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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 43

From जैनकोष



एवंविहा बहुविहा परमप्पाणं वदंति दुम्मेहा ।

ते ण परमट्ठवाई णिच्छयवाईहिं णिद्दिट्ठा ।।43।।

34. परात्मवादियों में परमार्थवादिता का अभाव―इस तरह के बहुत से दुर्बुद्धि जन पर को ही आत्मा मानते हैं । वे परमार्थवादी नहीं है ऐसा निश्चयवादियों ने निर्दिष्ट किया है । आचार्य कहते हैं कि इस प्रकार की कल्पना करने वाले जीव परमार्थवादी नहीं हैं―इस प्रकार बहुत से लोग परपदार्थों को आत्मा कह देते हैं । चैतन्यस्वभाव के अतिरिक्त जो कुछ भी है, सो सब पर है । अत: शरीर, कर्म, रागद्वेष की परंपरा आदि सभी पर हैं । एक चैतन्यस्वभाव की दृष्टि से देखा गया आत्मा तो निज है, इसके अतिरिक्त सब पर हैं । जिनकी बुद्धि सोई हुई है, वे पर को आत्मा कहते हैं । निश्चय तत्त्व के मानने वालों ने बताया है कि वे परमार्थवादी नहीं हैं । यह वही बता पायेगा, जिन्होंने परमार्थ को जाना है । एक के जानने में अनेक का निषेध हो सकता है । जो अनेक का निषेध करेगा, उसे इस एक चीज का पता है, तभी तो निषेध करेगा । आत्मा की जानकारी सबसे बड़ी चीज है । देखो जो विमूढाष्टक द्वारा आठ कुतत्त्वों में तत्त्व की कल्पना की है उनमें से अध्यवसान तो जीव का परिणमन है, किंतु वह नैसर्गिक नहीं है, औपाधिक है, अध्रुव है अत: परतत्त्व है, जीव नहीं है । कर्म तो पौद्गलिक है, अजीव प्रकट ही है । अध्यवसान की संतान कल्पना है, प्रत्येक अध्यवसान भाव अपने समय में उस जाति की परिपूर्ण पर्याय है, उसका अगले समय में व्यय हो जाता है वह द्रव्य तो है नहीं जिसकी संतानरूप में कल्पना की जावे । शरीर (नोकर्म) तो प्रकट अचेतन है । कर्मोदयजनित भाव (शुभ अशुभ भाव) औपाधिक भाव है, परभाव है, अध्रुव है वह जीव नहीं है । जीव तो परमार्थत शुद्ध चेतनामात्र है । सुख दुःख आदि भी इसी तरह इन्हीं कारणों से जीव नहीं हैं । कर्म और जीव का मिश्रण तो हो नहीं सकता क्योंकि वे जुदे-जुदे पदार्थ हैं । अपना-अपना अस्तित्त्व रखने वाले दोनों का समुदाय भी जीव नहीं है । कर्म अचेतन हैं, उनका संयोग भी जीव नहीं है । आत्मा तो इनसे परे निजचैतन्यस्वभावमात्र है । इसका प्रकट अनुभव तो निज ज्ञायकस्वभाव के उपयोग द्वारा एकला होने की स्थिति में होता है । आत्मज्ञान होने के बाद विकार का अभाव हो जाता है । उसके संसार बढ़ाने वाला बंध नहीं है । जैसे किसी महाजन के यहाँ लाखों रुपए का कर्जा होता था वह निपटा दिया जावे सिर्फ मामूली सा कर्जा शेष रहे तो वहाँ सौ दो सौ रुपए के कर्ज की गिनती नहीं होती है । पर को आत्मा कहने वाले जीव परमार्थवादी नहीं हैं ।

35. अज्ञान में अनेक परात्मवादिता―इसी प्रकार और और भी परजीवों में परतत्त्वों में ‘यह मैं हूँ’ ऐसा मानता है । कुछ लोग तो पुत्रादिक को ही ऐसा समझते हैं कि यही मैं हूँ । इतनी आसक्ति होती है जिस आसक्ति में और कुछ सूझता ही नहीं । कुछ लोग जो धन में आसक्त हैं वे धन को ही समझते हैं कि यही मैं हूँ, धन न रहा तो मैं कुछ न रहा । जो लोग नाम इज्जत को समझते हैं कि यह मैं हूँ वे नाम इज्जत न रहे तो ऐसा अनुभव करते कि अब मैं कुछ रहा ही नहीं । बहुत से लोग कहते हैं अब क्या जीवन है वह तो मर गया । जैसे कोई तीन वर्ष पहिले प्रधानमंत्री था रूस का तो उसका लोग बड़ा आदर करते थे, उसका बड़ा नाम लिया जाता था, उसका नाम अखबारों में खूब आया करता था, पर अब उसके प्रधानमंत्री न रहने पर उसका कोई नाम भी लेने वाला है क्या? लोग बड़े आश्चर्य से देखते हैं कि अरे अब वह क्या रहा? वह तो मर गया । तो जो लोग इज्जत में आसक्ति रखते हैं उनकी दृष्टि में इज्जत न रहे तो उसे जीवन ही नहीं समझते । जिन्हें पर्याय में, नाम में, विभाव में, किसी वस्तु में आसक्ति हैं वे उस उसमें मानते हैं कि यह मैं हूँ । और इस अज्ञान ने, आसक्ति ने, बड़ों-बड़ों को परेशान कर लिया है, पर जो यथार्थत: महापुरुष हैं वे कभी इनसे परेशान नहीं होते ।

36. अवशिष्ट समय को सत्पथ में व्यतीत करने में भलाई―वे भी पहिले इसी चक्कर में पड़े हुए थे, जो आज सुलझ गये हैं ऐसे महापुरुष और सिद्ध भगवंत, वे भी कभी हम आप जैसे ही चक्कर में पड़े हुए थे । उन्हें भी इस दुनिया का सब कुछ रंग ढंग ही सर्वस्व दिखता था, लेकिन जब ज्ञानप्रकाश हुआ, उससे विरक्त हुए तो पार पा गये संसार से । हम आप भी एक विकल्पों में ही उलझकर अपने आपको बरबाद किए जा रहे हैं, उससे मिलेगा क्या, दूसरों पर नजर डालकर समझ लो । जो लोग घर में रहे, अच्छा किया बुरा किया, आखिर मर गए, तो क्या मिला उन्हें? उनको दृष्टि में रखकर भी समझा जा सकता है कि इस संसार में रहने का कुछ नहीं । जब अपना कुछ भी नहीं है, और उस ही को सर्वस्व समझा जाये तो इस संसार का दुःख कैसे मिट सकता है? बाह्यपदार्थों के प्रति तो हठ ऐसी किया करते हैं, इन इंद्रिय विषयों के प्रति तो हठ ऐसी करते हैं कि कुछ भी हो, किसी प्रकार हो, बात यों ही होना चाहिये, पर कदाचित् यह ज्ञान नहीं जगता कि अपने आत्मस्वभाव में ठहरने के लिए, अन्य सबको बिल्कुल भुलाने के लिए हमारी हठ हो तो हमारी इसमें दया है । जब हम परपदार्थों से धोखा ही धोखा खाते आ रहे हैं, कोई समझे कि मायाचार करके हम विषय साधन बढ़ा लें तो हमने बुद्धिमानी की, सो बुद्धिमानी नहीं है । वह तो एक अपना पतन है, बरबादी है । हमने अपने आपको धोखा ही दिया । कोई पुरुष किसी दूसरे को सताकर यह माने कि मैं बड़ा चतुर हूँ, मैंने धोखा दिया दूसरे को और अपना काम सिद्ध किया, पर वास्तव में उसने अपने को ही धोखा दिया और अपने आपका ही बिगाड़ किया । कुछ बड़ी उम्र बीतने पर स्वयं समझ में आ जाता है कषायों का वेग कम होने पर स्वयं समझ में आ जाता है कि मैंने व्यर्थ ही इतना जीवन खो दिया । कैसे खो दिया? विषयों में रत रहे, कषायों में प्रीति थी, दूसरों से विरोध ईर्ष्याभाव रखा आदिक अनेक परिणामों से विकल्पोंसहित जो जीवन गुजरता है उससे संतोष नहीं मिल सकता । आखिर पछतावा ही मिलेगा, क्योंकि अपनी ही जाति की चीज होती तो वहाँ संतोष का अवसर था । की गई अपने विरुद्ध अपनी परेशानी की बात तो उन दुष्कर्मों के फल में अंत में पछतावा ही मिलेगा । हम रहे सहे समय के लिए भी चेत नहीं पाते हैं, न यह संकल्प कर पाते हैं कि जो समय गुजरा सो गुजरा, अब जो रहा सहा समय है उसे तो बिल्कुल ठीक ढंग से गुजार लें, यदि ऐसा किया जा सका तो समझिये कि हम लोग सब भले मार्ग में चल रहे हैं । यदि यह नहीं किया जा सकता तो समझिये कि हम लोग एक अनुचित पथ में जा रहे हैं ।

37. प्रशमादि सद्भावों से जीवन की सफलता―प्रशम, संवेग, अनुकंपा, आस्तिक इन चार प्रकार के परिणामों को रखने में कौन-सी अशांति है? प्रशमभाव रखें, शांतिभाव रखें, संवेग परिणाम, संसार शरीर भोगों से विरक्ति का परिणाम, इन भोगों में लोग तो कल्पनाओं में राजी होते लेकिन अंत में रीते रहना पड़ता है। इस कारण असंतोष बढ़ेगा, और फिर वहाँ मैं क्या करूं, कुछ उसे दिखेगा नहीं सत्पथ । शरीर में आसक्त रहेगा तो शरीर तो बूढ़ा बनेगा, रोगी बनेगा, मिटेगा, तो इससे शरीर को निरखकर आसक्ति के कारण यह बड़े विह्वल होता है । जो पहिले से ही अनासक्त हो, रोग में वह घबड़ाया नहीं, अपना अहित न मानेगा । तो संवेगभाव रखने में शांति ही है । अनुकंपा दया का पारिणाम―स्वयं पर दया, दूसरे पर दया, किसी पर अन्याय न करना ऐसे परिणामों में आसक्ति है, मैं आत्मा हूँ, मुक्ति ऐसे होती है, जीव की ऐसी अवस्थायें हैं, स्वभाव विभाव जो जैसे हैं तैसे दृष्टि में रहे अपने आत्मा के अस्तित्व की प्रतीति में रहे तो इसमें इसका क्या बिगाड़? इसका लाभ ही है । तो इससे चाहिये कि रहे सहे समय को हम शांति में गुजारें, वैराग्यपूर्वक गुजारें । मैं हूँ, ऐसा अपने प्रत्यक्ष श्रद्धा में रहे, ऐसे भाव में गुजरे तो समझिये कि जीवन सफल है, और रहे सहे जीवन को भी यदि ऐसे ही अनापसनाप विषयों में, कषायों में गवायें तो मरण के बाद कीड़ा मकोड़ा असंज्ञी हो गये तो फिर कुछ वश नहीं चलने का । इस कारण बुद्धि मिली है, कुल श्रेष्ठ है, जैनशासन मिला है तो इनका उपयोग यह है कि प्रशम, संवेग, अनुकंपा, आस्तिक आदिक गुणों की वृद्धि में अपना प्रयत्न रहे, यही बड़े संतोष की बात होगी ।


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