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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 375

From जैनकोष



असुहो सुहो व सद्दो ण तं भणइ सुणसु मंति सो चेव।

ण य एइ विणिग्गहिउं सोयविसयमागयं सद्दं।।375।।

शब्द व आत्मा का परस्पर अनाग्रह ― लोक के मंतव्य में माने जाने वाले ये शुभ और अशुभ शब्द तुम को कुछ प्रेरणा नहीं करते कि तुम हम को सुनो, खाली क्यों बैठे हो? और न यह आत्मा अपने स्वरूप से चिगकर उन शब्दों को सुनने के लिए उन को ग्रहण करता है या उनके पास पहुंचता है। शब्द शब्द में परिणत होते हैं, जीव जीवपरिणाम में परिणत होता है, फिर क्यों यह अज्ञानता की जा रही है कि यह मान लिया कि इसने मुझे यों कहा। किसी से विरोध हो और वह भली भी बात कहे तो इसे ऐसा लगता है कि हम से मजाक किया। तो यह तो जैसा अपना उपादान है उस के अनुसार इन बाह्य विषयों में कल्पना करता है और दु:खी होता है। जैसे यहाँ कमरे में रहने वाली चीजें मान लो रात्रि के समय टेबुल, कुर्सी, मेज आदि ये सब पड़े हुए हैं तो क्या ये बिजली के बल्ब के साथ कभी लड़ाई करते हैं कि हम तो अंधरे में पड़े हैं तुम क्यों बेकार बैठे हो? जलते क्यों नहीं हो? किसी ने यदि ऐसी लड़ाई देखी हो तो बतलावो।

दृष्टांतपूर्वक ज्ञेय ज्ञाता का परस्पर अनाग्रह▬ ये बाह्यपदार्थ इस दीपक को प्रकाशित करने के लिए कभी प्रेरणा नहीं करते और यह दीपक भी अपने स्थान से च्युत होकर इन मेज, कुर्सी आदिक को प्रकाशित करने के लिए नहीं आता है। क्या कभी देखा है कि यह बल्ब कभी किसी पदार्थ से कहता हो कि अब उठो, अब मैं जल गया हूँ, अंधेरा अब नहीं रह गया है? लोक व्यवहार में जैसे कि कुछ दिखता है कि अमुक पुरुषने अमुक पुरुष को हाथ पकड़कर झंकोर कर कहा कि तुम यह काम करो। जैसे यहाँ दूसरे को कोई प्रेरणा करता है इसी प्रकार मेज, कुर्सी आदिक दीपक को कभी प्रेरणा करता है क्या कि उठो अब उजेला हो गया है? और जैसे व्यवहार में ऐसा मालूम होता है कि चुंबक पत्थर के कारण खिंची हुई लोहे की सूइयां जैसे अपना स्थान छोड़कर चुंबक के पास पहुंच जाती हैं इस तरह दीपक अपना स्थान छोडकर प्रकाश्य पदार्थों की तरफ नहीं पहुँचता है। क्योंकि वस्तु का स्वभाव ही ऐसा दृढ़तम है कि किसी पदार्थ का स्वभाव किसी दूसरे के द्वारा उत्पन्न नहीं किया जा सकता। कोई किसी दूसरे को उत्पन्न नहीं कर सकता।

ज्ञेयज्ञातृत्व संबंध में विकार का अनवकाश ▬ तब फिर भैया ! जैसे यहाँ यह बात है कि चाहे मेज कुर्सी पड़े हों, तो जब दीपक या बिजली जलती है तो वे अपने स्वरूप से प्रकाशमान् होते रहते हैं। और चाहे बहुत सी चीजें पड़ी हों तो यह दीपक अपने ही स्वरूप से प्रकाशमान् होता है। अब यह एक निमित्तनैमित्तिक संबंध की बात है कि अपने ही स्वरूप से प्रकाशमान् इस दीपक का निमित्त पाकर ये मेज कुर्सी आदिक पदार्थ प्रकाश में आ गए। जो आज अच्छे बने हैं जिन की शकल सूरत ठीक है, सुहावने हैं या असुहावने हैं यह सब उन पदार्थों की परिणति से उनका आकार है। कहीं प्रकाश में आ जाने से ये प्रकाश्य पदार्थ उस दीपक में कोई विकार नहीं उत्पन्न करते। गोल घड़े को दीपक ने प्रकाशित कर दिया तो क्या दीपक भी उसकी तरह गोल बन गया या काली मेज को प्रकाशित करदें तो क्या बल्ब काला बन गया? ये प्रकाश्य पदार्थ प्रकाशक में रंच भी विकार नहीं कर सकते। इस ही प्रकार ये कर्ण में आए हुए शब्द इस आत्मा के द्वारा ज्ञेय ही तो हुए, आत्मा में ये विकार कैसे कर देंगे ?

विकारों का कारण अज्ञानभाव▬ यह आत्मा की स्वयं की कला की ओर से कहा जा रहा है। इन शब्दोंने इस आत्मा से यह जबरदस्ती नहीं की कि तू हमें सुन और सुन कर के गड़बड़ बन जा, ऐसी प्रेरणा नहीं की, और यह आत्मा भी अपने ज्ञानस्वरूप को छोड़कर शब्द में घुलमिल नहीं गया, किंतु ऐसा ही निमित्तनैमित्तिक संबंध है कि आत्मा में ज्ञानप्रकाश का निमित्त पाकर ये विषय ज्ञेय बन गए। अब ज्ञेय बनते हुए ये विषय इस ज्ञान के विकार के लिए कल्पित नहीं हैं, विकार नहीं कर सकते, फिर भी जो विकार हो रहे है वे इस जीव के अज्ञानभाव के कारण हो रहे हैं। कोई दूसरा पदार्थ्ा हमारी समझ में आया इसलिए विकार बन गया ऐसा नहीं है।

आशय के अनुसार गुणदोषग्राहिता ▬एक बार एक राजाने मंत्री से कहा कि मंत्री यह तो बतावो कि मेरे राज्य में गुणग्राही कितने हैं और दोषग्राही कितने हैं? मंत्री बोला कि महाराज आप के राज्य में सभी तो गुणग्राही हैं और सभी दोषग्राही हैं। राजा बोला यह कैसे? जो गुणग्राही है वह दोषग्राही कैसे हो सकता है और जो दोषग्राही है वह गुणग्राही कैसे हो सकता है। मंत्रीने कहा अच्छा हम आप को एक हफ्ते में इस बात को समझा देंगे। मंत्री ने एक से ही 2 चित्र बनवाये, मान लो किसी पुरुष के वे दोनों चित्र बड़े सुंदर सुडौल, सुहावने थे। पहिले दिन एक चित्र को घंटाघर के पास रख दिया और एक सूचना लिख दी कि जिस मनुष्य को इसमें जो दोष दिखता हो उसपर निशान लगा दे और नीचे अपने हस्ताक्षर कर दे। देखने वाले पहुंचे, सूचना पढ़ी। देखने लगे कि इसमें क्या दोष है? किसी ने देखा कि इसकी नाक ठीक नहीं बनी, निशान लगा दिया और अपने हस्ताक्षर कर दिये। इसकी आंख ठीक नहीं बनी है, निशान लगा दिया और हस्ताक्षर कर दिये। इसकी एड़ी ठीक नहीं बनी है, निशान लगा दिया और अपने हस्ताक्षर कर दिये। इस तरह से वह पूरा चित्र भर गया।

अभाव के बाद गुणग्रहिता की प्राकृतिकता▬ तीन दिन के बाद दूसरा चित्र टांग दिया, सूचना लिख दी कि इस चित्र में जिस को जहाँ पर जो भाग अच्छा लगता हो वह उस जगह निशान लगादे और अपने हस्ताक्षर कर दे। देखो कि ये आँखें इसकी बड़ी सुंदर हैं, निशान लगा दिया और हस्ताक्षर कर दिये। नाक इसकी बड़ी सुंदर है, ऐडियां इसकी बड़ी सुंदर हैं, निशान लगा दिया और अपने हस्ताक्षर कर दिये। इस तरह से वह भी सारा चित्र भर गया। 7वें दिन कहा महाराज देखो यह ही पुरुष इस अंग का दोषग्राही है और यही पुरुष इस अंग का गुणग्राही है। राजाने सोचा कि यह मामला क्या है? मंत्री ने कहा कि महाराज जिस का दोष देखने का आशय होता है उसे गुण भी दोष दिखा करते हैं और जिस का गुण देखने का आशय होता है उसे गुण ही गुण दिखते हैं।

कषाय में हैरानी ▬ भैया ! जगत में यही तो हैरानी है। जब तक कोई अपने बीच में है तब तक उस के गुण देखने की ओर किसी की दृष्टि ही नहीं जाती है और जब वह गुजर जाता है तब उस के गुण समझ में आते हैं। देखलो जब गांधी जी जिंदा थे तब उनके जीवन काल में लोग कितनी ही बातें कहा करते थे, यह ऐसा करते हैं तो यह नुकसान होता है, इससे यह नुकसान होता है, यह यों गलती करते हैं। ऐसी ही बातें नेहरू के प्रति भी हैं। जब तक जिंदा थे लोग दसों ही बाते कहते थे―यह ये गलती कर रहे हैं। पर जब वह गुजर गए तब लोगों को पता चला कि ओह विश्वभर में नेतृत्व था नेहरू का, विश्व भर में नेतृत्व था गांधी का। नेहरू भारत के ही नहीं बल्कि अन्य देशों के भी मार्गदर्शक थे। तो जब दोष ग्रहण करने का उदय होता है तो दोष देखने में आते हैं और जब गुण ग्रहण करने का उदय होता है तो गुण देखने में आते हैं।

बेमेल सगाई▬ ये शब्द हमें प्रेरणा नहीं करते कि तुम क्यों खाली बैठे हो, और यह आत्मा भी उन शब्दों को सुनने के लिए नहीं जाता, किंतु आत्मा के साथ ज्ञान ज्ञेय का संबंध है, फिर क्यों यह जीव अज्ञानी बन कर उन शब्दों के खातिर रोष व तोष करता है। देखो यह अध्यात्म का चरुणानुयोग ही भरा हुआ है। क्यों उन विषयों में अपना घात करते हो? इस विषय को बहुत लंबे समय से बताया जा रहा है कि तुम्हार कोई संबंध ही जब इन विषयों से नहीं है तो क्यों उन से सगाई करते हो? सगाई मायने स्वकीयता, स्व मान लेना। सगाई स्व शब्द से बनी है। अपना मान लिया। अभी शादी नहीं हुई। सगाई का अर्थ है कि परवस्तु को अपनी मान लेना और शादी का अर्थ है खुश होना। शादी शब्द विषाद से निकला है। शादी मायने दु:ख, विशाद मायने दु:ख। शादी का नाम विषाद है। तो यह मोही जीव सभी वस्तुवों के साथ सगाई भी किए है और शादी भी किए है अर्थात् इन्हें अपना भी मानता है और दु:खी भी होता जाता है।

धर्मपालन के सही ढंग की हितकारिता▬ये पदार्थ तुम पर कुछ जबरदस्ती नहीं कर रहे हैं कि तुम मुझ को सुनो ही और न यह आत्मा उन विषयों में दौड़ता है। यह तो अपने ज्ञानस्वभाव के कारण जाननहार रहा करता है। लेकिन कितने खेद की बात है कि यह अज्ञानी जीव विषयों को भूलता नहीं है। विषयों की यह करतूत नहीं है, यह अज्ञान की करतूत है। जितनी कलह है, विवाद है, खेद है वह सब अज्ञान की करतूत है। ज्ञान की कला तो शांति है। दिन रात के 24 घंटो में यह गृहस्थ पुरुष कैसा विकल्पों में ही पड़ा रहता है, अपने स्वरूप की दृष्टि छोड़कर बाह्य अर्थो में कितना लगा रहता है? यदि यह 2 मिनट भी यथार्थ ढंग से धर्म करे तो इसको शेष समय में भी मूल में निराकुलता बनी रह सकती है। पर जिस दो मिनट में धर्मपालन करे, पूरी ईमानदारी से करे केवलज्ञान स्वभाव के लिए ही लट्टू होकर, उस के ही रुचिया बनकर उसमें झुके। कुछ समय के लिए सभी बाह्य पदार्थ एक समान बाह्य बन जायें, वहाँ फिर यह वासना न रखें कि मेरे फलाने अमुक हैं। ऐसी दृढ़ भावना से यदि ज्ञान की उपासना की जा सकती है तो समझ लीजिए कि मुझे शांति का मार्ग मिल गया और आगे भी शांति रह सकेगी।

शब्दविषयविरक्ति के उपदेश की प्राथमिकता का कारण ▬ भैया ! यहाँ पांच विषयों में सबसे पहिले शब्द को क्यों लिया? ये शब्द सबसे अधिक विषयों में ले जाया करते हैं। अभी यहाँ बैठे हैं और सड़क पर अगल बगल जो गड़बड़ी मच रही है लो वह सुनने में आ गयी। नाक की बात तो तब है कि जब नाक सांस लेवें तो विषय आयेगा सूँघनेमें। पलक खोलकर देखने की मन में आये तो रूप दिखने में आयेगा। कोई चीज मुँह से खावे तो उसका रस मालूम होगा, किसी वस्तु को छूवें स्पर्श करें तो वह ठंडा या गरम मालूम होगी। पर ये शब्द तो चारों ओर से कानों में घुस पड़ते हैं। उन शब्दों को अपने से अलग बनाए रहना, उनके बहकावे में न आना इसके लिए बड़ा उद्यम करना पड़ता है। बड़ी एकाग्रता हो तब शब्द सुनाई न दे, थोड़ीसी एकाग्रता में यह संयम नहीं बन पाता है, इसलिए सबसे पहिले शब्द की खबर ली है और ये जितने विवाद और कलह बनते हैं, उनमें ये शब्द अगवानी के लिए पहिले तैयार रहते हैं। झगड़ा बनता हो, मनमोटाव होता हो तो सबसे पहिले ये शब्द स्वागताध्यक्ष का काम करते हैं विवाद करनें में , हम को दु:खी करने में ये शब्द पहिले स्वागत करने वाले हैं। हे आत्मन् ! ये शब्द शब्द की जगह हैं, इन को सुनकर तू क्यों अपने में रोष व तोष करता है ?

शब्दों से आत्मा में अकिंचित्करता ▬ यहाँ विषयों से अलग हो जाने के उपदेश में वस्तुस्वरूप के ज्ञान के माध्यम को यहाँ बताया जा रहा है कि निंदा और स्तुति के वचन ये तो भाषावर्गणा योग्य पुद्गल नाना प्रकार से परिणमे जा रहे हैं। ज्ञानी तो ध्रुव कारणसमयसार और पर्यायरूप कारणसमयसार―इन दोनों को जानकर निश्चय मोक्षमार्ग को व निश्चयमोक्षमार्ग के कारणभूत व्यवहार मोक्षमार्ग को जानकर निश्चय तत्त्व की रुचि से इष्ट अनिष्ट विषयों में रागद्वेष नहीं करता है। अज्ञानी जीव ही गाली सुनकर मन में खेद लाते हैं और स्तवन सुनकर फूले नहीं समाते हैं, अपने स्वरूप से भ्रष्ट होते हैं, वे तो शब्द पुद्गल के गुण हैं अर्थात् परिणमन हैं, उन से जीव में क्या जाता है ?

शब्दानाकर्षण के उपदेश का उपसंहार▬ उस अज्ञानी जीवको, जो कि कारणसमयसार के बोध से शून्य हैं, समझाया गया है कि यह तो पर का परिणमन है, उन को सुनकर तू रोष क्यों करता हैं? वे तुम्हें कुछ नहीं कहते हैं। ये शब्द तुम्हें प्रेरणा नहीं करते कि मुझ को सुनो। तो कोई पूछता है कि कान में तो ये आ पड़ते हैं करें क्या? .................................................................... पर भी आत्मा अपने ही स्वरूप में है, वे पौद्गलिक शब्द अपने ही स्वरूप में हैं। यदि ज्ञानस्वभाव का उपयोग दृढ़तर हो जाय तो वह तो मालूम ही नहीं पड़ सकता। यह आत्मा उन शब्दों में लगने के लिए अपने स्वरूप से नहीं चिगता है, इसलिए शब्दादिक विषयों में आसक्ति करना, हर्ष विषाद करना यह ज्ञानी का कर्तव्य नहीं है।

इसी प्रकार रूप के संबंध में भी अब कुंदकुंदाचार्य देव कहते हैं।


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