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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 42

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जीवो कम्मं उहयं दोण्णि वि खलु केवि जीवमिच्छंति ।

अवरे संजोगेण दु कम्माणं जीवमिच्छंति ।।42।।

30. जीव और कर्म के उभय में आत्मत्व की कल्पना―देखो आत्मा के बारे में लोगों की क्या-क्या धारणाएं हैं? कोई कहते हैं कि जीव और कर्म का मिश्रण जीव है । वैसे जीव और कर्म इन दोनों का मिश्रण जीव है, यह बात अज्ञानी नहीं समझता, क्योंकि उन्हें खाली जीव और कर्म दिखा नहीं, कर्म कभी दृष्टि में नहीं आया―अत: अज्ञानी जीव उन दोनो के मिश्रण को जीव तो कहता है, किंतु उनकी स्वयं-स्वयं की सत्ता न जानकर कहता है । इस सातवें विमूढ़ पुरुष को शुद्धसत्ताक जीव तो समझ में आया नहीं और कर्म को जीव कह सकता नहीं । इतना तो जानता है कि जिसमें सुख, दुःख, जानकारी आदि हो रही है वह जीव है, पर वह सब दिख रहा है कर्म के नाट्य में । अत: न केवल जीव इसकी समझ में आत्मा है, न केवल कर्म इसकी समझ में आत्मा है । इनका उभय ही आत्मा है ऐसा यह सप्तम विरुद्ध मानता है, चाहता है । इस कल्पित स्वरूप से ही बने रहने की चाह है इसकी ।

31. जीवकर्मोभयात्मवादिता―कोई पुरुष ऐसे होते हैं कि जीव और कर्म इन दोनों के मेल को जीव समझते हैं । केवल जीव नहीं दृष्टि में, केवल कर्म नहीं दृष्टि में, किंतु जीव कर्म का मिल करके आत्मा बना है ऐसा मानते हैं । ऐसा मानने का कारण उनका अज्ञान है । यह बोध नहीं है कि प्रत्येक पदार्थ अपना निजी-चतुष्टय रखता है । दो मिल कर कभी एक पदार्थ होता ही नहीं है, सो स्वरूप चतुष्टय का परिज्ञान नहीं, जीवतत्त्व का बोध नहीं और कर्मों के प्रभाव से लिपटे हुये ही हैं, कर्मों के प्रभाव में लिपटकर भी समझ है, बुद्धि है, ऐसा कुछ ख्याल करते हैं तो कुछ बात तो चेतन की पकड़ी गई और सारी बातें कर्म की पकड़ी गईं । इस प्रकार जब एक मिश्रण कर लिया तो वह अज्ञानी जीव और कर्म इन दोनों के मेल को जीव समझता है । इन शब्दों में कोई कह सके या न कह सके, पर इस प्रकार की बुद्धि अनेक लोगों के रहा ही करती है । एक जीवतत्त्व जब दृष्टिगत नहीं होता और जीव की बात, जीव का प्रताप बराबर चल ही रहा है, समझ बन ही रही है, ऐसी स्थिति में कुछ अपना तत्त्व मिलाया, शेष परतत्त्व मिलाया तो इन सबको मिल करके यह मानता है कि मैं जीव हूँ ।

32. कर्मसंयोग में जीवत्व की कल्पना―अब अष्टम विमूढ़ की बात देखिये―यह कर्मों के संयोग को ही जीव मानता है । अर्थ क्रिया में समर्थ कर्म का संयोग ही तो है । भिन्न-भिन्न रूप से कर्म रहें तो वे क्या कर सकते हैं ? खाट में आठ काठ होते हैं―4 मिचवा, 2 पाटी, 2 सीरा । ये भिन्न-भिन्न रहें तो ये पुरुष के सुलाने में समर्थ हैं क्या? इनका संयोग करके बुना दो, फिर काम करेंगे ये । इनका संयोग कोई अलग चीज नहीं । कितने ही अज्ञानी कर्मों के संयोग को जीव कहते हैं । जैसे―ईंटों के संयोग से भित्ति है और आठ काठ के संयोग का नाम खाट है, उसी प्रकार आठ कर्मों के संयोग का नाम ही जीव है । जैसे आठ काठ के बिना कोई खाट नहीं होती है, इसी प्रकार यह अज्ञानी कहता है कि आठ कर्मों के संयोग के बिना जीव नहीं है । उक्त सब कल्पनायें मोह में होती हैं ।

33. कर्मसंयोगात्मवादिता―कुछ लोग कर्मों के संयोग को जीव मानते हैं । केवल एक-एक कर्म क्या करे? कर्म जैसे कि 8 माने हैं―ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अंतराय । इनका जो मेल है, संयोग है वही जीव है । जैसे चारवाक लोग मानते हैं कि आठ काठ का जो संयोग है सो खाट है । उन आठ में से अगर एक न हो कुछ चीज, एक मिचवा या एक पाटी या कोई पाया, तो काम बन सकता है क्या? नहीं बन सकता । वह खाट नहीं कहला सकती । 8 काठ का जो संयोग है सो ही तो खाट है । आठ काठ से भिन्न और खाट क्या? इसी तरह आठ कर्म नहीं, फिर जीव कुछ न रहा । आठ कर्मों के संयोग का ही नाम जीव है । कुछ मूढ़ जीव अपने को न जानकर इन कर्मों के समूह को जीव समझते हैं और जानते हैं । सुन रखा है कि ज्ञानावरण का उदय आता तो ज्ञान कम हो जाता है । ज्ञानावरण जरा सहूलियत देता है तो यह ज्ञान प्रकट हो जाता है । दर्शनावरण से दर्शन का संबंध है, वेदनीय कर्म से सुख दु:ख मिलता है । मोहनीय कर्म के कम बढ़ होने से हम जीवों को कुछ प्रकाश आवरण आदिक मिलते हैं । आयु के कारण शरीर टिका हुआ है, नामकर्म से यह सब मैं बन बैठा हूँ, इस शरीर की रचना हुई है । गोत्र से हम ऊँच नीच कहलाते हैं । अंतराय से सब देना लेना न देना लेना आदिक बनते हैं । तो 8 कर्मों से रहित हम और रहे क्या? जो भी व्यवहार है, जो भी प्रवृत्तियाँ हैं ये सब अष्ट कर्मों के प्रताप से है । तो यह अज्ञानी जीव अष्टकर्मों के संयोग को ही जीव समझता है । उससे भिन्न मैं कुछ जीव हूँ ऐसा उसकी दृष्टि में नहीं है ।


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