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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 334

From जैनकोष



कम्मेहि भमाडिज्जदि उड्ढमहो चावि तिरियलोयं च।

कम्महि चेव किज्जदि सुहासुंह जित्तियं किंचि।।334।।

जीव परिभ्रमण के कर्मकृतला का पक्ष―कर्म को जीव भाव का कर्ता मानने वाले सांख्यानुयायी प्रश्न कर रहे हैं। इस प्रकरण में इतना ध्यान देना कि कर्म जीव के भाव को करते हैं। ऐसा कहने में उपादान दृष्टि उनकी बनी है, कर्म ही जीव भाव रूप परिणमते हैं या यों कहो रागादिक रूप परिणमते हैं। उसको जीव अपना मान लेता है ऐसा आशय है शंकाकार का। शंकाकार अपनी नई-नई बातें रखता हुआ चला जा रहा है कि देखो कर्म ही जीव को ऊपर नीचे भ्रमण करा रहे हैं। बोलो लिखा है ना जैनों के ग्रंथों में कि आयु पूर्वी कर्म का उदय आए तो यह जीव कहीं से भी मरकर जन्म लेने के लिए पहुंच जाता है हाँ लिखा तो है, तो हुआ ना ठीक कि कर्म ही जीव को भ्रमाता है ? और बड़े विस्तार से भी लिखा है। इसको कहते हैं विग्रह गति।

विग्रहगति में गमन पद्धति―नवीन विग्रह पाने के लिए जो गति होती है उसका नाम है विग्रहगति। विग्रह का अर्थ है शरीर। लोग अब भी किसी का यदि हष्ट पुष्ट शरीर हुआ तो कहते हैं कि इनका विग्रह तो अच्छा है। तो नवीन विग्रह पाने के लिए जीव का जो गमन होता है उसका नाम है विग्रह गति। और जीव मरने के बाद अर्थात् ,शरीर छोड़ने के बाद नया शरीर पाने के लिए जो जाता है सो दिशाओं में जाया करता है। आकाश की श्रेणियां हैं। उन श्रेणियों के अनुसार गमन होता है। पूर्व से उत्तर जाना हो तो सीधा न जायगा। पूरब से कुछ दूर पश्चिम तक आकर फिर उत्तर को मुड़े़गा। पूरब से पश्चिम उत्तर से दक्षिण ऊपर से नीचे जो सीधी आकाश श्रेणियां हैं उन मार्गों से गमन होता है। तो ऐसी कई जगह हैं कि जहां मुड़कर जीव को जाना पड़ता है। और ऐसी मोड़ इस जीव को अधिक से अधिक तीन लग सकते हैं तो मोड़ों को लेकर जो गमन होता है उसे कहते हैं विग्रहवती विग्रहगति। अर्थात् मोड़ा लेकर होने वाली विग्रह गति। विग्रहगति में आनुपूर्वी का उदय होता है। नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे कहां से कहां जीव का गमन होता हैं। यह जीव का स्वभाव है यों डोलते रहना। यह तो कर्म ही कराता है ना। तो कर्म ही जीव को नीचे ऊंचे की दिशाओं में सर्वत्र घुमाता है।

संसारी जीव के सूक्ष्म और स्थूल शरीर―भैया ! इस जीव के साथ दो शरीर लगे हैं―सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर। सूक्ष्म शरीर तो एक भव छोड़ने के बाद भी साथ चिपटा रहता है। वह एक क्षण को भी अलग नहीं होता है। और जब अलग होता है तो सदा के लिए अलग होता है उस सूक्ष्म शरीर का नाम है तैजस शरीर व कार्माण शरीर। औदारिक शरीर, वैक्रियक शरीर ये है स्थूल। स्थूल शरीर के अलग हो जाने का नाम है मरण। यह तैजस और कार्माण शरीर क्या है ? कि जो जीव के साथ लगा है कार्माण सो कर्म का पिंड है, कर्म और कार्माण शरीर में इतना अंतर है जितना कि ईट और भींट में ईटें पड़ी हुई हैं और वे ही ईटें सिलसिले बार ढाँचे के रूप में जड़ दी जायें उसका नाम हो गया भींट तो कर्म है, कर्मों की दृष्टि से वे कर्म हैं समूह हैं, बहुत हैं, संग्रह है पर उन कर्मों से पाये हुए शरीर के अनुसार या फैले जीव के अनुसार उनका ढांचा बन जाना यह है कार्माण शरीर और कार्माण क्या सभी शरीरों में तेज देने वाला होता है तैजस शरीर।

सूक्ष्म शरीर की अप्रतिघातिता―दोनों सूक्ष्म शरीर वज्र से भी नहीं अटकते। बड़ा काँच का महल भी बना दिया जाए, जहां से रंच हवा न आए और जाने कि मरण हार है। उसको उसके अंदर रख दिया जाए। फिर देखो कि यह जीव कहां से जाता है। तो काँच फूटेगा नहीं और यह जीव चला जायेगा। और मान लो कदाचित काँच फूट जाय तो जीव के टक्कर से काँच नहीं फूटा किंतु हवा रुकी है तो प्राकृतिकता से फूट जाय, सूक्ष्म शरीर किसी से नहीं रुकता। सूक्ष्म शरीर सहित यह जीव जाता है। पूर्व देहत्याग व नवीन देहधारण अंतरकाल―मरने के बाद तुरंत ही यह जीव जन्म स्थान पर पहुंच जाता है। अधिक से अधिक देर लगेगी तो तीन समय की लगेगी। चौथे समय में अवश्य पहुंच जायेगा। जीव का जन्म स्थान पर पहुंचना किसी तिलक वाले व्यक्ति के आधीन नहीं है कि जब तक 10 लोगों को जिमा न दिया जाय तब तक जीव चलता रहेगा। और जब 10 आदमियों को जिमा दिया जायगा। तब जीव जन्म स्थान पर फिट हो जायेगा ऐसा नहीं है लोग परीक्षा करने के लिए कि आखिर यह पैदा कहां होता है जीव अथवा ये दद्दा बब्बा, सो चूल्हे की राख छोड़ देते हैं और सुबह देखते हैं कि यह राख में चिन्ह कौन सा बना है, जिससे जान जाए कि यह कहां पैदा हुआ है। डुकरिया पुराण की कथा है। डुकरिया को लाज लिहाज नहीं रहती, जहां चाहे बोला करती है नई बहुओं को उनका बकना नहीं सुहाता सो वे डुकरिया पुराण कहा करती हैं। सो वे डुकरिया सुबह राख में देखती है कि कौन सा चिन्ह बना है।

एक सूक्ष्म दर्शी यंत्र होता है ना। उससे कुछ भी देखा तो हिलता डुलता ऐसा दिखता है। तो कह बैठते हैं कि इसमें कीड़े हैं। यद्यपि कीड़े सब दिखते हैं ऐसा नहीं है कि उसमें यह न दिखे कि चीजें न हलती हों। लोक में बड़े सूक्ष्म अजीब ढेर भी पड़े हैं पतले-पतले कूड़ा करकट भी इधर उधर फिरते रहते है। जहां देखते हैं कि साफ है वहां उस पोल में भी बहुत सा कूड़ाकरकट फिर रहा है पर इतना पतला है कि मालूम नहीं देता। कहीं जरा सा छेद हो की किरणों का आगमन हो तो उस जगह किल बिलाते हुए दिख जायेंगे। तो फट कह देते हैं कि देखो यहां पर बहुत से कीड़े फिर रहे हैं। कीड़े होते भी है और नहीं भी होते है। वे जीव पुद्​गल ही फिर रहे हैं, सूक्ष्म मैटर तो डोलत हैं ना तो जो डोले उसे जीव मान लिया।

पुनर्भव विज्ञान की भ्रमरूढ़ियाँ--यों ही राख में चूहा, छिपकली, झींगुर निकल गया हो, तो उससे बने हुए चिन्ह को देखकर कह देते है कि जीव अमुक हुआ है। ये बातें झूठ हैं। जीव तो मरने के बाद ही तुरंत जन्म ले लेता है, तेरई खाने पीने का अधिकार तो मुनियों को था अब उसके एवज में उन्हें कौन पूछता। बिरादरी के लोगों को और लोगों को ही खिलापिला देंगे। 12 दिन तक मुनियों को आहार देने का अधिकार नहीं रहता सो 13 वें दिन बड़ी खुशी से चौका लगाकर आहार देने के लिए लोग खड़े रहते थे। इसलिए कि भाई आज पात्रदान करने का मौका मिला, 12 दिन मौका नहीं मिला। तेरहवें दिन आहार कराने का मौका मिला है। कहीं ऐसा नहीं है कि जब तक पंगत न करे तब तक जीव घूमता रहेगा।

विग्रह गति के उभयभव का संधिपना―जीव आनुपूर्वी नामक कर्म के उदय के बिना ऊपर नीचे यत्र तत्र नहीं डोलता। इससे ज्ञात होता है कि कर्म ही जीव को यहां वहां घुमाता रहता हैं, कोई घोड़ा है और उसे मरकर बनना है मनुष्य तो उसके आगे के भव से संबंधित मनुष्य गत्यानुपूर्वी का उदय आ गया उस मनुष्यगत्यानुपूर्वी के उदय में कहलाएगा तो मनुष्य, रास्ते में विग्रह गति में और आकार रहेगा उस घोड़े का। यह तबादले का समय है। पहिला शरीर छूटा और नया शरीर मिलेगा, उसके बीच की जो विग्रह गति है उस विग्रहगति में दोनों के कुछ न कुछ समय की बात रहती है याने उदय तो आगे वाला रहा और आकार पहिले वाला रहा।

उभयभव संध्या का एक दृष्टांत―जैसे जब कोई पुराना अफसर नये अफसर को चार्ज देता है तो चार्ज देते समय दोनों अफसरों का कन्ट्रोल रहता है। चार्ज देने पर पुराने अफसर का कुछ नहीं रहता। यों ही नए स्थान पर पहुंचने पर पुराने का कुछ नहीं रहता है और देखो जब चार्ज सम्हाला जा रहा है तो लोगों की दृष्टि नए अफसर पर ज्यादा रहती है और वह पुराना अफसर जो बहुत दिन तक रहा उससे लोगों की दृष्टि हट जाती है क्योंकि अब काम पड़ेगा इस नए नवाब साहब से। तो इसी प्रकार विग्रह गति में प्रमुखता रहती है नवीन गति की। नवीन गति का उदय नवीन आयु का उदय और मनुष्य गत्यानुपूर्वी नामवाली आयुपूर्वी का उदय। केवल पुराने का इतना अभी रोब है कि जिस शरीर से आया था उस शरीर के आकार जीव के प्रदेश रहते हैं सो वह जीव जितना भ्रमण कर रहा है यह सब कर्म की प्रेरणा से कर रहा है। कर्म ही करा रहे हैं, ऐसा सांख्यानुयायी सिद्धांत की बात चल रही है।

दो द्रव्यों में परस्पर कर्तृकर्मत्व का अभाव―जैसे हाथ में घड़ी उठायी और दूसरी जगह धर दी, देख रहे हो ना, यह बात ठीक है ना। हाथ ने ही घड़ी उठायी और दूसरी जगह धर दी। लगता तो है ऐसा कि हाथ ने एक जगह से घड़ी को उठाकर दूसरी जगह पर धर दी, पर इसमें कुछ विचार करो, क्या यहां घड़ी में जो कुछ हुआ है परिणमन क्रिया जाने आने की बात क्या इसे हाथ ने किया है, अर्थात् क्या यह हाथ का परिणमन है सो तो नहीं है, क्योंकि यदि हाथ का ही परिणमन घड़ी का परिणमन बने तो दो द्रव्य नहीं रह सकते। तब क्या है। हाथ वहां निमित्त मात्र है और हाथ की क्रिया का निमित्त पाकर इस घड़ी में इसकी क्रिया गति हुई। अपने आपके स्वरूपास्तित्व को निरखो तो हाथ ने हाथ में काम किया। घड़ी ने घड़ी में काम किया परंतु इस तरह की क्रिया की परिणति से परिणत हाथ का निमित्त मात्र पाकर यहां यह परिणमन हुआ। बात तो ऐसी ही थी कि कर्म के उदय का निमित्त पाकर जीव में जीव के विभाव परिणमन होते हैं पर इसे निमित्त नैमित्तिक संबंध में न मानकर उपादान उपादेय संबंध स्वीकार करके यह जिज्ञासा चल रही है कि लो यह कर्म ने ही तो जीव को उल्टा सीधा करके यहां वहां फेंक दिया।

शुभअशुभ परिणाम की कर्मकृतता का पक्ष―अच्छा और भी आगे देखो जितना शुभ अशुभ किया जा रहा है वह कर्म के द्वारा ही तो किया जा रहा है। क्या शुभ और अशुभ के उदय बिना कोई शुभ और अशुभ परिणाम होता है। यदि शुभ राग प्रकृति के बिना शुभ परिणाम होने लगे तो सिद्ध में भी होने लगे। अशुभ राग के बिना यदि अशुभ परिणाम होने लगे तो सिद्ध में भी होने लगे। ऐसे गुणों का भी हम क्या करें जिसमें संदेह बना रहेगा, न जाने कब विभाव उठ बैठेगा, क्योंकि उपाधि उदय निमित्त तो कुछ रहा ही नहीं। यह जीव ही कर बैठता है तो जब चाहे शंका रहेगी कि न जाने कब विभाव परिणमन कर बैठेगा इसलिए यह बात मानना चाहिए कि कर्म ही जीव को शुभ परिणाम कराते और कर्म ही जीव का अशुभ परिणाम कराते हैं। देखो बोलने में कुछ हर्ज नहीं मगर यह आशय उपादान उपादेय का है।

विभाव के कर्मकतृत्व में श्रुति का प्रमाण―शंकाकार कह रहा है कि इतना ही नहीं, अन्य प्रकरण भी देखिए। जैसे इस जीव का अपने किसी विभाव रूप-परिणमन हो रहा हो उनकी जुदी-जुदी प्रकृतियाँ हैं, आगम में बताया गया है 148 प्रकृतियों का नाम। उसका मतलब ही क्या है। वे ही सब कराती हैं इस कारण इतना तो निश्चय हो रहा है कि कर्म ही सब करता है।


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