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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 407

From जैनकोष



तम्हा उ जो विसुद्धो चेया सो णेव गिण्हए किंचि।

णेव विमुंचइ किंचिवि जीवाजीवाण दव्वाणं।।407।।

आत्मा के अनाहारकत्व का सिद्धांत पक्ष ― निश्चयनय से यह जीव आहारक नहीं होता है, परंतु जो विशेष रूप से शुद्ध रागादिक रहित परिणमन करता है अथवा ऐसा ही जिस का स्वभाव है वह किसी भी प्रकार के आहार को ग्रहण नहीं करता है। इस सचित्त और अचित आहार का यह आत्मा ग्रहणकर्ता नहीं है। आहार होते हैं 6 तरह के―1 कर्माहार, 2 नोकर्माहार, 3 लेप्याहार 4 ओजाहार, 5 मानस आहार, 6 कवलाहार।

कर्माहार व नोकर्माहार ― कर्माहार, कर्मों का ग्रहण किया जाना। जैसे विग्रह गति में इसके कर्माहार ही तो मात्र रह गया। एक होता है नोकर्माहार अर्थात् शरीरवर्गणावों का ग्रहण करना। यह आहार होता है सयोग केवली भगवान के और सब के भी। अरहंतदेव के शरीर में शरीरवर्गणा के स्कंधाणु आते रहते हैं। और इस ही शरीर परमाणु के आते रहने रूप आहार के बल पर ही लाखों करोड़ो वर्ष तक मुख से आहार किये बिना, पौद्गलिक आहार किये बिना जीवित रहते हैं।

लेप्याहार ― एक आहार होता है लेप्याहार। जैसे ये वृक्ष अपनी जड़ों से कीचड़ मिट्टी पानी को खींचकर आहार करते हैं और जीवित रहते हैं। इन पेड़ों के कहाँ मुख है, वे जड़ से ही आहार ग्रहण करते हैं और देखो जड़ से तो सभी आहार लेते हैं। क्या मनुष्य जड़ से आहर नहीं लेता है? पर मनुष्य की जड़ ऊपर है, पेड़ों की जड़ नीचे हैं, यह मनुष्य मानों उल्टा पेड़ है, जो आहार लेने का मूल स्थान है उसका नाम जड़ है, मूल है। मूल कट जाये तो फिर वह जीव जिंदा नहीं रहता है। जैसे वृक्ष की जड़ कट जाय तो वृक्ष फिर नहीं रहता यों ही मनुष्य की जड़ है सिर। इसी से ही भोजन का आहार ग्रहण करता है। ये पेड़ जड़ से आहार लेते हैं और लेप्य आहार लेते हैं। ये पेड़ मिट्टी, कीचड़ पानी आदि का ही आहार करते हैं।

ओजाहार ― एक आहार होता है ओजाहार। जैसे ये चिड़िया अंडे सेया करती है। उनमें जीव कई दिनों तक भीतर पड़ा रहता है। उन को आहार कहाँ से चिड़िया दें, तो अंडों पर बैठे रहती हैं और अपनी गर्मी को, अपने ओज को उन अंडों में पहुँचाती रहती हैं।

मानसाहार ― एक होता है मानसिक आहार। जैसे देवता लोग भूखे प्यासे होते हैं तो मन में उनके वांछा हुई कि कंठ से अमृत झड़ गया। वह अमृत क्या है? कुछ हम आप के थूक से जरा बढ़िया थूक होता होगा। हम आप लोग भी तो जब थूक गुटकते हैं तो कितना अच्छा लगता है? जब कंठ से ही थूक झरता है तो हम आप लोग कुछ संतुष्ट से हो जाते हैं, कुछ ठंडा दिमाग हो जाता है, भूख प्यास नहीं रहती, कुछ ऐसा उनमें भान बन जाता है, उनके कोई और विलक्ष्ाण झर जाता है।

कवलाहार और आत्मा के आहारकत्व का अभाव ― तो ये उक्त 5 प्रकार के आहार हैं―इन आहारों में जो एक आहार शेष रहा छटवां कवलाहार―खाकर आहार लेना उसकी यहाँ चर्चा चल रही है। पुद्गलद्रव्य सचित्त अचित्त पदार्थ इन का आहार यह जीव ग्रहण करता है, भोगता है। इस कारण नोकर्म आदारमय यह शरीर जीवस्वरूप मेरा नहीं है और जब शरीर ही नहीं रहा तो शरीरमय ये जो द्रव्यलिंग हैं, साधु हो गए, नग्न हो गए, चर्या कर रहे हैं, व्रत पाल रहे है, तपस्या कर रहे हैं यह भी जीव का स्वरूप कहाँ से होगा? जब शरीर ही जीव का स्वरूप नहीं है तो शरीर का भेष, साधुभेष यह जीव का स्वरूप कैसे होगा ?

धर्मविक्रियाओं में पर्यायबुद्धता ― भैया ! स्वभाव की दृष्टि करिये, जो जीव अपने स्वभाव को नहीं परखता और ऐसा ही कल्पना में बना हुआ है मैं साधु हूँ, मुझे देखकर चलना चाहिए, ऐसी पर्यायमयी कल्पना बन रही है विविक्त अंतस्तत्त्व की प्रतीति ही नहीं है तो उस साधु के मिथ्यात्व बना हुआ है। सम्यक्त्व ही अभी नहीं जगा, साधुता तो बहुत आगे की बात है। जैसे गृहस्थ जन या अन्य कोई मिथ्यादृष्टि जीव अपने आप में ऐसा विश्वास रखता है कि मैं अमुक गांव का हूँ, अमुक नाम का हूँ, इतने परिवार वाला हूँ, ऐसी पोजीशन का हूँ, और मैं चिदानंदस्वरूप चैतन्यतत्त्व हूँ इसकी खबर नहीं है तो जैसा वह मिथ्यादृष्टि है इस ही प्रकार जिस के यह कल्पना लगी है कि मैं साधु हूँ, मैं मुनि हूँ, मुझे यों चलना चाहिए अब गरमी में बैठकर खूब तपस्या करनी चाहिये, अब इन कर्मों को जलाया जाय ऐसी कल्पना बनती है, पर्यायमयी और चिदानंद स्वरूप मैं चेतन तत्त्व हूँ, जिसकी वृत्ति केवल जानन देखन है, इस स्वरूप की खबर नहीं है तो वह भी लौकिक पुरुषों की तरह मिथ्यादृष्टि जानना चाहिए।

देहमय लिंग का आत्मा में अभाव - यहाँ स्वरूपदृष्टि का प्रतिबोध करा के उपदेश दिया जा रहा है कि जरा सोचो तो सही, यह अमूर्त आत्मा क्या है पौद्गलिक आहार को ग्रहण कर सकता है? नहीं। तो आहार से या अन्य से शरीरवगर्णावों से बना हुआ यह शरीर मुझ आत्मा का कुछ है क्या? नहीं। तो क्या यह शरीर हमारा नहीं है? नहीं है। तो शरीर का जो भेष बनाया गया है वह चाहे गृहस्थ का भेष हो और चाहे साधु का भेष हो, चाहे धोती दुपट्टा ओढ़कर, चाहेकमंडल पीछी उठाकर भेष बना हो या लंगोटी चादर लेकर पिछी कमंडल लेकर भेष किया गया हो या सब कुछ उतारकर नग्नरूपधरा गया हो, यह भेष क्या जीव का है? नहीं है। विशुद्ध ज्ञानदर्शनस्वभावी परमात्मा के इस ज्ञायकस्वरूप आत्मदेव के जब नोकर्म आहार ही नहीं होते तब इन नोकर्माहारों में कमलाहार भी समझ लेना। तो फिर आहारमय देह ही इस जीव के कैसे भी नहीं है।

देहमय लिंग की मोक्षहेतुता का अभाव ―जब देह भी जीव के नहीं है तो देहमय द्रव्यलिंग ही जीव के नहीं है। और जो चीज जीव की नहीं है वह मोक्ष का कारण नहीं है। निश्चय से ज्ञानवृत्ति ही मोक्ष का कारण है। शुद्ध ज्ञानदृष्टि रहना, निश्चय के साथ व्यवहार का मेल कैसे होता है? यह भी एक रहस्य है। पर यह स्वरूपदृष्टि रखकर यह सब वर्णन चल रहा है। इस प्रकार इस शुद्ध ज्ञान के देह ही नहीं है तो देहमय कोईसा भी भेष और लिड्ग इस ज्ञाता के मोक्ष का कारण नहीं होता। इस गाथा के भाव को अब अगली गाथा में ही कुंदकुंदाचार्यदेव सीधे स्पष्ट शब्द बोलकर बता रहे हैं।

ज्ञान में परद्रव्य का असंबंध, अग्रहण, अविसर्ग ―ज्ञान किसी भी परद्रव्य से न कुछ भी ग्रहण करता है और न कुछ भी छोड़ता है, न उनमें प्रायोगिक गुण की सामर्थ्य है और न उनमें कोई वैस्रसिक गुण है ऐसा जिस के कारण परद्रव्य को ग्रहण करने में आत्मा समर्थ हो सके या परद्रव्य के छोड़ने में यह आत्मा समर्थ हो सके, परद्रव्यपना ज्ञान में नहीं है। वह तो परद्रव्य में ही है। ऐसा परद्रव्यरूप जो मूर्त पुद्गल द्रव्य है उसका आहार जीव के नहीं होता। और यों यह ज्ञान आहारक नहीं है। जब ज्ञान आहारक ही नहीं है तब यह ज्ञान शरीरवर्णावों को और मूर्त पुद्गल द्रव्यों को ग्रहण ही नहीं करता है। तो फिर इसके देह है ऐसी तो शंका ही न करना चाहिए। ज्ञान तो केवल जाननस्वरूप को ही लिए हुए रहता है। शुद्ध के ज्ञान में देह ही नहीं है तो आत्मा के देहमय लिड्ग उस दोष के कारण कैसे होंगे? इस विषय का वर्णन अब कुंदकुंदाचार्य देव अगली दो गाथावों में कर रहे हैं।


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