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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 53

From जैनकोष



जीवस्स णत्थि केई जोयठ्ठाणा ण बंधठाणा वा ।

णेव य उदयट्ठाणा ण मग्गणट्ठाणया केई ।।53।।

186. योगस्थान में जीवस्वरूपत्व का प्रतिषेध―जीव के योगस्थान नहीं है । योग कहते हैं आत्मप्रदेश परिस्पंद को । आत्मप्रदेश परिस्पंद होता है काय के परिस्पंद के निमित्त से । तो मन, वचन, काय का निमित्त पाकर जो प्रदेश परिस्पंद होते हैं जीव में उन परिस्पंदों के अनेक स्थान हैं । हलन-चलन की विधि ढंग मंदता तीव्रता आदिक कारणों से योग के अनेक स्थान होते हैं । जब प्रदेश परिस्पंद भी मैं नहीं, मेरा स्वरूप नहीं तो योगस्थान मेरा स्वरूप क्या होगा? योगस्थान इस जीव का स्वरूप नहीं है । जीव का स्वरूप तो ऐसी बुद्धि बनाने में विशदतया विदित होता है कि जिसका सर्वस्व सार चैतन्यशक्ति में व्याप्त है उतना मैं जीव हूं, इससे अतिरिक्त अन्य सब भाव पौद्गलिक हैं, कुछ तो पुद्गल उपादान वाले हैं और कुछ पुद᳭गल के निमित्त से आत्म–उपादान में प्रकट हुए भाव हैं, वे सभी के सभी पौद्गलिक हैं ।

187. बंधस्थान में व उदयस्थान में जीव स्वरूपत्व का प्रतिषेध―जीव के बंधस्थान भी नहीं है । विभावपरिणामों का निमित्त पाकर जो कर्म बंधते हैं उन बंधों में जो स्थान होते हैं अनेक प्रकृतियों के रूप से जो बंधस्थान होते हैं वे पुद᳭गल के हैं, कर्म के हैं, वे मेरे नहीं हैं । ये प्रकट भिन्न पदार्थ हैं―जीव और कर्म । कर्म का कुछ भी परिणमन तो मेरा हो ही नहीं सकता और कर्म के उदय के निमित्त से उत्पन्न हुआ मेरे गुणों का प्रभाव, परिणमन; वह मेरा परिणमन तो है किंतु उत्कृष्ट विशुद्ध तैयारी के साथ निरखा जा रहा है कि मैं अनादि अनंत शाश्वत चित्स्वभावमात्र हूँ, ऐसा ही निरखता रहूं अत: मैं यही चैतन्यशक्ति हूं, चित्स्वरूप हूं, मैं यह विभावपरिणमन भी नहीं । यह पौद्गलिक है । फिर कर्मों के जो स्थान हैं बंधस्थान हैं वे तो मेरे होंगे ही क्या? जीव के उदयस्थान भी नहीं । कर्मों के उदय के स्थान ये तो कर्म में पड़े हुए हैं । वे मेरे में कहां? उनके विपाक का निमित्त पाकर मुझमें जो प्रभाव होता, उदय होता, उनमें जो स्थान हैं वे तक भी मैं नहीं हूं, जीव के उदयस्थान नहीं ।

188. मार्गणास्थानों में जीवस्वरूपत्व का प्रतिषेध―मार्गणास्थान भी कोई जीव के नहीं है । मार्गणाओं का बहुत बड़ा विस्तार है । चौदह प्रकार की मार्गणायें होती हैं―गति, इंद्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्यत्व, सम्यक्त्व, संज्ञी और आहार । इनके भी और भेद हैं, उन भेद प्रभेदों के स्वरूप के परिज्ञान से जीव के विभाव परिणमनों का विस्तार ठीक से समझ आ जाता है । नरक गति, तिर्यंच गति, मनुष्यगति और देवगति की बात तो स्पष्ट है, ये जीव के स्वरूप नहीं हैं । सिद्ध स्थिति के रूप में भी परिणमन निरखा जा रहा है, है वह स्वाभाविक परिणमन, किंतु कोई भेद ये जीव के स्वरूप नहीं हैं । सिद्ध स्थिति अथवा 5वीं गति, स्थिति जीव के स्वभाव विकास में आयी है । लेकिन जीव का स्वरूप कहोगे तो वह स्वरूप न बनेगा । स्वरूप होता है शाश्वत । सिद्ध दशा तो कर्मक्षय के बाद प्राप्त हुई है । तो ये मार्गणा स्थान भी जिनके भेद विभावरूप हैं और एक भेद इन मार्गणाओं में स्वभावरूप भी आता है वे सब भी जीव के स्वरूप नहीं हैं । मार्गणा कहते हैं खोज को । खोज करने में जहाँ विभाव नहीं मिला उसे भी जाना जायेगा तो यों मार्गणास्थान कोई भी जीव के नहीं है । एकेंद्रिय होना, दो इंद्रिय होना, तीन इंद्रिय होना, चार इंद्रिय, पंचेंद्रिय होना ये जीव के स्वरूप नहीं हैं, और कभी इंद्रिय से रहित हो जाये जीव उसे भी यों निरखना कि यह इंद्रियरहित है, तो इंद्रियरहितपना भी जीव का स्वरूप नहीं है । जीव का स्वरूप तो जीव में तादात्म्यरूप से रह रहा है, वह है चैतन्य स्वरूप । इसी प्रकार अन्य सभी मार्गणास्थानों की बात समझना । कोई भी मार्गणास्थान जीव के नहीं हैं ।

189. योगस्थान बंधस्थान व उदयस्थानों से जीव की विविक्तता―जीव के योगस्थान कुछ भी नहीं है । आत्मा में योग है, आत्मा में कर्म के आने की कारणभूत शक्ति है उसका नाम योग है । जितनी शक्ति है वह सब स्वाभाविक है । उसके परिणामों में कोई स्वाभाविक होता है, कोई वैभाविक होता है । वस्तुत: आत्मा में योगों का भी भेद नहीं है । योगमात्र से जो आस्रव है उसे ईर्यापथ आस्रव कहते हैं । कषाय सहित योग होने को सांपरायिक आस्रव कहते हैं । आत्मा इन सबसे शून्य है । प्रकृतिबंध के स्थान, स्थितिबंध के स्थान और प्रदेशबंध के स्थान ये जीव में नहीं हैं । एक शुद्ध दर्पण है उसमें लाल, पीला, नीला, हरा की उपाधि नहीं है । इसी तरह इन बंधों के स्थान जड़ स्वभाव हैं वह आत्मा में नहीं हैं तथा उदयस्थान भी आत्मा में नहीं हैं । यद्यपि जीव उपादान वाले स्थान जीव में हैं किंतु औपाधिक स्थान स्वभाव का विस्तार नहीं है । थोड़ी प्रकृतियों का उदय हुआ, अधिक प्रकृति का उदय हुआ, इनका उत्पत्ति स्थान न जीव है और न पुद्गल है । मंद फल, तीव्र फल ये उदयस्थान भी जीव के नहीं हैं । उन फलों में जो उदय स्थान हैं वे जीव के नहीं हैं, वे तो संबंध पाकर हुए हैं ।

190. गति, इंद्रिय, काय मार्गणा से जीव की विविक्तता―मार्गणास्थान जीव में नहीं । खोजने के स्थान जीव के हुआ तो करते हैं किंतु उसका कार्य नहीं । जीव की मनुष्य गति, तिर्यंचगति, नरकगति, देवगति भी नहीं हैं । हालांकि जीव इनमें जा रहा है, किंतु शुद्ध दृष्टि से तो जीव इनमें नहीं हैं । कोई आदमी पहले बड़ा सदाचारी होवे, बाद में दुराचारी हो जाये, तो अन्य मनुष्य उससे कहते हैं तुम पहले के नहीं रहे । लेकिन मनुष्य तो वही है जो पूर्व में था वही अब है, ऐसे ही द्रव्यदृष्टि से जीव शुद्ध है । कोई व्यक्ति सोना लाया, उसमें चौदह आने भर सोना है तथा 2 आना भर अन्य धातु है । तो सोना खरीदने वाला कहता है, यह क्या पीतल ले आये । क्योंकि उसकी शुद्ध दृष्टि असली सोना खरीदने की है । अतएव वह दो आना अस्वर्णमिश्रित सोने को भी पीतल कह देता है । सहजतत्त्व (चैतन्य) के अतिरिक्त सभी भाव या परिणमन अनात्मा है । शुद्ध जीव में इंद्रियों की भी कल्पना नहीं होती है । एकेंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और पांच इंद्रिय संसारी जीव को कहते हैं । जीव तो शुद्ध चैतन्यमात्र है । योगी जंगल में रहते हैं, लेकिन किसके बल पर, वे ध्यान के बल पर जंगल में रहते हैं । उनका उत्तम उपयोग शुद्ध चैतन्य से बात करता रहता है । काय मार्गणा भी जीव में नहीं है । पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक और त्रसकायिक जीव में नहीं है । कायरहित अवस्था भी जीव की नहीं है, । कर्म का निमित्त पाकर ये शरीरसहित हुए हैं । जीव तो वस्तुत: शरीररहित है । इसका तात्पर्य है कि जीव एक चैतन्य मात्र है, किंतु अफसोस है कि अपने ही अज्ञान अपराधवश यह जीव इतना चक्कर में पड़ा है कि वह इन विकल्पजालों से निकल ही नहीं पाता है । यदि सर्व विकल्प छोड़कर शुद्ध चेतना का अनुभव करे तो क्लेशमुक्त हो सकता है ।

191. योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन मार्गणा से जीव की विविक्तता―योगमार्गणा भी जीव की नहीं है । योग―मन, वचन, काय के प्रवर्तक से होने वाले आत्मप्रदेशपरिस्पंद को कहते हैं । इनका संबंध पाकर आत्मप्रदेश हिल जाते हैं । जिसके यही अनुभव रहता है कि मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं बालक हूँ वह आत्मतत्त्व से काफी दूर है, संस्कार के वशीभूत होकर वह ऐसा समझता है । आत्मा न पुरुष है और न स्त्री है, न नपुंसक लिंग है, वह तो चैतन्य मात्र है । पुर्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुँसक लिंग भाव भी जीव के नहीं हैं । उपाधि को निमित्त पाकर भ्रम से जीव अन्य को अपना मान रहा है । कषायमार्गणा―क्रोध, मान, माया, लोभ भी मेरे नहीं हैं । मेरे नहीं है तभी तो मैं इन्हें छोड़ सकता हूँ । जब लोभ मेरा नहीं है तो जिन पदार्थों को देखकर लोभ होता है, वे मेरे कैसे हो सकते हैं? छोटा मोटा ज्ञान भी मेरा नहीं । वह तो पैदा हुआ नष्ट हो गया । ज्ञानमार्गणा भी 8 प्रकार की होती है―मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, केवलज्ञान, कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, विभंगावधिज्ञान । ये सब ज्ञान की पर्याय हैं, अत: क्षणिक हैं । केवलज्ञान भी क्षणवर्ती है किंतु एक केवलज्ञान पर्याय के बाद केवलज्ञान पर्याय ही होती है, अनंतकाल तक केवलज्ञान पर्यायें होती चली जावेंगी, अत: नित्य का व्यवहार कर दिया जाता है । निश्चयत: जीव सनातन एक चिन्मात्र है, अत: ये ज्ञानमार्गणायें भी जीव नहीं हैं । संयमस्थान भी मेरा नहीं । हिंसा दया आत्मा की नहीं । इनसे रहित शुद्ध चैतन्यमात्र निरपेक्ष तत्त्व मेरा है हितकर तो उसकी दृष्टि है । किसी को उच्च पदाधिकारी बना दिया जावे और वह होशियार नहीं निकला तो कोई कहते हैं कैसे बुद्धु को उच्च पदाधिकारी बना दिया? यदि ज्ञानभाव को तो सम्हाला नहीं और बाह्यसंयम धर लिया तो वास्तविकता नहीं आ जायेगी । बाह्यसंयम तो है ही क्या, अंत:संयमस्थान भी जीव के नहीं है । दर्शनमार्गणा भी जीव की नहीं है । दर्शन 4 तरह का होता है―(1) चक्षुदर्शन (2) अचक्षुदर्शन (3) अवधिदर्शन (4) केवलदर्शन । चक्षु इंद्रिय के द्वारा जो ज्ञान हो उससे पहिले होने वाले प्रतिभास को चक्षुदर्शन कहते हैं । बाकी चार इंद्रियों और मन से जो ज्ञान हो उससे पहले होने वाले दर्शन को अचक्षुदर्शन कहते हैं । अवधिज्ञान से पहले होने वाले दर्शन को अवधिदर्शन कहते हैं । केवलज्ञान के साथ होने वाले दर्शन को केवलदर्शन कहते हैं । दर्शन की प्रवृत्ति जीव की नहीं है तो चक्षुदर्शनादि कैसे जीव का हो सकता है?

192. लेश्यादि मार्गणा से जीव की विविक्तता―लेश्या 6 तरह की होती है । कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल । यह भी जीव की नहीं है । इनके समझने का एक दृष्टांत है । एक आम का वृक्ष काफी आमों से लदा था । उसको देखकर कृष्णलेश्या वाला व्यक्ति कहता है, इसे जड़ से काटकर आम खा लें सब । नीललेश्या वाला कहता है इसका तना काटकर आम तोड़ लेवें । कापोतलेश्या वाला कहता है, डालें काटकर फल तोड़ लेवें । पीतलेश्या वाला कहता है, टहनी तोड़कर फल खा लें । पद्मलेश्या वाला कहता है, पके-पके आम तोड़ कर ही अपना काम निकाल लेवें और शुक्ललेश्या वाला कहता है, नीचे जो फल गिरे पड़े हैं उन्हीं को खाकर संतुष्ट रहेंगे । ये सब भाव कर्म की उपाधि पाकर हुए हैं । गति, इंद्रियाँ भी दूसरों से मांगकर लिए हुए हैं । अन्यत्र से आये अन्यत्र चले जावेंगे । संज्ञी, असंज्ञीपना भी जीव का स्वभाव नहीं है, और न यह जीव में भेद हैं । आहारक अनाहारक भी जीव का भेद नहीं । यह जीव आहार ग्रहण करता ही नहीं, तब आहारक कैसे हो सकता है तथा अनाहारक कहने का भी अवकाश कहाँ? स्पर्श आदिक भी तुम्हारी आत्मा के नहीं हैं । जो उपद्रव आत्मा में लग गया है उसी की हम रक्षा करते हैं । वाह री बुद्धि! दूसरे के पहरेदार बनकर रक्षा करता हुआ भी यह शरीर प्रसन्न होता है । यह सब जीव के नहीं, शुद्ध चैतन्यमात्र आत्मा है । यह कार्य मैंने किया, बनवाया अथवा इस तरह कहना―आपके दास ने यह मंदिर बनवाया है, यह सब जीव के स्वभाव नहीं हैं । जब कर्म ही जीव के नहीं हैं तो अन्य पदार्थ जीव के किस तरह हो सकतें हैं? अब आगे कहेंगे कि स्थितिबंधस्थान आदि भी जीव के नहीं हैं:―


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