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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 54

From जैनकोष




शरीरे वाचि चात्मानं संधत्ते वाक्शरीरयो: ।भ्रांतोऽभ्रांत: पुनस्तत्त्वं पृथगेषां निबुध्यते॥54॥

अज्ञानी और ज्ञानी के उपयोग का रोपण – पहिले श्र्लोक में आत्मतत्त्व की लीनता के लिए बहुत प्रतिग्रह किया गया है । उसको सुनकर जिज्ञासु के मन में यह बात आती है कि इस आत्मा को कहाँ निरखें ? सामने तो शरीर और वचन उपस्थित है । व्यवहार होता है तो वचनों से । और संबंध होता है तो इस शरीर से । शरीर और वचनों को छोड़कर अन्य कुछ आत्मा का अस्तित्त्व मालूम नहीं होता है । किसकी चर्चा करें ? उस जिज्ञासा में समाधान स्वरूप यह श्र्लोक आया है कि वचन और शरीर के में जिसको भ्रांति हो रही है अर्थात् जो वचन और शरीर के यथार्थस्वरूप को नहीं पहिचानते हैं, बहिरात्माजन वचन और शरीर में आत्मा को धरते हैं, आरोपित करते हैं ।

यह मैं हूं, किंतु वचन और शरीर से भिन्न ज्ञानानंदमात्र समस्त भारों से रहित आकाशवत् निर्लेप भावस्वरूप निजतत्त्व का जिसे परिचय होता है, शरीर और वचन में जिसे आत्मा मानने का भ्रम नहीं रहा है – ऐसे पुरुष इस शरीर और वचन के स्वरूप को इस आत्मा से पृथक देखते हैं ।

दृष्टात्मा का सहजदर्शन – भैया, जिसने इस आत्मतत्त्व को देख लिया, उसे जरा सी नजर में यह आत्मतत्त्व दिख जाता है । जो आत्मतत्त्व को नहीं देख पाया, वह इंद्रिय का व्यापार कर करके हैरान हो जाता है । कैसा है यह मेरा आत्मा ? ज्ञानी जानता है कि यह शरीर पुद्गल की रचना है । आहारवर्गणा के सूक्ष्मस्कंधों का पिंड होकर यह शरीर का रूप बनता है तथा यह वचन भी पुद्गल की रचना है । संयोग और वियोग के कारण भाषावर्गणा के स्कंधों में जो वचनरूप अवस्था बनती है, वह वचन है । शरीर और वचन दोनों ही पौद्गलिक है, रूप, रस, गंध, स्पर्श वाले हैं । ज्ञानरूपादिक मैं नहीं हूं । वह तो बहुत विलक्षण आश्र्चर्यजनक एक ज्ञानज्योति हैं । शरीर जड़ है । यह कुछ नहीं जानता है, किंतु यह मैं आत्मा जाननस्वरूप हूं, अमूर्त हूं, समस्त पुद्गलों से अत्यंत भिन्न हूं – ऐसा जिन्हें भी परिचय है, वे ज्ञानीपुरुष शरीर और वचन को निजआत्मतत्त्व से पृथक निहारते हैं।

ज्ञानस्वभाव में ज्ञानोपयोग की एकरसता – शरीर और वचन में आत्मबुद्धि रखना तो अज्ञान है । यह ज्ञान जब ज्ञानस्वरूप में फिट नहीं बैठता है तो यह डावांडोल रहता है । कैसे फिट बैठे ? अन्य कोई स्थान इसके फिट नहीं बैठता है । जैसे नमक की डली पानी में डालने पर घुलकर एकरस हो जाती है, उसका पृथक व्यक्तित्व नजर नहीं आता है । इस ही प्रकार यह उपयोग सहजस्वभाव में घुलकर एकरस हो जाता है । वहां यह कोई भी ऐसा भेद नहीं रह पाता कि लो यह मैं जानने वाला हूं और इस मुझने इस गुण को जाना, ऐसा भेदभाव नहीं रहता है, ज्ञान ज्ञान में पहुंचकर एकरस हो जाता है ।

भ्रांत और अभ्रांत का भवितव्य – ज्ञान को शरीर और वचन में फंसाना अज्ञानभाव है। बहिरात्मा पुरुष कुसंस्कारों के वश से इन जड़ बाह्यपदार्थों को आत्मा मानता है, किंतु अंतरात्मा पुरुष थोड़ी सी भीतर की गुप्तकला के प्रसाद से जिनको कहने के लिए कोई वचन नहीं हैं । थोड़ा झुके निज की ओर निशंक होकर, किसी को साथ न लेकर थोड़ा परमविश्राम किया तो इस आत्मा को अपने आपमें उस ज्ञानस्वरूप का दर्शन होता है । जिसने वचन और शरीर में ‘यह मैं हूं’ ऐसा भ्रम किया है, वह तो संसार में रुलता है और जिसे भ्रम नहीं है कि मैं तो ज्ञानमात्र हूं और इसी तरह की अपने आपमें उपासना करता है, वह मुक्ति के निकट है ।

स्फुट हितबोधन – यहां किसी को कुछ दिखाना नहीं है । पहिले इस ही का निर्णय कर लो कि हम अपनी कोई कला, कोई चतुराई दूसरों को दिखा दें तो इससे कुछ अंतर में लाभ भी है क्या ? किसे दिखाते हो ? यहां तुम्हारा कोई प्रभु बैठा है क्या ? अरे जैसे तुम खुद संसार में भटकने वाले एक प्राणी हो, इसी तरह संसार में भटकने वाले ये दृश्यमान सभी लोग हैं । इनको तुम कुछ दिखाना चाहते हो ? मैं इतना धनी हूं, मैं इस नगर में सर्वप्रथम धनी हूं, ऐसा किसको बताना चाहते हो ? अव्वल तो किसी को बता नहीं सकते हो और मान लो कदाचित् कि बता भी दिया तो इसका फल क्या होगा ?

जीव के जिस समय जिस प्रकार उदय होता है, उसके अनुसार जीवन मरण सुख दु:ख उसके स्वयमेव होता है । जो पुरुष किसी एक पुरुष के द्वारा दूसरों को कुछ कर देगा, इस तरह देखता है, समझता है, वह पुरुष संसार के बंधनों में जकड़ जाता है ।

ज्ञानी का विशद भेदविज्ञान – यहां भेदविज्ञानी पुरुष स्पष्ट आत्मतत्त्व और अनात्मतत्त्व में भेदविज्ञान कर रहा है । अज्ञानी ही एकमेक मानें तो मानें, परंतु ज्ञानी तो सबसे निराला जो एक ज्ञायकस्वरूप है, उसको ही आत्मा समझता है । यह पुरुष शरीर को शरीर समझता है, वचन को वचन समझता है, आत्मा को आत्मा समझता है । किसी एक का दूसरे के साथ मिलान नहीं है । यहां मन की कुछ चर्चा नहीं की जा रही है, इसका कारण यह है कि मन दो प्रकार का है – एक द्रव्यमन और दूसरा भावमन ।

द्रव्यमन यद्यपि भिन्न वर्गणावों से रचा गया है । जिन वर्गणावों से यह शरीर रचा गया है, उनसे नहीं, किंतु उनसे भी जो सूक्ष्म हैं – ऐसी भिन्न मनोवर्गणाएँ उनसे रचा गया है, फिर भी द्रव्यमन शरीर का एक अंंग है । द्रव्यमन को शरीर में ही शामिल कर लो । अब रहा भावमन । तो भावमन तो तर्क वितर्क विचार ज्ञान का नाम है । सो भावमन को सुधारने के लिए ही तो यह चर्चा की जा रही है । ज्ञानी पुरुष शरीर और आत्मा से पृथक अपने आत्मतत्त्व को प्रकट निहारता है ।


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