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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 376

From जैनकोष



असुहं सुहं च रूवं ण तं भणइ पिच्छ मंति सो चेव।

ण य एइ विणिग्गहिउं चक्खुविसयमागयं रूवं।।।376।।

रूप और ज्ञाता का परस्पर अनाग्रह ▬ ये अशुभ और शुभरूप तुम को यह नहीं कहते कि मुझ को देखो और न यह आत्मा ही चक्षु के विषय को प्राप्त रूप को देखने के लिए, ग्रहण करने के लिए अपने स्वरूप से निकलकर बाहर जाता है। यह रूप पुद्ल द्रव्य के रूप शक्ति का परिणमन है। वह अपने में अवश होकर किसी न किसी रूप में प्रकट बना ही रहा करता है और यह आत्मा अपने ही स्वरूप में रहता हुआ अपनी ही ज्ञानशक्ति से अपना परिणमन कर रहा है। उस समय उस के इस परिणमन में जो विषय है वह आश्रय मात्र है, संबंध कुछ नहीं है। पुद्ल का जब यह गुणरूप पर्याय इस आत्मा से भिन्न ही है तो इस रूप में तो इसका कुछ भी आग्रह नहीं किया, हैरान नहीं किया। यह ही ज्ञानभाव से हटकर अपनी अटपट कल्पनावों से हैरान हुआ करता है।

दुर्लभ अवसर के लाभ की ओर▬ देखो भैया ! इस अनंत काल में हम आप इन एकेंद्रिय विकलत्रय आदि अनेक कुयोनियों में रहे। अनंतकाल तो बिना आँख के ही व्यतीत हुआ। निगोद एकेंद्रिय जीव है, पृथ्वी जल आदिक एकेंद्रिय जीव हैं, कीड़े-मकौड़े दो इंद्रिय तीनइंद्रिय हैं, इन के भी आंखे नहीं और चारइंद्रिय अंसज्ञी पंचेंद्रिय के भी आंखे हुई तो केवल अपने विषय मात्र में ही उसका उपयोग रहा। इन आंखों का मिलना कितना दुष्कर है और संज्ञी पंचेंद्रिय मनुष्य होकर इन आंखो का तो मूल्य और अधिक बढ़ गया। चाहे इन से अशुभदर्शन करें, चाहे शुभदर्शन करें । इन इंद्रियों का सदुपयोग करते हुए अपने आत्महित की दृष्टि से विषय कषाय आदिक विभावपरिणामों के अधीन न होकर यदि निर्मोहता की वृत्ति बनाएँ तो इन का यह जन्म सफल है।

पशु और मनुष्यों में अंतर्दिग्दर्शन ▬भैया ! विषय ही जिस का उद्देश्य है, ऐसे मनुष्य में और पशुपक्षियो में कोई अंतर नहीं रहता है। हां इतनी बात अवश्य है कि इसकी गांठ में लाल बँधा है पर पता नहीं है, सो उपयोग नहीं कर सकता। जैसे कंजूस धनी पुरुष अपने धन का कुछ आराम नहीं पा सकता और न उसकी लोक में प्रतिष्ठा रहती है पर चूंकि वह कंजूस भले ही हो, पर है तो धनी। कदाचित् उसका भाव बदल जाय तो उस धन का पूर्ण सदुपयोग कर सकता है। इस ही प्रकार यह मनुष्य भव एक अमूल्य मन का भव है। यद्यपि यह जीव अभी विषय कषायों में व्यग्र है, कंजूस है, आत्मनिधि का सदुपयोग नहीं कर सकता, पर है तो निधि। कभी इसका भाव बदले, विषयकषायों से मोड़ खाये, अपने हित की भावना आए तो सदुपयोग हो सकता है। भावी काल की संभावना की अपेक्षा पशुवों से मनुष्य कुछ श्रेष्ठ हैं पर वर्तमान में जो इसकी करतूत है उसको देखकर समानता सोची जाय तो पशुवों से और मनुष्यों में कोई खास विशेषता नहीं है।

अध्रुव चीज के सदुपयोग का विवेक ▬विवेकी वह है कि अध्रुव चीज का ऐसा उपयोग करे कि जिस से ध्रुव तत्त्व के मिलने में बाधाएँ न आएँ। तन, मन, धन और वचन ये चारों अध्रुव हैं। जो पुरुष इन चारों के कंजूस होते हैं, अपना तन भी पर की सेवा में लगाना नहीं चाहते, अपना मन भी परकेगुण चिंतन में लगाना नहीं चाहते, अपना अध्रुव धन भी परसेवा में लगाने का भाव नहीं करते, अपने वचनों का भी दूसरे जीवों को सुख देने लायक प्रयोग नहीं करते, ऐसे अध्रुव समागम भी कंजूसजन न तो अपने में शांति लाभ ले पाते हैं और न पर के लिए कुछ इष्ट बन पाते हैं। ये सब इंद्रियां अध्रुव हैं। पाया है इन्हें तो इन का सदुपयोग करो।

मात्र रूपज्ञातृत्व में विकार का अनवकाश ▬ यह रूप न तो आत्मा को प्रेरित करता है कि मुझे देखो और न यह आत्मा रूप की ओर जाता है, किंतु यह तो अपने ज्ञानबल से जानने का कार्य किया करता है। इस प्रकार स्वरूप को जानते हुए इस आत्मा के ज्ञानविषय में यह नानापरिणत रूप आ जाये तो आ जाये, इन रूपों के आने से ये विकार तो नहीं होने चाहिये। जैसे दीपक कमरे में रखी हुई सभी वस्तुवों के प्रति उदासीन है तो अपने परिणाम से परिणमता हैं, अब चाहे परपदार्थ प्रकाशित हो जायें तो हो जायें। ये वस्तुवें सभी अपने-अपने में ही जलती है। मात्र उनमें निमित्नैमित्तिक संबंध है, इतने पर भी यदि रागद्वेष होता है तो यह सब अज्ञान का प्रताप है। ज्ञानमात्र निज स्वरूप के ज्ञान में कोई विडंबना नहीं है। इस अज्ञानभाव का परिहार कर के सर्वविशुद्व सहज स्वरूप को निहारें तो यही अंत:पुरुषार्थ दृढ़तम होकर मोक्ष के रूप में परिणत होगा।

प्रकट भिन्नता में भी अनुराग की मूढ़ता▬ भैया ! रूप के प्रसंग में शिक्षा की बात तो कुछ सुगम हो रही है। शब्द तो इन कानों में ठोकर लगाते हैं, पर यह कोई रूप इन आंखों में ठोकर मारता है क्या? नहीं। जैसे कोई जोर से बोले तो कान भर जाते हैं, कानों पर आक्रमण होता है पर इस रूपने कभी आंखों पर आक्रमण किया क्या कि दौड़ कर आए और आंखो में घुस जायें। ये तो जहाँ के तहां पड़े हुए हैं और यहाँ शब्दों के अनुराग से कुछ कम अनुराग नहीं है रूप के देखनेमें। अपना काम कर रहे हैं और कोई सामने से निकले, प्रयोजन देखने का कुछ नहीं है, मगर देखने ही लगते हैं। कुछ देखने की प्रकृति ऐसी पड़ी है कि परवस्तु को देखे बिना नहीं रहा जाता। कोई घर का बाबा मानलो इटावा से आया, अपनी पीठ की गठरी उतारकर आराम से बैठ गया, तो बच्चे नहीं मानते, बतावो बाबा इसमें क्या है? है कुछ नहीं उनके काम की चीज, पर देख लिया तो उन्हें शांति हो गयी। तो देखने का भी शौक रहता है। यहाँ से रेलगाड़ी रोज निकलती है और आप घूमते जा रहे हो रेल की पटरी के नीचे से तो आप उस रेलगाड़ी को देखने लगेंगे कि देखें तो इसमें कितने मालगाड़ी के डिब्बे लगे हैं। है प्रयोजन कुछ नहीं, पर देखने की ऐसी प्रकृति बनी है कि कुछ प्रयोजन न होने पर भी देखे बिना नहीं रहा जाता।

रूप में इष्टानिष्टबुद्धि का कारण अज्ञानभाव ▬ यहाँ रूप कोई आत्मा को प्रेरणा नहीं करता और न यह आत्मा भी अपने स्वरूप से भागकर उन रूपों में प्रवेश करता। एक ज्ञान ज्ञेय का संबंध है, निमित्तनैमित्तिक भाव है आ गए ज्ञानमें, पर इतने मात्र से विकार तो नहीं आने चाहिए। जैसे दीपकने मेज कुर्सी घड़े इत्यादि को प्रकाशित कर दिया तो क्या दीपक मेज, कुर्सी, घड़े रूप परिणम गया? नहीं, तो फिर इस अपने आत्मा को क्यों तुम विकाररूप परिणमाते हो? मकान में से एक ईंट खिसक जाय तो यहाँ आप के चित्त से भी कुछ खिसक जाता है। जैसे किसी जगह घर में आग लग जाय तो चित्त के एक कोने में भी आग लग जाती है। अरे भैया ! जैसे दीपक नाना प्रकार के पदार्थों को प्रकाशित करता है तो भी वह दीपक अपने ही रूप रहता है अन्य नाना द्रव्योंरूप नहीं परिणम जाता है, यों ही तुम ज्ञाता को भी विकृत नहीं होना चाहिये । होते हो तो इसमें अज्ञान ही कारण है।

अब यह बताते हैं कि जैसे रूप के विषय में अज्ञान भाव से यह आत्मा लगता है इसी प्रकार घ्राण के विषय में भी यह आत्मा अज्ञान से लगता है।


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