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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 390

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सत्थं जाणं ण हवइ जम्हा सत्थं ण जाणाए किंचि।

तम्हा अण्णं णाणं अण्णं सत्थं जिणा बिंति ।।390।।

शास्त्र और ज्ञान में व्यतिरेक – शास्त्रज्ञान नहीं होता है क्योंकि शास्त्र कुछ जानता नहीं है। शास्त्र का मतलब है द्रव्यश्रुत का। द्रव्यश्रुत जो कि दो भागों में विभक्त है―एक अक्षरात्मक स्वरूप और दूसरा शब्दात्मक स्वरूप। ये दोनों प्रकार के स्वरूपों में ज्ञान नहीं है, क्योंकि ये जानते कुछ नहीं है। अक्षर हैं वे भी पौद्गलिक रचनाएँ हैं, जो शब्द हैं वे भी पौद्गलिक रचनाएँ हैं। इस कारण यह अन्य है और शास्त्र अन्य है। ऐसा जिनेंद्रदेव कहते हैं। यह व्यवहार की भाषा है और निमित्त वाली बात का कथन है कि शास्त्र से ज्ञान होता है क्योंकि शास्त्र का अध्ययन करते हैं तो उसका निमित्त पाकर जीव को ज्ञान होते देखा जाता है। इतने मात्र निमित्तनैमित्तिक संबंध से बढ़कर व्यामोह में यह मान लिया जाता है कि शास्त्र से ही ज्ञान होता है। वहाँ अपने आप का महत्व ज्ञानस्वरूप विदित नहीं होता तो वह एक मिथ्याभाव है।

ज्ञाता के आश्रय से ज्ञान की व्यक्ति ― अक्षरात्मक श्रुत से ज्ञान नहीं होता है और उसही प्रकार बोले गए शब्दों से ज्ञान नहीं होता है। ज्ञान तो ज्ञानशक्ति के आश्रय में हुआ करता है। इस प्रकरण में इस अध्याय में शुरू से ही बताते आये हैं कि यह ज्ञानी तो सर्वविशुद्ध स्वरूप वाला है। अपने आप के स्वभाव से यह ज्ञाता द्रष्टा है। इसका यह ज्ञानित्व किसी परपदार्थ से नहीं आता। जिस पर्दाथ में जो कला है वह उस पदार्थ की स्वभाविक देन है। कोई परपदार्थ किसी अन्य पदार्थ में अपनी कला नहीं चलाता है। ऐसे अपने अपने परिणमन से परिणमते हुए इस शास्त्र और ज्ञान के संबंध में बताया जा रहा है कि शास्त्र तो अचेतन है और ज्ञान चेतन है। इस कथन से कहीं निरादरता जैसा भाव नहीं लेना है कि आगम तो अचेतन है, वह कुछ जानता नहीं है। स्वरूप बताया जा रहा है, पर जो शास्त्र को पूजना है वह निमित्तदृष्टि से पूजना है।

दृष्टांत में स्थापनाजिन व्यवहारदृष्टि से – जैसे मूर्ति का स्वरूप कैसा है? हम सीधा यों कहते हैं कि यह आदिनाथ भगवान बैठे हैं और यह नेमिनाथ भगवान बैठे हैं। खंडवा मंदिर में पीछे प्रतिमावों का बहुत बड़ा समुदाय है, तो वहाँ एक छोटा बच्चा हमें दिखाने के लिये जा रहा था। कहता जाता था कि देखो यह हमारे बड़े भगवान बैठे हैं। यह हमारे छोटे भगवान बैठे हैं और यह हमारे बिल्कुल छोटे भगवान बैठे हैं। तो क्या मूर्ति माप से भगवान भी छोटे बड़े होते हैं? तो बात क्या है वहाँ? मूर्ति ही भगवान नहीं है। मूर्ति तो अचेतन है, पाषाण या धातु से बनती है। लो इतनी बात सुनकर कोई श्रद्धालु बुरा मान जाये, अरे देखो यह तो अविनय की बात कह रहे हैं । अरे भाई यहाँ अविनय और अपूज्यता की बात नहीं है किंतु वस्तुस्वरूप की बात लेना। वहाँ भगवान की स्थापना है और है यह साकार स्थापना। ऐसी मुद्रा में कल्याणविधि से जिसकी प्रतिष्ठा होती है वह स्वयं भगवान नहीं है, किंतु भगवान की स्थापना की हुई है। उन्हें स्थापनाजिन बोलते हैं भावजिन नहीं बोलते। यह तो स्वरूप की बात है।

अक्षरात्मक व शब्दात्मक श्रुत में ज्ञानत्व का अभाव ― शास्त्र किस का नाम है? यदि पोथी पत्रों का नाम और जो अच्छे अक्षरों से लिखा हो, छपा हो उनका नाम है तो उनमें परीक्षण कर लो, वे कुछ बोलते भी हैं क्या? हम यदि किसी लकीर का उल्टा अर्थ लगाने लगें तो क्या वह शास्त्र हमें चांटा भी मार सकता है कि तू उल्टा अर्थ क्यों लगा रहा? शब्दरूप में आगत पुद्गल भी अचेतन है। कोई पुरुष शास्त्र की बात सुन रहा है, शब्द बोल रहा है तो वे शब्द यदि शास्त्र हैं तो वे शब्द भी अचेतन हैं, भाषावर्गणा के परिणमन हैं।

अध्यात्म में ज्ञानज्ञातृत्व की प्रतिष्ठा-- यदि भावश्रुत को श्रुत कहते हो, जो अंतर में श्रुतविषयक ज्ञान होता है उस ज्ञान का नाम यदि श्रुत कहते हो तो उसका ज्ञान नाम कहा जा सकता है पर जिस अध्यात्म में ज्ञानस्वभाव की प्रतिष्ठा की जा रही हो उस प्रकरण में ज्ञानस्वभाव को चेतने में प्रवर्त रहा जो ज्ञान है उसे ही ज्ञान कहा जा सकता है और जो ज्ञान स्वभाव को न चेते, उस के उन्मुखता की तैयारी जहाँ नहीं रहती, पर के आकर्षण में चलता है वह ज्ञान नहीं कहा जाता।

ज्ञान का निर्विवाद जाननस्वरूप ― ज्ञान में कभी कोई लड़ाई होती है क्या? नहीं। ज्ञान लड़ाई का कारण नहीं है किंतु देखा जाता है कि प्राय: ज्ञान पर लड़ाईयाँ हुआ करती हैं। अभी कोई चार समझदार बैठे हों और चर्चा कर रहे हों तो उनमें इतनी जल्दी लड़ाई हो जाती है कि जैसे बच्चों में लड़ाई हो जाती है। कहीं चार पांच बच्चे खेलते हों तो जब तक उनमें लड़ाई नहीं हो जाती तब तक वह खेल छोड़कर घर नहीं जाते। उनका खेल तभी समाप्त होता है जब उनमें कुछ हाथापायी हो जाय। ऐसा हुए बिना उनका खेल ही पूरा नहीं होता है। ऐसे ही चार ज्ञान वाले बैठे हों, चर्चा हो रही हो तो चर्चा के प्रारंभ में ही तो लड़ाई होती नहीं है खेल खेलने के शुरुवात में तो लड़ाई होती नहीं है किंतु कुछ समय खेल चलने दो, कुछ समय चर्चा चलने दो, थोड़ी ही देर में गरमागरमी होने लगी और रूपक लड़ाई का बन जायेगा। अच्छा, लो ज्ञान से लड़ाई हुई। क्या ज्ञान से लड़ाई होती है? नहीं होती है। जिस भाव के कारण लड़ाई हो वह भाव ज्ञानभाव नहीं है, अज्ञानभाव है।

स्वसंवेदी ज्ञान का ज्ञानत्व – यह भावश्रुत सम्यग्ज्ञान है क्योंकि वह मोक्षमार्ग के अनुकूल दृष्टि बनाने की बात कहता है और इस ओर लगने की प्रेरणा करता है। इस कारण वह ज्ञान है, पर परमार्थत: जो ज्ञान ज्ञान को चेते उस ज्ञान का नाम ज्ञान है और जो न चेते उसका नाम अज्ञान है। अध्यात्ममार्ग में ज्ञान और अज्ञान की ऐसी व्यवस्था की गयी है तभी तो देखो सामायिकादि की क्रियायें करते जाते हैं और यह समझ बनती है कि यों यों करना, यह ज्ञान की चेष्टा नहीं है। और इससे अधिक बढ़कर बात क्या होगी ज्ञानी की कि वह सामायिक में मन, वचन, काय को स्थिर बना रहा है और अच्छी कल्पनाएँ करता है, शरीर को बिल्कुल स्थिर आसन वाला रख रखा है फिर भी ज्ञान सही है कि शरीर को ऐसा खंभे की तरह सीधा रखना, यह ज्ञान की चेष्टा नहीं है और मन में जो ज्ञान की तरंगें, भाव की कल्पना करता है यह भी ज्ञान की चेष्टा नहीं है। यद्यपि ये सब ज्ञान ज्ञानगुण के ही परिणमन हैं, मगर केवल ज्ञान के ही कारण जो ज्ञान की वृत्ति हुई वह तो है ज्ञान की चेष्टा और रागद्वेष की सैन पाकर अपना परिणमन बनाएँ वह है अज्ञान की चेष्टा।

शास्त्र और ज्ञान का भेदसाधक व्यवहार – इस परम भेदविज्ञान के प्रकरण में आचार्यदेव कह रहे हैं कि शास्त्रज्ञान नहीं होता है यह उनका ही शब्द है। सुनने में किन्हीं किन्हीं को ज्यादा अटपट लगता होगा, किन्हीं को कम अटपट लगता होगा और किन्हीं को न भी अटपट लगता होगा। पर जो गाथा में शब्द हैं वे इसी प्रकार के हैं कि शास्त्रज्ञान नहीं होता है क्यों कि शास्त्र कुछ जानता ही नहीं है, जानने वाले जानते हैं। शब्द वहाँ मात्र निमित्त हो रहे हैं। इस कारण शास्त्र अन्य चीज है और ज्ञान अन्य चीज है। कोई शास्त्र की बात पढ़ते पढ़ते उसका जो मर्म है, अर्थ है वह भूल जाय तो भूलने वाला आत्मा कभी तो मस्तक में हाथ लगाकर याद करता है, कभी आँखें मींचकर याद करता है, कभी मस्तक मरोड़ कर के याद करता है पर पन्ना मरोड़कर याद करता हुआ कभी किसी को देखा है क्या? नहीं। अगर पंक्ति का अर्थ नहीं लगता तो पन्ना मरोड़कर कोई नहीं याद करता। सभी मस्तक रगड़कर याद करते हैं। यद्यपि इस मस्तक से ज्ञान नहीं उत्पन्न होता है फिर भी मस्तक, मन, इंद्रिय – ये ज्ञान की उत्पत्ति के बाह्य कारण हैं। इन्हें तो रगड़ना थोड़ा बुरा नहीं जंचता है, उसे कोई पागल न कहेगा, पर कोई शास्त्र की पंक्ति का अर्थ न लगा पाये तो उस पन्ने को मरोड़े तो उसे तो लोग पागल ही कहेंगे।

मूल प्रीतियोग्य के बाह्यसाधन से प्रीति ― देखो भैया ! जिस मित्र से प्रेम होता है उस मित्र के कपड़ों से भी प्रेम होता है। मित्र की टोपी नीचे गिर जाय तो दूसरा मित्र उठाकर झाड़कर ऊँची जगह रखता है या नहीं? रखता है। तो क्या उसे उस टोपी में अनुराग है? नहीं। उसे तो मित्र में अनुराग है, पर मित्र से संबंधित जो वस्तुएँ हैं उन वस्तुवों में भी अनुराग होता है। तो जि से वस्तु के सहज स्वभाव में अनुराग है, आत्मा के सहज ज्ञायक स्वरूप का अनुराग है उस सहज ज्ञायकस्वरूप को शब्दों में जहाँ लिख दिया गया हो उन शब्दों में क्या अनुराग नहीं करेगा? शास्त्रों के पढ़ने से अपना उपादेयभूत ज्ञानस्वभाव विदित हुआ हो उन से क्या वह अपना नाता न जोड़ेगा? वह क्या पूजा नहीं करता? करता ही है। और इसी कारण देव, शास्त्र, गरु ये तीनों पूज्य स्थान में रखे गये हैं।

देवभक्ति का यथार्थ कारण – वस्तुत:तो हमारा देव भी कुछ नहीं करते। हम कितना ही चिल्लाएँ, गला फाड़कर पूजा करें, पर भगवान की तो जूँ भी नहीं रेंगती। बहुत देर हो गयी, झांझ बजाते, मृदंग बजाते, नाचते, गाते, फिर भी भगवान जरा भी हमें दर्शन नहीं देते। थोड़ा हमारी सुन तो लें, बड़ी देर से टेर लगा रहे हैं, टेर सुनो भगवान अब हमारी बारी है, क्यों नहीं तारते? घंटे भर प्रशंसा तो सर्व प्रकार कर डाली, पर भगवान का रंचमात्र भी हमारी ओर आकर्षण नहीं होता है। भगवान हमारा भला करने नहीं आते हैं, न हम से कुछ कहते हैं, न हाथ पकड़ कर ले जाते हैं। वे भी पूर्ण उदासीन हैं, जैसे ये शास्त्र उदासीन हैं। ये हम को कुछ प्रेरणा नहीं करते, उदासीन हैं। इतना काम करने के लिए तो जैसे सब अजीव हैं, ये शास्त्र भी हैं वै से ही मेरे प्रति जड़ भगवान बन गए। सुनते ही नहीं जरा भी। तो भगवान की जो पूज्यता है व शास्त्र की जो पूज्यता है वह भगवान और शास्त्र की ओर से कुछ चीज मिलती है इस कारण नहीं है।उन से कुछ भी आता नहीं, किंतु जिस मूलतत्त्व को हम चाहते हैं, जिस ज्ञायकस्वभाव का अवलंबन कर के हम अपनी शुद्धपरिणति करते हैं, सदा के लिये संकटों से मुक्ति पाने का उपाय बनाते हैं, वह ज्ञायकस्वरूप जिस के स्पष्ट व्यक्त हो गया है, जो मेरे मोक्षमार्ग में चलने प्रोत्साहन देने के लिये आदर्श रूप है उनमें उपासक की क्या भक्ति नहीं जागती है? बहुत भक्ति जागती है।

प्रभुभक्ति का स्थान – भैया ! मार्ग मिलना चाहिए किसी द्वार से, उसी से चलकर कर हमें भक्ति करनी चाहिए। एक काव्य में तो यहाँ तक कहा है कि हे देव ! शुद्ध ज्ञान हो जाय, शुद्ध चारित्र हो जाय तब भी आप में यदि उत्कृष्ट भक्ति नहीं जगती है अर्थात् मैं आप की उत्कृष्ट भक्ति नहीं कर पाता हूँ तो फिर मुक्ति का किवाड़ बंद है, उनके खुलने का साधन तो आप की भक्तिरूप चाबी थी वह मेरी खो गयी। तो चाहे ज्ञानी बड़ा बन जाय, चारित्र भी पालने लगे, पर मुक्ति के किवाड़ को हम खोल नहीं सकते। मोह के किवाड़ों से मुक्ति का द्वार बंद है। तो जिस दृष्टि से भगवान की पूज्यता है वह दृष्टि संभालना चाहिए। प्रभु स्वच्छ स्पष्ट हो गया, शुद्ध निर्दोष उनका स्वरूप बन गया है और हम हैं इस सहजस्वरूप के रुचिया, सो यहाँ देख लो―हम ही भक्ति का भाव बनाते हैं और हम ही सब कुछ करते हैं।

परमोपेक्षा से ही भगवान की पूज्यता ―भैया ! भगवान अपने स्वभाव से चिगकर किसी भी भक्त के लिये कुछ भी अनुराग नहीं करते हैं और तभी भगवान की महिमा है, अगर ये भक्तों से अनुराग करने लगे तो यहाँ भक्तों में लड़ाई हो जायेगी। जैसे यही त्यागी साधुवों के प्रति अनेक कल्पनाएँ की जाती हैं। यह पक्ष करते हैं, इन को बहुत सोचते, इन का ख्याल नहीं करते। तो यह विडंबना भगवान की भी बन जायेगी। चाहे कितना ही कोई चिल्लायें कि हे भगवान ! हम दो घंटे से चिल्ला रहे हैं, प्यासे हो गए हैं तनिक सुन लो, तो भी वे किसी की सुनने नहीं आते। वे तो अपने पूर्ण स्वभाव में स्थित हैं, यही उन की पूज्यता का कारण है। हम ही स्वयं उनके गुण सोच सोचकर अपना उत्थान किया करते हैं।

प्रभु की महिमा अपरनाम भक्तों का धर्मानुराग – वास्तव में उन्हें भगवान बनाया है, महान् बनाया हैं, भक्त लोगोंने। अरे तो अरहंत सिद्ध अपने आप भगवान नहीं हैं? महान् नहीं है? हाँ नहीं है। अगर हम आप उन की चर्चा करने वाले भक्तजन न होते और अरहंत किसी कमरे में बैठे होते और किसी से कोई वास्ता नहीं, कोई जानता ही नहीं तो उन्हें भगवान कौन कहता? वह तो शुद्धस्वरूप है। कोई शुद्ध आत्मा है तो वह हो गया शुद्ध, हो गया खालिस। संसार में जीव यों हैं तो वह जीव यों है, पर उन्हें जो भगवान बनाया है, उन की महिमा फैलाई है, यह सब तो इन भक्तों की करतूत है। वह तो जैसा है सो ही है, शुद्ध है, उस से मेरे में कुछ भी बात नहीं आती। तो जैसे हमें और तो क्या करना है, अन्य चेतन तत्त्व से भी ज्ञान नहीं आता। वह मेरा ज्ञान नहीं है। साक्षात् अरहंत और सिद्ध भगवान भी मेरा ज्ञान नहीं है, वह तो जो है खुद का है। मेरा ज्ञान तो मेरा मेरे में है। शास्त्र तो मेरा ज्ञान ही क्या होगा ?

स्वाध्याय की हितकर पद्धति ― शास्त्र अन्य है और ज्ञान अन्य है, ऐसा जिनदेव कहते हैं। यह बात किसलिए कही जा रही है कि हम अन्य पदार्थों के विकल्पों का भी त्याग कर अपने आप के ज्ञानस्वरूप की महिमा में विराजें? जैसे स्वाध्याय करने का तरी का यह है कि बड़े ध्यान से एक लकीर पढ़ी और उस लकीर को पढ़कर कुछ आंखें मींचकर उस लकीर का अर्थ करें और फिर आंखें बंद कर उस शास्त्र को भी भूलकर कि हमारे आगे क्या धरा है और उस के अर्थ में ऐसा मग्न हो जायें कि जो शास्त्र की पंक्ति ने कहा है वह अपने आप में उतार कर अपने को बतला दें, ऐसा यत्न करना यह स्वाध्याय करने का ढंग है।

घटित पाठ स्मरण – जैसे कहते हैं कथानक में कि एक गुरु कौरव और पांडवों को पढ़ा रहे थे। पाठ निकला क्षमा का, क्रोध का, चलो पढ़ो, खोलो पुस्तक पढ़ो गुस्सा न करना चाहिए। अच्छा नकुल ! पढ़ो गुस्सा न करना चाहिए नकुल ने पढ़ दिया कि गुस्सा न करना चाहिए। अच्छा सहदेव ! तुम पढ़ो, पढ़ दिया―गुस्सा न करना चाहिए। अच्छा भीम, तुम पढ़ो। पढ़ दिया―गुस्सा न करना चाहिए। अच्छा युधिष्ठिर तुम अपना पाठ सुनावो। युधिष्ठिर बोला कि अभी याद नहीं हुआ है। गुरु जी को गुस्सा आया, पूछा तुझे क्यों नहीं याद? इसी तरह कई दिन हो गए, युधिष्ठिर यही कहे कि अभी पाठ याद नहीं हुआ। गुरुजी को गुस्सा अधिक आया सो दो चार डंडे जमा दिए। युधिष्ठिर हंसता रहा। गुरु जी ने युधिष्ठिर से पूछा कि मैं तो मारता हूँ और तू हंसता क्यों है? युधिष्ठिर ने कहा कि महाराज अब याद हो गया। हाँ सुनावो, गुस्सा नहीं करना चाहिए। युधिष्ठिर ! इतनी बात आज 7 दिनों में याद कैसे हुई? तो युधिष्ठिर बोले कि गुरू जी इतने दिन तक गुस्सा न करने का खूब यत्न करने के बाद आज पाठ याद हुआ कि गुस्सा नहीं करना चाहिए। देखो आपने मारा फिर भी हमारे गुस्सा नहीं आयी। तब मुझे विश्वास हुआ कि मुझे पाठ याद हो गया। तो स्वाध्याय करने का ढ़ंग यही है, जो स्वाध्याय करते हो उसे अपने में उतार कर देखो।

स्वाध्याय में विदित भाव का सुघटन ― स्वाध्याय में आए हुए शब्द मेरे कुछ नहीं हैं। इतना ही नहीं, आंखें मींचकर विचार करो कि सर्व पदार्थ हम से जुदे हैं, सभी अपने आप में परिणमते हैं, यह मैं अपने भावों से परिणमता हूँ, जीव का जैसा स्वरूप है तैसा ही स्वरूप इसका है, अन्य जीवों से इसकी कोई खासियत नहीं है, जीव तो मेरा न कहाये और ये मेरे कहने लगें, ये प्रकट भिन्न हैं। यह बात तनिक उतारने की करो तो फिर घर बैठो और गप्पें खावो, मना कौन करता है? स्वाध्याय करते हो तो स्वाध्याय करते हुए में तो सही मार्ग अदा करो।

धर्म के पार्ट में भी यथार्थता की संयोजना ― एक मंत्री ने कहा कि महाराज साहब हम इतनी बातें दिखाते हैं, आप का मन बहलाते हैं तो हम को कोई बड़ा दो चार गांव का राज्य इनाम में मिलना चाहिए। राजा ने कहा कि मिल जायेगा, तुम हम को एक बार साधु का पार्ट दिखा दो। कहा, अच्छा महाराज ! लुप्त हो गए, संन्यासी बन गये। पहिले अपनी महिमा जतायी दो चार जगह चवन्नी, अठन्नी, रुपये गाड़ दिये। लोग आए कोई बोला कि हम बड़े दु:खी हैं। तो साधु ने कहा कि अच्छा जावो वहाँ खोद लो, मिल गया रुपया, फिर किसी के मांगने पर कहा कि वहाँ खोद लो, उसे मिल गयी अठन्नी। लो धीरे धीरे साधु की महिमा बढ़ गयी। किसी ने राजा को बताया कि कोई साधु आया है वह जमीन की भी बात बता डालता है। राजा भी पता पाने पर वहाँ पहुंचे। बड़े विनय से बड़ी सेवा कर के राजा बोले कि महाराज आप की सेवा में आप जो कहो राजपाट तक तैयार। वह बोला कि हमें कुछ न चाहिए। हम साधु हैं, साथ निष्परिग्रही होते हैं। दूसरे दिन साधुवेष छोड़कर बोला, महाराज कहो हमने दिखा दिया न पार्ट। कब? तीन दिन पहिले जब आप चरणों में पड़ गए थे। उस समय तो सारा राजपाट आप समर्पण कर रहे थे, अब तो दो हमें इनाम। राजा कहता है कि जब सारा राज्य चरणों में धर दिया था तब क्यों न लिया था? तो मंत्री बोला कि महाराज हम उस समय साधु का पार्ट अदा कर रहे थे। राजा बहुत प्रसन्न हुआ। तो जब साधु का पार्ट अदा किया जा रहा था तब तो यह हालत हुई और जब कोई साधु हो जाय तो क्या उसमें निष्परिग्रहता न होनी चाहिये ?


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