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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 102

From जैनकोष



अदु:खभावितं ज्ञानं क्षीयते दु:खसन्निधौ ।तस्माद्यथावलं दु:खैरात्मानं भावयेन्मुनि: ॥102॥

तपश्चरण के लिये सकारण अनुरोध – गत प्रसंग में यह बात चल रही थी कि आत्मा अनादिनिधन है, यह केवल भावना ही कर सकता है और उस भावना के प्रसाद से यह परमात्मतत्त्व को प्राप्त कर लेता है । इस पर यह शंका होना प्राकृतिक है कि जब केवल आत्मा की भावना करने से ही मुक्ति मिल जाती है फिर उपवास करना, तपस्या करना―ये कठिन कठिन काम करने की क्या आवश्यकता है ? उसके ही समाधान में इस श्लोक में कहा गया है कि जो ज्ञान, बिना क्लेश सहे, आराम में प्राप्त किया जाता है वह ज्ञान दुःख के कारण छूटने पर नष्ट हो सकता है । इस कारण योगी पुरुषों को अपनी शक्ति के माफिक अपने को तपस्या में लगाना चाहिए ।

यथाबल क्लेशभावना का हेतु – यहाँ यह बताया है कि मुनि यथाशक्ति अपने को क्लेशों से भावित करें । जो मनुष्य कष्ट नहीं सह सकते हैं, जिनमें कष्ट सहने का उत्साह नहीं है या जिन पर कष्ट नहीं आ रहा हो वे पुरुष अपने शुद्ध आनंद के मार्ग को पा सकें यह बात जरा कठिन है । प्रथमानुयोग में जितने पुराण पुरुष हुए हैं, पद्मपुराण, हरिवंश पुराण, प्रद्युम्नचारित्र आदि में जितने भी पुराणपुरुषों की कहानी है केवल उनके कष्टों की ही तो कहानी है । कोई महापुरुष ऐसा बतावो जिसने आराम ही आराम भोगा हो, गद्दे तक्कों पर ही पड़ा रहता रहा हो और शांति पायी हो, इज्जत पायी हो, कोई भी पुरुष बतावो । जब तक कष्ट नहीं आते हैं और उन कष्टों को सहने की क्षमता नहीं होती तब तक आत्मा में क्रांति नहीं बढ़ती है । कौन, कैसा अंतर में कष्ट सहता है, किसको क्या पता है ? जिसके चारित्र में कुछ लंबे काल भी सुखिया बताया हो उस पर भी किसी न किसी अवसर पर महान् क्लेश उपस्थित हो जाते हैं । भरतचक्रवर्ती की बड़ी प्रसिद्धि है, जिन्होंने दीक्षा ली और अंतमुर्हूत में ही केवली हो गये । भरतचक्री का चक्र नगर में नहीं प्रवेश कर पा रहा था और बाहुबली का मुकाबला करना पड़ा था और बाहुबली से हार गये थे, इससे बढ़कर और क्या कष्ट हो सकता है । कष्ट की जातियाँ अलग-अलग हैं ।निर्विकल्पकी मुनिमें कष्टसहिष्णुता –महापुरुषों में इतना बल होता है कि कष्ट आये तो उन्हें सहन करते जायें । किसके कष्ट की कहानी लिखी है ? किसी के कष्ट की नहीं लिखी है, पर संसार में ऐसा होता नहीं है कि कोई बिना कष्ट के रह सके । कष्ट सब पर आता है । जो कष्ट में अंधे हो जाते हैं वे डूब जाते हैं, उनका इतिहास में नाम नहीं आता । किंतु जो कष्टों से न घबरायें उनकी आज कहानी शास्त्रों में भी लिखी गई है । कष्ट आने की संभावना तो रहती ही है तब आराम से पैदा किया हुआ ज्ञान दुःख आने पर नष्ट हो सकता है । अब आजकल तो कोई ढंग की वास्तविक विद्या ही नहीं रही । अभी ही कुछ समय पहिले लोग धनिकों के लड़कों को कहा करते थे कि ये सिर्री होते हैं, वे पढ़ लिख नहीं सकते । माँ-बाप का उन पर बड़ा प्यार रहता है, आराम की उनकी जिंदगी रहती है । सो उनका चित्त विद्याग्रहण में नहीं लगता है । जो वास्तविक विद्या है वह गुरु-विनय बिना और कष्ट-सहन बिना प्राप्त नहीं होती है । यों तो आज की विद्याएँ हो रही हैं, पर उन आज की विद्यावों में भी जिसे लोकविद्या कहते हैं, जितने निपुण गरीब छात्र हो जाते हैं उतने निपुण श्रीमंतों के लड़के नहीं हो पाते हैं । उसका कारण है कि आराम ही आराम में उत्कृष्ट विद्या नहीं आती है । अत: उत्कर्षार्थी को कष्टसहिष्णु होना चाहिए ।स्वयं की कार्यप्रयोजकता मानने पर कष्ट का विनाश – भैया ! सच तो बात यह है कि कष्ट कुछ है ही नहीं इस जीव पर । बाहर में कोई पदार्थ कैसे ही परिणम रहे हैं, परिणमने दो तुम ज्ञाता-दृष्टा रहो । यह जानो कि मैं पर के लिए कुछ न कर रहा हूँ, मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह अपने लिए कर रहा हूँ । यदि दूसरों की सेवा करता हूँ, दूसरों का उपकार करता हूँ तो वह दूसरों के लिये नहीं कर रहा हूँ, वह मैं अपनी रक्षा के लिए कर रहा हूँ । कैसे ये विषय, कषाय, ममता के संस्कार इस जीव को बहुत-बहुत तरह से दुःखी कर रहे हैं, जिनमें रमते हुए यह जीव यह समझता है कि मैं बहुत होशियारी का काम कर रहा हूँ, मैं सबसे प्रसिद्ध धनिक हूँ, बड़े आराम के साधन हैं, मेरी बड़ी लोक में मान्यता है । कुछ भी समझें पर अंतर में विषय-कषायों के संस्कार हैं, सो वे दुःखी कर रहे हैं, उनसे बचने का यह सब इलाज है – दूसरों की सेवा करना आदि । उसमें उपयोग लगेगा तो उतनी देर को विषय कषायों में उपयोग न लगेगा । पापों का बंध न हो तो आत्मदृष्टि की पात्रता ही मिलेगी । अपनी रक्षा के लिए पर की सेवा कर रहे हैं, यह जिसके भाव हैं वह कभी क्लेश में नहीं आ सकता और जिसका पर के प्रति एहसान का भाव है – मैंने इन लोगों के लिए कितना क्या किया, बहुत किया, ऐसा परिणाम जो रखेगा वह अपने ही अपराध के कारण दुःखी रहेगा ।कार्य की प्रयोजकता का अवलोकन – जिसने अब तक जिस किसी की भी सेवा की; स्त्री, पुत्र आदिक की ममताभरी सेवा की, न्याय-अन्याय भी कुछ नहीं गिना, वहाँ भी उसने दूसरे के लिए कुछ नहीं किया, अपने ही लिए किया था और अब उनसे हटकर गरीबों की दया, लोगों का उपकार, धर्मप्रचार या उपदेश आदि जो कुछ भी किए वे दूसरे के लिए नहीं किए, अपनी ही शांति के लिए यह सब किया गया, ऐसा जिसका परिणाम होगा उसे क्रोध नहीं जगेगा । प्रतिकूल भी कोई चले, उसको भी देखकर क्रोध न आयगा । क्रोध आता है तब, जब उसके संबंध में कुछ एहसान समझते हैं । मैंने तो इतना एहसान किया और यह इस तरह बोल गया । ज्ञानी पुरुष का सर्वत्र यही परिणाम है कि मैं जो कुछ करता हूँ अपने लिए करता हूँ, दूसरों के लिए नहीं करता हूँ, ऐसे आशय के पुरुष ही कष्टसहिष्णु हो सकते हैं । अज्ञानीजन तो कष्ट में अधीर हो जाते हैं ।कष्टसहिष्णुता से योगियों के परिणामों में उज्ज्वलता – साधु-संत-जन जानकर अपने शरीर को कष्ट में लगाते हैं, उपवास करते हैं । क्या जरूरत है साहब उपवास की ? इसमें ज्ञानी का तो यह उत्तर है कि आराम-आराम में भले प्रकार रहा आया तो परिणामों में उज्ज्वलता नहीं जगती है । जैसे भट्टियों में तपाया हुआ सोना कांति लाता है, शुद्ध होता है ऐसे ही कष्ट में तपा हुआ पुरुष अंतरंग में अपनी उज्ज्वलता बढ़ाता है । वह घाटे में नहीं है । घाटे में तो है आरामतलब पुरुष । कष्ट सहने वाला कभी घाटे में नहीं होता । आरामतलब लोग कायर, गंभीर, आलसी व चित्त के मलिन होते हैं और स्वार्थ में अंधे रहते हैं अथवा यह कह लीजिए कि उनमें निर्दयता की भी मात्रा अधिक होती है । उससे लाभ नहीं होता । मोही पुरुष ही ऐसा जानता है कि मैं बड़े लाभ में हूँ । कुछ कष्ट ही नहीं करना है, वह आराम से खाता है, रहता है । इसने ऐसा भ्रम बनाया कि उसकी कल्पना में आराम ही आराम है सदा । अज्ञानी प्राणी को यह विदित नहीं कि विषयों के आराम में विष भरा हुआ है । अंदाज करके देखलो, कष्ट सहते हुए अपने न्याय की दृढ़ता की जो खबर रखता है उसे कितना आनंद आता है; विषय-साधनों में आसक्त होकर झुकने में इतना आनंद कहाँ आया करता है । जब कोई विकल्प उठ रहा हो, धर्म की बात ही चित्त में समा रही हो उस समय की कांति और आनंद की मुद्रा देखलो और एक विषयों के सुख लूटते समय की कांति और मुद्रा देख लो; कितना अंतर रहेगा ? पश्चवर्ती में वहाँ रोनी सूरत रहती है । भले ही उसने आराम माना हो, पर उन विषयों के सुख में वह प्रसन्नता कहा रह सकती है जो न्याय, नीति और शुद्ध भावों में मिल सकती है ।

योगियों के तपश्चरण के प्रयोजन – योगीजन अपने आपको कष्ट और तपस्या में लगाते हैं, उसके अनेक प्रयोजन हैं कि तप में अपनी वृत्ति होने पर विषय-कषायों के गंदे परिणाम हट जायेंगे । सो विषय-कषायों के आघात से सुरक्षित रहने के लिए अपने को कष्ट और तपस्या में ज्ञानी पुरुष लगते हैं । दूसरा कारण यह है कि कुछ कष्ट सहने का माद्दा जीवन में नहीं बना, तो पाया हुआ ज्ञान सब एक किनारे हो जायगा । जो दो-दो दिन के तीन दिन के उपवास कर सकते हैं, कदाचित् उदयवश कमी रह जाय या न योग जुड़े तो वे धैर्य तो रख सकते हैं । लोग अपमान से बड़ा भय खाते हैं । मेरा कहीं अपयश न हो । भैया ! यह भय तब तक बना रहेगा जब तक अनेक बार अपयश न हो । एक नीति में बताया है कि जब तक कोई उपसर्ग नहीं आता, कष्ट नहीं आता तब तक इसका भय रहता है और जब कष्ट आता है तो वह हिम्मत बनाता है उसे फिर उस कष्ट से उतना भय नहीं रहता है जितना कि भय पहिले था । तो कभी कोई कष्ट उपस्थित हो उस समय भी तो यह चाहिये कि हम कष्ट सहें और अपनी शक्ति माफिक व्रत, तप में रहा करें । तीसरा कारण यह है कि ये बाहरी कष्ट लोगों को दिखते हैं कि ये बड़े कष्ट सह रहे हैं किंतु विवेकियों को तो उस कष्ट के अंदर अपूर्व आनंद का अनुभव होता है । जैसे गृहस्थ पचासों कष्ट सहकर भी रोजगार में आनंद माना करते हैं ।साधुओं के कष्ट की अननुभूति – योगी तो अपने से अधिक कष्ट गृहस्थों के देखता है, ये लोग बड़े कष्ट सहते हैं । और, वैसे भी देखो तो साधुवों के कष्ट से अधिक गृहस्थों के कष्ट हैं । साधुओं ने एकबार खा लिया, दिन भर चैन से रहे, खूब ध्यान किया, न कमायी करना, न धन जोड़ना, पोथी पढ़कर सुनादी, बांचली, विश्राम किया, क्या कष्ट है साधुवों को, बतावो ? और जरा गृहस्थों को देखो, दुकान करें, दसों ग्राहकों की भली-बुरी बात सुनें और त्यागीजन आ जायें तो उनकी सम्हाल करें और देश का काम आये, संस्था के काम आयें उनको देखें, मंदिरों की जिम्मेदारी लें कितने कष्ट हैं गृहस्थों को फिर भी जो उन कष्टों को सहन कर सकते हैं, क्या उन गृहस्थों में धैर्य कम है ? 22 परिषह लगे हैं साधुओं के और गृहस्थों के कितने परिषह हैं उनकी गिनती बताओ । लड़का परिषह, नाती परिषह, दूकान परिषह, घर परिषह, कितने परिषह हैं ।विवेकी गृहस्थों की भी पुण्यचेष्टितता – भैया ! वे गृहस्थ भी धन्य हैं कि जो गृहस्थी के बीच रहते हुए भी यह समझते रहें कि मैं तो केवल ज्ञानानंदस्वरूप हूँ । कोई यहाँ नाम लेकर भी कितने ही अपयश करे, बुरा-भला कहे तो जिसका वह नाम है उसको भला-बुरा कहा । मेरा तो कुछ नाम ही नहीं है जिसका लोगों ने नाम धर दिया है वह मैं नहीं हूँ । इसमें नाम नहीं है । दूसरे को कोई नाम लेकर गाली दे तो हम बुरा तो नहीं मानते । हमें तो यह गाली नहीं दे रहा है । इसी तरह यहाँ भी निरखता है ज्ञानी कि ऐसा नाम लेकर भी यदि कोई कुछ कह रहा है जिसे कहता होगा कहे । मेरे को नहीं कहता । मेरे को कह भी नहीं सकता । मैं तो निर्नाम चैतन्यस्वरूप हूँ ।

योगियों की कष्ट में आनंद की अनुभूति ― यह ज्ञानी संत पुरुष उन कष्टों के बीच गर्मी में पहाड़पर तपस्या कर रहा है । शीत ऋतु में ठंड सह रहा है, आहार का योग न मिला तो भी प्रसन्न है, अंतराय आ गया वहाँ भी कुछ गम नहीं है । कितने ही कष्ट सहे, उन कष्टों के बीच में भी वह अद्भुत आनंद अमृत पीता रहता है । इस अज्ञानी को क्या पता है कि ज्ञानी क्या करता है, क्या नहीं किया करता है ? इसका परिचय अज्ञानी नहीं पा सकता है । वह तो ऊपरी वृत्ति देखकर कहेगा कि आज महाराज ने यह किया । अरे ! क्या अंतर में किया, क्या नहीं किया ? इसे अज्ञानीजन जान नहीं सकते । जिस पर बात न आ पड़े वह नहीं समझ सकता ।तपस्या में आत्मसंपदा का अवलोकन – इस तपस्या में, इन कष्टों के सहन में बहुत संपदा भरी हुई है । सुख में क्या मग्न होना दुःख में क्या घबराना ? यह ज्ञानी तो सुख को भी हेय समझता है । वह तो निज सामान्य की ओर आकर प्रसन्न रहता है, वह विशेष में नहीं लगना चाहता, सब लोग जानते हैं कि सुख के बाद दुःख आता है । जो संसार के सुख हैं, वैषयिक सुख हैं उनके बाद दुःख आते हैं और दुःख के बाद सुख आते हैं, कोई भी मनुष्य या जीव ऐसा दुःखी न होगा कि उस ही रफ्तार का दुःख दिन भर किए रहता हो । कहाँ तक करेगा ? थक जायगा । तो सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख आता है । कहो, तुम्हें क्या पसंद है ? जिसके बाद दुःख आये चीज पसंद है । दुःख के बाद सुख आता है । अरे ! तो दुःख पसंद नहीं हैं । संसार में कहीं क्लेश नहीं है, ज्ञानानंदस्वरूप अपने आत्मतत्त्व की सुध लो, रंच भी तो कष्ट नहीं है । चिंताओं का क्यों बोझ लाद लिया है ? जिसका जो होता है वह उसके भाग्य से होता है । हमारे थोड़े कर्तव्य में कोई सुखी हो जाय, होने दो । पर चिंताएँ लादकर अपने आपको संसार-गर्त में डालना, यह तो बुद्धिमानी नहीं है । कष्टसहिष्णु हों और वहाँ भी अपने आपके तत्त्वज्ञान का ही ध्यान रखो । ऐसी वृत्ति से ही कल्याण का मार्ग मिल सकेगा ।


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