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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 408

From जैनकोष



पाखंडीलिंगणि व गिहलिंगणि व वहुप्पयाराणि।

घित्तं वदंति मूठा लिंगमिणं मोक्खमग्गोत्ति।।408।।

ण उ होदि मोक्खमग्गो लिंगं जं देहणिम्ममा अरिहा।

लिंगं मुइत्तु दंसणणाण चरित्ताणि सेयंति।। 409।।

व्यवहार में धार्मिक दो लिंग― जैन सिद्धांत में मोक्षमार्ग के दो लिड्ग कहे गए हैं―एक पाखंडी लिड्ग और एक गृहस्थों का लिड्ग अर्थात् एक तो धर्म है पाखंडियों का और एक धर्म है गृहस्थों का धर्म। पाखंडी का अर्थ है मुनि महाराज। पाखंडी शब्द सुनकर गालीरूप भाव न लेना। पाखंडी शब्द का असली अर्थ है मुनि महाराज जो पाप का खंडन कर दे। पर न जानें कैसी प्रथा चल गयी है कि खराब धारणा वाले को लोग पाखंडी कहा करते हैं। पर पाखंड का अर्थ है शुद्ध 28 मुलगुणों का पालन करने वाले मुनि महाराज। तो दो धर्म हैं―एक पाखंडियों का एक गृहस्थों का। ये मोही जीव इन लिंगों को धारण करके ऐसा मानते हैं कि यह ही मोक्ष का मार्ग है। मोक्ष का मार्ग वास्तव में भावलिंग है। रागादिक विकल्प उपाधिरहित परमसमाधिरूप भावलिंग मोक्ष का मार्ग है, ऐसा ज्ञान नहीं है। तो इस द्रव्य लिंग को ही मुक्ति का कारण मानते हैं।

पाखंडीलिंग की विशुद्धता ―इन लिंगों में पाखंडीलिंग तो एक ही प्रकार का है और गृहस्थों के लिड्ग कई प्रकार के हैं। गृहस्थ अविरत भी होते हैं और प्रतिमाधारी भी होते हैं और पाखंडी महाराज केवल एक ही प्रकार के होते हैं, शुद्ध 28 मूलगुणों का पालन करने वाले होते हैं। इसी कारण साधु महाराज में कोई भी मूल त्रुटि नजर आये तो वह साधु नहीं कहला सकता । साधु तो परमेष्ठी का नाम है। परमेष्ठी का दर्जा कितना विशुद्ध होता है ?उन साधुजनों से गृहस्थों को कुछ मिलता नहीं, गृहस्थों को दुकान नहीं करा देते, गृहस्थों के शादी विवाह नहीं करा देते, कुछ भी लाभ नहीं है, फिर भी उन साधुवों के चरणों में मस्तक झुकाते, अपना सर्वस्व त्याग करते हैं। तो उन साधुवों में बड़ी विशुद्धि होनी चाहिए।

साधु की निरारंभरता ― साधुवों के किसी भी प्रकार के विषयों की चाह नहीं होती, किसी भी प्रकार का आरंभ परिग्रह नहीं होता। उनके तो जो 6 आवश्यक कार्य हैं वंदना, प्रतिक्रमण, स्तुति आदिक बस इतना ही मात्र उनका आरंभ है और पिछी, कमंडल, पुस्तक इन को ही ग्रहण करना इन को ही समितिपूर्वक धरना, उठाना इतना ही मात्र आरंभ है, सो ये आरंभ नहीं कहलाते। ये तो साधना के उपकरण कहलाते हैं। इसके अलावा अन्य किसी भी प्रकार का आरंभ हो तो वह साधु नहीं है; आरंभी साधु के द्रव्यलिंग भी नहीं है, भावलिंग की बात दूर रही। गृहस्थजन नाना प्रकार के कर्तव्यों में रहते हैं। उनके लिड्ग प्रकार बहुत हैं। उनमें कोई कितनी चूँकि रहा ही करती है तभी तो वह गृहस्थ हैं। पर गृहस्थ अंतर में श्रद्धान् का इतना विशुद्ध होता है कि मेरा जो आदर्श है अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु―ये मेरे आदर्श निर्दोष हैं। स्वयं आचरण कुछ नहीं कर पा रहा गृहस्थ, मगर जिन्हें पूज्य माना गया उन्हें निर्दोषता के कारण ही पूज्य माना करता है। यों साधु लिड्ग और गृहस्थ लिड्ग दो प्रकार के धर्म व्यवहार में जिनशासन में कहे हैं।

व्यवहारमुग्धों की व्यवहार में अटक ― द्रव्य लिंगों को धारण करके मूढ़जन ही कृतार्थता का ख्याल करके संतुष्ट होते हैं, जैसे कि गृहस्थ संतुष्ट हो जायें। हम रोज पूजा कर लेते हैं, थोड़ा स्वाध्याय कर लेते हैं, सुन लेते है, हमने तो हित का काम पूरा निभा लिया है, और इसी से ही हम तिर जायेंगे। यों गृहस्थों के व्यवहारिक कर्तव्यों में मोक्षमार्ग मान लेना जैसे गृहस्थ का अपराध है, इसी तरह साधु के व्रत निर्दोष पालन करने में निर्दोष समिति में कहीं बाधा न हो, देखकर चलें, भाषा भी बहुत प्रिय बोलें कि लोग सुनते ही अपना भय समाप्त कर लें, हित की वाणी बोलें। यों बड़ा निर्दोष चारित्र पाल रहा है कोई साधु और अंतर में यह दृष्टि न बन स की कि मैं तो अमूर्त एक चिदानंदस्वरूप हूँ, मेरा कर्तव्य तो ज्ञाता दृष्टा रहने का है और केवल ज्ञानवृत्ति विशुद्ध बने, यही मोक्षमार्ग है, ऐसी निर्विकल्प समाधिरूप अंतरड्ग चारित्र की भावना जिन के नहीं है, उसे जानते ही नहीं हैं, वे इतना ऊँचा बाह्य चारित्र पालते हुए भी उनके लिए आचार्य महाराज कहते हैं कि ‘इदं लिंग मोक्षमार्ग; ऐसा मूढ़ ही कहते हैं ।

पर्यायमूढ़ की वृत्ति ― भैया ! मूढ़ नाम मोही का। जो पर्याय में मुग्ध हो उसका नाम मूढ़ है, चाहे गृहस्थ हो और चाहे साधु हो। पर्याय मायने शरीर और शरीर की चेष्टाएँ, इन में ही जो मुग्ध हो ऐसे मूढ़जन गृहस्थ लिड्ग को धारण करके कहते हैं कि यह मोक्षमार्ग है और पाखंडी लिड्ग को भी धारण करके कहते हैं कि यह मोक्षमार्ग है, किंतु भावलिंगरहित यह द्रव्यलिंग मोक्ष का मार्ग नहीं हो सकता। साधु नाम है ज्ञान की मूर्तिका, चारित्र की मूर्तिका। जैसे ज्ञान अंतरड्ग ज्ञायक को संकेत करता है इसी प्रकार चारित्र अंतरड्ग चारित्र को संकेत करता है। मोक्षमार्ग कहीं बाहरी वृत्तियों में नहीं है। जो बाहिरी वृत्तियों में मोक्षमार्ग मानते हैं वे पर्याय मूढ़ हैं।

द्रव्यलिंग में ममता न करने वालों के उदाहरण ― जिस कारण अरहंत भगवान देह से निर्मम होकर, लिड्ग आधारभूत शरीर की ममता को छोड़कर दर्शन, ज्ञान, चारित्र की सेवा करते थे, भावना करते थे, इससे भी सिद्ध है जीवों के देह के आश्रित जो चिन्ह हैं, लिंग हैं, भेष है, वे मोक्षमार्ग नहीं हैं। यदि शरीर का कपड़ा रहित हो जाना मोक्ष का मार्ग होता तो पुराण पुरुषों ने इस शरीर की दृष्टि छोड़कर आत्मा में दृष्टि क्यों लगायी? जब शरीर का भेष मोक्ष का मार्ग है, तो शरीर पर ही दृष्टि बनाए रहते, किंतु ऐसा किसी ने नहीं किया, ऐसा करके कोई मोक्षमार्ग पा नहीं सका। इससे यह जानिए कि यह द्रव्यलिंग मोक्ष का मार्ग नहीं है।

द्रव्यलिंग में मोक्षमार्गत्व की प्रसिद्धि का कारण ―द्रव्यलिंग मोक्ष का मार्ग है, ऐसा प्रसिद्ध क्यों हो गया? इसका कारण यह है कि भावलिंग का और बाहर में होने वाले इस द्रव्यलिंग का कोई मेल संबंध है। वह किस प्रकार? जिस पुरुष को आत्मा के ज्ञानानंदस्वरूप की रुचि तीव्र हुई है उस मनुष्य की वृत्ति ज्ञान और आनंद स्वरूप में मग्न होने के लिए होगी। जो पुरुष ज्ञानानंद स्वरूप में मग्न होने का यत्न करेगा वह धन वैभव मित्रजन देश कैसे चिपका सकेगा? उसकी तो रुचि निज शुद्ध आत्मतत्त्व की ओर लगी है। औरों की तो बात जाने दो, जो आत्मस्वभाव का प्रबल रुचिया है, उसे एक धागे का उठाना और बांधना भी विपत्ति मालूम होती है, ऐसी जिस के अपने आत्मस्वभाव की तीव्र रुचि जगी है उस के समस्त बाह्य पदार्थों से हटे रहने का ढ़ंग बन गया और जिस के आत्मकल्याण की ही धुनि है उस के अभी शरीर लगा है ना, क्षुधा, तृषा, आदिक बाधाएँ भी लगी है और काम करना है इस मनुष्य भव में अभी आत्मकल्याण का। बहुत दिन तक इस शरीर को रखना भी एक गौणरूप से आवश्यक हो गया है। इस ही हेतु यह सब द्रव्यलिंग भी हो जाता है।

द्रव्यलिंग की साधनासहायकता ― भैया ! जब चलेंगे साधुजन तो क्या ऊपर को सिर उठाकर चलेंगे? जिन का इतना विशुद्ध ज्ञान वैराग्य है कि अपने आत्मा की दृष्टि से रंच भी नहीं हटना चाहते, वे कभी कारणवश तो क्या अगल बगल में बातचीत हंसी ठट्ठा करते हुए चलेंगे? क्या जहाँ चाहे सिर उठाकर चलेंगे? यह वृत्ति नहीं हो सकती। गमन होगा नीची दृष्टि रखकर, मौन लेकर। वहाँ तो केवल जीव रक्षा का ख्याल होता है। तो यह वृत्ति बनती है पर कोई अपने अंतरंग प्रयोजन को तो जाने नहीं और इन बाहरी वृत्तियों में ही मोक्ष मार्ग है, ऐसा श्रद्धान रखें तो कहते हैं कि वे पर्यायमूढ़ हैं। इस वृत्ति से वे मोक्षमार्ग में नहीं हैं और उन की साधुता है, न गृहस्थापना है। बहुत मोटी युक्ति यह जानना कि जोअरहंत भगवान हुए हैं उन्होंने क्या द्रव्यलिंग धारण नहीं किया, मगर द्रव्यलिंग की ममता त्याग करके शुद्ध ज्ञायकस्वभाव में दृष्टि जगाई, इससे यह विदित होता है कि द्रव्यलिंग मोक्ष का कारण नहीं है किंतु मोक्ष की साधना करने वाले भावलिंगी पुरुष को यह द्रव्यलिंग का वातावरण उस के कर्त्तव्य में सहायक है।

भैया ! बाह्य क्रियाएँ द्रव्यलिंगी और भावलिंगी मुनि के यद्यपि एक सी होती है, फिर भी अंतर में संवर और निर्जरा का कारण भावलिंग है। ज्ञानी शुद्ध अंतस्तत्त्व का आश्रय कर रहा है और अशुद्ध कर्मों से हट कर अपने अंतरंग में प्रवेश करके संवर और निर्जरा कर रहा है।

ज्ञानी की बाह्यचेष्टा की नकल में सिद्धि के अभाव का उदाहरण ― जैसे एक कोई व्यापारी है। वह गया चावल निकालने के बड़े मिल पर, वहाँ बहुत धान के ढेर रखे हुए थे, सो उस व्यापारी ने धान खरीद लिया। उस के पीछे एक गरीब मूर्ख लग गया। उसने सोचा कि यह कैसे धनी बन गया है, देखें तो सही यह क्या काम करता है? जो काम यह करेगा वही काम हम करेंगे तो हम भी धनी बनेंगे। देखा उसने कि सेठ साहब कुछ मटमैले रंग की ऐसे आकार प्रकार की कोई चीज खरीद लाये हैं। ठीक है, वह व्यापारी तो चला गया। भाव भी उस व्यापारी से उस गरीब ने पूछ लिया था। मानो उसने 10) मन भाव बताया। तो दो तीन दिन बाद वह भी उसी चीज को खरीदने के लिए उसी मिल पर गया। तो चावलों का जो छिलका होता है ना, वहीं वहाँ ढेरों पड़ा हुआ था। पूछा भैया ! यह क्या भाव है? कहा 2) रूपये मन। वह बड़ा खुश हुआ। मैं तो सेठ साहब से भी अधिक धनी बन जाऊँगा। वह तो ले गया था 10) रूपये मन, हमें तो दो रूपये मन मिल रहे हैं। सो कहा कि अच्छा भर दो जितने हों । खरीदकर वह बाजार ले गया। बाजार में वही भाव बिके जो भाव वह ले गया था, बल्कि उस से भी कुछ कम भाव पर बिके। सोचा कि क्या बात है? वैसी ही चीज, वैसा ही रंग, फिर भी हमें घाटा हो गया और सेठ मालोमाल हो रहा है।

ज्ञानी की बाह्यचेष्टा की नकल में सिद्धि का अभाव ― इसी तरह भावलिंगी मोक्षमार्ग का सफल व्यापारी इन 28 मुलगुणों का पालन कर रहा है। एक मुढ़ ने सोचा कि इन की इज्जत भी बहुत बड़ी है। हर एक कोई इन के हाथ जोड़ता है, पैर पकड़कर खिलाते हैं, इन का तो शासन सा चल रहा है। सो ऐसा करें ना कि यह लिड्ग अपन धारण कर लें तो दुनिया का मजा भी मिलेगा, खाने को मिलेगा, सभी लोग हाथ जोड़ेंगे और साथ ही कर्म कट जायेंगे क्योंकि इन के कर्म कट रहे हैं। धर्म भी हो जायेगा। सो द्रव्यलिंग धारण कर लिया। धारण करने के बाद भावलिंगी तो मोक्ष में बढ़ गया और द्रव्यलिंगी बढ़ना तो दूर रहा, जैसे कि आजकल बतलाते हैं कि कई करोड़ साधु इस पंचम काल में दुर्गति में जायेंगे, तो ऐसी ही स्थिति उस द्रव्यलिंगी की हो गयी। इस गरीब व्यापारी को यह पता न था कि छिलकों के भीतर जो सफेद-सफेद चावल है, उसकी सारी कीमत है, इस ऊपरी छिलके की कीमत नहीं है। इसी तरह द्रव्यलिंगी साधु को यह पता नहीं है कि अंतर में आत्मस्वभाव की रुचि ज्ञान और उस ज्ञानरूप बर्तते रहना इस रत्नत्रय की कीमत है। इस शरीर की अथवा इसके बाह्य खटपटों की कीमत नहीं है। जैसे चावल के पीछे धान का छिलका भी बड़े व्यापारियों के हाथ में शोभा देता है इसी तरह इस अंतरंग रत्नत्रय के साथ में इस शरीर की पूज्यता लगी हुई है। यह बात उस द्रव्यलिंगी को पता नहीं है। इस कारण वे द्रव्यलिंग को ही ग्रहण करके यह ही मोक्ष का मार्ग है इसी प्रकार कितने ही लोग द्रव्यलिंग को ही अज्ञान से मोक्षमार्ग मान रहे हैं। और इसी कारण से मोह से द्रव्यलिंग को ही ग्रहण करते हैं।

आत्मसाधना का उद्यम ― भैया !जि से आत्मसाधना चाहिए उसे अपने बारे में दुनिया मुझे कुछ जान जाय, ऐसा भाव तो करना ही न चाहिए। अंतरंग में ऐसी कल्पना न जगनी चाहिए और ज्ञान के अभ्यास की, ज्ञान भावना की वृत्ति बनाए रखनी चाहिए, गृहस्थ हो अथवा साधु हो। जैसे जन्म मरण सब का एकसा होता है इसी तरह संसार और मोक्ष्ा की पद्धति भी सब जीवों में एक किस्म से होती है। वहाँ ऐसा भेद नहीं है कि गृहस्थ तो भगवान की पूजा करके, द्रव्य चढ़ाकर मोक्ष चला जायेगा और साधु महाराज इस -इस तरह से चर्या करके मोक्ष चले जायेंगे। मोक्ष का मार्ग केवल एक ही प्रकार का है―यह शुद्ध ज्ञायक स्वभाव अपनी दृष्टि में आये और इस ही रूप अपना अनुभवन करे, विकल्पों का परिहार हो, निर्विकल्प ज्ञानानुभूति जगे, ऐसी वृत्ति ही मोक्ष का मार्ग है। गृहस्थों के कभी-कभी होती है इसलिए ही परंपरया मोक्षमार्ग है और साधुपने में यह वृत्ति निरंतर हो सकती है। इसलिए वह भव्य प्राणी साक्षात् मोक्षमार्गी है।

द्रव्यलिंग के ममत्व के त्याग की अनिवार्यता ― देखो जितने भी भगवान अरहंत बने हैं वे शुद्ध ज्ञानमय ही तो हैं। उन्होंने द्रव्यलिंग का आश्रयभूत जो शरीर है उस शरीर के ममत्व का त्याग किया था तब उन्हें मोक्ष मिला है। तो द्रव्यलिंगी के आधारभूत शरीर की ममता से मोक्ष है या ममता के त्याग से? इसी प्रकार इस द्रव्यलिंग की ममता से मोक्ष है या द्रव्यलिंग की ममता के त्याग से? त्याग से ही मोक्ष है, जब उन अरहंत भगवंतों ने शरीर का आश्रयभूत द्रव्यलिंग का त्याग करके दर्शन ज्ञान चारित्र मात्र आत्मतत्त्व को ही मोक्षमार्ग के रूप में अपनाया, उपासा तब उन को मोक्ष मिला।

मोक्तव्य और मुक्तिस्वरूप के परिज्ञान की आवश्यकता ― सो भैया ! यह अबाधित सिद्ध है कि जिसे मुक्ति दिलाना है, उसकी पहचान करनी है और जैसी स्थिति दिलानी है उसकी पहिचान करनी है। इन दो परिचयों के बाद मोक्षमार्ग मिलता है। जिसे मुक्त कराना है, उसका ही सही पता नहीं तो बेपते के लिफाफे की तरह यहाँ से वहाँ भटकना बना रहता है। किसी लिफाफे को बिना पता लिखे लेटर बॉक्स में डाल दो तो डाकिया उसे कहाँ ले जाये, वह लिफाफा तो इधर उधर ही भटकेगा। इसी तरह अपने आप का पता नहीं है और डाल दिया निर्ग्रंथ लिंग के लेटर बॉक्स में तो उस लिफाफा जैसी उसकी स्थिति है। अब वह कहाँ जाये बतावो? कभी किसी के संघ में घुसा, कभी किसी के संघ में घुस,कभी कहीं मन बहलाया। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि जिन्हें आत्महित करना हो वे अपने आत्मतत्त्व का यथार्थ परिचय करें और इस विविक्त ज्ञायकस्वरूप आत्मतत्त्व की अंतरंग से रुचि करें तो इससे कल्याण के पात्र हो सकते हैं।

देहपरिणति के ममत्व की मुक्तिबाधकता―साधुलिंग और गृहस्थलिंग इन्हें ग्रहण करके मूढ़ पुरुष ‘यह ही मोक्षमार्ग है’ ऐसा माना करते हैं, पर उन्हें यह खबर नहीं है कि इस देह का ममत्व त्यागने पर ही मोक्ष का मार्ग मिलता है। देह के आश्रित जो लिंग चिन्ह बनता है उसमें ममता का भाव होना सो देह की ममता कहलाती है, इसही बात को अब अगली गाथा में सिद्ध करते हैं।


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