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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 21

From जैनकोष



उत्पंनपुरूषभ्रांते: स्थाणौ यद्वद्विचेष्टितम् ।

तद्वन्मे चेष्टितं पूर्वं देहादिष्वात्मविभ्रमात् ।।21।।

भ्रमचेष्टा–यहां एक दृष्टांतपूर्वक भ्रम की बात बता रहे हैं-जैसे प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में कोई टहलने जा रहा हो, बहुत दूर निकल गया और ऐसी सड़क पर निकल गया जिस पर वह कभी न गया था। कुछ अंधेरे में कुछ उजेले में बहुत दूर पर एक वृक्ष का ठूठ खड़ा हुआ था। शाखायें तो सब गिरा दी गयी थीं, खाली सूखा ठूठ रह गया था जो 5 या 5।। फुट का ऊँचा था। उस टहलने वाले ने देखा, पर वह समझ न पाया कि यह ठूठ है। दूर से दिखाई देने पर उसे पुरूष का भ्रम हो गया। तो उस ठूठ में पुरूष का भ्रम हो जाने से अब उसकी चेष्टाएं कछ और प्रकार की हो गयीं। यह कौन भयानक खड़ा है, कहीं डाकू तो नहीं है, कहीं और कोई धोखे वाला तो नहीं है, उसे कुछ भय सा गया, कुछ जिज्ञासा सी हो गयी, बात क्या है, इतने समय यहाँ यह क्यों खड़ा हुआ है ? तो जैसे ठूठ में पुरूष का भ्रम हो जाने से कुछ अन्य–अन्य प्रकार की चेष्टा हो जाती हैं, इसी प्रकार इस देहादिक में आत्मा का भ्रम हो जाने से पहिले मेरी ही ऐसी विचित्र चेष्टाएं हुई थीं।भ्रममूलक व्यवहार–कहां तो यह ज्ञानानंदस्वभाव स्थिर अचल ब्रह्मस्वरूप है और कहां इतनी चेष्टाएं करनी पड़ रही हैं ? किसी को मित्र माना, किसी को रिश्तेदार समझा, ऐसा जैसा जिसका व्यवहार है उस प्रकार का व्यवहार करना यह देहादिक में आत्मा का भ्रम होने से ही तो हो रहा है, किसी के पैर छू रहे हैं, किसी को आशीर्वाद दे रहे हैं, किसी से घुल मिलकर बातें कर रहे हैं, किसी से कैसा ही व्यवहार है, यह क्या व्यवहार है ? यह एक ऐसा भी व्यवहार है कि समधिन समधी को देखकर अलग छिप जाती है। आंखों एक दूसरे को कोई देख नहीं सकते या और और तरह के विचित्र व्यवहार चलते हैं। ये क्या आत्मा के दर्शी के व्यवहार हैं अथवा आत्मत्व के नाते के व्यवहार चलते हैं। ये देह में आत्मा का भ्रम हो जाने से सारे व्यवहार हैं।ज्ञानी और अज्ञानी के आशय में अंतर–भैया ! एक चेष्टा नहीं, संसारी पुरूषों के मन, वचन, काय की जितनी चेष्टायें हो रही है, उन सबमें देह में आत्मा के भ्रम का भूल पड़ा है। हालांकि लोकव्यवहार में वह कर्तव्य की बात मानी जाती है। जैसे देश की रक्षा करना, समाज की रक्षा करना, कुटुंब की रक्षा करना कर्तव्य माना जाता है, ठीक है, पर इस प्रकार के जो परिणाम होते हैं उनमें तन, मन, धन सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार होते हैं। ये सब बुद्धियों क्या देह में आत्मा की बुद्धि किए बिना हो सकती हैं ? होती भी हैं किसी ज्ञानी के, ऐसा निष्काम कर्मयोग है परंतु निष्काम कर्मयोग में आसक्ति नहीं होती है। आसानी से बने तो बने, न बने तो उसके लिए कमर कसकर नहीं गिरा करते हैं। इतना अंतर है आसक्तिपूर्वक कार्य करने में और निष्काम कर्मयोग में।अनासक्ति का एक उदाहरण–एक कथानक है कि नगर का राजा गुजर गया तो मंत्रियों ने सलाह की कि राजवंश में तो कोई उत्तराधिकारी है नहीं। किसे राजा चुना जाय ? सलाह में निश्चित हुआ कि 5 बजे सुबह इस महल का अग्रिम फाटक खोला जाय, जो फाटक के पास मिले उसको ही राजा बनाया जाय। खोला फाटक तो एक संन्यासी लंगोट पहिले हुए मिला। उसके हाथ पकड़कर मंत्रियों ने कहा कि चलो तुम्हें राजा बनायेंगे। साधु बोला-नहीं नहीं, हम यह आफत नहीं लेना चाहते। बड़ा आग्रह किया तो इस शर्त पर वह राजा बनने को तैयार हो गया कि हमसे राजकाज की कोई चर्चा न करना। हम बैठे भर रहेंगे। अच्छा महाराज आप से राजकाज की कोई चर्चा न करेंगे। साधु को राजदरबार में ले गए। साधु ने अपने कपड़े उतार दिए और राजवस्त्र धारण कर लिए। एक छोटी सी काठ पेटी में अपना लंगोट रख दिया। दो तीन वर्ष तक खूब राजकाज चला। इतने में एक शत्रु ने आकर उस पर आक्रमण कर दिया। अब मंत्री लोग घबड़ाए और पूछा―महाराज अब क्या करना चाहिए शत्रु तो सिर पर चढ़ आया। महाराज कहते हैं कि अच्छा हम बताते हैं―जरा वह पेटी उठावो, पेटी खोलकर लंगोट निकाल कर, राजवस्त्र फेंक कर लंगोट पहिनकर और चलते हुए कहता है कि हम राम को तो यह करना है, और तुमको जो करना हो सो तुम जानो।ज्ञानी का शुद्ध चित्त–तो ज्ञानी जन अज्ञानी की भांति उड़कर नहीं चलते हैं। लोकव्यवहार में चाहे कोई माने, चाहे न माने, उल्टा चले, तब भी मोह किया जा रहा है। कितना ही समझाया जाय, बताया जाय, हित की बात प्रेम सहित कही जाय। मान लिया तो ठीक, न मानें लोग तो ज्ञाता रह गए। किंतु मोह में ऐसा नहीं होता है, कितनी ही विपत्तियां आएं फिर भी परिजन की ममता त्यागी नहीं जा सकती। कितना ही नाती पोते पीटें फिर भी उनके बाबा ही तो रहेंगे, कोई बाबा कहलाना तो न मिटा देगा। ऐसी मन में ममता की आसक्ति ज्ञानी पुरूष के नहीं होती।ज्ञान होने पर अज्ञान चेष्टा का बोध व एक उदाहरण–यह ज्ञानी सोच रहा है कि आत्मज्ञान से पहिले मुझे देह में आत्मा का भ्रम था इस कारण मेरी ऐसी चेष्टा हुई है जो आत्मा के नाते से विपरीत थी। किसी पुरूष को अंधेरे उजेले में घर के बाहर पड़ी हुई तीन चार हाथ की लंबी रस्सी टेढ़ी मेढ़ी पड़ी हुई दिख जाय तो सांप का भ्रम होने पर उसकी कैसी चेष्टा हो जायेगी ? घबड़ाहट, चिल्लाहट। लोगों को बुलायेगा, बचाव के साधन इकट्ठे करेगा और यहाँ तो बचाव कौन करता है, सीधी लाठी वगैरह ढूँढ़ते हैं। तो सारा यत्न करेगा, चित्त में अशांति हो जायेगी ये सब भ्रम की चेष्टाएं हैं। शायद लाठी के प्रहार भी कर दे और 10–20 लाठी लग जाने पर फिर जरा निकट जाकर देखे कि यह मरा कि नहीं मरा और उठाया तो माथा घुनता है―ओह यह तो रस्सी ही थी, भ्रम में मैंने क्या क्या चेष्टाएं कर डाली ?

ज्ञान में अज्ञान चेष्टा का निर्णय–इसी प्रकार अपने आत्मा द्वारा अधिष्ठित देह में यह मैं हूँ ऐसा भ्रम किया और पर-आत्मा द्वारा अधिष्ठित देह में यह पर है ऐसा भ्रम किया, बस इस भ्रम की नींव पर ये सारी चेष्टाएं, बोलचाल व्यवहार, मनमुटाव, पक्षपात, ईर्ष्या, घृणा, सारी की सारी विडंबनाएं इस पर चल उठी हैं। ज्ञातापुरूष सर्वत्र इस चैतन्यस्वरूप का दर्शन करता है। वह गुणग्राही होता है, और देहों में आत्मा का भ्रम करने वाले पुरूषों को गुण से तो प्रयोजन ही नहीं, बल्कि उनमें दोषग्राहिता का स्वभाव पड़ जाता है।ज्ञानी और अज्ञानी की प्रकृति–जगत् में जितने पुरूष है उनमें यदि दोष है तो कोई न कोर्इ खासा गुण भी है हर एक पुरूष में। कोई कंजूस है तो प्यारा बोलने वाला भी है, कोई परनिंदक है तो कोई किसी के तन की सेवा करने वाला भी है। कोई दोष है कोई गुण है। पर दोषग्राही पुरूष को वहाँ दोष ही दिखता है और गुणग्राही पुरूष को गुण ही दिखते हैं। जैसे जोंक भैंस के थनों में लग जाय तो जोंक दूध नहीं पी सकती। वह खून ही पीयेंगे। और हंस मिले हुए दूध और पानी में दूध को ग्रहण कर लेगा पानी को छोड़ देगा। यह ज्ञान और अज्ञान में ऐसी प्रकृति हो जाती है।अज्ञानचेष्टा का अवबोध व अज्ञानचेष्टा के परिहार का यत्न–ज्ञानी पुरूष यह चिंतन कर रहा है कि पूर्वकाल में, जो अनंतकाल हो गया है, देहादिक में आत्मा का भ्रम करने से मेरी ऐसी चेष्टा हुई जैसे ठूठ में पुरूष का भ्रम हो जाय तो उस भ्रमी की चेष्टा हो जाती है। क्या चेष्टा हो जाती है ? किसी का उपकार करना, किसी का अपकार करना, किसी को अपना मानकर अपना सर्वस्व समर्पण करना, किसी को अपराधी जानकर दुःखी देखकर भी करूणा उत्पन्न न होना, ऐसी अजब चेष्टाएं मिथ्यात्व में हो जाया करती हैं। एक ही जीवन में दसों बार ऐसे उतार चढ़ाव के प्रसंग आ जाते हैं कि कभी वह इष्ट हो जाता है और कभी वह अनिष्ट हो जाता है। ऐसी चेष्टा इस देह में आत्मा का भ्रम करने से ही हो जाया करती है। ठीक है, किंतु जब आत्मज्ञान हो जाता है तब यह पुरूष कैसा बर्ताव करने लगता है ? इस संबंध में आचार्यदेव कह रहे हैं।


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