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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 333

From जैनकोष



कम्महि सुहाविज्जदि दुक्खविज्जदि तहेव कम्मेहिं।कम्मेहि य मिच्छत्तं णिज्जदि णिज्जदि असंजमं चेव।।333।।

सुख दुःख की कर्मकृतता का पक्ष―कर्म के ही द्वारा यह जीव सुखी किया जाता है कर्म के ही द्वारा यह जीव दु:खी किया जाता है, कर्म के ही द्वारा जीव मिथ्यात्व को लिवाया जाता है। और कर्मों के ही द्वारा यह जीव असंयम को प्राप्त होता है बात यद्यपि ठीक है। साता वेदनीय के परिणाम उदय आए बिना कौन जीव सुखी होता है इस संसार के सुख से ? क्या जीव के सुखी होने में कर्म प्रकृति निमित्त नहीं है। यदि नहीं है तो यह वैषचिक के सुख जीव का स्वभाव बन जायगा। पर जिसके आशय में यह बात पड़ी हो कि जीव सुखरूप नहीं परिणमता, सुख रूप भी कर्म परिणमता है और इस जीव में वह परिणमन मात्र झलकता है। ऐसा जिनका आशय है उनकी ओर से यह शंका है कि कर्म ही जीव को सुखी करते हैं, अर्थात् सुख परिणमन भी प्रकृति का है जीव का नहीं है।

अपरिणामैकांत का प्रतिषेध―इस कर्मैकांत के सिद्धांत का खंडन किया तो गया है आगे, पर यह जान लो कि जो अपरिणामी सिद्धांत है उसका खंडन है। कहीं निमित्त भाव का खंडन नहीं है। निमित्त के खंडन से तो जीव की दुर्गति होगी, स्वभाव बन बैठेगा पर सिद्धांत ऐसा मानते हैं―प्रकृते तस्मादपिर्महान ततोऽहंकास्तस्माद गणश्च षोडषक:। षोडषकात्पंचभ्य:--पंचभूतानि। उसका यह प्रकरण है। यहां कोई जैन सिद्धांत नहीं बोला जा रहा है प्रकृति से तो महान् होता है। महान् मायने बुद्धि। सबसे पहिले प्रकृति ने विकार किया तो ज्ञानरूप परिणमन किया, यह प्रकृति का विकार है क्योंकि ये सर्व दिक्कतें ज्ञान से शुरू हुई। न जानते तो बात ही कुछ न थी। तो ज्ञान द्वारा यह सब गड़बड़ी हुई ऐसा सांख्य सिद्धांत है। प्रकृति से पहिले महान् पैदा हुआ, बुद्धि पैदा हुई, ज्ञान विस्तार पैदा हुआ, फिर इससे अहंकार बना। यह सारी सृष्टि प्रकृति का ही विकार है, इसको सिद्ध किया जा रहा है।

प्रकृति परिणामैकांतवाद से निज के प्रमाद की सुरक्षा―घमंड पैदा हो अहंबुद्धि हो, यह मैं हूँ, मैं मनुष्य हूँ, मैं तिर्यंच हूँ आदि अहंकार आए तब इससे अनर्थ उत्पन्न होता है। इंद्रिय ज्ञान-जगह कर्म इंद्रिय और ज्ञान इंद्रिय। हाथ पैर आदि का चलना अंग वगैरह का उठना ये सब कर्म इंद्रिय हैं, और स्पर्शन, रसना आदि का ज्ञान होना यह सब ज्ञान इंद्रिय है। फिर इन इंद्रिय के बाद 5 विषय उत्पन्न हुए स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द और इससे फिर 5 ये भूत पैदा हुए जो दृश्यमान हैं सबको दिखते हैं। इस तरह यह सारा जगजाल प्रकृति से उत्पन्न हुआ ऐसा जिनका सिद्धांत है उनकी ही बात यहां चल रही है। कहीं यह बात नहीं ग्रहण करना है कि जब अज्ञान होने को होता है होता ही है, जब राग होने को होता है होता ही हैं। अरे तो इस तरह स्वच्छता से वह अगर कर रहा है तो वह स्वभाव बन जायगा।

निमित्तनैमित्तिक संबंधवाद का वस्तुस्वातंत्र्य साधन में सहयोग―निमित्त पाये बिना यह विभाव नहीं होता है। सिद्धांत से तो स्वभाव की सुरक्षा है। जीव स्वत: स्वरसत: रागादिक भावों को करता नहीं है, किंतु उपाधि का निमित्त पाकर अपनी परिणति से रागादिक परिणमनों को करता है, स्वभाव की भी रक्षा हुई और वस्तु की स्वतंत्रता भी प्रकट हुई। वस्तु अपनी ही परिणमन से परिणमता है, सर्वत्र यह वस्तु की स्वतंत्रता है। जीव पराधीन भी बनता है तो आजादी से पराधीन बनता है या पराधीनता लेकर। पराधीनता लेकर पराधीन नहीं बनता। यहां सांख्य सिद्धांत कहा जा रहा है कि कर्म द्वारा ही जीव सुखी किया जाता है। उसमें आशय क्या पड़ा है कि कम ही सुखरूप परिणमन करता है जीव नहीं करता है। पर बुद्धि के आश्रय से पुरूष में सुख दु:ख राग आदि की बात आया करती है ऐसा सांख्य सिद्धांत है, परंतु वस्तुस्थिति ऐसी है कि अशुद्ध परिणक्य सकने का उपादान वाला जीव कर्म उपाधि का निमित्त पाकर स्वयं की परिणति से ही सुखी और दु:खी होता है।

कर्तत्ववाद के भ्रम के अवसर का योग―भैया ! लोगों को कर्ता कर्म का जो भ्रम बन गया है कि कोई पदार्थ पर का कर्ता है, इस भ्रम के लिए उनको मूल में बात क्या मिली जिससे उन्होंने बढ़कर भ्रम बना लिया ? भूल में बात निमित्त नैमित्तिक संबंध की मिली। उससे बढ़कर उन्होंने भ्रमरूप बुद्धि करली कि हमने ही यह किया। एक बालक बीस हाथ दूर खड़ा है, दूसरा बालक दूर से ही अंगुलि मटका कर या जीभ निकाल कर चिढ़ा रहा है तो यह दूसरा बालक दु:खी हो रहा है। तो भला यह बतलाओ कि यह बच्चा जो दु:खी हो रहा है सो अपनी परिणति से दु:खी हो रहा है या बड़े लड़के की परिणति से दु:खी हो रहा है? बड़ा लड़का इसे चिढ़ा रहा है या छोटा लड़का चिढ़ रहा है ? यह लड़का चिढ़ रहा है बड़ा लड़का चिढ़ा नहीं रहा है। वह तो अपनी अंगुलि में अंगुलि मटका रहा है। यह बालक विकल्प बनाकर दु:खी हो रहा है।

संकेतों का आशय―एक बार एक राजा ने यह सोचा कि हम अपनी लड़की की शादी बड़े बुद्धिमान लड़के से करेंगे। सो पंडितों से कहा कि जावो बुद्धिमान लड़का ढूंढ लाओ। सो कुछ पंडित लोग ईर्ष्या रखते थे वे चाहते थे कि किसी मूर्ख से इसकी शादी कराई जाय। सो वे चले मूर्ख लड़के की खोज में। देखा कि एक पेड़ पर एक लड़का चढ़ा है और डाली के अग्रभाग पर बैठा हुआ कुल्हाड़ी चला रहा है। तो अब बताओ कि अगर डाली कट जायगी तो वह गिरेगा कि नहीं ? गिर जायगा। सो सोचा कि इससे मूर्ख और कहां मिलेगा। कहा कि चलो तुम्हारी शादी राजपुत्री से करवायेंगे। तुम वहां चुपचाप बैठना, मुँह से जरा भी न बोलना। वह चला गया संग में। राजदरबार में भरी सभा में एक किनारे मूर्खदास भी बैठ गए। तो पंडित लोग कहते हैं कि यह कवि पंडित मौन व्रत रखे हैं सो संकेत में करो प्रश्नोत्तर तब लड़का और लड़की के बुद्धि का परिचय मिलेगा। दोनों का परिचय हुआ। सो पंडितों ने कहा कि पहले लड़की प्रश्न करे। तो लड़की ने खड़े होकर एक अंगुलि उठायी। इस आशय से कि जगत में केवल एक ही ब्रह्म है। तो उस मूर्ख ने सोचा कि यह कह रही है कि मैं एक आँख फोड़ दूंगी। तो उस मूर्ख ने दो अंगुलि उठायी, उसका मतलब था कि मैं दोनों आंखें फोड़ दूंगा। पंडित लोग वहां अर्थ लगाने को बैठे थे क्योंकि जबरदस्ती शादी करवाना था उस मूर्ख लड़के के साथ। सो पंडितों ने कहा कि ये महाकवीश्वर यह कह रहे हैं कि जगत में केवल एक ब्रह्म ही नहीं है साथ में उसके माया भी है। तो ब्रह्म और माया ये दो तत्व हैं। फिर कहा लोगों ने कि दूसरा प्रश्न कीजिये, हमारे महा पंडितेश्वर जी जवाब देंगे। लड़की ने पाँच अंगुलियाँ उठाई। उसका अर्थ यह था कि यह सब पंच भूतात्मक हैं। तो उसने पांचों अंगुलि देखकर समझा कि यह कहती है कि तमाचा मारूंगी। सो उसने मुट्ठी बांधकर मुक्का मारने को उठाया। उसका मतलब था कि अगर तू तमाचा मारेगी तो मैं मुक्का मारूंगा। यह सब लोगों ने उसे सिखा दिया था कि चुप रहना मुख से बोल दिया तो पोल खुल जायगी। इसलिए जो मूर्ख आदमी है उसे सभा में मौन व्रत लेकर बैठना चाहिये लोग उसे बुद्धिमान जानेंगे। तो लोगों ने अर्थ लगाकर कह दिया कि दूल्हा जी का कहना है कि पंचभूत हैं तो जरूर, पर सबका मूल आधार एक अद्वैत है। तो ऐसे वचनों के भी अनेक अर्थ होते हैं पर उनमें आशय तका जाता है कि इसका आशय क्या है।

विरूद्ध आशय का खंडन―भैया ! यह सब निमित्त दृष्टि से बोला जाय तो इसमें कोई सिद्धांत विरूद्ध बात नहीं आती। हाँ हाँ साता वेदनीय के उदय बिना जीव सुखी नहीं हो सकता असाता वेदनीय के उदय बिना जीव दुःखी नहीं हो सकता लेकिन शंकाकार का आशय यह नहीं है। आशय उसका यह है कि प्रकृति ही सुख और दु:ख रूप परिणमती है। उस परिणमन को यह जीव भ्रम से मानता है कि मेरा परिणमन है। जीव अपरिणामी है वह परिणमता नहीं है। यह इस आशय में पड़ा हुआ है। उस आशय का खंडन किया जाता है।

आशय के ही खंडन मंडन की शक्यता―एक बार कहीं शास्त्रार्थ हुआ तो पक्ष रखा कि ईश्वर जगत का कर्ता है तब प्रतिवादी कुछ खंडन करने लगा ? तो वह वादी बोलता है कि पहिले यह बताओ कि ईश्वर जगत का कर्ता है यह बात है या नहीं। अगर यह बात है तो खंडन तुम कैसे कर सकते और यदि यह बात नहीं हैं तो खंडन किसका तुम करते हो तो वह उत्तर देता है कि हम ईश्वर का खंडन नहीं करते, जगत कर्ता का खंडन नहीं करते किंतु ईश्वर सद्​भूत एक पदार्थ जगत का कर्ता है ऐसा जो तुम्हारा अभिप्राय बना है हम उस अभिप्राय का खंडन कर रहे हैं। तो आशय हर एक बात में देखा जाता है।

आशय विज्ञान में सन्मान अपमान―देहाती लोग आपस में जब मिलते हैं बहुत दिनों में मित्र-मित्र या साढ़-साढ़ या कोई कोई तो किसी तरह से मिलते हैं पर ऐसे भी लोग मिलते हैं कि एक दूसरे के दो चार तमाचे मारकर मिलते हैं। यह उनकी जुहारू होती है। न विश्वास हो तो देख लो। उनका मिलना इसी ढंग का है। कोई जमाने में कहीं की सभ्यता में विनय पूर्ण व्यवहार होता था पर जैसे-जैसे समय गुजरता है। वैसे ही वैसे परिवर्तन होता रहता है। पहिले समय में लोग विद्वानों को गुरूवों को दंडवत् नमस्कार करते थे दंडवत् के मायने जैसे डंडा पड़ा है तो बिल्कुल लेटा पड़ा है ना ? तो डंडे की तरह लेट करके नमस्कार करते थे। फिर दंडवत् तो रही नहीं। घुटने टेककर सिर नवा कर नमस्कार हुआ फिर घुटने टेकना सिर नवाना दूर रहा फिर घुटने टेककर हाथ जोड़ दिया। यह भी दूर हुआ तो खड़े ही खड़े पेड़ की तरह सिर झुका दिया। यह भी दूर हुआ अब मस्तक में चार अंगुलि लगाकर नमस्कार कर लिया। यह भी छूटा तो रह गया एक अंगुलि का गुडमार्निंग। यह भी छूटा तो मुख से बोल दिया जय जिनेंद्र। यह भी छूटा तो मुख से एक दूसरे ने बोल दिया बाबू जी, हाँ सेठजी। वहाँ भगवान का भी नाम छूटा, फिर और समय गुजरा तो उन्होंने मुस्करा दिया। अब यह भी नौबत आ गई कि उनने गाली सुना दिया उनने सुना दिया। देख लो साढू साढू में बहनोई साले में कैसा नमस्कार होगा। तो इन सब परिस्थितियों में भी आशय जिसका अच्छा है उसका बुरा नहीं मानते हैं और आशय अच्छा नहीं है तो बुरा माना जाता है।

आशय की शुद्धता में विरूद्ध व्यवहार से भी अविषाद―अभी बच्चा छत पर या दरवाजे जैसे स्थान पर खेलता हो जहां से गिरने की नौबत आए तो माँ उसे कितनी गालियां सुनाती हैं, नासके मिटे तू मर न गया पैदा होते ही। ऐसी गालियां सुनकर भी बच्चा बुरा नहीं मानता है। क्योंकि वह जानता है कि अम्मा ही तो हैं हमारी और कोई दूसरा आदमी थोड़ी सी भी बात कह दे तो वह रोने लगता है, क्योंकि वह समझता है कि इसका आशय खोटा है। तो यहां आशय का ही खंडन किया जा रहा है।

शंकाकार का मूलसाध्य―शंकाकार कहता है कि कर्म ही जीव को सुख दु:ख देता है इसमें यह आशय भरा है कि कर्म ही सुख दु:ख रूप परिणमते हैं जीव तो अपरिणामी है। मूल से बात पकड़ लो तब यह समझ में आयगा। इसी प्रकार कर्म ही जीव को मिथ्यात्व रूप बनाते है। और कर्म ही जीव को असंयम रूप बनाते हैं। इस प्रकार यहां शंकाकार जीव के समस्त परिणमनों का कर्ता बता रहा है। अब जीव के परिभ्रमणादि के कर्तृत्व की बात भी कर्म पर लादी जा रही हैं।


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