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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 388

From जैनकोष



वेदंतो कम्मफलं सुहिदो दुहिदो य हवदि जो चेदा।

सो तं पुणोवि बंधइ वीयं दुक्खस्स अट्ठविहं ।।388।।

कर्मचेतना का निर्देश―कर्मफल को चेतता हुआ मैंने यह कर्मफल किया, यह विभावपरिणमन किया, ऐसा जो जीव मानता है वह फिर भी दु:ख के बीजभूत 8 प्रकार के कर्मों का बंध करता है। इस गाथा में कर्मचेतना का स्वरूप दिखाया गया है। ज्ञानभाव के अतिरिक्त अन्य भावों में ‘इसे करता हूँ ’ इस प्रकार की चेतना करने का नाम कर्मचेतना है। यह कर्म―चेतना संसार का बीज है। संसार का बीज यों है कि वह आठ प्रकार के कर्मों के बंधन का कारण है।

कर्मचेतना की मुद्रा―कर्मचेतनावों के रूपक यों होते हैं―मैंने किया मैंने कराया, मैंने अनुमोदना किया याने मैंने हौंसला बढ़ाया, मैंने मन से किया, वचन से किया, काय से किया, और इस प्रकार कराया और अनुमोदा, इस प्रकार के विकल्पों का नाम है कर्मचेतना। ये समस्त विकल्प संसार के कारण हैं। इसलिये मोक्ष्ा चाहने वाले पुरुषों को इस अज्ञानचेतना के विलास के लिये सर्वप्रकार के कर्मों के त्याग की भावना बनाए रहनी चाहिए। जिस जीव की यह वासना निरंतर बनी रहती है कि मैं करता हूँ, मैं करा देता हूँ, मैं दूसरों का हौंसला बढ़ा देता हूँ, मुझ में ऐसी मन वचन काय की कला पड़ी हुई है, ऐसी कर्तृत्व वासना जि से बनी रहा करती है वह अज्ञानी है। मोक्षमार्गी पुरुष को ऐसी भावना रहती है कि न मैं कुछ करता हूँ, न कराता हूँ, न किसी को अनुमोदित कर सकता हूँ। अज्ञानचेतना का विनाश कर के ही ज्ञानचेतना का विलास बन सकता है। मैं तीनों काल विषयक मन, वचन, काय से करने, कराने, अनुमोदने के विकल्पों को सर्व प्रकार के कर्मों को त्याग कर के मैं तो नैष्कर्म्य अवस्था को ग्रहण करता हूँ।

कर्मचेतना के रूपक―जीव अपने प्रदेश से बाहर कहीं कुछ नहीं किया करता, अपने आप में जो कुछ किया करता है वह अपने आप को अपने लिये किया करता है। अज्ञानी यों विकल्प बनाता है कि देखो मैंने यह काम किया। अरे उसने उस काम को नहीं किया, उसने तो उस कार्य विषयक विकल्परूप विभाववरिणमन किया। करने संबंधी कितनी तरह के विकल्प हैं, उन्हें संक्षेप में जातिरूप में संग्रहीत कर के देखा जाय तो मूल में अपने मन वचन काय कृतकारित अनुमोदना के भेद तरंग उठते हैं और इसही के संयोगी अंगों के द्वारा इन कर्मों की बात के 49 प्रकार बनते हैं।

तीनों साधनों से तीनों कार्यों का एक विकल्प – कोई यों विकल्प करे कि मैंने मनसे, वचनसे, काय से किया, कराया और अनुमोदा। यह एक कर्मविषयक सर्वांग विकल्प है इसमें कुछ भी छोड़ो नहीं। कर्मों की बातें तीन हैं और साधनों की भी बातें तीन हैं―किया, कराया, अनुमोदा, ये तीन तो काम हैं और मन, वचन, काय यह तीन साधन हैं। तीनों साधनों से तीनों कर्म करना यह कर्म विषयक सर्वांग विकल्प है।

दो साधनों से तीन कर्मों के 3 प्रकार – कोई दो साधनों से तीनों कर्मों के विकल्प बनाता है तो वे तीन प्रकार से बनते हैं―(1) मैंने मनसे, वचन से किया, कराया, अनुमोदा। (2) मैंने मनसे, काय से किया, कराया अनुमोदा। (3) मैंने वचनसे, काय से किया, कराया, अनुमोदा। दो साधनों द्वारा तीन कर्म करने के विकल्पों की जाति तीन हैं।

एक साधन से तीन कार्यों के 3 प्रकार – कभी एक साधन से तीनों कर्म करने के विकल्प उठते हैं―(1) मैंने मन से किया, कराया, अनुमोदा।(2) मैंने वचन से किया, कराया, अनुमोदा,(3) मैंने काय से किया, कराया, अनुमोदा। ये कर्मचेतना के विकल्पों के प्रकार हैं। कितने प्रकार से यह ज्ञानी जीव अपने में कर्मविषयक विकल्प गूँथा करता है ?इसका छोटा सा यह दिग्दर्शन है।

तीन साधनों से दो कार्यों के 3 प्रकार – कभी 3 साधनों से 2 कर्मविषयक विकल्प होते हैं। जैसे―(1)मैंने मनसे, वचनसे, काय से किया और कराया। (2)मन, वचन, काय से किया और अनुमोदा। (3)मैंने मन, वचन, काय से कराया और अनुमोदा। योग्यताएँ तो भैया !उस मोही जीव में सभी साधनों से सभी कर्मों के करने की बनी हुई हैं, लेकिन उपयोग की विचित्रता की बात है कि कितने साधनों से कितने कर्मों के करने का कब विकल्प उठता है ?कहीं यह जीव दो साधनों से कितने कर्मों के करने का विकल्प किया करता है। तो चूँकि दो के तीन विकल्प हैं, सो तीन विकल्पों से तीन कार्य किए गए हैं।

दो साधनों से दो कार्यों के विकल्पों के 9 प्रकार – कभी दो साधनों से दो कर्म के विकल्प होते हैं। उस के 9 भंग होते हैं―(1)मन वचन से किया कराया, (2)मन, काय से किया कराया, (3)वचन काय से किया कराया, इसी तरह (4)मन वचन से किया अनुमोदा, (5)मन, काय से किया अनुमोदा, (6)वचन काय से किया अनुमोदा, फिर (7) मन, वचन से कराया अनुमोदा, (8)मन काय से कराया अनुमोदा, (9)वचन काय से कराया अनुमोदा।

साधनों से कर्मों के करने के विकल्पों का विवरण–देखिए परविषयक कर्मों की कल्पना में किस प्रकार से विकल्पतरंगों का निर्माण होता है ?उन बातों को साधन और कर्म के द्वारा बताया जा रहा है। मन से करना क्या ?मन से करने का परिणाम क्या ?वचन से भी कितनी ही बातें कर देते हैं और काय से करना तो सब लोग स्पष्ट जानते हैं। मन से कराने का भी विकल्प होता है और कभी कार्य वचन से भी कराया जाता है और काय से भी कराया जाता है, यह तो लोग स्पष्ट जानते हैं। मन से अनुमोदा जाता है, बहुत से कार्य करते हैं लोग और अपने में संकल्प बनाते हैं, अनुमोदना बनाते हैं कि ठीक किया। वचन से अनुमोदा जाता है, यह बात तो बिल्कुल स्पष्ट है और शरीर की चेष्टा से अंगुली उठाकर, आंखें मट का कर इस तरह भी अनुमोदा जाता है। जैसे कोई पूछे कि कहो यह बात ठीक है ना ?सिर हिला दिया, मायने हाँ सही है। तो काय से अनुमोदा गया ना, तो इस प्रकार कर्मों के करने की ये पद्धतियां हैं।

कर्मचेतना का अज्ञान चेतना द्वारा पोषण – इसमें जो यह परिणाम करता है कि मैंने किया, कराया, अनुमोदा, यह सब अज्ञानचेतना है क्योंकि परपदार्थों के द्वारा कोई परपदार्थ नहीं परिणमाया जा सकता, फिर भी यह मान रहा है। निमित्त प्रत्येक अपने ही प्रदेश में अवस्थित रहते हैं, उनके गुण पर्यायों की कला निमित्त के क्षेत्र से बाहर नहीं होती। फिर कौन किस को करता है ?फिर भी यह जीव विकल्प बनाये रहता है, मैंने मंदिर बनवाया, मैंने उत्सव किया। कितने प्रकार के करने के विकल्प बनाते हैं ?आरंभ और परिग्रह संबंधी करने के आशय में जैसे पाप है इसी प्रकार धर्म का नाम लेकर भी परपदार्थों में मैंने कुछ किया, ऐसा आशय रहे तो उसमें भी वही मिथ्यात्व का पाप है। ज्ञानीसंत तो कुछ भी काम कर के वह सामायिक में खड़ा होकर वंदना कर रहा हो, भक्तिपाठ पढ़ रहा हो, उन सभी बातों में यह भावना रखता है कि यह सब अज्ञान की चेष्टा है। जो जो उसने कार्य किया वह ज्ञानभाव के गंध से निकली हुई नहीं है किंतु रागद्वेष जो शेष हैं वे अज्ञान भाव हैं और उन की प्रेरणा के ये सब बाह्य करतूतें हैं। सो इन सब को करता तो है वह, परंतु मेरा इन का ही करने का काम है, ऐसा मिथ्या आशय वह नहीं रखता है।

दृष्टांतपूर्वक ज्ञानी के व्यवहारप्रवृत्ति में भी ज्ञानवृत्ति के लक्ष्य की सिद्धि – जैसे सीढ़ियोंपर चढ़ते हुए कोई सीढ़ियों को भी गिनता है क्या ?नहीं। वह तो सभी सीढ़ियों पर पैर रखकर ऊपर पहुंच जाता है। कोई मनुष्य दौड़ लगाता है तो क्या वह अपने पगों को गिनता जाता है ?अरे वह तो दौड़ता हुआ बड़ी जल्दी से पहुंच जाता है। तो जैसे दौड़ लगाने वाला बिना पगों को गिने हुए दौड़ लगाकर अपने इष्ट स्थान में पहुंच जाता है, सीढ़ियों पर चढ़ने वाले का लक्ष्य अट्टालिका में पहुंचने का है इसी तरह व्रत, तप संयम करने वाले का लक्ष्य निर्विकल्प समाधि भाव में पहुंचने का है न कि वर्तमान में की जा रही मन, वचन, काय की चेष्टावों को निरखने का है।

प्रवृत्तिमात्र में अज्ञानचेष्टापन का ज्ञानी के निर्णय– आत्मानुशासन में इस बात को स्पष्ट कहा है कि ‘यद्यदाचरितं पूर्वं तत्तदज्ञानचेष्टितम्।‘ जो जो भी मैंने यह आचरण किया है वह सब अज्ञान की चेष्टा है। मैं तो निर्विकल्प ज्ञान ज्योतिमात्र हूँ। कितना शुद्ध आशय ज्ञानी संत का होता है और कर्मचेतना से कितना पृथक् बना रहता है ?यह मर्म जिस भक्त की समझ में आता है वह भक्त ऐसे ज्ञानी आत्मावों पर अपना मानो सर्वस्व न्यौछावर कर देता है। इतनी उपासना की दृष्टि जगती है। वह ज्ञानी तो परमगुरु सर्वज्ञदेव और उनके ही मार्ग पर चलने वाले अन्य ज्ञानीसंत पुरुष हैं। पतंग इतनी खबर तो न बिसारो कि जो हम कर रहे हैं वह सब अज्ञान की चेष्टा है, इतनी बात ध्यान में बनी रहे तो ज्ञान की डोर हाथ में रहेगी। चाहे आकाश में कितनी ही उड़ जाये पर डोर बालक के हाथ में है तो पतंग अब भी बस में है। इसी तरह यह अज्ञान की चेष्टावों की पतंगें चाहे कितनी ही दौड़ लगा जाए किंतु ज्ञानतत्त्व की डोर दृष्टि उपयोग के हाथ में है तो अब भी वे बेढंगी क्रियाएँ होकर भी खुद के ही वश में है सब। जिस चाहे क्षण में मन, वचन काय की चेष्टावों का परिहार कर के निर्विकल्प समाधि में अवस्थित हो सकता हूँ।

एक साधन से दो कर्मों के विकल्प के 9 प्रकार – यह कर्मचेतना का प्रकरण है। ऐसे नाना प्रकार के विकल्पों से कर्म का आशय पोसा करते हैं मोही। कभी यह जीव एक साधन से दो प्रकार के कर्मों का विकल्प करता है – एक साधन से दो कर्मों के विकल्प नौ प्रकार से किये जा सकते हैं- (1) मैंने मन से किया, कराया, (2) वचन से किया, कराया, (3) काय से किया कराया, (4) मन से किया, अनुमोदा, (5) वचन से किया, अनुमोदा, (6) काय से किया, अनुमोदा, (7) मन से कराया, अनुमोदा, (8) वचन से कराया, अनुमोदा, (9) काय से कराया, अनुमोदा। ये सब विकल्प बड़े संक्षेप में जातिवाद को लेकर बताये जा रहे हैंइन का विस्तार तो अनगिनता है।

अज्ञान में करामात–देखो भैया !कैसी क्षण-क्षण में विकल्प तरंगे उठा करती हैं और यह अज्ञानी जीव उन विकल्प तरंगों की अपनाए रहता है। इसे भीतर का कुछ पता नहीं और बाहर का भी सही पता नहीं। जो दिखता है वह भी झूठ है और जो भीतर दिखता है वह भी झूठ है, न बाहर की सच्चाई का पता है और न भीतर की सच्चाई का पता है। विकल्पों के अपनाने रूप अज्ञानचेतना के प्रसाद से यह कर्मचेतना का जाल इस जीव को फंसाने के लिये बिछा हुआ है। अभिमानी लोगों को उनके द्वारा यह काम हुए हैं ऐसे कर्तृत्व का वचन बोल दो तो वे अभी खुश हो जायेंगे। किसी को वश करना कोई कठिन बात नहीं है। आप अपने कषाय को वश कर के उन उपायों को करें, घमंडियों की प्रशंसा कर कर के अपना नौकर बना लीजिए। मायाचारियों की हां में हां मिलाकर उन्हें अपना नौकर बना लीजिए। लोभियों को अच्छी-अच्छी चीजें खिलापिला कर अपने अधीन कर लीजिए।

अज्ञानभाव से अज्ञानियों का वशीकरण―ये बच्चे लोग पैसा चाहते हैं, बाप से और रूठकर चाहते हैं। अरे वे भूल करते हैं। हम बच्चों को जरा सी तरकीब बता दें और रोज खूब पैसा लें बापसे। जरासी तो तरकीब है। जरा हाथ जोड़ लें, मीठे वचन बोल लें और आप के पास बैठकर अपना बड़ा विनय दिखा दें, लो इतनी बात कर देने से ही खूब पैसे ले लें। 10 पैसों की जगह पर 20 पैसे मिल जायेंगे। जरासा तो काम करना है, फिर बाप को उल्लू बना लें। पर कषाय की ऐसी चेष्टा भरी है कि वे उपाय ही नहीं सूझते जिस से कि वे अधीन बन जायें और अधीन क्या, वे तो अधीन हैं ही। तुम्हारे अधीन नहीं है तो औरों के हैं, औरों के नहीं है तो अपने विकल्पों के हैं। अज्ञानी जीव तो सदा विवश है, उसका मूल आशय अज्ञानचेतना का है और जब कुछ लोकयात्रा के लिये तैयार होता है तो कर्म चेतना का कदम उठता है।

तीन साधनों से एक कार्य के विकल्प के 3 प्रकार―कभी यह जीव तीन साधनों से एक काम का विकल्प करता है। ऐसे विकल्प तीन प्रकार से जगते हैं―(1) मैंने मन, वचन, काय से किया, (2) मैंने मन, वचन, काय से कराया। (3) मैंने मन, वचन काय से अनुमोदा, ऐसे नाना प्रकार के कर्मों में कर्तृत्व का आशय रखकर यह अज्ञानी जीव अपना स्वरूप भूल जाता है और बाह्य में बड़ा सावधान अपने को समझता है। बाहर का काम जरा सफाईसे, व्यवस्था से बड़ी बढ़वारी के साथ बन गया तो भीतर में कर्तृत्व का आशय बना कर अपने को करता तो बरबाद है, पर समझता है कि लोक में हम सबसे अधिक चतुर हैं। मैं अपना काम यों ही आनन फानन में कर डालता हूँ। समझता है चतुराई और भीतर बसी है व्यामूढ़ता। अरे !अंतर में ही व्यामूढ़ता को समाप्त कर के इस अज्ञानचेतना को दूर कर के ज्ञानचेतना का विलास करना है।

भूतकर्म में कर्तृत्वबुद्धि–इस जीव को अपनी कततूत पर अहंकार रहता है, अपने आपके निष्कर्ष सहज चित्स्वभाव का परिचय न होने से विभावों को अपनाता है और उनमें उनके कारण परपदार्थों के संबंध में कर्तृत्व बुद्धि बनाता है। यह अमृतपान यदि यह जीव करले कि प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र है, किसी भी परद्रव्यपर मेरा अधिकार नहीं है, जो जैसा परिणमता है वह स्वयं की परिणति से परिणमता है। कला तो केवल उसकी ही कार्य करने में संपन्न और समाप्त होती है तो ऐसी वस्तुस्वतंत्रता की बुद्धि से इस जीव को आकुलता नहीं हुआ करती है। यह अज्ञानी जीव भूतकाल संबंधी कर्तापन के भाव को लादे हुए है। इस कर्मचेतना के संबंध में भूतकालविषयक अनेक भंग पैदा हो गए।

दो साधनों के द्वारा एक कार्य के विकल्प के 9 प्रकार–अब कभी यह अज्ञानी दो साधनों के द्वारा एक कर्म का अहंकार रखता है- (1) मैंने मन, वचन से यह कार्य किया, (2) मन, वचन से कराया (3) मन, वचन से अनुमोदा (4) मन, काय से किया, (5) मन काय से कराया (6) मन, काय से अनुमोदा, (7) वचन, काय से किया, (8) वचन, काय से कराया और (9) वचन, काय से अनुमोदा। इस प्रकार दो साधनों द्वारा एक कर्म में 9 जाति विकल्पोंरूप परिणमता है।

एक साधन के द्वारा एक कार्य के विकल्प के 9 प्रकार – कभी यह अज्ञानी एक साधन के द्वारा एक कर्म को करने के अहंकार में भी 9 तरह से परिणमन करता है - (1) मैंने मन से किया, (2) वचन से किया, (3) काय से किया, (4) मन से कराया, (5) वचन से कराया, (6) काय से कराया, (7) मन से अनुमोदा, (8) वचन से अनुमोदा (9) काय से अनुमोदा। इस तरह भिन्न-भिन्न साधनों से भिन्न-भिन्न कर्मों के कर्तृत्व के अहंकार से लदा हुआ यह अज्ञानी जीव कर्मचेतना के वश लोकयात्रा कर रहा है।

कर्मचेतना की संकटमयता–यह जीव स्वभावत: आनंदमय है, जब उदय खराब है तब यह जीव अपने आनंद स्वभाव की दृष्टि से चिगकर बाह्यपदार्थों में स्वामित्व और कर्तृत्व की बुद्धि का बोझ लादता है और दु:खी होता है। इसने यह क्यों नहीं किया, यह ऐसा क्यों नहीं परिणमता, यह यों क्यों नहीं बन जाता ?अरे तुम जगत् में अन्य पदार्थों की संभाल क्या कुछ भी कर सकते हो ?यह तो एक उदय का मेल है कि कदाचित् कोई वस्तु मनचाही सामने आ जाय, कोई जीव मनमाफिक परिणति करने लगे, यह तो एक उदयानुसार कभी-कभी का मेल बन जाता है। इसमें भी वास्तविक संबंध प्रयोजन, मर्म, रहस्य कुछ नहीं है। ज्ञानी संत इन 49 जातियों में विभक्त भूतकाल संबंधी कर्तृत्व के विकल्प को दूर करता है। यह कर्तृत्व विकल्प का पाप मेरा मिथ्या हो।

ज्ञानी की शिवदर्शन से उत्पन्न हुई विविक्तता―भैया ! वे ही सब बातें जिन में अज्ञानी जीव मग्न होकर अहंकाररस में डूबा हुआ व्याकुल हो रहा था। वे सारे विकल्प और करतूतें इस शुद्ध सहज स्वभाव की दृष्टि से ऐसे लग रहे हैं कि ये कहाँ हो रहे हैं। झूठ हो जायें, बन गया काम, ऐसी कोई मेरे प्रोग्राम की बात न थी, मेरे सहजस्वभाव की ओर से कोई कार्यक्रम न था। मिले हुए निमित्तनैमित्तिक भाव से अटपट बातें हो गयीं, हो गयीं, वे मिथ्या हैं, मिथ्या हों। मैं तो सहज ज्ञानस्वरूप हूँ। न मैंने किया, न कराया, न अनुमोदा। यह बीच का इंद्रजाल आ पड़ा था। मैं तो एक सहजशुद्ध ज्ञायकस्वरूप हूँ। ज्ञानी जीव जिस को लक्ष्य में लेकर ऐसा कह रहा है वह चीज लक्ष्य में न आए तो अन्य लोग ऐसा सोचते हैं कि वाह यह तो बड़ा अच्छा हुआ। मुख से कह लिया, पाप मिथ्या हो गए पर जिस तत्त्व को लक्ष्य में लेकर ज्ञानी का यह शिवभाव होता है वह लक्ष्य में आए तो पता पड़ता है कि यह तो अंतपुरुषार्थपूर्वक एकदम सत्य कदम रखा जा रहा है ज्ञानी जीव का शिव संकल्प हो रहा है। अहो पूर्व काल में मोह से जो जो मैंने किया उन समस्त कर्मों को अतिक्रांत करके, त्याग करके, विभक्त करके, उस से पृथक् चेतनात्मक निष्कर्म निज आत्मतत्त्व में अपने आप के साधन के द्वारा बर्तूं।

अज्ञान और ज्ञानचेतना की दिशायें―बीती हुई बात में करने की आप के ममता हुआ करती है क्या? हाँ अज्ञानी जीव के हुआ करती है। कोई घटना कुछ दिन पहिले हो गयी हो और आज भी उसकी ममता रह सकती है। मैं कैसे माफ करूंगा, मुझे ऐसा क्यों कहा था ?अरे ऐसा जो विकल्प है यह ममता का ही तो परिचय है। पूर्वकाल में किये हुए अपराध में भी आत्मीयता है, इसकी निशानी ही तो वर्तमान हठ है। ज्ञानी पुरुष की आत्माने विकल्पों को अपने में स्थान नहीं दिया। हुआ था जो विकल्प वह जब का जब था, अब तो मैं समस्त कर्मों से रहित शुद्ध चेतनात्मक तत्त्व में रह रहा हूँ। एक व्यावहारिक विकल्प का भंग कर के दूसरे व्यावहारिक विकल्पों को अपनाए तो वह तो है बेईमानी, किंतु व्यावहारिक विकल्पों को भंग कर के यह शुद्ध आत्मतत्त्व में बर्ते तो वह बेइमानी नहीं है।

एक ही भाव में द्विजपना–जैसे किसी सेठने दो दिन पहिले कुछ सहायता देने को कहा था, मानो यह कहा था कि तुम्हारा काम अट का है सो तुम हमारे यहाँ से 50 हजार ले जाना। तुम गरीब पुरुष हो, अपना काम चलाना और हो जाय आज वह निर्ग्रंथ साधु, चला जाये जंगल में धर्मसाधना के लिये तो क्या कोई यह कहेगा कि देखो इसने वचन दिया था और वचन पाला नहीं। हाँ, जिस पर ऋण हो वह निर्ग्रंथ साधु नहीं बन सकता है पर और भी वायदा किया हो कि अजी चलो अपन गिरनार जी व मूलबद्री की यात्रा करें, या अपन अगले महीने में बंबई कपड़ा खरीदने चलेंगे, किसी मित्र से ऐसा कह दिया और आज हो गए साधु तो क्या कोई यह कहेगा कि तुमने तो वायदा किया था और आज हो गए हो साधु ?ऐसा कोई नहीं कहता। अरे वह पहले वाला पुरुष तो मर चु का है, अब तो वह द्विज बना है। अब तो उस पुरुष का नया जन्म हुआ है।

नए जन्म में पुराने जन्म की वासना का अभाव ― पहला जन्म वह था जब मां के पेट से निकला था, अब मोह हट गया, रागद्वेष क्षीण हो गया, शुद्ध आत्मा की लौ लग गई तो यह उसका दूसरा जन्म हुआ है। अब पहिले जन्म की बात सब भूल जायेगा। जैसे कोई इस जन्म से मरकर दूसरे भव में पहुंचता है तो वहाँ दूसरे भव में रहते हुए क्या पहिले के इस जन्म की घटनावों में संकल्प, विकल्प मचते रहते हैं ?नहीं तो फिर इसही मनुष्यभव में रहकर साधु व्रत लेकर अर्थात् नया जन्म पाकर अब पुरानी घटना पुरानी ही ढालने चलाने का विकल्प करे तो क्या यह कहा जा सकता है कि मैंने नया जन्म पाया। अरे वह तो वही का वही है जो पहिले था।

ज्ञानचेतना में प्रतिक्रमण की संपन्नता ― ज्ञानी संत पुरुष पूर्वकृत विकल्पों को अपनाता नहीं है। जो इस प्रकार का कर्म होता है वह सब मेरा मिथ्या हो। मैं तो अपने आप में ही बर्त रहा हूँ। अहो मैं ज्ञान स्वभावमात्र हूँ। यह तो स्वभावत: निष्कर्म है। ज्ञाता दृष्टा मात्र रहूं, इतना ही मात्र होना है। अहो यह अटपट बात हो गयी। यह हो गयी, यह न होने की तरह हो जाय। मैं अपनी प्रज्ञा को अपने आप के अंतरमर्म में लिए जा रहा हूँ। मैं शुद्ध ज्ञान स्वरूप हूं- ऐसी भावना के बल से यह जीव प्रतिक्रमण कर रहा है, कर्मचेतना का त्याग कर रहा है। कर्मचेतना तीन प्रकार से होती है, किए हुए कर्मों में कर्तृत्व बुद्धि करना और किए जा रहे कर्म में कर्तृत्वबुद्धि करना और आगे भविष्य में किये जाने वाले कर्मों में कर्तत्व बुद्धि करना। इन तीनों प्रकार की बुद्धियों के त्याग का नाम प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और आलोचना। यहाँ तक प्रतिक्रमण का वर्णन समाप्त होता है।

निश्चय आलोचना नामक परम तप―अब आलोचना के प्रकरण में आइए। जैसे भूतकाल में 3 साधनों द्वारा अथवा दो साधनों द्वारा अथवा एक साधन द्वारा तीन, दो या एक कर्म का कर्तृत्वभाव किया था तो यहाँ आलोचना के विरोधरूप अपराध में उस ही प्रकार के वर्तमान कार्य में कर्तृत्व भाव किया जा रहा है, इसका नाम है वर्तमान कर्मचेतना। इसे भी उसही प्रकार 49 प्रकार के विकल्पों में लेना। उन सब कार्य में भी यह ज्ञानी संत अपने शुद्ध स्वभाव की दृष्टि की ओर आ रहा है। मैं न मन से करता हूँ, न वचन से करता हूँ, और न काय से करता हूँ, न कराता हूँ, न अनुमोदता हूँ। यों वर्तमान करतूत से भिन्न अपने सहज स्वभाव के देखने में यत्नशील हो रहा है।

स्वयं में स्वयं की कला का विलास – वास्तविकता की बात यह है कि जो मैं स्वलक्षणत: जैसा जो कुछ हूँ उस पर दृष्टि देकर देखें तो न मैं शरीर का कर्ता हूँ, न दुकानादि का कर्ता हूँ, न कर्मों का कर्ता हूँ और यह मैं तो रागादिक भावों का भी कर्ता नहीं हूँ। यह भी होना पड़ता है। असावधानी तो इतनी है और उसी का फल है कि मेरा ही विभाव परिणमन हो जाता है किंतु स्वरसत: यह मैं कुछ किया नहीं करता हूँ। न मैं करता हूँ और न मैं कराता हूँ। कराना कहते हैं करते हुए को प्रेरणा करना। मैं कि से प्रेरणा कर सकता हूँ, अपनी भावना वासना के अनुसार अपनी चेष्टा कर डालूं यहाँ तक तो मेरी विभाव कला खेल जायेगी पर इससे आगे मैं किसी को कुछ प्रेर सकूं ऐसी मुझ में सामर्थ्य नहीं है।

उदासीनता से सिद्धि―भैया !यहाँ तो यदि ऐसी दृष्टि से रहे, जैसे देखा होगा ना चतुर भिखारियों को जो यह कहते जाते हैं कि जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला। उसकी आवाज सुनकर देने वाले भी दे उठते हैं। इसी तरह यदि इस आशय से रहा जाय कि कोई यों परिणमन करे तो उसकी मर्जी, न करे तो उसकी मर्जी। ऐसे उदासीन भावों से अपनी वृत्ति बनाएँ तो यह बहुत कुछ संभव है कि आप की मर्जी के विरुद्ध परिणमने वाला भी आप के अनुकूल परिणम जाय और न भी परिणमे तो मैं अपना ही मालिक हूँ ऐसा तो निर्णय है ही आपका। दूसरे का मैं मालिक नहीं हूँ। दूसरे से तो एकमात्र धार्मिक संबंध है और ममता का भी संबंध होता है।

गृहमें भी धार्मिक संबंध की उत्पादि का प्रज्ञा-भैया !ममत्व के संबंध में तो सद्बुद्धि ठिकाने नहीं रहती, पर धार्मिक संबंध मानने पर सद्बुद्धि ठिकाने रहा करती है। क्यों मानें गृहस्थजन कि उनका परिवार के साथ ममता का संबंध है? ममता संबंध नहीं है, किंतु एक धार्मिक संबंध है। भली प्रकार विचार लो-जो पुरुष आत्मबल की प्रबलता के अभाव से सकल संन्यास नहीं कर सकता उसको यह आवश्यक हो गया है कि कहीं कुपथ में न गिर जायें इसलिए कुछ ऐसा परिजन वैभव का संग रखें कि जिस से कुछ एक देश धर्म पालन की पात्रता तो बनी रहे। इसी उद्देश्य से गृहस्थोंने गृहिणी को स्वीकार किया है। यदि भोग और ममत्व के उद्देश्य से गृहिणी को स्वीकार किया हो तो जीवन भर चक-चक लगी रहेगी। यदि पहिले उद्देश्य न रहा हो यह तो अब उद्देश्य बना लेना चाहिए। कुपथ में भ्रष्ट न होउं, इतने मात्र बचाव के लिये घर स्वीकार किया है, कहीं घर में ममता नहीं है।

गृहस्थ को प्राप्त विवेक का प्रसाद―लक्ष्य सही हो, फिर यह बात जल्दी आ जायगी कि ये परिजन समझाये जाने पर भी यदि अनुकूल नहीं चलते हैं तो मत चलें, बाबा तुम्हारा भी भला हो। ऐसी उदासीनता और ज्ञान वैराग्य के प्रकाश में यह गृहस्थ सुरक्षित रहता है। उसकी कितनी भी आमदनी हो जाय पर कोई आकांक्षा गृहस्थ के नहीं रहती । धर्म, अर्थ, काम ये तीनों पुरुषार्थ करना कर देने का काम है। तो अपनी ड्यूटी पालने के लिये वह अपनी आजीविका के कार्य में लगता है। फल मिलना यह हमारी बुद्धि पर निर्भर नहीं है। हाँ हमारी बुद्धि पर निर्भर यह है कि उदयानुसार जो कुछ प्राप्त हो उस के ही अंदर अपना गुजारा करें, ऐसी व्यवस्था बनालें। इस पर तो बुद्धि चलेगी पर किसी की जेब से रुपये निकालकर तिजोरी में आ जायें ऐसी बुद्धि न चलेगी। इस कारण गृहस्थ आचरण के बारे में भी चिंता नहीं रखते, कर्तव्य पालते हैं।

ज्ञानी गृहस्थ का लौकिक इज्जत में अविश्वास--गृहस्थजनों के यह भी परिणाम नहीं होता कि यदि ऐसा ठाठबाट न रहेगा तो पोजीशन गिर जायेगी। न गिरेगी। क्या किसी निर्ग्रंथ दि. साधु का जब इतना त्याग हो गया, घर छोड़ा, कुटुंब छोड़ा, आराम छोड़ा, वाहन छोड़ा, जमीन पर ही लोटते, जमीन पर ही बैठते, यह उन की एक चर्या बन गयी तो क्या उस से उन की पोजीशन कम हो गयी ?उपासक भक्त लोगों के चित्त में तो पोजीशन बढ़ गयी कि धन्य हैं वे संत पुरुष जिन के अहंकार नहीं रहा, शरीर के आराम की बात नहीं रही, जमीन पर ही लौटते हैं, जमीन पर ही सोते हैं, धूल से चिपटा शरीर है, मन में उस के प्रतिकार की आकांक्षा नहीं रहती है ऐसा प्रबल ज्ञान वैराग्य जगा हुआ है। इस प्रकार जो गृहस्थ छोटी आय के भीतर ही संतोषपूर्वक गुजारा करते और मन से दूसरों का भला सोचते, वचन से दूसरों का भला करते, शरीर से दूसरों की सेवा करते उनका कुर्ता चाहे फटा भी हो, कपड़े भी चाहे कोई पहिनने को न मिलें तो भी दुनिया की निगाहमें उसकी इज्जत कम नहीं होती, बल्कि उसकी इज्जत बढ़ती है। अन्याय कर के मायाचार कर के दुनिया में अपनी पोजीशन रख ली और अंतर में रत्नत्रय से भी चिगा रहा, आत्मदृष्टि खो कर निर्बल हो गया तो यहाँ संसार के लोगों के मध्य में भी उसे अपनी करतूत का फल भोगना पड़ेगा।

पर के कर्तृत्व, कारयितृत्व व अनुमंतृत्व का प्रभाव--मैं न करता हूँ किसी अन्य पदार्थको, न कराता हूँ और न अनुमोदता हूँ। पर का कर्ता तो मैं यों नहीं हूँ कि पर की परिणति उस पर में ही होती है, मेरी वृत्ति मेरे में होती है। मैं पर को कहाँ किया करता हूँ और पर को मैं कराता नहीं हूँ। कराना कहते हैं करने की प्रयोजकता को। किए गये काम का फल जि से मिले उसे कराने वाला कहते हैं। जैसे आप खेती कराने वाले कहलाते हैं क्योंकि खेती में जो अनाज उपजेगा उसका फल आप भोगेंगें तो लोक में कराने वाला उसे कहते हैं जो काम का फल भोगे। क्या यह कराने वाला जि से लोक में माना गया है वह परकीय काम के फल को परमार्थत: भोग सकता है ?नहीं। फिर कराने वाला कैसे ?प्रत्येक पदार्थ के कार्य का फल वही प्रत्येक पदार्थ पाता है और वास्तव में फल तो कार्य का यह है कि वह पदार्थ शाश्वत बना रहे। परिणमनकाप्रयोजन वस्तु का शाश्वत बना रहना है, इससे आगे उसका प्रयोजन नहीं है।

परिणमन का प्रयोजन सत्त्व का बना रहना―यहाँ आप अजीव पदार्थ में भली प्रकार से देख लो, वहाँ आप को सच्ची गली दिख जायेगी, क्योंकि अजीव पदार्थ बेईमान नहीं होते। अजीव पदार्थ के परिणमन का प्रयोजन उसका सत्त्व बना रहना है। जीव पदार्थ में यह सच्चाई जरा देर में समझ में आयेगी कि इसके परिणमन का प्रयोजन इसकी सत्ता बनी रहे इतना ही मात्र है; यह बात देर में बैठती है। यही कषाय मन में बसाये हुए है कि अरे बच्चा बड़ा होगा तो हमें आदर से आरती उतार कर रोटी खिलायेगा यह प्रयोजन मन में बसा है। यह समझ में ही नहीं आता कि बच्चे का जो परिणमन होगा उस के प्रयोजन में उस ही द्रव्य का शाश्वत बना रहना है और कोई दूसरा प्रयोजन नहीं है। यह वस्तुस्वरूप के बोध से ध्यान में आता है। तो मैं न करने वाला हूँ, न कराने वाला हूँ, न अनुमोदने वाला हूं--इस प्रकार यह ज्ञानी आलोचना को प्राप्त कर रहा है।

अप्रतिकमण की तरह वर्तमानकर्तृत्व व भावीकर्तृत्व के विकल्प―अज्ञानी जीव भविष्यत् काल के कर्तृत्व की भी संचेतना किया करते हैं। मैं अमुक कार्य करूंगा या करते हुए का हौंसला बढ़ाऊँगा, इस प्रकार के भावों द्वारा भावी काल के कर्मों की भी संचेतना किया करते हैं। जैसे प्रतिक्रमण 49 विकल्पों में होता है अथवा भूतकाल के कर्तृत्व की संचेतना 49 विकल्पों में होती है, इस तरह वर्तमान कर्तृत्व की कल्पना 49 विकल्पों में है। इसी प्रकार भावी कर्तृत्व की कल्पना भी 49 रूपों में है। मन, वचन, काय के इन तीन साधनों द्वारा मैं करूंगा, कराऊँगा, अनुमोदूंगा। इस प्रकार से विकल्पों के द्वारा पहिले की तरह भेद लगा लेना। जैसे भूतकाल के काम का परिग्रह व्यर्थ ही सताता है इसी प्रकार भविष्यकाल के काम का परिग्रह भी व्यर्थ सताता है। आयु व्यतीत हो जाती है, आयु क्षीण हो जाती है किंतु आशा क्षीण नहीं होती है। अब यह करना है, इस करने के भाव में ऐसा रोग बना रहता है कि अपना जो स्वास्थ्य है, ज्ञानदर्शनस्वभावी आत्मतत्त्व का श्रद्धान ज्ञान और आचरण है वह नहीं बन पाता। करूंगा, करूंगा यह तो बहुत ख्याल में रहता है किंतु मरूंगा, मरूंगा, मरूंगा यह भूल जाता है।

भावकर्म के संबंध में ज्ञानी की भावना―आलोचना में ज्ञानी संत का यह भाव रहता है कि मोह के विलास के बढ़ने से उत्पन्न हुए जो ये कर्म हैं ये सब मेरे स्वरूप नहीं हैं, इन से मैं पृथक् हूँ, ऐसा जानकर चैतन्यस्वरूप निष्कर्म आत्मा में मैं बर्तूं। इस ही प्रकार यह ज्ञानी संत भविष्य काल के कर्मों को भी त्याग कर मोहरहित होता हुआ इस निष्कर्म चैतन्यस्वरूप आत्मा में रहूं, ऐसी भावना करता है। मन, वचन, काय की जो चेष्टा हुई जि से मैंने स्वरसत: नहीं की, किंतु हो गयी, इस ही प्रकार मन, वचन, काय का जो परिणमन होगा वह भी मैं न करूंगा किंतु हो पड़ेगा। मैं तो वह करता हूँ जो मेरे सत्त्व के कारण ही मुझ में उत्पन्न हो सकता हो।

पर में करने, कराने व अनुमोदने की सृष्टि की असंभवता ― करना कहते हैं परवस्तु का परिणमन बना देनेको। सो यह तो होता नहीं। कराना कहते हैं परवस्तु के परिणमन का फल स्वयं पा लेना। सो यह भी होता नहीं, क्योंकि परमार्थ: प्रत्येक कार्य का संप्रदान कार्य का आधारभूत पदार्थ ही मिलता है। और अनुमोदना कहते हैं करते हुए की अनुमोदना करना, अनुमोदना है एक प्रकार का ज्ञानपरिणमन। जैसे ज्ञान परमार्थत: परपदार्थ को नहीं जानता किंतु अपने ही ज्ञेयाकार परिणमनरूप से जानता भर रहता है, इस ही प्रकार कोई भी पुरुष किसी पर को अनुमोद नहीं सकता, वह अपने कषाय के विकल्पों को ही अनुमोदता है। अत: न 'मैं'पर का कुछ कर सका, न करा सका, न अनुमोद स का और इस ही प्रकार न मैं पर का कुछ करता हूँ, न कराता हूँ, न अनुमोदता हूँ। यहाँ मैं शब्द को देखने में अनादि अनंत शुद्ध चैतन्य स्वभाव रूप में दृष्टि जानी चाहिए। न मैं किसी पर का कुछ करुंगा, न कराऊँगा, न अनुमोद सकूंगा। इस प्रकार निश्चयप्रतिक्रमण, निश्चयप्रत्याख्यान और निश्चयआलोचना की पद्धति से शुद्ध ज्ञान चेतना की भावना बनती है और मैं ज्ञान को ही करता हूँ, ज्ञानरूप ही परिणमता हूँ, ऐसी दृढ़ भावना के बल से इस ज्ञानी के कर्मचेतना का संन्यास हुआ।

अब अज्ञानचेतना की दूसरी शाखा जो कर्मफल चेतना है उस कर्म फल चेतना के संन्यास की भावना के लिए पहिले कर्मफल चेतना का स्वरूप अवधित करते हैं।


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