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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 22

From जैनकोष



यथासौ चेष्टते स्थाणौ निवृत्ते पुरुषाग्रहे।तथाऽचेष्टोऽस्मि देहादौ विनिवृत्तात्मविभ्रम:।।22।।यथार्थ ज्ञान होने पर विपरीत चेष्टा का अभाव–जैसे वही पुरूष जिसको कि स्थाणु में पुरूष का भ्रम हो गया था, कुछ और चलने पर जिज्ञासा सहित निरखने पर जैसे यह समझ आ गई कि यह तो कोरा ठूठ ही है, तो ऐसा जानकर अब उसकी वे सब विपरीत चेष्टाएं समाप्त हो जाती है, भय नहीं रहता, कुछ नि:शंक हो जाता है। इस ही प्रकार जब देह में आत्मा का भ्रम समाप्त हो जाता है, आत्मस्वरूप में ही यह मैं आत्मा हूँ ऐसा दृढ़ निर्णय हो जाता है तो यह भी उन सब चेष्टावों से निवृत्त हो जाता है, ज्ञानरस का स्वाद लिया करता है।ज्ञान में अनाकुल दशा–भैया ! ज्ञान हो जाने पर इस जीवन में बड़ा अंतर आ जाता है। आकुलता मूल में नहीं रहती, विसम्वाद की स्थिति उस ज्ञाता पुरूष के नहीं रहती। चाहे संग वह ही हो, किंतु यथार्थ बोध हो जाने पर फिर उसकी दशा ही बदल जाती है। जैसे रस्सी में सांप का जिसे भ्रम हो जाय वह कुछ हिम्मत बनाकर निकट जाय और धीरे-धीरे समझ में आए कि यह तो सांप नहीं मालूम होता है और बढ़कर देखता है―निर्णय हुआ कि यह तो रस्सी है। रस्सी का ज्ञान होने पर भय आकुलता, अँधेरा ये सब समाप्त हो जाते है। ऐसे ही यह मैं आत्मज्ञानानंद का पुंज हूँ। इसका कार्य ज्ञानरूप वर्तना और आनंदरूप वर्तना है। ऐसा यथार्थ ज्ञान होने पर जो संसार के नाना कार्य भ्रमों का बोझ लादे था वह सब समाप्त हो जाता है।

ज्ञानकिरण–इस अज्ञ पुरूष पर लौकिक कर्मों का बड़ा बोझ लदा रहता है। अब यह काम करने को पड़ा है, अमुक काम अभी अधूरा ही है। इस तरह के बोझ चित्त में रहा करते हैं। पर जब ज्ञानकिरण का उदय होता है और यह आत्मा समझ लेता है कि मैं तो अपने भावरूप परिणमन के अतिरिक्त अन्य कुछ करता भी नहीं हूँ और न ही वह काम जिसे सोचा था या लोग सोचा करते हैं तो यह भी अधूरा नहीं रहता। यह तो मैं परिपूर्ण सत् हूँ―ऐसा अपना परिपूर्ण स्वभाव जो देखता है उस पर से सारे बोझ हट जाते हैं। हो तो कोई बुद्धिमान विवेकी, सो जैसे मुफ्त मिले हुए धन की व्यवस्था बिना भार के की जाती है ऐसी ही चेष्टा है उनकी। जो मेरे घर में हैं, मिले हैं, ये भी मुफ्त मिले हुए की तरह हैं। हैं जड़ पुद्​गल मुफ्त मिले हैं, मेरा उनसे कुछ संबंध नहीं है। वे मेरी व्यवस्था नहीं बना देते हैं। ज्ञान होने पर दृष्टि उत्कृष्ट हित की ओर ही जाती है।अज्ञान में विचार–एक बड़ा सेठ था किंतु वह अकेला ही था। एक छोटा लड़का भर था। जब सेठजी के मरने का समय आया तो सेठ ने सोचा कि इतने बड़े स्टेट की रक्षा यह बालक न कर सकेगा, सो बराबरी के चार बिरादरी भाईयों को बुलाया और उनको ट्रस्टी बना दिया, उनके नाम सब लिखा पढ़ी कर दिया। जब यह बालक बड़ा हो जाय तो इसको सारी संपत्ति सौंप देना। सेठ गुजर गया। बालक सड़क पर खेल रहा था। दो तीन वर्ष की अवस्था थी, अच्छे कुल का पुत्र था, अच्छे वातावरण में पला था, सुंदर कलावान था। खेल रहा था वह बालक। एक ठग सड़क से निकला, उसे यह बालक सुहा गया और उसे उठा करके चल दिया। ठगनी से कहा कि अपने घर बालक नहीं है सो इसकी रक्षा करो। यह अपना बालक है। पल पुसकर अव वह 17, 18 वर्ष का हो गया। अब उस बालक को सही पता नहीं कि मेरा घर कौन था और क्या संपदा है ? वह ठग को ही बाप समझता है और ठगनी को मां।ज्ञान में प्रकाश–एक बार वही बालक शहर से निकला, तो एक ट्रस्टी ने कुछ पहिचान लिया। ट्रस्टी ने कहा कि ऐ बालक ! हम लोग कब तक तुम्हारी जायदाद रखेंगे, तुम अपनी जायदाद ले लो। (कोई यह न सोच बैठे कि कहीं ऐसे ट्रस्टी हम न हुए)। दूसरा ट्रस्टी भी देखता है―कहता है―ऐ बालक तुम्हारी जायदाद हम कब तक रक्खेंगे, अब तुम अपनी जायदाद ले लो। इसी तरह से तीसरे और चौथे ने कहा। तो बालक सोचता है कि ये दे ही तो रहे हैं कुछ लिए तो नहीं लेते। सो सोचकर उसने कहा―अच्छा हम 10–5 दिन के बाद आपसे बात करेंगे। अब जंगल में अपनी झौंपड़ी में वह सोचता है कि मामला क्या है ? अरे मेरा बाप यह है, मेरी मां यह है और यह खेतीबाड़ी मेरी जायदाद है और वे बताते हैं दस बीस दुकानें, अमुक, अमुक। सो वह चिंतातुर था। जिज्ञासा का समाधान नहीं था, सो वह ठगनी के पैरों में पड़कर नम्र शब्दों में बोला कि मां बतावो मैं किसका बालक हूँ ? उसे तुरंत कह आया उस बालक की सरलता और मुद्रा देखकर कि बेटा तू अमुक सेठ का बालक है। तू खेल रहा था सो ये तुम्हारे पिता जी तुम्हें उठा लाये, पाला पोसा। इतनी बात सुनते ही उसके यह निर्णय हो गया कि मैं अमुक शहर के अमुक सेठ का लड़का हूँ, अब इस निर्णय को कौन बदले ? फिर भी जब तक उस झौंपड़ी में रह रहा है क्या उस ठग को ठग कहकर पुकारेगा, क्या उस ठगनी को ठगनी कहकर पुकारेगा ? नहीं। ठगनी को मां ही कहेगा, ठग को पिता ही कहेगा और खेतीबाड़ी को यदि जानवर बरबाद करने को घुस जाय तो उसे भी वह बाहर निकालेगा। सब कुछ करेगा, पर अंदर में उसके पूरा ज्ञान है कि मैं तो अमुक सेठ का लड़का हूँ।यथार्थ ज्ञान और व्यवहार–ऐसे ही यथार्थ ज्ञान हो जाने पर इस गृहस्थ को भी व्यवहार करना पड़ रहा है सब कुछ, पर जान रहा है अंतर में सब सत्य बात। मेरा वैभव तो मेरा गुणपुंज है, मेरा पिता तो यह ही मेरा सत् स्वरूप है, सब कुछ समझ रहा है, फिर भी लोकव्यवहार के माता पिता वैभव को क्या गालियां देकर पुकारेगा ? तुम धोखे से भरे हो, मायारूप हो, असार हो। क्या ऐसा कहेगा ? ऐसा न कहेगा। वह मां को मां ही कहेगा, पिता को पिता ही कहेगा, धन वैभव का भी संचय करेगा, पर दृष्टि उसकी बदली हुई है। सो जब तक भ्रम था तब तक अन्य प्रकार क चेष्टाएं थीं, जब भ्रम हट जाता है तो विपरीत चेष्टाएं दूर हो जाती हैं और आत्मतत्त्व के नाते से उसकी चेष्टाएं होने लगती हैं। ओह मैंने देहादिक में आत्मा का भ्रम करके ऐसी भ्रमपूर्ण चेष्टाएं कीं। जैसे कि कोई ठूठ को पुरूष जानकर, रस्सी को सांप जानकर उद्​विग्न होकर नाना चेष्टाएं किया करता है। ऐसा यह ज्ञानी आत्मज्ञान होने पर पूर्व की अवस्थावों का ज्ञाता दृष्टा बन रहा है।अज्ञ जंतु की विडंबनायें–इस आत्मा ने स्वपर के भेदविज्ञान बिना बाह्यतत्त्वों को अपनाकर कैसे कैसे भव धारण किये और उनमें कैसी विडंबनाएं सहीं, सो कुछ साक्षात और कुछ सिद्धांतग्रंथों से जान लीजिये। इस जीव का आदि निवास साधारण वनस्पतिकाय रहा। जहाँ एक श्वास में 18 बार जन्म मरण किया। सुयोग से उस देह कुल से निकला तो पृथ्वी, पानी, आग, हवा और वनस्पतिकाय इनमें जन्म लिया, सो आप सब देख ही रहे हैं। ये एकेंद्रिय जीव हमारी ही तरह चैतन्यशक्ति वाले हैं और सुख दुःख के भोगने वाले हैं। इनके केवल एक ही इंद्रिय है। इस कारण वे कुछ भी हलन चलन करके खुद को मना नहीं कर पाते। इस पृथ्वी के नीचे जितनी भी धातुयें हैं मिट्टी पत्थर आदिक हैं वे सब जीव हैं। इस मनुष्य ने अपने प्रयोजन से इस जमीन को खोदा और भीतर के पत्थरों को फोड़कर सुरंगे बनाईं और भी किस-किस तरह उन पृथ्वीकायिक जीवों का घात हुआ। वे सब वेदनाएं हम आप जीवों ने सही।असावधानी का फल–आप मनुष्यभव में हैं, अपनी गत वेदनाओं का कुछ स्मरण नहीं करते हैं। पुण्योदय से जो समागम मिला है उस समागम में मस्त होते चले जा रहे हैं। कुछ ही दिन बाद सर्वसमागम मिटेंगे, परभव में यहाँ का क्या साथ जायेगा इसका भी तो ख्याल करो। यह जो करनी है, जो भाव बनाया है भला अथवा बुरा, उनका ही फल अगले भव में नजर आयेगा।

जल, अग्नि, वायु, वनस्पति के क्लेश–यह जीव कभी जलकायिक हुआ। जल जो पीने में आता है वह स्वयं एकेंद्रिय जीव है। उसमें रहने वाले कीड़ों की बात नहीं कह रहे हैं। वह एकेंद्रिय जल ताड़ा गया, रोका गया, तपाया गया, धोती चद्​दरों से पिछाड़ा गया, वहाँ भी कितने कष्ट इस जीव ने सहे ? अग्निकायिक हुआ तो लोग अग्नि को पानी से बुझा देते हैं अथवा तवे से बंद करके उसके प्राण नष्ट कर देते हैं। कई तरह से इस अग्नि का भी विध्वंस हुआ। वायुकायिक हुआ। यह अपनी चर्चा चल रही है। हम पहिले कैसी-कैसी योनी में और देह में पहुँचते रहे। हवा हुए तो रबड़ों में रोके गए अथवा जब चाहे पंखों से ताड़े गए। वहाँ भी अनेक कष्ट सहे। हरी वनस्पति की तो बात ही क्या बताएं ? ये पेड़ पौधे फल फूल आदि सब एकेंद्रिय जीव हैं। इनको तोड़ लिया, छेद डाला, भेद डाला, पका दिया, कितनी ही स्थितियां बनती हैं।

दो इंद्रिय व तीन इंद्रिय जीव के क्लेश–कदाचित् स्थावरों से निकला, दो इंद्रिय जीव बना केचुवा, लट, जोक, सीप का कीड़ा, कौड़ी का कीड़ा आदिक दो इंद्रिय जीव हुआ तो उनके दुःख का क्या ठिकाना ? ढीमर लोग मछली फांसने के लिए कांटे में केचुवे को पिरो देते हैं, जल में डाल देते हैं, मछलियां उन्हें खाती हैं, अथवा चलते फिरते मुसाफिर, कोई बिरले ही सत्पुरूष उन जीवों पर दया करते हैं, कितने ही लोग जानबूझकर जूते की नालों से मसलकर रौद्र आशय करके मौज मानते हैं। तीन इंद्रिय जीव हुआ तो उसके दुःख का क्या ठिकाना ? खटमल होते हैं खाटों में तो लोग उन पर गरम पानी डालकर मार देते हैं, धूप में खाट से गिराकर तपी हुई धूल में उन्हें झुलसा देते हैं। अथवा मिट्टी का तेल संदूक या अलमारी आदि में डालकर उन खटमलों को नष्ट कर देते हैं। ऐसी तीनइंद्रिय कीड़ा मकौड़ों की हालत होती है। एक निज ब्रह्मस्वरूप के परिचय बिना बाह्यपदार्थों में ममता होने के कारण ऐसे-ऐसे भव इस जीव को धारण करने पड़े।चौइंद्रिय व पंचेंद्रिय जीवों के क्लेश–कदाचित् तीन इंद्रिय जीव से और ऊँचा उद्धार हुआ तो चौइंद्रिय जीव हो गया। मक्खी, मच्छर, टिड्डी, भँवरा, ततैया आदि चौइंद्रिय जीव हैं। लोग ततैया के घरों को आग लगाकर जला देते हैं, ततैया जल जाती हैं, बच्चे किलबिलाकर मर जाते हैं। टिड्डी दलों को नष्ट करने की कितनी ही औषधियां बनाई गई है। मच्छरों को मारने की कितनी ही औषधियां है। यह जीव चौइंद्रिय से निकलकर पंचेंद्रिय हुआ, तिर्यंच हुआ, तो वहाँ के कष्ट देखो गाय बैल बूढ़े हो जाते हैं तब उनकी कौन परवाह करता है ? गधे, कुत्ते, सूकर इनकी कौन परवाह करता है ? सूकरों को तो लोग खड़े ही नष्ट कर देते हैं और कोई तो उनके पैर बांधकर जिंदा ही बड़ी भट्टी में डाल देते हैं। मुर्गा मुर्गियों की तो कथा सुनी ही होगी। पंचेंद्रिय जीव का भव पाया तो ये स्थितियां हुई।आप बीती कहानी–भैया ! कहां तक दर्द भरी कहानी सुनाई जाय जब हम दूसरों को ऐसा हुआ करता है यों देखते है तो वह कहानी सुन ली जाती है और जब यह ख्याल होता है कि आखिर ऐसा ही भव हमने भी तो धारण किया और अब भी क्या हुआ, भाव न सुधरे तो ऐसा ही भव हमें भी तो धारण करना पड़ेगा। ओह बड़ा विषाद होता है। आज इतना श्रेष्ठ मन पाया, अपने मन की बात दूसरों को बता सकते हैं, दूसरों के मन की बात हम समझ सकते हैं और बड़े-बड़े तत्त्वज्ञान की बातें समझने के काबिल है, ऐसी ऊंची स्थिति पाकर भी विषयों की खाज खुजाने में ही यह अमूल्य समय गुजारा तो बतलावो अब कौनसा समय आयेगा जिसमें संकटों से छूटने का मौका मिले। यह सब उस अज्ञान का परिणाम है जिस अज्ञान में मनुष्य फूले नहीं समाते हैं। मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरा वैभव, मेरा ऐश्वर्य, ओह कितना अद्​भुत है, देख-देखकर फूले नहीं समाते हैं। ऐसा जो परिणाम है यह अज्ञान अंधेरे का परिणाम है। ऐसी मोह ममता में निज ब्रह्मस्वरूप का क्या परिचय हो सकता है और अपने आपके स्वरूप की यदि दृष्टि नहीं होती है तो आकुलता ही बसी रहती है, वह ब्रह्मस्वरूप क्या है, वह अंतस्तत्त्व क्या है ? इस बात का वर्णन करने के लिए आचार्यदेव अगला श्लोक कह रहे हैं।


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