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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 100

From जैनकोष



अयत्नसाध्यं निर्वाणं चितत्त्वं भूतजं यदि ।

अन्यथायोगतस्तस्मान्न दुःख योगिनां क्वचित् ॥100॥

चेतना को भूतज मानने पर निर्वाण की अयत्नसाध्यता व व्यर्थता का प्रसंग – कोई पुरुष इस आत्मा को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु इन चार तत्त्वोंरूप मानते हैं, आत्मा इनसे पृथक कुछ नहीं है । जब तक इन चार तत्त्वों का विधिवत् मेल रहता है तब तक यह जानना समझना बना रहता है और जब ये चारों तत्त्व बिखर जाते हैं, परस्पर का संबंध तोड़ देते हैं तो जानना समझना नहीं रहता है, यह सब चारों तत्त्वों की बात है आत्मा अलग से कुछ नहीं है, ऐसा एक सिद्धांत है । उसके मत में तो निर्वाण बड़ा सरल है, मर गए और मोक्ष हो गया क्योंकि भूतचतुष्टयरूप का शरीर है, बिखर गया निर्वाण हो गया । कुछ यत्न ही नहीं करना पड़ा । क्या ऐसा निर्वाण है ? कुछ लोग इस आत्मा को सदा मुक्त मानते हैं । जो आत्मा है वह तो ज्यों का त्यों ही है किंतु प्रकृति और पुरुष का संबंध होने से एक केवल भ्रम ही रह गया है । आत्मा तो मुक्त ही है, शुद्ध ही है ऐसा भी एक सिद्धांत है । तो जो मुक्त है स्वयं ही उसको मुक्त करने की कोशिश करना व्यर्थ है, छूटा ही है वह, फिर मुक्ति का उद्यम क्यों किया जाता है ।निर्वाण की यत्नसाध्यता – स्याद्वादसिद्धांत के अनुसार यह आत्मा स्वरूप से तो स्वभावत: एक स्वरूप है, सदामुक्त है, किंतु उसकी जो वृत्ति बन रही है वह वृत्ति संसारी है, वहाँ मुक्ति नहीं है । जैसा परिणाम है वैसा ही भोग भोगना पड़ता है । यह संसार-वृत्ति न हो तो मुक्त होने का उद्यम क्यों किया जाय ? तथा स्वभाव यदि मुक्त का नहीं है तो मुक्त हो ही नहीं सकेगा, फिर तो मुक्त होने का उपाय भी बिल्कुल व्यर्थ हो जायगा । आत्मतत्त्व यद्यपि एक चैतन्यस्वरूप नित्य पदार्थ है, परंतु अनादि काल से कर्म-पुद्गल के संबंध से विभावरूप परिणमता चला आ रहा है । इसका स्वभाव तो सदा ज्ञानप्रकाशमय रहने का है, परंतु वृत्ति में रागद्वेष, मोह भी चल रहे हैं तो यह सब कर्म-उपाधिक संबंध का प्रताप है जिसके कारण यह जीव अपने स्वरूप में स्थिर नहीं हो पाता है । वृत्ति संसारी है परंतु स्वभाव सबसे विविक्त केवल रहने का है इसी कारण ध्यान आदिक के प्रयत्न किए जाने से ये विभाव परिणतियाँ दूर हो जाती हैं और स्वभाव विकासपूर्ण प्रकट हो जाता है । जहाँ दोष एक भी न रहे, गुणों का पूरा विकास हो उसे निर्वाण कहते हैं । निर्वाण में जो आनंद है उस आनंद को विषय का मोही जीव रंच भी नहीं पहिचान सकते ।

यथार्थ ज्ञान से ही पथलाभ – भैया ! यह संसार विकट जाल है । यहाँ मोही जीवों का ही समागम बना हुआ है । एक दूसरे की वृत्ति देखकर ललचाया करते हैं, मैं भी ऐसा क्यों न हो गया । अपने स्वरूप को भूल जाते हैं, दुःखी रहते हैं । इसके अलावा सबसे विकट समस्या यह है कि गल्ती भी करते जाते और चतुराई भी मानते जाते ये प्राणी, सो बतावो ये गल्ती कैसे मिट सकती है । गल्ती को गल्ती समझें तो मिट सकती है । यह मोही जीव विषय-वासना में रत हुआ नाना विरुद्ध परिणतियाँ करता है और उनमें ही यह मानता है कि मैं बड़ा होशियार हूँ । दखो, मैंने दूसरों को कैसा धोखा दिया और अपना काम बना लिया । कर रहा है यह गल्ती; स्वभाव से विमुख हो गया है, शांति का पात्र नहीं रहा है; व्यर्थ की कल्पनाएँ बना रहा है तिसपर अपने को चतुर समझता है । जब तक स्याद्वाद का आश्रय न करें, तब तक वस्तुस्वरूप को सही नहीं जान सकते हैं । जब वस्तुस्वरूप का यथार्थ परिज्ञान ही नहीं है तो परम कल्याण कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?लोकायतिकता से सिद्धि का अलाभ – अहो ! जो चीज आँखों दिखती है उस पर लोगों को बड़ा विश्वास है । यह ज्ञानमय आत्मतत्त्व तो आँखों नहीं दिखता, इस कारण उसकी ओर विश्वास नहीं होता, परंतु है कितनी मोटी समझ की बात । अरे ! जो जान रहा है वह कुछ नहीं है क्या ? लेकिन विषय-व्यामोह में जो दृश्यमान है, वही सब कुछ लगता है इस दिखती हुई दुनिया को ही जो सब कुछ मानता है उसे चार्वाक कहा गया है । चार्वाक का यह भी अर्थ हो सकता है कि जो चारु वाक सुने, बोलाकरे, जो बात लौकिक जनों को बड़ी भली लगे ऐसे चातुर्य की सुंदर बात बोले उसे चार्वाक कहते हैं । जगत के जीवों को सुंदर बात रागभरी बात ही लगती है । रागभरी बात, इस दृश्यमान जगत को ही जो लक्ष्य में रखते हैं, उनके ही लगती है । यह दृश्यमान ही सब कुछ होता और आत्मतत्त्व कुछ नहीं होता, तो दृश्यमान तो नष्ट होता ही है । शरीर नष्ट होता हुआ मरण हुआ तो वही निर्वाण बन गया, सो यों तो सब का निर्वाण होता है और ऐसे निर्वाण को कौन चाहेगा कौन ऐसा बुद्धिमान है जो स्वयं ही अपने नाश का प्रयत्न करे ? मरण में नाश ही तो हो गया ।

आत्मा को सर्वथा निर्लेप मानने में भी मुक्ति का अनवकाश – एक ओर तो चार्वाक के सिद्धांत को मानने वाले जो शरीर से न्यारा अपने आपका सत्त्व ही नहीं समझते हैं, दृश्यमान को ही सर्वस्व समझते हैं और दूसरी ओर वे जो इसके मुकाबले कोई अपने को बड़ा विवेकी कहलाने के लिये तत्त्वज्ञान का ऐसा बढ़ावा दें जो सीमा तोड़ बन बैठे याने आत्मा को शुद्ध बुद्ध सदामुक्त माना करे, दोनों के ही निर्वाण नहीं है । जब यह शुद्ध बुद्ध ही हो गया तो फिर ध्यान आदिक करने के लिए क्यों उद्यम किया जाय, फिर तो मुक्ति का कोई विधान ही न होना चाहिये । जो अचेतन है उसको मुक्ति दिलाने से लाभ क्या, और जो चेतन है वह तो पहिले से ही मुक्त है, फिर मोक्षमार्ग तो कुछ भी न रहा । इन दोनों बातों का निवारण स्याद्वादसिद्धांत में मिलता है । आत्मा मुक्त होने का स्वभाव रखता है और उपाधि के संबंध में संसारी वृत्ति में लग रहा है । यह आत्मा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र के बल से, शुक्लध्यान के प्रताप से विभाव परिणतियों को त्यागकर स्वसंवेदन के योगाभ्यास से शुद्धस्वरूप में स्थिर हो सकता है, इस ही का नाम है निर्वाण ।आश्रेय तत्त्व की मार्गणा – भैया ! निर्णय करलो कि अपना चित्त कहाँ लगायें कि कुछ धोखा न रहे और वास्तविक आनंद प्राप्त कर लें । इस जगत में खोजो किस जगह अपना चित्त लगायें, कुटुंब में चित्त लगायें तो प्रथम तो यह कुटुंब भिन्न है । उनके परिणमन से मेरा कुछ नहीं होता, मेरे परिणमन से उनका कुछ नहीं होता । मैं सुखी-दुःखी अकेला ही होता हूँ । शुद्ध, अशुद्ध जो कुछ हुआ करूँ वह अकेला ही होऊँगा । किन में चित्त लगायें, अचेतन जड़ परिग्रहों में चित्त लगाने से लाभ क्या है ? वे तो जड़ हैं, भिन्न हैं, मुझे कुछ प्राप्त नहीं होता किसी भी अन्य पदार्थ में चित्त लगाने से । खूब खोजते जावो । कम से कम इतनी समझ बन जाय कि दुनिया में कोई भी पदार्थ में अपना चित्त न लगायें तो सहज ही वह ज्ञानज्योति प्रकट हो जाती है जिसमें चित्त लगाने से संसार के संकट टल जाया करते हैं ।अंतर्दर्शन में स्वाभाविक आनंद का लाभ – योगी पुरुष का चित्त इस आनंदमय आत्मस्वरूप में रहता है इसी कारण उनके ध्यान, साधना के काल में किसी तिर्यंच, मनुष्य इत्यादि के द्वारा उपसर्ग हो तो भी कहीं भी उन्हें रंच दुःख नहीं होता है क्योंकि आनंदमय आत्मस्वरूप को तो ग्रहण कर लिया ना । इस लोक में हम आप का कहीं कोई शरण नहीं है । एक आनंदस्वरूप निज आत्मतत्त्व का आलंबन ही वास्तविक शरण है । जितना उद्यम, श्रम बाह्य दृष्टि बनाकर किया करते हैं उसका हजारवाँ भाग भी ध्यान, श्रम अपने आत्मस्वभाव की ओर लगायें तो यह कल्याणमय आत्मा अपने आप पर प्रसन्न हो जायगा, फिर कोई संकट नहीं रह सकता । संकट शरीर की परिस्थिति में नहीं हैं किंतु अपने अंतर के उपयोग की बर्हिदशा में हैं, हम कैसा उपयोग करें कि दुःखी हो जायें, कैसा उपयोग करें कि सुखी हो जायें । जिनका चित्त बाह्य संपदाओं में भटका हुआ है उन्हें शांति से भेंट नहीं हो सकती । जिनका चित्त परतत्त्व की दीवालों को पार करके शुद्ध सहज आनंदस्वरूप में लगता है उनके आनंद सहज ही प्रकट होता है । ऐसे योगी पुरुषों को ध्यानसाधना के काल में भी चूँकि वे अपने सत्य का उद्देश्य लिये हुये हैं अत: किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता ।ज्ञानियों का स्वाधीन आनंद – अज्ञानी जीव तो गद्दा तक्कों पर पड़ा हुआ भी दुःखी हो रहा है और ज्ञानी पुरुष घोर जंगल में कैसी ही सर्दी गर्मी में बसा हुआ भी सुखी रहता है, क्योंकि सुख और दुःख का आधार ज्ञानी की कला है, बाहरी पदार्थों की परिस्थितियाँ नहीं हैं । किसी मनुष्य के घर में लाखों का धन गड़ा हो और उसे पता नहीं है तो उस धन के निकट बस कर भी वह गरीबी का अनुभव करता है, वैसा ही दुःखी होता रहता है । जब उपयोग में ही अपनी निधि नहीं है, तब यह दीन ही तो है, ऐसे ही आनंदस्वरूप ज्ञानप्रकाशमात्र अपना आत्मा जिसके अनुभव में नहीं है वह बाहरी ही बाहरी पदार्थों से भीख मांगकर, आशा लगाकर अशांति ही प्राप्त करता है । शांति वहाँ नहीं हो सकती है ।विवेकियों का अंतर्निर्णय – यह संसार अज्ञान का घर है, इसमें दूसरों का वोट ले करके न्याय नहीं बन सकता है । किसमें सुख है वोट ले लो सबका । उल्टी राय ही प्राय: सबकी मिलेगी; सही बहुमत नहीं मिल सकता । करोड़ों अज्ञानियों की संगति की अपेक्षा एक ज्ञानी की संगति लाभदायक है । अज्ञानी पुरुषों के मतों से अपने कल्याण का निर्णय नहीं हो सकता । ये सब स्वप्न की दशाएँ हैं । मोह की नींद में जो यहाँ सब कुछ निरखा जा रहा हो कि यह मैं हूँ । शरीर को ही लक्ष्य में लेकर इस अज्ञानी ने मैं की व्यवस्था बना ली है और दूसरे जीवों में भी शरीर को लक्ष्य में लेकर मैं की व्यवस्था बनायी है, सर्वत्र किसी न किसी पर की व्यवस्था बनायी है । जिसे सुखी होना है उसका पता ही नहीं है तो सुखी किसे करोगे, जिसे भीख देना है वही नहीं दिख रहा है तो भीख किसे दोगे । जिसे सुखी करना है उसका तो सही पता हो । व्यामोही पुरुषों को न तो उसका ही पता है जिसको आनंद देना है और न आनंद का । यों भ्रमवश किसी को मान लें, वह तो उनकी कल्पना है । न तो उन्हें प्रयोजक का पता है और न प्रयोजन का पता है कि हमें कैसा आनंद चाहिये । जब तक आत्मा का और आनंद के स्वरूप का यथार्थ निर्णय न हो तब तक इसको आनंद प्राप्त हो ही नहीं सकता है ।ज्ञातृता में पारमार्थी की प्रसन्नता – ज्ञानी जीव सदा प्रसन्न रहता है । इसका कारण यह है कि वह सबका मात्र ज्ञाता-दृष्टा रहता है, जो केवल जानन-देखनहार रहे उसे आपत्ति नहीं है । यह संसार अजायब घर है । अजायब घर में अजायब ही चीजें हुआ करती हैं । वहाँ जो दर्शक जायें उन्हें केवल देखने का अधिकार है, छूने का अधिकार नहीं है । कोई छुये तो उसे दंड भोगना पड़ता है । ऐसे ही इस लोक में यह सब दृश्यमान अजायब घर है । कुटुंब परिवार धन वैभव ये सब अजायब घर की वस्तुएँ हैं । उन्हें केवल जानते-देखते रहा तो कोई आपत्ति नहीं है, किंतु जब जानन-देखनहार न रहकर उनमें राग और द्वेष करते हैं, उन बाह्य पदार्थों को छूते हैं तो छूने वालों को दंड मिलता है, भव-भव में भटकना पड़ता है, आकुलित होना पड़ता है । इस आकुलता को दूर करना है तो ममता छोड़ो, अपने आपके सहजस्वरूप में आओ तो इस शुद्ध प्रयत्न से ही सब संकट दूर हो सकते हैं । यों स्याद्वाद से आत्मतत्त्व की व्यवस्था करें और बाह्य से हटकर अंत:स्वरूप में लगें, यही विधि ही संसार के संकटों से बचाने में कारण है । सदा शुद्ध अनादि अनंत इस ज्ञायकस्वरूप की भावना रखना चाहिए, कि मैं तो यह ज्ञानस्वरूप हूँ, सर्व परभावों से न्यारा हूँ ।


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