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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 389

From जैनकोष



वेदंतो कम्मफलं सुहिदो दुहिदो य हवदि जो चेदा।

सो तं पुणोवि बंधइ वीयं दुक्खस्स अट्ठविहं ।।389।।

कर्मफल चेतना–मूल में मोही जीव के अज्ञान चेतना उठी। ज्ञान के अतिरिक्त अन्य भावों में ‘यह मैं हूँ’ ऐसी चेतना का नाम अज्ञानचेतना है। वह अज्ञानचेतना दो प्रकार की है―कर्मचेतना और कर्मफल चेतना। उसमें कर्मचेतना का तो वर्णन किया जा चु का है। अब इस गाथा में कर्मफलचेतना का वर्णन चल रहा है। ज्ञानभाव के अतिरिक्त अन्य भावों में यह मैं इसे भोगता हूँ, इस प्रकार का अनुभवन करना सो कर्मफल चेतना है। इसमें प्रकट रूपक इस भांति के हैं। मैं भोजन खाता हूँ, मैं और इंद्रियों के सुख को भोगता हूँ, ऐसी इंद्रियज सुख के भोगने का जो परिणाम है, सो कर्मफल चेतना है। कुछ इस मुझ को ख्याल ही नहीं है कि ये विषय अत्यंत परपदार्थ हैं, इन को मैं कभी भोग ही नहीं सकता। इन पदार्थों के संबंध में जो मैं विकल्प किया करता हूँ, उस विकल्प को ही भोगता हूँ। इस मर्म का परिचय न होने से अज्ञानी जीव का आकर्षण परपदार्थ की ओर रहता है और यह आकर्षण सबसे महान् कठिन विपदा है।

संसारमार्ग व मोक्षमार्ग का मूल में अंतर―भैया ! संसारमार्ग और मोक्षमार्ग के परस्पर विपरीत होने की सीमा में यहाँ थोड़ा ही अंतर है। जैसे दो खेतों के बीच बहुत पतली रेखा पड़ी हो तो दो खेतों का बंटवारा कराने वाली मूल में जो जगह है वह बहुत कम अंतर वाली है, पश्चात् बाहर के विस्तार के क्षेत्र का अंतर अधिक है। इसी प्रकार यह सारा संसार जो अनेक योनिकुलों रूप है, अनेक विडंबनाओं रूप है इसके और अनंतचतुष्टयात्मक मोक्ष का तो बड़ा अंतर है, पर इस बड़े अंतर के सीमारूप मूल में जरा सी बात का अंतर था क्योंकि आत्मप्रदेश में अवस्थित इस उपयोगने अपनी ओर मुख न कर के पर की ओर मुख कर दिया। इतना ही मूल में अंतर रहा, पर इस अंतर के परिणाम में अंतर इतना बढ़ गया कि कहाँ तो संसार की ये सारी विडंबनाएँ और कहाँ मोक्ष का अनंतचतुष्टयात्मक स्वरूप। इस अज्ञानचेतना का जो मूल में अत्यंत निकट का अपराध है उस अपराध के फल में कर्मचेतना और कर्म फल चेतना के रूप में बड़ा विस्तार बन जाता है। ज्ञानभाव के अतिरिक्त अन्य भावों को मैं भोगता हूँ, ऐसी चेतना करना सो कर्मफलचेतना है।

विषयभोग के विकल्प के भोगने की बुद्धि में भी कर्मफलचेतनापन ― मैं भोजन भोगता हूँ, यह तो कर्मफलचेतना है ही, पर मैं कुछ थोड़ा बहुत शब्दों को बोलने लगा और इस ढंग में कुछ दिखने लगा कि मैं भोजन को नहीं भोगता हूँ, किंतु भोजन संबंधी जो विकल्प हुआ है उस विकल्प को भोगता हूँ। यहाँ पर भी कर्मफलचेतना ही रही। मैं तो ज्ञानभाव के अतिरिक्त अन्य आत्मीय परभावों को भी नहीं भोगता हूँ। ऐसा मात्र शुद्धनिश्चय की दृष्टि से केवल ज्ञानवृत्ति को ही भोगने की भावना करना, सो कर्मफल चेतना से अलग ज्ञानचेतना वाली बात होगी। यह कर्मफल चेतना भी 8 प्रकार के कर्मों का बंध कराने वाली है। कर्मफल को भोगता हुआ सुखी और दु:खी होना, सुख और दु:ख को भोगता हुआ ऐसा अनुभव करना, सो यह कर्मफल चेतना है।

क्लेश पाने की मूल पद्धति की एकता--यह कर्मफलचेतना संसार के बीजभूत 8 प्रकार के कर्मों को बांधती है यह जीव बिल्कुल व्यर्थ ही दु:खी हो रहा है। पूरा है, अपने में है, प्रभु है, विभु है, पर से कुछ लेनदेन नहीं है किंतु मोहवश पर की ओर अपने उपयोग को भेजकर अपने को रीता बना लेता है, और जो रीता हो गया, गरीब है, दीन हो गया, आशा करने वाला हो गया सो दु:खी ही होगा। एक ही ढ़ंग का दु:ख है सब जीवोंके। पर की ओर आकर्षण, बस यही मूलरूप दु:ख है जगत के सब जीवोंको। जैसे मनुष्य चाहे हिंदू हो, मुसलमान हो, जैन हो, एक तरह से ही पैदा होते हैं और एक ही तरह से मरते हैं। इसी तरह कोई भी जीव हों वे सब एक ही तरह से दु:खी होते हैं--वह तरह है परपदार्थों की ओर अपने उपभोग का आकर्षण हो जाना। सब जीवों में इसी ही प्रकार का दु:ख है, चाहे कीड़ा मकौड़ा हो, चाहे देव मनुष्य हो, एक ही किस्म से यह सारा जीवलोक दु:खी है।

विभिन्न क्लेशों में भी मूल पद्धति की एकता―जैसे किसी के मरने की प्रक्रिया में भले ही पचासों तरह की घटनाएँ हों, कोई जल में डूबकर मरे, कोई आग में जलकर मरे, कोई बीमारी से मरे, कोई हार्टफैल होकर मरे। कितने ही भिन्न साधन बन जायें परंतु मरना जीना तो एक ही तरह का है। कोई बड़े लाड़ प्यार के साधन में पैदा हो और चाहे आफत मानने वाले माता पिता के विकल्पों के वातावरण से पैदा हो―पैदा होना और मरना एक ही ढ़ंग से होता है। इसी तरह दु:खी होना एक ही ढ़ंग का है, उस के रूपक चाहे कितने ही भिन्न हो गए हों। और ये रूपक इतने भिन्न हो गए कि एक मनुष्य के दु:ख से दुसरे मनुष्य का दु:ख मिलता जुलता नहीं है। हम और ढंग से दु:खी हो रहे हैं, आप और ढंग से दु:खी हो रहे हैं। सब के दु:खों की पद्धतियां न्यारी-न्यारी हो गयीं फिर भी मूल में प्रकार एक ही है। अपने ज्ञानभाव को छोड़कर अन्य भावों में आकर्षण हुआ। यह अपराध जितने दु:खी हैं सब के एक समान पाया जाता है।

कर्मफलचेतना के संन्यास के लिये भगवती ज्ञानचेतना से अभ्यर्थना–मैं अन्य पदार्थों को भोगता हूँ, इस प्रकार की चेतना संसार का बीज है, दु:ख का कारण है, ऐसा जानकर जो संकटों से छूटने का अभिलाषी हो उस पुरुष को इस अज्ञानचेतना का प्रलय करने के लिये जैसे कर्मचेतना के संन्यास का भाव किया था इसी प्रकार सकलकर्मफल के भी संन्यास की भावना करे और स्वभावभूत भगवती ज्ञानचेतना का आराधन करें। भगवान अर्जी न सुने तो इस भगवती से अर्जी करो। लोक में कुछ ऐसी चलन है कि जो बात गुरु जी से कहकर सिद्धि में न आती हो तो गुरुवानी से कह देता है बालक। तो भगवानने तुम्हारी न सुनी हो तो इस भगवती से अपनी अर्जी करो। कौनसी भगवती ?यह ज्ञानचेतनारूप भगवती। जैसे गुरुवानी के जोर से गुरु भी मान जायेगा, ऐसे ही ज्ञानचेतना के जोर से यह भगवान भी मान जायेगा। मैं ज्ञायकस्वरूप हूँ, ज्ञान को ही करता हूँ, ज्ञान को ही भोगता हूँ, इस प्रकार का अनुभवन करना सो ही भगवती ज्ञानचेतना की आराधना है।

कर्मचेतना व कर्मफलचेतना के आशयों की तुलना--भैया ! कर्मचेतना से निपटकर अब कर्मफलचेतना से निपटो। यद्यपि जब कर्मचेतना दूर होती है तो कर्मफल चेतना भी दूर होती है, फिर भी व्यवहार में पहिले कर्तृत्वबुद्धि का परिहार कर के भोक्तृत्वबुद्धि का परिहार करना देखा जाता है। परपदार्थ को करने का ऊधम विषमता और उद्दंडता दोनों से भरा हुआ है और भोक्तृत्व का ऊधम चाहे उद्दंडता से भरा न हो तो भी वह विषमता से भरा है। जैसे समझदार बदमाश और मूर्ख बदमाश―इन दोनों में से अधिक खतरनाक किसे जानते हो ?समझदार बदमाशको। समझदार बदमाश जैसा तो कर्मचेतना और मूर्ख बदमाश जैसा है कर्मफलचेतना। कर्मचेतना में उद्दंडता का नाच है और कर्मफल चेतना में विवशता का नाच है।

कर्मफल से उपेक्षा―तीन काल संबंधी सर्व प्रकार के कर्मों को दूर कर के यह शुद्धनय का आलंबन करने वाला ज्ञानी पुरुष मोह को विलीन कर के विकाररहित चैतन्यस्वरूप अपने आत्मा का आश्रय करता है और कर्मचेतना का परित्याग करके, कर्मसंन्यास की भावना बनाकर अब यह ज्ञानी समस्त कर्मफल के संन्यास की भावना करता है। ये कर्मफल मेरे स्वभाव से उत्पन्न नहीं हुए। ये कर्मरूपी विषवृक्ष के फल हैं, औपाधिक भाव हैं, परभाव हैं, ये कर्मविषवृक्षफल, विभाव परिणमन, सुख दु:ख आदिक विभाव मेरे भोगे बिना ही निकल जाएँ। मैं तो एक चैतन्यस्वरूप अचल आत्मा को ही चेतता हूँ। ये कर्मफल आ पड़े हैं, किंतु यह ज्ञानी अंतरंग में ज्ञानस्वरूप की भावना बनाए हुए है और ज्ञानस्वरूप की तीव्र रुचि के कारण वह अपने में ऐसा साहस बनाए है कि ये कर्मफल विभाव मेरे भोगे बिना ही खिर जायें।

अविपाकनिर्झरणभावना- -खिरना तो इन्हें ही, क्योकिं ये रागादिक भाव अत्यंत अशरण हैं, इन का सहाय कोई नहीं है। ये आते हैं मिटने के लिए। जैसे पतंगी दीपक पर आती है मरने के लिए, ऐसे ही रागादिक विभाव उत्पन्न होते हैं तो मिटने के लिए ही उत्पन्न होते हैं। किंतु यह जीव मिटने वालों से राग कर के अपने आप को बरबाद करता है। ऐ कर्म विषवृक्षफलों, तुम मेरे भोगे बिना ही गल जावो, तुम निकल तो रहे ही हो निकल जावो, पर भोगे बिना निकल जावो, उनमें भोगने का विकल्प बनाए बिना मेरे ऊपर से गुजर जावो। जानता है ज्ञानी कि ये कर्मफल अंतर में प्रवेश तो कर ही नहीं सकते, सो उनके प्रति संन्यास भावना करता है कि आए हैं महिमान तो मेरे भोगे ही बिना, मेरे द्वारा आदर किये बिना ही निकल जावो क्योकिं ये महिमान हैं। महिमा नहीं जिन की सो महिमान। जितनी घर के बच्चे की आप महिमा समझते हैं उतनी आप फूफा के मौसा के बच्चे की महिमा नहीं समझते घर का है। वह महिमा है, बाहर का है महिमान है। ऐसे महिमान विभावों के प्रति हे विषफलो ! मेरे भोगे बिना ही निकल जावो, ऐसी ज्ञानी की भावना होती है।

ज्ञानावरणकर्मफलसंन्यासभावना ― कर्मों की 14 प्रकृतियाँ होती हैं। प्रकृति कहते हैं फल देने की जातिको। किसी जाति का फल देने की प्रकृति पड़ी है, ऐसी प्रकृति को कर्मप्रकृति कहते हैं। ज्ञानावरण की 5 प्रकृतियां हैं―मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मन:पर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण। मतिज्ञानावरणीय कर्म के उदय का निमित्त पाकर यह जीव मतिज्ञान प्रकट नहीं कर सकता। मतिज्ञान बिल्कुल प्रकट न हो, ऐसी स्थिति संसारी जीव की नहीं ह। कुछ न कुछ बना रहता है पर जो नहीं प्रकट हो सकता है उसमें निमित्त है मतिज्ञानावरण कर्म का उदय। इसी प्रकार अन्य ज्ञानावरणों का भी उस ज्ञान को प्रकट न होने देना यह काम है। अज्ञानरूप स्थिति होना यहीं ज्ञानावरण कर्म का फल है। होती है ज्ञान के अभावरूप स्थिति, लेकिन अंतर में निज सहजस्वभाव का परिचय कर लेने वाले ज्ञानी पुरुष को अंतर में इस चैतन्यस्वभाव का ही दर्शन और रमण करने का यत्न होता है इस कारण उसकी यह भावना होती है कि वह अंतर में यह निर्णय किए हुए रहता है कि मैं ज्ञानावरणीय कर्मों के फल को नहीं भोगता हूँ किंतु चैतन्यात्मक आत्मा को ही चेता करता हूँ।

दर्शनावरणकर्मफलसंन्यास भावना ― दर्शनावरणीय कर्म का फल है आत्मदर्शन न होने देना। दर्शनावरणीय कर्म का उदय रहते हुए भी समयग्दृष्टि के अंतर में आत्मा का दर्शन यथासमय होता रहता है और इस बल से वह अपने अंतर में यों निर्णय किये हुए रहता है कि मैं दर्शनावरणीय कर्म के फल को नहीं भोगता हूँ, किंतु चैतन्यात्मक निज आत्मा को ही चेतता हूँ।

वेदनीयकर्मफलसंन्यास भावना ―वेदनीय कर्म के उदय से जीव को साता और असाता प्राप्त होती है, साता असाता परिणाम में आश्रयभूत सामग्री का संयोग होता है। इन सब कर्मफलों के बीच भी ज्ञानी जीव यह निर्णय रखता है कि मैं वेदनीयकर्म के फल को नहीं भोगता, किंतु चैतन्यात्मक आत्मा को ही चेतता हूँ। ऐ विषवृक्ष फल, मेरे भोगे बिना ही निकल जावो।

मोहनीयकर्मफल संन्यास भावना ―मोहनीय कर्मों की 28 प्रकृतियां होती हैं, तीन तो दर्शनमोह की प्रकृतियां हैं―मिथ्यात्व परिणाम होना, मिश्रपरिणाम होना और सम्यक्त्व में दोष उत्पन्न होना। इनमें से मिश्र परिणाम और मिथ्यात्व परिणाम की बात जिस के नहीं रही है अथवा तीनों दर्शनविभाव नहीं रहे आंदोलन बना हुआ है कि मैं किसी भी कषाय के प्रकृति फल को नहीं भोगता हूँ किंतु मैं चैतन्यस्वरूप आत्मा को ही चेतता हूँ। जरा कड़ा साहस कर के इस ऊधम को दूर कर के अंतर में प्रवेश करें। बाह्य विकल्पों से निकलकर अंतर में प्रवेश करने वाला ज्ञानी संत विचार रहा है कि मैं तो चैतन्यात्मक आत्मा को ही भोग रहा हूँ। कोई न भी भोग रहा हो किंतु चैतन्य रस के भावना की उत्कंठा प्रबल हो तो उस ओर ही दृष्टि होने के कारण वह कुछ भी भोगता हुआ ऐसा ही मन में भाव रखता है अथवा यह ज्ञानरस का अनुभव दूर कहाँ है ?मैं इस ओर दृष्टि नहीं करता हूँ। दृष्टि करता हूँ तो मैं इसको ही भोगता हूँ।

कार्य की बदल में नूतन कार्य की तत्परता ―भैया ! भोगने के निकट होने में भी भोगता हूँ, ऐसा प्रयोग होता है। जैसे बहुत देर तक बातों में लगने के बाद जब खाने की इच्छा होती है तो मित्र अपने दोस्त से कहता है कि अब मैं बात नहीं करता हूँ। अब तो मैं खाता हूँ। तो खाने की ओर उपयोग दिया। अभी खा नहीं रहा है, फिर भी वह ऐसा निर्णय बनाए है कि अब मैं गप्पों में नहीं हूँ, अब तो मैं खाता हूँ। तो यह ज्ञानीसंत कभी कभी तो ज्ञानरस को भोग लेता है और कभी स्मरण करता हुआ उसकी ओर दृष्ट होता है कि मैं कहाँ अन्य कुछ भोगता हूँ, ऐसा उस के निर्णय बना रहता है। कभी देखा होगा कि ऊपर सुख और भीतर दु:ख। कभी अनुभव किया होगा कि ऊपर तो दु:ख और भीतर सुख। ऐसी स्थितियां आया करती हैं।

अंतर्भोग व बाह्य वर्तना के बेमेलीपर एक दृष्टांत ―जैसे कभी कोई इष्ट वियोग की घटना घट जाये तो रिश्तेदार मित्रजन उसे बड़े प्यार से बुलाते हैं, गोद में बिठाते हैं, मस्तक पर हाथ फेरते हैं, बढ़िया बढ़िया खाने के सामान रखते हैं और उसका दिल बहलाने की कोशिश करते हैं। ऊपर से कितना सुखी हो रहा है, ऐसा सुख तो कितना ही खर्च करने पर भी नहीं मिलता है, पर भीतर में उस के दु:ख बना हुआ है। इसी तरह सम्यग्दृष्टि पुरुष के ऊपर से तो दु:ख लगा है, घर गृहस्थी का झगड़ा लगा है, लड़कों को पढ़ाना लिखाना, लड़कियों की शादी करना, सभा सोसाइटी के काम करना, देश की सब बातें हैं, तो ऊपर से तो कितने दु:ख लगे हुए हैं, पर अंतर में जरासा ही तो मोड़ना है ज्ञानदृष्टि को, मैं तो यह अमूर्त ज्ञानमात्र हूँ, परिपूर्ण हूँ, ज्ञानानंदमय हूँ, यों देखकर भीतर में अनाकुल बना हुआ है। उसमें इतनी हिम्मत है कि कर्तव्य है मेरा परपदार्थों में कुछ करने का, हो गया तो ठीक, न हो गया तो ठीक।

ज्ञानी का ज्ञातृत्व ―अज्ञानी जीव की कल्पना में आता है कि न हुआ ऐसा तो, वह घबड़ा जाता है, फिर क्या होगा ?परंतु ज्ञानी पुरुष के घबड़ाहट नहीं है, हो गया तो ठीक, न हुआ तो ठीक। इष्टवियोग हो जाता है तो ज्ञानी ज्ञाता उसका रहता है, मैं तो पहिले से ही जानता था कि ऐसा होता है, उसे क्लेश किस बात का ?यह ज्ञानी पहिले से ही जान रहा है कि जो कुछ परिणमन है यह सब मिटने वाला है, अलग होने वाला है। कोई मर गया तो इसमें कौन सी अनहोनी बात हो गयी ?यह तो होने की ही बात है, होकर रहेगी। किसी का कुछ समय संयोग है तो अंत में वियोग होगा ही। इसे कोई नहीं टाल सकता। इस बात को अभी से जानते रहें तो जब तक जी रहे हैं तब तक सुखी रह जायें ना, यह समय भी दु:ख में क्यों निकले ?ज्ञानी जानता है कि मैं कर्मों के फल को नहीं भोगता हूँ किंतु अपने चैतन्यात्मक आत्मा को ही चेतता हूँ।

ज्ञानतीर्थ में क्वचित् संगम -- क्रोध आता हुआ भी अंतर में ज्ञान और शांति बनी रहे, ऐसी विरुद्ध दो नदियों का संगम इस ज्ञानतीर्थ में ही हो सकता है। क्रोध आये फिर भी उस क्रोध में पर का अनर्थ न कर सके, ऐसी सज्जनता इस ज्ञानी पुरुष में ही रहा करती है। अज्ञानी तो ऐसा क्रोध करेगा कि किसी कारण क्रोध कम हो रहा हो तो यह कोशिश करता है कि क्रोध कम न हो, नहीं तो मैं इसका नाश ही न कर सकूंगा। क्रोध और अंतर में शांति, इन दोनों का मेल ज्ञानतीर्थ में होता है। मान और अंतर में विनय, इन दोनों का संगम किसी ज्ञानी में होता है। अभी अंतर की सरलता और बाहर का मायाचार, इन दोनों का भी मेल होता है कि नहीं ?होता है। किसी के अंतर में तो यह बात बसी है कि मैं सर्वपरिग्रहों को त्यागकर ज्ञानस्वरूप आत्मा में ही रहूं, भीतर तो यह आशय बना है और ऊपर ये सब मन, वचन, काय की चेष्टाऐं ऐसी बनी हैं कि भीतर के अभिप्राय के विरुद्ध हैं । या यों कहो कि ज्ञान में बात हितपूर्ण बसी है और करना कुछ और है। यह तो है ज्ञानी का अवशता का मायाचार। अंदर में यह बात बसी है कि मैं शुद्ध ज्ञानरस में मग्न हो जाऊं और ऐसी बात बाहर करता नहीं। विवशता में ऐसा आचरण बनाता है कि कमाये, घर रहे, बात करे और उनमें मन है नहीं, मन लगा है निजप्रभुता की जगह और कर रहा है, बोल रहा है कुछ और तो यह भी एक बड़ा अद्भूतसंगम है।

रुचि और भोग की मैत्री--अंतर में निर्विकल्पता और बाहर में आवश्यक वृत्ति संचय―ये दो बातें प्राक्पदवी में किसी बिरले ज्ञानी पुरुष में एक साथ संगत हो जाती हैं। इसी बल पर तो ज्ञानी के यह निर्णय है कि मैं मोहनीय कर्मों के फल को नहीं भोगता हूँ, किंतु मैं तो चैतन्यस्वरूप आत्मा को चेतता हूँ अथवा भोगने का काम छोड़कर चेतने के काम की तैयारी में ऐसा कहा जाय कि मैं कर्मफल को कुछ नहीं भोगता हूँ, मैं तो चैतन्यस्वरूप आत्मा को अनुभवता हूँ। प्रोग्राम बदल गया, अब गप्पों में नहीं बैठता हूँ, अब तो मैं भोजन करता हूँ। जैसे दो कामों में एक से निवृत्ति और एक में प्रवृत्ति होती है। जब नूतन कार्य का उद्यम होता है तब भी यह सब बोला जाता है और यह ज्ञानी तो कर्मफल के क्षेत्र से परे अंतर में बोझरहित ज्ञानरस का स्वाद लिये जा रहा है। मोहनीय कर्मों में हास्य, रति, शोक, भय, जुगुप्सा ये सब प्रकृतियां हैं, उन प्रकृतियों के फल में हास्य शोक आदि रूप परिणमन भी होता है, किंतु उन सब स्थितियों में इस ज्ञानी के यह निर्णय बना है कि मैं हास्य शोक आदि फलों को मैं नहीं भोगता हूँ किंतु ज्ञानरसात्मक निजतत्त्व को अनुभवता हूँ।

ज्ञानी की अंतरचेतना--दो मित्र बातें कर रहे हों, एक से घनिष्ट मित्रता हो और एक से साधारण बोलचाल हो तो साधारण बोलचाल वाला बड़ी बड़ी बातें सुना रहा है पर यह तो मैं नहीं सुनता हूँ, मैं तो सुन रहा हूँ दूसरे घनिष्ट मित्र की बात और सुन रहा है दोनों जगह, शब्द कहाँ जायें ?कान में तो दोनों मित्रों की बात आ रही है मगर घर कर रही है घनिष्ट मित्र की बात और साधारण बोलचाल वाले की बात को सुन ही नहीं रहा है। इसी तरह ये कर्मफल भी ज्ञानी जीव पर आ रहे हैं और अंतर में ज्ञानरस का पान भी किया है ना इसने, उसका स्मरण बना है। तो यह ज्ञानी कर्मफल को नहीं भोगता किंतु ज्ञानरस को चेतता है।

आयुकर्मफलसंन्यासभावना--एक आयुकर्म होता है जिस का फल यह है कि आत्मा को शरीर में रोके रहना, यह आत्मा इस शरीर में रुका हुआ है, शरीर के बंधन में पड़ा हुआ, फिर भी यह ज्ञानी जीव जिस का कि उपयोग नित्य निरंजन सहज ज्ञानस्वरूप में लगा है उस ओर ही जो रहने का उत्सुक है तो जिस का ख्याल है उसका भोग है। शरीर है और इसमें बंधा हुआ है इस ओर उसका ध्यान नहीं है और न ऐसा अनुभवन करने का उपयोग कर रहा है। वह ज्ञानी तो आयुकर्म के फल को नहीं भोग रहा है किंतु चैतन्यरसात्मक आत्मतत्त्व को चेतता है।

नामकर्मफलसंन्यासभावना --नामकर्म के फल में अनेक प्रकार के शरीरों की रचना होती है। शरीर की कितने प्रकार की रचना है यह क्या समझाना है ?यहीं देख लो जितने दिख रहे हैं इन सबकी नाक आंखों के बीच और मुँह के ऊपर ही तो लगी है, एक स्थान पर ही है। पर किसी की नाक से किसी की नाक नहीं मिलती। खूब देख लो। तो जब यह नाक ही किसी की नाक के समान नहीं दिख रही है तो फिर यह सारा शरीर कैसे समान होगा और फिर पशु, पक्षी, कीड़ा, मकोड़ा, पेड़, इन सब के संस्थान विभिन्न प्रकार के हैं, इनका रस, इनका स्वरूप, इन का वर्ण, आकार, प्रकार, ढाँचा यह सब भिन्न–भिन्न प्रकार के हैं। ऐसे भिन्न भिन्न्ा शरीर होना नाम कर्म का फल है। पर होने दो खूब फल, मैं तो यह शरीर ही नहीं हूँ। मैं तो एक ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व हूँ और ऐसा रुचिपूर्वक उपयोग भी इस स्वभाव की ओर जाय तो लो नामकर्म के फल को अब नहीं भोग रहा है। वह तो चैतन्यरसात्मक आत्मा को ही चेतता है। अथवा यह सब कर्मफलचेतना संन्यास की भावना की जा रही है, मैं इसे नहीं भोगता हूँ, मैं तो यह करता हूँ, अपने आप को चेतता हूँ।

क्षेत्रकर्मफलसंन्यासभावना ―गोत्र कर्म का फल है लोकमान्य अथवा लोकनिंद्य कुल में उत्पन्न होना। लोकव्यवस्था से अथवा अपने आचरण के संस्कार से उत्तम अथवा नीच कुल होता है। लेकिन जब मैं शरीर ही नहीं हूँ और किसी प्रकार की पोजीशन भी मैं नहीं हूँ। मैं तो ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व हूँ, तो वह गोत्रकर्म के फल में क्या उपयोग लगायेगा ?वह तो आत्मरस की ओर चलेगा। मैं गोत्रकर्म के फल को नहीं भोगता हूँ, किंतु ज्ञानरस निर्भर आत्मतत्त्व को चेतता हूँ। कर्मों के फल का विस्तार बहुत अधिक है, एक-एक कर्म का फल समक्ष रखकर उस से संन्यास की भावना बनाना चाहिए।

अंतरायकर्मफल संन्यासभावना-- 8 वां कर्म है अंतराय कर्म। अंतरायकर्म के फल में दान लाभ भोग आदि की वृत्ति में अंतराय होते हैं। दान देने का परिणाम न हो सके, यह दान अंतराय का फल है। दानी पुरुष मन में कुछ खर्च करने का भाव रखकर भी उसे हाथ से देते नहीं बनता और यह कह देंगे कि रखे हैं रुपये, तुम अपने हाथ से देवो। यह गप्प की बात नहीं कह रहे हैं। ऐसे पुरुष होते हैं। गुरुजी सुनाते थे कि एक भाई ऐसे थे, वे यही कहते थे कि भाई ले जावो वे रखे हैं, पर हाथ से देते नहीं बनता। खैर, वहाँ भी दानांतराय जरा कमजोर हो गया, पर दानांतराय के उदय में तो भाव ही यह नहीं होता कि मैं कुछ त्याग करूं। यह विभाव है, इसी प्रकार लाभ, भोग, उपभोग आदि के अंतराय का फल है। विभाव के फल को कुछ मैं नहीं भोगता हूँ अर्थात् इन विभावों को मैं त्यागता हूँ। मैं तो एक चैतन्य रसात्मक आत्मतत्त्व को चेतता हूँ।

भैया !एक-एक कर के समस्त कर्मों के फल के त्याग होने से इस मुझ को चैतन्यचिन्ह परमात्मतत्त्व के दर्शन सुगम होते हैं। जैसे पुराणों में राजावों की, चक्रवर्तियों की विभूति, नगरी, रानियों की बड़ी प्रशंसा के जिस में बड़े अलंकारों में अनेक पेज भर दिये गये हैं और काम की बात, त्याग की बात दीक्षा का प्रसंग बताने में दो एक पन्ने ही भरे हैं परंतु इस सब श्रृंगार और वैभव का वर्णन इस दीक्षा के प्रसंग में बड़ी मदद दे रहा है। इतना अद्भूत वैभव जब सुन रखा है और फिर एक ही शब्द में यह वर्णन आ जाय कि लो अब चक्रवर्ती ने सारा त्याग कर दिया। तो इस शब्द की बड़ी महिमा बनती है। कैसा वैभव था जिस का त्याग किया?कर्मफल को विस्तारपूर्वक यदि पढ़ा जाय, सुना जाय और फिर ज्ञानी के कर्म फल के संन्यास की भावना कही जाय तो इसमें स्फूर्ति और अधिक आती है। ओह, ज्ञानी संत ऐसे विकट कर्मफल से अलग रहकर ज्ञानस्वभाव का संचेतन किया करते हैं।

ज्ञानानुभूति में समय व्यतीत करने की आकांक्षा--कर्मफल के त्याग होने के परिणाम में ऐसी समस्त विभाव क्रियावों की निवृत्ति हो, ज्ञानातिरिक्त विभाव के संन्यास की स्थिति आये तो ऐसी स्थिति में एक चैतन्यचिन्ह चेतन को चेतने से उस समय में जो आन्नदरस का अनुभव हो उस अनुभव के बाद जब कुछ ज्ञान विकल्प में अथवा अन्य चर्चावों में आता है तो उन से भी कोशिश कर के यह सोचता है कि ओह जैसे क्षण मेरे अभी व्यतीत हुए थे, ऐसा ही समय मेरे अनंत काल तक रहे, मुझे अन्य विकल्प ना चाहियें।

ज्ञानी के आत्मसंचेतन की उत्सुकता – यह जीव अज्ञानवश कर्मोदयजन्य स्थितियों में अपनी कल्पना बनाकर कर्मफलों को भोग रहा था। जब अपने यथार्थस्वरूप का परिचय हुआ, तब यह मैं मात्र ज्ञानस्वरूप हूँ, ज्ञान के कर्म को करता हूँ और ज्ञान के फल को भोगता हूँ – इस प्रकार का जब निर्णय हुआ तो सभी प्रकार के कर्मफल को वह त्याग कर अपने आप में अपने ज्ञानानंदस्वरूप की चेतना उद्यमी होता है। कर्मों के फल में अनेक बातें हैं पर कुछ बातों पर दृष्टि देकर यह समझने का यत्न करें कि क्या जीव वास्तव में ऐसे कर्मफल को भोगा करता है? अंतराय कर्म का उदय हो,चीज न मिली, ठाठबाट का आराम ना मिला, अरे मिलता तो भी जीव निराला था और ना मिलता तब भी सबसे निराला है। उस स्थिति में कल्पना बनाना, यह सब अज्ञान की बातें हैं। मैं इसको नहीं भोगता हूँ, मैं तो शुद्ध ज्ञायकस्वरूप आत्मा को ही भोगता हूँ । जैसे कहते हैं ना कि हम को यह नहीं खाना है, हम तो यह खाते हैं, हम को वहाँ नहीं जाना है, हम तो यहाँ जाते हैं। ऐसी बात कर देना है इस ज्ञानी जीव को कि हम कर्मफल में नहीं भोगते हैं, हम तो ज्ञानमात्र आत्मा को चेतते हैं।

अनात्मपरिहार और आत्मसंचेतन – भैया ! यश भी और अयश भी एक बुरी बला है। ये भी कर्म के उदय से हुआ करते हैं। यश क्या चीज है कि जगत के मोही जीवों ने कुछ भला भला गा दिया। जो कि वास्तव में जीव की निंदा है। क्या यश फैलायेगा कोई, यहाँ बड़ा परोपकार करता है। तो क्या जीव का परपदार्थों में कुछ करने का स्वभाव है? उल्टी उल्टी बातें दुनिया कहती है। पर कुछ सुहावनी उल्टी हैं और कुछ असुहावनी उल्टी हैं। ज्ञानी जीव जानता है कि मैं ज्ञानातिरिक्त अन्य कुछ को नहीं करता, ना भोगता, यह सब कर्म विपाक हैं, इन को मैं नहीं भोगता हूँ। मैं तो ज्ञानस्वरूपआत्मतत्त्व को चेतता हूँ। जैसे पंगत में बहुत सी चीजें परोसी जाती है तो उनमें से जिन चीजों का स्वाद अच्छा न लगे उन को हमें नहीं खाना है, हमें तो कलाकंद, बर्फी आदि नहीं खाना है, हमें तो बावर ही खाना है। पत्तल में पड़ा है तो पड़ा रहे, हमें क्या हर्ज है? ऐसी ही विलक्षण ज्ञानी की महिमा है। इस उपयोगभूमिकामें, इस उपयोग पत्तल में सारी चीजें परोसी हुई हैं, इस ज्ञानी जीव को जिन में स्वाद नहीं आ रहा है, ऐसे जो कर्मफल हैं उन को छोड़ता है। कुछ हो इनका, मैं तो इस ज्ञान मात्र भाव को ही चेतता हूँ।

यश और अयश की वला ―ये यश और अयश जिन में जगत के जीव आसक्त हो रहे हैं यह क्या हैं? बला हैं। बला और भला- इन के परस्पर विरुद्ध अर्थ हैं। भला का उल्टा बला। इसमें मात्र संक्लेश ही है। कांतिमान शरीर हो गया। यह भी कर्म का ही फल है। अब अज्ञानी जीव तो देह को निरख-निरख कर खुश होता है। बड़ा अच्छाशरीर मिला, बहुत सुंदर हूँ। ज्ञानी जीव जानता है कि यह तो इल्लत लगी है, मेरा तो देहरहित स्वभाव है। आत्मीय वास्तविक आनंद को भोगने का मेरा स्वभाव है, मैं इन को नहीं भोगता हूँ, मैं तो एक ज्ञानमात्र भाव को चेतता हूँ। कुछ दुनिया में पोजीशन बन जाती है, शकल सूरत भी न हो तो भी लोग प्रीति करते हैं। और कोई शक्ल सूरत अच्छी है फिर भी नफरत करते हैं। यह सब कर्मों का ही तो खेल है। मैं तो एक ज्ञानमात्र निज तत्त्व को चेतता हूँ।

ज्ञानी की आकांक्षा ―भैया ! यश अयश ही एक क्या अनेक कर्मफल हैं जिस कर्मफलों का इस ज्ञानी जीव ने त्याग किया और इसके फल में समस्त जो अन्य क्रियाएँ हैं उनके विहार को खत्म किया, ऐसी स्थिति में जब किसी कर्म को अपनाया नहीं जा रहा है, किसी फल को भोगने की बुद्धि नहीं की जा रही है। केवल निर्विकल्प सहज आत्मानंद को भोगने का भाव है ऐसी स्थिति में जो आत्मतत्त्व का दृढ़ अनुभव है, अनुपम आनंद है, उसको भोगने के बाद जब थोड़ा सा भी चिगता है तो ज्ञानी बड़ा खेद करता है। अरे मुझे तो वही क्षण प्राप्त हो जिस स्थिति में अभी था। उसी स्थिति में रहकर मेरा समय व्यतीत हो अनंतकाल तक एक ऐसा ही मेरा परिणमन चले ऐसी ही स्थिति रहे।

वर्तमान व सर्व भविष्य में रम्य आनंद का पात्र ―पूर्व परिणामकृत जो विषवृक्ष हैं, द्रव्य कर्म के बंधन हैं उन विषवृक्षों के फल को जो ज्ञानी जीव नहीं भोगता है, किंतु अपने आप में तृप्त रहता है वह ऐसे उक्त आनंद को प्राप्त होता है जो वर्तमान काल में भी सुख देने वाला है और भावी काल में भी सुख देने वाला है ऐसे अनुपम आनंद की दशा प्राप्त होती है। जैसे लोगों के प्रति सद्व्यवहार रखना वर्तमानकाल में भी आनंद का कारण है और आगामी काल में भी आनंद का ही कारण है व्यवहार में, इसी प्रकार परमार्थ में कर्म और कर्मफल में भी आनंद का करने वाला है और आगामी काल में भी आनंद का करने वाला है। ये संसार के सुख, वर्तमान काल में तो सुख की अवस्था के करने वाले होते हैं पर भविष्यकाल में इन से क्लेश ही बनते हैं लेकिन मोही जीव इन विषयसुख के कटुफलों को भोगते जाते हैं और फिर भी छोड़ना नहीं चाहते।

आनंदभाव की बलि ―भैया ! कर्मफल चेतना से जो निवृत्त हो गया है वह शुद्ध ज्ञानचेतनारूप ही चेतता रहता है। उसमें उपाय है निश्चय कारणसमयसार का आलंबन, जो आलंबन साक्षात् उपादेयभूत कार्यसमयसार को उत्पन्न करने वाला है, उसकी पद्धति है चिदानंदस्वभावी शुद्ध आत्मतत्त्व का यथार्थ ज्ञान व श्रद्धान होना और वै से ही अनुचरण होना ऐसे अभेद रत्नत्रयरूप निर्विकल्प समाधि से जो सहजानंद प्रकट होता है उस के अनुभवन से यह मोक्षमार्ग और मोक्ष प्रकट होता है। इसके लिए बड़े बलिदान की आवश्यकता है। किस के बलिदान की? जो अपने में विषयकषाय की इच्छा घर किये हुए हैं उसकी बलि की आवश्यकता है, त्याग की आवश्यकता है। त्याग का ही नाम पूजन है, त्याग का ही नाम प्रेम है। त्याग बिना प्रेम भी प्रकट नहीं होता, त्याग बिना पूजा भी प्रकट नहीं होता।

कल्याण की त्याग पर निर्भरता ―कोई कहे कि मित्रता तो करें, पर रहें कंजूस, पैसा भी खर्च न करना चाहे तो उसका प्रेम भी नहीं कहा जाता है। सब लोग जानते हैं त्याग बिना प्रेम नहीं होता, त्याग बिना पूजा भी नहीं बनती। त्याग बिना न प्रीति है, न पूजा है, न मोक्षमार्ग, न मोक्ष है। तो जो ये विषय कषाय इस कारण प्रभु पर हावी हो रहे हैं उन विषय कषायों का बलिदान करना एक बहुत बड़ा काम पड़ा है तीन लोक, तीन काल संबंधी जो मन, वचन, काय से करे, कराये, अनुमोदे, ऐसे परद्रव्यों के आलंबन से उत्पन्न हुए जो शुभ-अशुभ संकल्प हैं, इन संकल्पों का विनाश करना है और जो देखे सुने, अनुभवे, भोगे, स्मरणरूप आकांक्षा रूप जो निधानों का जाल है उस जाल का बलि करना है। इतनी तैयारी की जाये तब जाकर प्रभु के दर्शन होंगे।

अज्ञान व ज्ञान दशा की परिस्थितियां – परद्रव्यों को अपनाने का नाम भी लोभ कषाय है, जिस को रंग की उपमा दी गई है। इसमें रंगा हुआ प्राणी अपने यथार्थस्वरूप को संभाल नहीं सकता। ऐसे शुद्ध ज्ञानचेतना के आलंबन से यह मोक्षार्थी पुरुष कर्मचेतना और कर्मफलचेतना का संन्यास कर रहा है। ज्ञानी जीव कर्म से भी विरक्त है और कर्मफल से भी विरक्त है। इस कारण अज्ञानचेतना उस के नहीं रहती है और अपने स्वभाव से जो ज्ञानचेतना है उसमें सहज आनंद की अनुभूति के साथ यह रमता है। जब रमता है तब उस समय की सीमा से पूर्व व उत्तरकाल के इस जीव के फैलाव के 2 भाग हो जाते हैं, इससे पहिले तो इसका विषरस अटका था और इसके बाद कुछ वह जीव अमृतपान कर रहा है। ऐसे ज्ञानी संत के प्रति प्रमोद भावना कर के छोटे मोटे भक्त उपासकों के आर्शीवादरूप वचन निकलते हैं कि लो अब यह ज्ञानी सदाकाल इस ज्ञानामृत का ही पान किया करें।

अज्ञानचेतना की संन्यास का उद्यम ―अज्ञानी अज्ञानचेतना का तो त्याग करे और ज्ञानी होकर ज्ञानचेतना का विकास करे। ज्ञानातिरिक्त भाव में ‘यह मैं हूँ’ ऐसी बुद्धि का नाम अज्ञानचेतना है। इसके विनाश के लिये ज्ञान का भाव लें। मैं ज्ञानमात्र भाव हूँ, ज्ञानातिरिक्त भाव मैं नहीं हूँ, ज्ञानातिरिक्त भाव को मैं करता हूँ ऐसे परिणाम का नाम कर्मचेतना है। उस कर्मचेतना के त्याग के लिये ऐसा भाव बनाएँ कि मैं ज्ञानमात्र हूँ अन्य कुछ नहीं हूँ इस ही रूप परिणमता हूँ। अपने आप के अंतर में विराजमान शुद्ध ज्ञायकस्वरूप का जब तक दर्शन नहीं होता है तब तक इस जीव के बारे में सैकड़ों अटकलबाजियां लगाई जा सकती हैं। मैं यों हूँ मैं यों हूँ। है वह एक शुद्ध ज्ञायक स्वरूप, पर उसका परिचय न होने से इस अपने आत्मतत्त्व को भिन्न रूपो में सोचा करता है।

ज्ञानी का सुगम ज्ञान वैभव ―भैया ! पदार्थों का स्वतंत्र रूप जानकर अब सब पदार्थों से अपने ज्ञान स्वरूप को पृथक् करो और इस ज्ञान में ही निश्चल ठहरो, चीज कठिन है मगर ज्ञानभावना के अभ्यास से यह बात अत्यंत सरल हो जाती है। जैसे दीन भिखारियों के, करोड़पतियों के आराम पर आश्चर्य होता है और सब को कठिन समझते हैं पर करोड़पतियों के लिये तो यह सब उनके बायें हाथ का खेल है। उन्हें अपने वैभव में आश्चर्य नहीं होता और न कुछ कठिन मालूम पड़ता है। ऐसे ही अज्ञानी जीव ज्ञानियों के ऐसे चमत्कार को अनुभवन से अचरजकारी बात जानते हैं और कोई कोई तो यों मानते हैं कि ये जो शास्त्र की बातें हैं, वे शास्त्र में ही रहनी चाहियें, शास्त्र से अलग न करना चाहिएँ। लेकिन ज्ञानी जीव को यह सब यत्न, ये सब अनुभवन सुगम मालूम होते हैं। उन्हें इसमें अचरज नहीं होता। बल्कि पहिले जो अनंतकाल बीत गया वह व्यर्थ में बीत गये, इस पर उसे अचरज होता है।

ज्ञानी के भ्रम की समाप्ति ―जैसे कंजूस लोग उदार पुरुष की चेष्टा पर अचरज करते―कैसे डालते हैं, कैसे पर का उपकार कर डालते हैं, उदार पुरुषों पर कंजूस पुरुषों का अचरज होता है ज्ञानी जीव को अपने आप के मार्ग में बढ़ने का कोई अचरज नहीं और न कठिनता होती है। सब वस्तुओं से भिन्नपने का जब निर्णय हो गया तो ऐसा ही ज्ञान अब ज्ञानी के निश्चल रूप से अवस्थित रहता है अब सब परभावों से और परपदार्थों से भिन्न किया गया यह ज्ञान कहीं भ्रम को प्राप्त नहीं होता है। यह ज्ञान ज्ञानस्वरूप ही है। कोई बहकाए किन्हीं परपदार्थों में यहाँ है तेरा ज्ञान, यहाँ है तेरा आनंद, यहाँ है तेरे विश्राम का घर, लेकिन ज्ञानी जीव भ्रम को प्राप्त नहीं होता।

अपना सब कुछ अपने आप में ―भैया ! अपनी दुनिया जो कुछ है व अपने आप के आत्मप्रदेश में है, इससे बाहर अपनी दुनिया नहीं है। जितना अपने आप को भूल रहे हैं व अपने आप के प्रदेश में जैसी कंपनी चल रही है, जैसी खटपट हो रही है उसका फल मिलता है, बाहर की खटपट का फल नहीं मिला करता है। जब कभी कुमार्ग से हटकर सुमार्ग में लगेगा, अज्ञान से हटकर ज्ञान में लगेगा, संसार से हट कर मुक्ति में जायेगा वे सब अपने आत्म प्रदेश के अंदर में ही होने वाली बातें हैं। अपना धर्म, अपना अधर्म, पुण्य, पाप कुछ भी चीज अपने आत्मप्रदेश से बाहर नहीं है, बाहर तो पदार्थ का भी भाव नहीं है। जैसे लोग कहते हैं कि आज सोने का क्या भाव है, तो सोने का भाव जानना है तो सोने के अगल बगल देखें। क्या उसमें कहीं भाव लिखा मिलेगा? नहीं। उसका अर्थ यह है कि सोने के बारे में लोगों के क्या भाव हैं ?

पर की कीमत अपना भाव ―कोई पूछे कि गेहूं का क्या भाव है? तो गेहूं तोड़कर खूब देख लो, कहीं शायद आटे में भाव निकल आए। अरे उसका अर्थ यह है कि गेहूं के बारे में लोगों का क्या ख्याल है? गेहूं का क्या भाव है, इतना सीधा तो अर्थ है। पत्थर का क्या भाव है ?अरे पत्थर के बारे में लोगों का यह ख्याल है कि यह मामूली चीज है सो कितने जाता है। कभी कभी सोने के भाव से अनाज का भाव बढ़ जाता है। मानो दो पुरुष यात्रा को चले या परदेश धन कमाने के लिये चले। तो एक पुरुष थोड़ा-थोड़ा हीरा, रत्न, जवाहरात, सोना चांदी की गठरी बना कर चला और एक थोड़े से चने की गठरी लेकर चला। जंगल में रास्ता भूल गये। भूख सताने लगी। बिल्कुल मरणाहार होने लगे तो उस समय रत्न वाला कहता है कि भैया मेरे सब रत्न ले लो, पर मुझे मुट्ठी भर चने दे दो। अब बतावो वहाँ चने का क्या भाव है? क्या कहीं चने में भाव खुदा है? अरे चने के बारे में लोगों के क्या ख्याल हैं, कितना आदर है, उस आदर का नाम भाव है। तो जितनी जो कुछ दुनिया है हमारी वह हमारे आत्मा के अंदर में है, इससे बाहर हमारा कुछ नहीं है।

स्वसंचेतनरूप महाकर्तव्य – भैया !अज्ञान से निवृत्त होना व ज्ञान में लगना है, सीधा तो काम है। अपने आप का सही ज्ञान हो और उस ज्ञान रूप अपने को बनाए रहें इतना ही मात्र काम है। पर इतना सा काम नहीं किया जाता और बड़े कठिन काम किये जाते हैं। दूसरों को खुश रखना क्या हमारे हाथ की बात है? दूसरे अपने कषाय के अनुकूल अपनी कल्पना कर के अपना परिणमन करते हैं, उन पर मेरा कहाँ अधिकार है कि मैं उन को अपने मन माफिक बना लूं? जब वस्तुस्थिति ऐसी है तब बाह्यपदार्थविषयक कल्पनाओं से विमुख होकर अपने आप के ज्ञानस्वरूप को चेतना चाहिए। आखिर इसमें ही आत्मा को शरण मिलेगा।


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