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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 335

From जैनकोष



जम्हा कम्मं कुव्वदि कम्मं देदि हरदि त्ति जं किंचि।तम्हा उ सव्वजीवा अकारगा होंति आवण्णा।।335।।

विभाव के कर्मकतृत्व का निष्कर्ष―जिस कारण कर्म ही कर्ता है, कर्म ही देता है, कर्म ही हरता है, तो हम तो यह जानते हैं कि इस कारण समस्त जीव अकारक ही हैं, अकर्ता हैं। देखा ना, किसी को गर्मी प्रकृति की जो बीमारी हुई तो उसने ठंडी तेज दवा पीली, सो लो, अब ठंडी का रोग हो गया। आत्मा कर्ता है, इस बात को मिटाने के लिए निमित्त रूप कर्म की बात बतायी गई थी। अब उसका इतना अधिक आलंबन कर गया कोई कि आत्मा को अपरिणामी देखने की नौबत आ गई। अब आत्मा अकारक हैं। एक कोई देहाती पटेल था, तो लड़के की बारात ले गया लड़की के दरवाजे। टीका करने लगा लड़की वाला तो लड़की का बाप दूल्हा का टीका 11 रू देकर करने लगा तब लड़के का बाप बोलता है कि इतना नीचा गिराकर लड़के का टीका न होगा। टीका होगा 501 रू का। आपस में दोनों में लड़ाई बढ़ गई। तब बाप ने कहा देखो या तो टीका होगा 501 रू का नहीं तो तुम्हारे ही सामने दूल्हा को आग में जलाये देते हैं। अरे यह क्या बात है। देखो आत्मा को सीधे-सीधे कर्ता मानते जाओ और नहीं मानते हो तो आत्मा को अपरिणामी मान लेते है। जो कुछ करते हैं सो कर्म करते हैं।

विरूद्ध वृत्ति में अध्यात्मवाद का अभाव―एक कोई पंडित जी अध्यात्मवाद एक शिष्य को पढ़ाते थे। पंडित जी में आदत मिठाई खाने की ज्यादा थी, उन्हें रसगुल्ला बहुत अच्छे लगते थे, तो जिस चाहे दूकान पर खालें। तो शिष्य कहे कि महाराज यह क्या करते हो ? तो वह कहे कि हम कुछ नहीं करते हैं, सब कुछ कर्म ही करते हैं। एक दिन ऐसी दूकान पर पहुंच गया कि जहां खराब चीजें भी बिकती थी, मांस वगैरह और मिठाई भी बिकती थी। उसी दूकान पर खड़े-खड़े वह खाने लगे। पंडित जी, तो शिष्य ने क्या किया कि उसके गाल में एक तमाचा मारा। गुरु कहता है कि यह क्या कर रहे हो ? कहता है कि महाराज कर क्या रहा हूँ, आप ये मांस भरे रसगुल्ले क्यों खा रहे हैं ? तो वह कहता है कि हम नहीं खाते हैं। ये तो पुद्​गल पुद्​गल को खा रहे हैं। महाराज फिर आप मुझे क्यों टोकते हो। यह हाथ और आपका गाल भी पुद्​गल पुद्​गल ही है। पुद्​गल-पुद्​गल लड़े हमने तुम्हें नहीं मारा। तब गुरूजी बोलें कि तुमने हमारी आँखें खोल दी। होता है ऐसा।

आत्मा व परमात्मा का व्यावहारिक अवबोध―एक राजा था, उसे आत्मा व परमात्मा कुछ भी नहीं मालूम था। एक दिन वह घोड़े पर जा रहा था, रास्ते में मंत्री का घर मिला। मंत्री से कहा कि हमें परमात्मा व आत्मा समझाइए। मंत्री ने कहा कि घोड़े से उतरो तब एक आध घंटे तक अच्छी तरह समझाए। बोला कि हमारे पास इतना टाइम नहीं है, हमें तो पाँच मिनट में ही समझा दो। मंत्री ने कहा कि अच्छा पाँच मिनट नहीं, हम एक मिनट में ही समझा देंगे पर हमारी खता माफ हो। अच्छा माफ। मंत्री ने राजा का कोड़ा छीनकर 5-7 राजा में जड़ दिये। राजा बोला अरे रे रे भगवान। मंत्री ने समझाया कि देखो जो अरे रे रे कहता है वह है आत्मा। और जिसे भगवान कहा है वह है परमात्मा।

जीवभाव की कर्मकृतता में आपत्ति―यहां यह सांख्यानुयायी सिद्ध कर रहा है कि जीव अकारक है, अथवा इसी का समाधान इसमें भरा हुआ हैं कि देखो भाई यदि तुम ऐसा मानते हो कि कर्म ही सब कुछ करते हैं तो फिर जीव अपरिणामी बन जायगा और जिसमें कुछ भी परिणमन नहीं होता है वह असत् होता है। आत्मा का फिर कुछ सत्व ही नहीं रहा गया, इस कारण तुम यह जानों कि कर्म तो वहां निमित्तमात्र है, परिणमने वाला विभावों से यह जीव है। यह बात आगे कहेंगे। अभी तो यह बताया जा रहा है कि इस सिद्धांत में जीव अकारक बन जायगा अपरिणामी बन जायगा, कुछ परिणमन ही नहीं करता।

अक्रियता का व्यवहार में असुहावनापन―अभी किसी आदमी से कुछ बात कही और वह मौन सा बैठा रहे, क्यों जी वहां चलोगे ? वह चुप बैठा रहे। क्यों जी ऐसा करना है ना ? वह चुप बैठा रहे, इसी तरह की दसों बातें आप कहे वह चुप बैठा है जरा सा भी न बोले तो आपका गुस्सा आ जायगा। आप कहीं जा रहे हों, कोई सिपाही मिल जाय और आप कहें कि भैया फलानी जगह का रास्ता कहां से गया। और वह कुछ न सुने, न बोले तो आप उसे मन ही मन गाली देकर जाते हैं कि देखो हमारा ही नौकर और जरा सा बताने में भी आलस्य कर रहा है, वह आपको सुहाता नहीं है। ऐसे ही कर्मठ पुरूष सबको सुहाता है जो पुरूष आलस्य करता है वह नहीं सुहाता है।

परिणमयिता में ही सत्व का संभवता―जो सदा परिणमता रहे वह सद्​भूत होता है अन्यथा सत् भी नहीं रह सकता है। तो कर्म ही जीव को अज्ञानी बनावे ज्ञानी बनावे जगावे सुलावे दु:खी करे, सुखी करे, उल्लू बना दे संयमी बना दे, जहां चाहे भ्रमण करा दे, शुभ अशुभ परिणाम करा दे, इतना यदि संतव्य है तो फिर यह बतलावो कि आत्मा ने किया क्या ? यह सब तो किया कर्मों ने। तो इस सिद्धांत में आत्मा अकारक बन जायगा, इस आपत्ति को देकर और वर्णन करेंगे।

यहां सांख्य सिद्धांती अपने ही पक्ष का निरूपण करता जा रहा है और जैन आगम में और जैन सिद्धांत में जो शब्द कहे हैं उनके द्वारा सिद्ध करता जा रहा है।


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