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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समयसार - गाथा 54

From जैनकोष



णो ठिदिबंधट्ठाणा जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा ।

णेव विसोहिट्ठाणा णो संजमलद्धिट्ठाणा वा ।।54।।

193. स्थितिबंधस्थानादि से जीव की विविक्तता―स्थितिबंधस्थान जीव का नहीं । कम, ज्यादा समय तक कर्म रहें आत्मा में, यह भी स्वभाव जीव का नहीं । संक्लेश स्थान जीव का नहीं क्योंकि कर्म के तीव्रोदय को पाकर आत्मा में जो संक्लेश भाव होते हैं वह संक्लेश कहलाता है । यह संक्लेश उपाधि पाकर हुआ है । यद्यपि यह आत्मा ही का परिणमन है किंतु औपाधिक है । विशुद्धिस्थान भी जीव के नहीं । पूजा करते हुए, धर्म करते हुए भी यह मेरा नहीं ऐसी प्रतीति करो । जिन्होंने यह सोचा मैंने कुछ नहीं किया उनके कषाय भाव रहता नहीं । जैसे संक्लेश और संक्लेशस्थान जीव के नहीं वैसे ही विशुद्धि परिणाम और विशुद्धिस्थान भी जीव के नहीं । सेवा भाव में चित्त लगने लगा, शुद्धभाव होने लगे यह भी जीव के नहीं । जैसे कोई चला जा रहा है और उसे सुगंध दुर्गंध का कोई ज्ञान नहीं होता, सुगंधि भी हो तो उसे परवाह नहीं और दुर्गंधि भी हो तो उसे परवाह नहीं तो वह वहाँ उसके ज्ञाता रहते। ज्ञानी जीव संक्लेश के भी ज्ञाता हो जाते हैं और विशुद्धि के भी ज्ञाता हो जाते हैं । मंदिर में आना, स्वाध्याय करना, पूजन करना, उपदेश सुनना आदि बातें खेत को जोतना हुआ और जिन्हें मध्य में बीज बोने का ध्यान नहीं तो वैसे सदैव जोतते रहने से कोई लाभ नहीं । कोई आदमी नाव चलाता होवे वह कभी इस तरफ ले जावे और कभी उस तरफ ले जाये, लेकिन किनारे पर लगना जिसका उद्देश्य ही नहीं वह क्या किनारे पर लगेगा? धर्म तो मेरा उतना है जितने समय आत्मस्वभाव पर दृष्टि है ।

194. जीवों की स्वार्थनिरतता―मनुष्य क्या, सभी जीव वस्तुत: स्वार्थी हैं, सभी अपनी-अपनी कषाय का पोषण करते हैं । कोई किसी से मित्रता रखता है, कोई किसी से शत्रुता रखता है, यह कषाय को बढ़ाने वाला कार्य हुआ । मैं और हम नाम की एक कथा है दो मित्र चले जा रहे थे । रास्ते में चलते-चलते मित्र को एक रुपये से भरी थैली मिल गई । तब वह कहता है मुझे तो एक थैली मिल गई । तब दूसरा मित्र कहता है ऐसा मत कहो । यह कहो “हमें थैली मिली” अर्थात् दोनों को एक थैली मिली । इतने में थैली वाले ने देख लिया और वह पकड़ा गया तो कहता है अब हम फंस गये । तब दूसरा बोला, यह न कहो कि हम फंस गये, पर यह कहो “मैं फंस गया ।” इसीलिए कहा है “खीर को सोज महेरी को न्यारे ।” अपना निज का कुछ उपकार करते नहीं । दूसरे का भी उपकार करते नहीं तथा गुणों को दोष बताने में बड़े पटु होते हैं, इसी से देश में भाररूप कहलाते हैं ।

195. संयमवृद्धिस्थानों से जीव की विविक्तता―जीव के संयमलब्धिस्थान भी व्यवहार से होते हैं, निश्चय से नहीं होते हैं । मुनि को कोल्हू में पेरा जा रहा है, वह ऐसा सोचता है कि हे आत्मन् ! तूने महाव्रत धारण किये हैं मुनि होकर समता धारण करना चाहिए, शत्रु को शत्रु मत मान, कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ता है । ऐसा सोचने वाला मुनि द्रव्यलिंगी है मिथ्यात्वी है, पर इस पर्याय बुद्धि के विपरीत सोचकर कि मैं अमूर्त चैतन्यमात्र हूँ, इस तरह सोचकर निर्विकल्प समाधि में लीन हो जाये तो वह अनुकूल कार्य करना है । चैतन्यमात्र आत्मा के भाव हैं, इसके अतिरिक्त आत्मा में कुछ विकार नहीं । मुनि होकर थोड़ी-थोड़ी बात पर क्रोध आता है, बाद में सोचता है मैं मुनि हूँ यह मुझे करने योग्य नहीं आदि विचारे तो समझना चाहिए उसकी दृष्टि केवल पर्याय पर है । मुख से बोलना अन्य बात है, प्रतीति में आना अन्य बात है, क्या मुनि यह नहीं कहेगा―मेरा कमंडल उठा लाना तथा शिष्यों को भी दंड देगा, उपदेश भी होगा किंतु उनमें ममत्व परिणाम नहीं करेगा । शुभ भावरूप आत्मा की प्रतीति नहीं करता अतएव जीव में संयम वृद्धि स्थान नहीं है ।

196. आगे पीछे के ध्यान का विवेक―बुंदेलखंड में कटेरा नाम का एक ग्राम है । वहाँ पर एक काफी धनवान सेठ रहता था । राजा भी उसका आदर करता था । इतना सब होने पर भी नमक, गुड़, तमाखू आदि पीठ पर लादकर दो घन्टा गाँवों में बेचने जाया करता था, जिसे बंजी कहते हैं । उससे किसी ने कहा―आप इतने अधिक धनवान होते हुए बजी क्यों करते हो? तब कहता है आज हम सेठ हैं कल न रहें तो हमें दु:खी तो नहीं होना पड़ेगा । जिनके विवेक नहीं ऐसे धनियों के पापोदय में बुरी हालत होती है । पहले शान में आकर सोने की परवाह नहीं की, सोने का गहना रखने भी नौकर जाये तथा सेठजी को तोलने की फिक्र नहीं, तथा जब दिवाला निकला, खपरे भी गिनकर अपने हाथ से दिये । खैर, ज्ञानी जीव सोचता है, इंद्रियों का व्यापार बंद करके शुद्धात्मानुभव को अपना विषय बनाऊं । ऐसा जीव सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्र वृत्ति को अपना नहीं मानता, वह परपदार्थों को अपना कैसे मानेगा? ज्ञानी चैतन्य मात्र अपनी प्रतीति करता है ।

197. स्वाध्याय से लाभ―स्वाध्याय करते रहना परमकर्तव्य है । दुकान से निवृत्त हुए स्वाध्याय में लग गये । व्यापारी कार्य करते हुए जब भी ग्राहकों से पीछा छूटा तब स्वाध्यान में रत हो गये । ऐसी आदत बनाइये । तमाम ही केवलज्ञान का कारण है । ज्ञान का यत्न अवश्य करो । एक सेठ और सेठानी थे । सेठानी प्रतिदिन शास्त्र सुनने जाया करती, पर सेठजी नहीं जाते । एक दिन सेठानी बोली―शास्त्र सुनने चला करो । सेठजी शास्त्र सुनने गये शास्त्रसभा खूब भरी थी अतएव सबसे पीछे जाकर बैठ गये । सेठजी को नींद आ गई, इतने में कुत्ता आया और टांग उठाकर मुँह पर पेशाब कर गया । मुंह खुला था । शास्त्रसभा समाप्त हुई तब सेठजी भी जल्दी उठे, उनका मुंह खारा हो रहा था । घर आकर सेठजी सेठानी से बोले―आज की शास्त्रसभा तो खारी लगी । सेठानी बोली, फिर से सुनने चलना । सेठानी जी ने एक गिलास में शक्कर का शर्बत तैयार कर लिया और साथ में लिये गई । सेठ जी शास्त्र सुनने गये, उन्हें फिर से नींद आ गई, तब सेठानी जी ने मुंह खुले में शर्बत के गिलास से कुछ शरबत डाल दिया । सेठ जी उठे जीभ फेरते हुए । सोचने लगे आज कहेंगे कि आज की शास्त्रसभा बड़ी मीठी लगी खुशी का पारावार न था । घर हर्ष से आकर उक्त समाचार कह दिया । अब तो रोज जाने की इच्छा हुई । एक दिन वर्णन निकला―देवताओं की छाया नहीं पड़ती । उसी दिन उनके घर चोर डाकू घुस गये । सेठजी की नींद खुल गई और सोचने लगे शास्त्र में तो सुना था देवी की छाया नहीं पड़ती, इनकी तो छाया है अतएव उन्हें भगा दिया । तो सोचा शास्त्र सुनने के प्रभाव से हमारी चोरी नहीं हो पाई । उसी तरह शास्त्र शुरू में कठिन लगता है, बाद में मीठा लगता है, तथा उसके रसिक जन कर्मरूपी चोरों को भी भगा देते हैं । यह है शास्त्र सुनने का, स्वाध्याय करके का निज पर प्रभाव ।

198. आत्मा की मौलिक विशुद्धता―आत्मा का जन्म नहीं हुआ है, क्योंकि वह अमूर्तिक है । किसी भी आत्मा का नाम नहीं है । कालाणु में भी आत्मा का कोई नहीं है । जाति मात्र की अपेक्षा ब्रह्म है या आत्मा है । निश्चय तप से, जाति में सभी एक समान आ जाते हैं । निश्चय से उसका कोई नाम नहीं । जन्म मरण जितने भी होते हैं वह सब कर्मकृत लीला है । प्रदेशों में परिणमना आदि आत्मा का स्वभाव नहीं, आत्मा का नाम नहीं, जिनका नाम नहीं उसमें किसका सहारा लेकर रागद्वेष किया जायेगा? जिसका नाम होगा उसमें इष्टानिष्ट की कल्पना हो जायेगी । बौद्ध नाम को कर्म का कारण मानते हैं । अगर उसका नाम कहो चैतन्य है, जीव है, आत्मा है तो उसका देखकर नाम बताया । प्राणों के द्वारा जीता है इसलिये इसका नाम रख लिया । जब नाम नहीं तब यह बताओ किसका आत्मा पुरुष है, किसकी आत्मा स्त्री है? आत्मा में न पुरुषपना है न स्त्रीपना है और न नपुँसकपना है । संस्कृत में अस्मद् शब्द है तथा युष्मद् शब्द है―इन दोनों के कोई लिंग नहीं । अस्मद् अर्थात् हम और युष्मद् अर्थात् तुम । अहम् मैं और त्वम् (तुम), यह मैं और तुम स्त्री व पुरुष अपने लिए व दूसरे के लिए समान तौर से प्रयोग करेंगे । हिंदी में पुरुष एवं स्त्री समान रूप से अपने लिए मैं तथा दूसरे को तुम कहेंगे तथा अंग्रेजी में भी ‘आई’ और ‘यू’ स्त्री एवं पुरुष दोनों में समान तौर से चलता है । लेकिन स्त्री अपने लिये यह नहीं कहती “मैं यहाँ आया”, वह सदैव ‘आई’ कहती है, तथा पुरुष भी यह नहीं कहेगा “मैं यहाँ आयी” वह अपने लिए ‘आ गया’ कहता है । देखो तो कैसा पर्यायगत संस्कार पड़ा । हिंदी में मैं के साथ क्रिया में फरक आ जाता है किंतु मैं या तुमसे लिंग नहीं । जब शब्द में लिंग नहीं तो आत्मा में न पुरुषत्व है, न स्त्रीत्व है, न नपुंसकत्व ही है, वह तो चैतन्यमात्र है । ऐसे निरपेक्ष स्वभाव वाले आत्मा का जो ज्ञान है वही नमस्कार करने योग्य है, वही दर्शन है, वही ज्ञान है और वही चारित्र है, आचार भी वही है । शुद्ध सामान्य चैतन्य की दृष्टि जो आत्मा का स्वभाव है वही शुद्ध है, उसमें क्रिया कारक का चिन्ह नहीं । वही एक परमज्ञान है । शुद्ध आत्मतत्त्व की दृष्टि हो गई वही चरित्र है ।

मनुष्य संयोग को तड़फते हैं, लेकिन दु:ख का कारण संयोग है । अपने आपको जानो, आत्मा में रति करो । भ्रम से रस्सी को सर्प मान लिया तो दु:खी हो जाते हैं । उसी तरह अज्ञानी जन परपदार्थों को अपना मान रहे हैं व दु:खी हो रहे हैं । आत्मा युक्तियों से नहीं जाना जा सकता है । अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख और अनंत वीर्य आत्मा में ही है, उन्हें खोजने के लिए यहाँ वहाँं भटकने की जरूरत नहीं । शुद्ध चैतन्यमात्र आत्मा का स्वभाव है ।

199. आत्मा तात्त्विक नमन―सबसे उत्तम नमस्कार है आत्मद्रव्य को नमस्कार करना । नमने का अर्थ है झुकना। भैया ! आत्मा की ओर झुको । आत्मा का जो स्वरूप है, उस पर दृष्टि जाने से राग नहीं उठता, क्योंकि रागद्वेषरहित उसका स्वरूप ही है । आत्मा में स्वरूप की दृष्टि से समता होती है । भगवान का आश्रय लेने से भी राग हो जाता है और पदार्थों की तो कथा छोड़ो । तो सबसे ऊँचा तत्त्व है आत्मा और वही आत्मा का स्वरूप है । अपने आपमें ठहरने का नाम स्वास्थ्य है । योग का अर्थ अपने आपमें जुड़ जाना, उपयोग का अपने आपमें लगा देना, चित्त का रुकना और समता एक ही बात है । शुद्धोपयोग का अर्थ राग द्वेष से रहित स्थिति है । शुद्ध चैतन्य निगाह में है तो वहाँ समता है । जहां राग द्वेष मोह न हो वहाँ धर्म है । परमात्मा पर एक दृष्टि है तो वहाँ राग उठेगा । पूर्ण निर्विकल्प ज्ञान हो गया तो वहाँ आत्म-साक्षात्कार हो गया । कमाई में कमी आवे तो आवे, पर समता न छोड़ो । समस्त शास्त्रों का सार समता है । समता से कर्म जल जाते हैं । साम्यं शरणं । क्रोधादि के विषय उपस्थित होने पर समता धारण करना, कोई किसी का हितैषी नहीं है । अकेले ही सुख है, दु:ख है । “त्यजेदेकं कुलस्यार्थं ग्रामस्यार्थं कुलं त्यजेत् । ग्रामं जन्मदेशार्थं, आत्मार्थं पृथ्वीं त्यजेत् ।। कुल की रक्षा के लिए एक को छोड़ने की जरूरत पड़े तो छोड़ देवे । यदि गांव की रक्षा होती हो एक कुल के छोड़ने से तो उसे छोड़ देवे । यदि एक गांव के छोड़ने से देश की रक्षा होती हो तो उसे छोड़ देवे । और अपने आत्मरक्षा कल्याण के लिये पृथ्वी को भी छोड़ देना चाहिए । जिनको यह आत्मतत्त्व प्यारा है या ज्ञात रहता है उन्हें मृत्यु अमृत के समान रहती है । जिन्हें परपदार्थ में आत्मबुद्धि है उन्हें ही संताप होगा । सारी महिमा जो है वह आत्मस्वभाव की है । आत्मा जिस ओर निगाह देती है उसी तरह की सृष्टि बनेगी । निर्मलता पर ध्यान देता है तो शुद्ध स्वरूप बनेगा ।

200. सत्य ज्ञान की महिमा―एक बुढ़िया थी । उसके दो लड़के थे । उन दोनों में एक को कम दिखता था तथा दूसरे को पीला-पीला दिखता था । दोनों को सफेद मोती भस्म गाय के दूध में चाँदी के गिलास में देना वैद्य जी ने बताया । जब यह दवा दी, तो कम दिखने वाले ने तो पी ली, उसका रोग अच्छा हो गया । दूसरे को दी तो कहे यह गाय का पीला मूत्र है, यह हड़ताल है । यह कहकर दवा नहीं पी, इससे उसका पीलापन का रोग नहीं गया । चाहे ज्ञाता हो, होना चाहिए यथार्थ । सत्यज्ञान की बड़ी महिमा है । क्रोधादि अचेतन भाव हैं, उनमें आत्मबुद्धि क्या करना, ज्ञान और दर्शन चैतन्य गुण युक्त हैं बाकी गुण तो चेतन का काम नहीं करते । अभेद की दृष्टि से आत्मा चैतन्य है । मेरे लिए दूसरे का ज्ञान दर्शन अचेतन है । चेतन अचेतन का ज्ञान होना विवेक है । मेरा चेतन तो चैतन्य है और चैतन्य की दृष्टि जहां है वह ज्ञान भी निश्चय से चेतन है ।

201. समयसारसर्जन की झांकी―इस ग्रंथ का नाम समयसार है । समय माने आत्मा उसका जो सार वह समयसार है । सारतत्त्व त्रिकालवर्ती चैतन्यस्वरूप है । कुछ काल रहे, कुछ काल न रहे उसे सार नहीं कहते । परिणाम अनादि अनंत नहीं हैं, ये घटते बढ़ते हैं । चैतन्य स्वभाव न घटता है और न बढ़ता है । ऐसे शुद्धतत्त्व का वर्णन करने वाले भगवान कुंदकुंदाचार्य हैं । ये दक्षिण देश के रहने वाले थे । इनका बड़ा माहात्म्य था । ये जब पालने में झूलते थे उस समय इनकी मां झुलाते समय गीत गाती थी । शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि, संसारमायापरिवर्जितोऽसि । संसारस्वप्नै त्यज मोहनिद्रां श्री कुंदकुंदजननीदमूचे । श्री कुंदकुंद की मां कहती है कि हे कुंदकुंद ! तू शुद्ध है, बुद्ध है, निरंजन है, संसार की माया से रहित है । संसार का स्वप्न व इस मोह नींद को छोड़ । केवल शुद्ध चैतन्यतत्त्व की दृष्टि में कोई क्लेश नहीं । शुद्ध चैतन्य तो मात्र नित्य ज्योति है ।


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