा है। भोगने वाले तो अज्ञानी ही होते हैं।

ज्ञानी की गुप्त अंत:अनाकुलता―एक ज्ञानी अंतरात्मा श्रावक बच्चे को गोद में लेकर खिला रहा हैं किंतु दृष्टि है इस ओर कि यह परिवार का बंधन जो विकल्पों का आश्रयभूत है, इससे हटकर कब मेरी ऐसी स्वतंत्र वृत्ति हो कि मैं निर्जन विपिन में केवल एक आत्माराम को देखकर अपने आपमें आनंदमग्न होऊँ। तो वह जंगल में तो नहीं है, पर जो आनंद जंगल में लूटा वहीं आनंद गोदी में बैठे हुए बच्चे को खिलाते हुए में भी है। उससे बढि़या तो अज्ञानी मिथ्यादृष्टि हैं कि खिलाने का आनंद तो लूट रहे हैं। ज्ञानी की दशा तो ऐसी है कि दृष्टि लगी है एकांत आत्मतत्त्व की। जो सामने है उसमें मन लगता नहीं। तो क्या वह अज्ञानी से बुरा हैं? अरे अज्ञानी तो अज्ञान की लीलाएँ करके निरंतर दु:खी हो रहा है। वह तो स्वरूप दृष्टि बनाकर अंतर में अनाकुल तो बना हुआ है। भोगने वाला अज्ञानी पुरूष ही होता है ऐसा यहां नियम कहा जा रहा है। उस नियम को अब आचार्य कुंदकुंददेव एक गाथा द्वारा प्रकट करते हैं।


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