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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 101

From जैनकोष



स्वप्ने दृष्टे विनष्टेऽपि न नाशोऽस्ति यथात्मन: ।तथा जागरदृष्टेऽपि विपर्यासाविशेषत: ॥101॥

आत्मा की अविनाशता का कथन – पूर्व श्लोक में दो पक्ष रखकर यह कहा गया था कि यदि कोई आत्मा का जुदा अस्तित्व नहीं मानता है, केवल इस भौतिक शरीर को ही सब कुछ जानन देखनहार मानता है उसके भी निर्वाण नहीं है, क्योंकि शरीर तो नष्ट हो जायगा । क्या शरीर के ही नाश का नाम निर्वाण है ? मरण का ही नाम निर्वाण है क्या ? दूसरे पक्ष में कोई यह मानते हैं कि आत्मा तो अपरिणामी है, व्यापक है, सदामुक्त है । उस सिद्धांत में फिर मोक्षमार्ग के विधान की आवश्यकता क्या है ? इन दोनों पक्षों को रखकर स्याद्वाद सिद्धांत से नित्यानित्यात्मक, स्वतंत्र सत्तावान, आत्मतत्त्व को सिद्ध किया था । उस बात को सुनकर लोग शीघ्रता में यह सोच सकते हैं, जैसे कि आम लोगों के ख्याल भी हो जाता है कि, आत्मा कहाँ रहता है आगे, मर गये, शरीर जला दिया, फिर रहा क्या ? उसके समाधान में यह श्लोक कहा जा रहा है ।मोह में आत्मानाश का भ्रम – देखो भैया ! जब नींद में कोई स्वप्न आ जाता है और मान लो ऐसा ही स्वप्न आ जाय कि हम बड़े कठिन बीमार हैं, वैद्य नाड़ी देख रहा है, नाड़ी खतम हो गयी है, हम मर गए हैं ऐसा स्वप्न दिख सकता है कि नहीं ? जंगल में कहीं भटक गए, कोई सिंह आ गया, मेरे शरीर का विदारण कर दिया, हम मर गए, ऐसा भी स्वप्न में देखा जाता है ना, तो ऐसा देखे जाने पर भी क्या वह मर गया ? नींद खुलती है तो देखता है अरे ! मैं कहाँ मरा ! मैं तो आराम से कमरे में पड़ा हूँ । तो जैसे स्वप्न में अपने मरने का दृश्य दिख जाय तो वह भ्रमरूप है, सही बात नहीं है, वह तो अभी जिंदा है, नींद खुलने पर तो अपने को वह जिंदा पाता है । मैं कहाँ मरा, केवल एक स्वप्न में ही मर गया था । तो जैसे एक स्वप्न में दुःखी होना, मरना भ्रम ही है, वास्तव में नहीं है, वह तो सुरक्षित है ऐसे ही इस जगते हुए में याने इन आँखों से जो देखा जाता है कि यह मर गया, अब कुछ नहीं रहा, यों यह जीव का मरण देखना यह भी भ्रम है । आँख के जगते व सोते के दोनों ही दृश्यों के भ्रम समान हैं । आँख की नींद में मरना दिख गया तो जैसे वह भ्रम ही है ऐसे ही मोह की नींद में अपने आपके स्वरूप का परिचय न होने से जो यहाँ मरना देखा जाता है वह भी भ्रम है ।मोहनिद्रा के भंग होने पर भ्रम का परिहार – भैया ! और भी देखिये, जिस समय स्वप्न में मरण देखा जा रहा है, उस समय क्या ऐसा भी लगता है कि यह भ्रम ही है, हम मर नहीं गये ! स्वप्न में तो जो देखा जाता है वह बिल्कुल सच्ची घटना लगती है । यह भ्रम था इसका ज्ञान तो जग जाने पर होता है । जब नींद खुल गई तब ख्याल होता है ओह ! मैं स्वप्न में देख रहा था, जो भी स्वप्न में देख रहा था वह भ्रमरूप था, मैं तो जिंदा हूँ, कहाँ मरा ! ऐसे ही जब तक अज्ञान है, निज स्वतंत्र सत्ता का परिचय नहीं हैं तब तक यह जीवन और मरण देखना यह भी सच लगता है । यह जिंदा तो हुआ है, यह मर तो गया है, कैसे इसे झूठ मान लें । अब कुछ नहीं रहा, कहाँ है आत्मा आज निकल गया । मोह की निद्रा में ये सब पर्यायबुद्धि की बातें सही लगती हैं, भ्रम नहीं लगती हैं । ये सब बातें भ्रमरूप तो तब विदित होती हैं जब यह जग जाय अर्थात् मोहनिद्रा भंग होती है, वस्तु के यथार्थ स्वरूप का परिचय होता है तब विदित होता है ओह ! यह सब मैं भ्रम ही कर रहा था । मैं तो अनादि अनंत अहेतुक चैतन्यस्वरूप हूँ ।सर्व पदार्थों की शाश्वतता – जगत में जितने भी पदार्थ हैं वे समस्त पदार्थ शाश्वत हैं । न कोई पदार्थ नया बनता है और न कोई पदार्थ अपना सत्त्व छोड़ता है । जितने जीव हैं उतने ही हैं । हैं अक्षयानंत । जितने पुद्गल अणु हैं वे उतने ही हैं । वे भी अक्षयानंत हैं । धर्म, अधर्म, आकाश एक ही एक हैं और कालद्रव्य असंख्यात हैं । जितने भी पदार्थ हैं उनमें से न एक कम होता है, न एक कभी ज्यादा हो सकता है, कोई पदार्थ ज्यादा कैसे हो सकेगा ? कुछ भी नहीं है और कुछ भी हो जाय, यह कैसे संभव है । कुछ भी हो कोई तो उसका उपादान होगा ही जिसमें कि कुछ हुआ है । नया कुछ हुआ अर्थात् असत् सत् नहीं बन सकता, और जो कुछ है उसका विनाश कैसे होगा ? जो सत् है वह कुछ भी न रहे ऐसा कैसे किया जा सकता है । कोर्इ लकड़ी का ठूँठ वजनदार है, मानो दो मन का है, उसे जला दिया जाय तो जल जाने पर कहो कि दो ही किलो का वजन रह जाय । कुछ धुवाँ में उड़ गया, कुछ भष्म भी बह गयी और कभी कुछ भी न रहे, सब उड़कर बिखर जाय, कुछ पता ही न चले, ऐसी स्थिति में भी उस ठूंठ में जितने परमाणु थे उनमें से एक भी कम नहीं हुए । भले ही वे बिखर जायें धुवाँरूप में, भष्मरूप में, कैसी ही हालत में हो जाएँ पर उनमें कमी नहीं आ सकती ।सत् के विनाश और असत् के उत्पाद की असंभवता – भैया ! सोचो तो सही, सत् कैसे असत् बन जायगा और असत् कैसे सत् बन जायगा ? यदि कोई असत् भी सत् बन जाय याने जो कुछ भी न हो उपादान में भी, वह भी कुछ बन जाय तो अगर यहाँ दस-बीस शेर, चीता, हाथी आ पड़ें तो उन्हें कौन रोक सकता है ? क्योंकि न कुछ से कुछ होने लगा, सदा शंका रहेगी । कोई ऊपर की छत पर आकाश से वजनदार हाथी टपक जाय तो क्या हाल हो ? तो ऐसा नहीं होता, असत् कभी सत् नहीं होता और सत् कभी असत् नहीं होता है । अपने आपके आत्मा के संबंध में भी सोचो कि यह मैं कुछ हूँ या नहीं । यदि मैं कुछ न होऊँ तो यह तो बहुत ही बड़ी अच्छी बात है । मैं कुछ भी न होऊँ, असत् रहा तो फिर क्लेश कहाँ पैदा होगे ? यह तो संंकटों को मिटाने की बड़ी बढ़िया बात सुनाई कि मैं कुछ हूँ ही नहीं । यह बोलता तो है ना, कि हम हैं । जिसमें अहं प्रत्यय हो रहा है, ‘मैं हूँ’ ऐसी जिसमें समझ हो रही है वह कोई एक स्वतंत्र सत् है । शरीर में समझ नहीं होती । मैं नहीं हूँ ऐसा तो है ही नहीं । मैं जड़ हो जाऊँ ऐसा भी नहीं है । चैतन्यस्वभावी तत्त्व कभी जड़ नहीं हो सकता और जड़स्वभावी तत्त्व कभी चेतन नहीं हो सकता । कल्पना कुछ ही कर लो ।

कल्पना से वस्तुस्वरूप परिवर्तन का अभाव – एक कुछ पुरानी बात है, हमारी 6॥ वर्ष की उमर होगी, तब की बात है – जिस पाठशाला में गाँव में मैं पढ़ता था वहाँ एक दिन दो लड़के बहुत बुरी तरह से पिटे । मास्टर ने पीटा, तो देखकर फिर हम दूसरे दिन पाठशाला न गये । एक को पिटते देखकर भय हो ही जाता है हालांकि गल्ती निकले तभी तो पिटे, पर उस दिन डर के मारे हम पाठशाला न गये । तो मास्टर ने चार बच्चों को भेजा कि उसे लिवा लाओ । अब सुबह का टाइम था, पराठा और मठा मैं खा रहा था, लड़कों ने माँ से शिकायत की । माँ ने कहा जावो जल्दी पाठशाला ! तो हमने कहा कि आज तो हम नहीं जायेंगे । माँ ने एक दो थप्पड़ लगाये । मैं रोता जाता और सोचता जाता कि यदि मैं यह काठ का खंभा होता (जिसमें मक्खन बिलोया जा है) तो मैं न पिटता । काठ के खंभे को कोई कहाँ पीटता है ? तो वह तो एक कल्पना थी । न कोई जड़ कभी चेतन होता और न चेतन कभी जड़ होता । कैसे हो, चैतन्यस्वभावी तत्त्व कभी जड़ नहीं हो सकते और जड़स्वभावी तत्त्व कभी चेतन नहीं हो सकते । कल्पना में कुछ भी ले आयें । फिर भी जो लोग यों सोचते हैं कि यह मर गया, कुछ नहीं रहा, खतम हो गया, वह भ्रम है ।प्रेम की समस्या – सच तो बात यह है कि परिवार के लोग, मित्रजन किनसे प्रेम करते हैं ? किसी से भी नहीं ! वे केवल अपने कषाय से प्रेम करते हैं । सब अपनी-अपनी बात सोच लो । क्या कोई कुटुंबी मुझसे प्रेम रखता है ? अपने आपमें सोचिये ! यह ‘मैं’ दो प्रकार से कहा जा सकता है – एक तो शरीररूप जिसे दुनिया समझती है और एक चैतन्यस्वरूप, जिसे ज्ञानी ही समझता है । ये कुटुंब के लोग इस शरीर से प्रेम करते हैं या उस आत्मा से प्रेम करते हैं ? पहिले विश्लेषण करके इसका निर्णय बताओ ! कुटुंबी जन यदि शरीर से प्रेम करते हैं तो मरने पर क्यों सोचते हैं कि इसे तुरंत जलावो, देर हो रही है, घर खराब हो जायगा, यह देर तक रहेगा तो न जाने कैसा विष घर में फैल जायगा । क्यों ऐसा सोचते हैं ? अरे कुटुंबी जनो ! इस शरीर से तुम बड़ा प्रेम करते थे, यह शरीर तो पड़ा तो है, क्यों नहीं प्रेम करते ? कुटुंबी लोग शरीर से प्रेम नहीं करते, तो क्या आत्मा से प्रेम करते हैं ? वे आत्मा से भी प्रेम नहीं करते ! आत्मस्वरूप की ओर तो उनका लक्ष्य ही नहीं है, इस मुक्त आत्मा से वे क्या प्रेम करेंगे ? तो न उन्होंने शरीर से प्रीति की और न आत्मा से प्रीति की । जिसको आत्मा लक्ष्य में आ जायेगा वह एक ही आत्मा से क्यों प्रेम करेगा ? वह तो सभी आत्माओं से प्रेम करेगा !

प्रीति की अतथ्यता – देखो भैया ! परिजनों ने आत्मा से प्रीति करनी सोची होती तो जिसमें आत्महित होता हो वह ही क्यों न करते । कभी किसी बालक का कुछ ज्ञान की ओर चित्त जाय, वैराग्य की ओर चित्त जाये तो उससे उस आत्मा का भला होगा ना, किंतु नहीं ऐसा होने देते । ऐसे उपाय रचते हैं कि वह शादी करले, घर में फँसे, ज्ञान न सीखें । अरे ! यह लड़का महाराज के पास ज्यादा न बैठे, साधु-संगति में अधिक न रहे, कहीं ऐसा न हो कि चित्त में आ जाय और घर छोड़ दे तो मेरा घर ही मिट जाय । क्या कोई पिता अपने पुत्र के प्रति ऐसा भी कुछ प्रोग्राम सोचता है कि इसे धर्म विद्या पढ़ाओ । यह आत्मा के स्वरूप को ठीक पहिचान जाय, आत्मदृष्टि कर ले । इस जीव का कहीं कुछ है ही नहीं, फिर क्यों इसकी बर्हिमुखी दृष्टि बनी । यह संसार में न रुले, मोक्षमार्ग प्राप्त कर ले । इसका विवाह न करेंगे । इसे खूब ज्ञान और वैराग्य में लगायेंगे ऐसा किसी बाप ने पुत्र के प्रति चिंतन किया है क्या ? चाहे न कर पाये, बहुत सी बातें सोचता है पिता और उन्हें नहीं कर पाता, पर सोचता तो है । कोई भी न किसी के आत्मा से प्रेम करते हैं और न शरीर से । सच तो यह है कि वे अपने आपमें उठी हुई कषाय से प्रेम करते हैं उसे शाँत करने का उद्यम करते हैं पर इस तथ्य को नहीं जानते तो किसी पर तो बात फेंकी जायगी ? किस पर बात फेंकी जाय । जो उस कषाय वेदना के शांत होने के विषयभूत पड़े उस पर आक्षेप किया जायगा ।व्यवहार की मायारूपता – यह सब व्यवहार मायारूप है । यों समझ लीजिये कि जैसे स्वप्न में दिखे हुए दृश्यों में सार नहीं है, केवल कल्पना-जाल है ऐसे ही खूब खुली आँखों में, चतुराई भरे मन में भी जो व्यवहार किया जाता है वह सब थोथा है, असार है, भ्रमरूप है । अज्ञानी करे क्या, स्वप्न में भी तो यह बुद्धि नहीं बन पाती कि जो स्वप्न मैं देख रहा हूँ वह सब भ्रम है तो यह ख्याल भी भ्रमरूप ही है । वह है 10, 20 मिनट का दृश्य और यह 10, 20, 50 वर्ष का दृश्य सब दृश्यमान पदार्थ मायारूप हैं । प्रत्येक पदार्थ अविनाशी है, ध्रुव है । पदार्थों की पर्याय पलटती रहती है किंतु पदार्थ का विनाश नहीं होता । यह जीव आज मनुष्य भव में है, कल अन्य भव में है पहिले अन्य भव में था, यों पर्याय अनादि से पलटती चली आयी है पर यह जीव नहीं पल्टा अर्थात् यह चेतन से अचेतन नहीं होता और न इसका अभाव होता । ये दोनों ही भ्रमरूप हैं, और इस जीवन में जो दुकान हैं, काम है, परिजन है, जिनको खूब सम्हाल रहे हैं, धन का संचय कर लेने पर अपने में बड़प्पन अनुभव कर रहे हैं, ये सब स्वप्न की तरह भ्रमरूप है । जब यह जीव जग जायगा अर्थात् अपने सहज स्वरूप का परिचय कर लेगा तब पता पड़ेगा कि ओह ! मैंने सारा भ्रम ही किया था ।निज सहज स्वरूप की दृष्टि में आत्मलाभ – जब तक मोह-निद्रा भंग नहीं होती, परमार्थभूत आत्मतत्त्व का परिचय नहीं होता तब तक ही यह सब सही दिखता है, बात-बात में लड़ाई, अन्याय, पक्षपात, मायाचार ये सब किस कारण हो रहे हैं ? अज्ञान के कारण । ज्ञानी पुरुष तो सर्वत्र यों देख रहा है कि जो होना है हो रहा है । कहीं भी कोई कुछ होता हो उसके कुछ होने से मेरे में कुछ सुधार-बिगाड़ है क्या ? यह तो आत्मा केवल ज्ञानानंदस्वरूप मात्र है । जितना है उतना ही यह शरीर छोड़कर चला जायगा और जब इस शरीर के अंदर है तब भी यह आत्मा केवल अपने स्वरूप मात्र है, परमाणु मात्र भी मेरा यहाँ कुछ नहीं है किंतु यह बहुत बड़ा संकट है जीव पर जो यह ऐसी श्रद्धा बनाए है कि मेरा यह घर है, मेरा यह परिवार है । यह अज्ञान की बात बड़ी सस्ती लग रही है किंतु यह बहुत महँगी पड़ेगी । यह समझ रहा है चातुर्य, पर कट रही है इसकी जड़, इसके स्वरूप पर हो रहा है कुठाराघात । कोई चीज सस्ती ले आयें तो वह खोटी बनेगी, सभी तो चतुर हैं । इस अज्ञानी जीव को ये भोग भोगने में बड़े आसान लग रहे हैं, उदय है ना, घर हमारा है, स्त्री हमारी है, बच्चे हमारे हैं, यों बड़े सरल सस्ते लग रहे हैं । मनचाहे कर्म करने में, मनमाने भोग भोगने में, जिस पर चाहे हुकूमत करने में इसको बहुत मौज आ रहा है, सब करनी इसे सस्ती लग रही है, किंतु क्या हो रहा है अंतर में ? कर्मबंध, पापबंध, मलिन परिणाम, अज्ञान का बोझा । इनका फल क्या मिलेगा नहीं ? अवश्य मिलेगा । ये सब भ्रमरूप हैं, अपने सत्त्वपर दृष्टि दो और कल्याण के मार्ग में लगो, यही एक सारभूत कर्तव्य है ।


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