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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 55

From जैनकोष




न तदस्तींद्रियार्थेषु यत्क्षेमंकरमात्मन: ।तथापि रमते बालस्तत्रैवाज्ञानभावनात् ॥55॥

इंद्रिय के विषयों में ऐसा कोई भी विषय नहीं है, जो आत्मा के क्षेम, कल्याण, सुख को उत्पन्न करे । फिर भी यह बालक अर्थात् अज्ञानी जीव उन इंद्रियों के विषयों में ही अज्ञानभावना से रमा करता है । इंद्रियां पांच होती हैं – स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र । इनका विषय भी एक एक जुदा जुदा है अर्थात् पांच स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द । जगत् में जो कुछ भी उपयोग में आ रहा है, वह इन पांच विषयों में से कोई विषय उपभोग में आ रहा है । निश्चय से तो उन विषयों को आश्रय भेद बनकर अपनी कल्पना से अपनी कल्पनाएं ही भोग में आया करती हैं, किंतु वे कल्पनाएँ जिन विषयों का निमित्त पाकर उत्पन्न हुई हैं, उन विषयों में उपचार करके कहा जाता है कि यह अज्ञानी पुरुष इंद्रिय के विषयों को भोगता है और उन इंद्रिय के विषयों की कल्पना में जब यह जीव रहता है तो विषयों से आत्मा को कल्पना में एकमेक कर डालता है यह अज्ञानी ।

इसलिए कहा गया है कि यह जीव इंद्रिय के विषयों को भोगता है, पर उन विषयों में से कोई भी विषय ऐसा नहीं है, जो आत्मा को क्षेम तो करे । पहिली इंद्रिय स्पर्शन है। स्पर्शन इंद्रिय के तीन भोग हैं । जाड़ा गर्मी मिटाना भोग है, पर विकारभावों की अपेक्षा कामवासना यह स्पर्शन इंद्रिय का विषय है । मनुष्य यौवन अवस्था में कुछ विवेक नहीं रख पाता है और स्पर्शन इंद्रिय के विषय में लीन रहता है ।

फल यह होता है कि जब अवस्था ढल जाती है, तब वृद्धावस्था में इसे यह दिखता है कि हमने समय बेकार में गंवाया, किंतु आज हाथ कुछ भी नहीं आया है, बल्कि आत्मबल भी घटा, कर्मों का कितना बंध भी हुआ । सब तरह से लुट गया, पर हाथ कुछ नहीं लगा है। लुटने पिटने के बाद जो बुद्धि अक्ल आया करती है, वह अक्ल यदि लुट पिटने से पहिले आये तो इस जीव का कितना कल्याण हो ? साहित्यों के ग्रंथों में इस काम की वेदना और विडंबना के संबंध में बहुत बहुत वर्णन है । कामबाण से बिंधा हुआ पुरुष कितना व्याकुल रहता है ? उसे न खाना रुचता है और लंबी बड़ी श्वास खींचता है और अंत में बहुत सी विडंबनावों के कष्ट के पश्चात् मरण को प्राप्त होता है ।

स्पर्शन इंद्रिय के विषय में कौन सा विषय इस जीव को क्षेम करने वाला है ? रसना इंद्रिय के विषय को कहते हैं – खाया, खोया, बह गया । लोग रसना इंद्रिय के लोभ में आकर कितना तो श्रम करते हैं और कितनी आपत्तियां उठाते हैं । बहुत विडंबनाओं के पश्चात् एक दो सैकिंड का सुख पैदा होता है । जितनी देर जीभ की नोक पर वह विषय आया है, उतनी ही देर तो उसे कुछ मौज सा मिलता है । उस कल्पित मौज में वह आदत को भी खराब करता है और अपने स्वास्थ्य को भी खराब करता है । सात्विक भोजन रहे, पकवान मिठाई आदि गड़बड़ चीजें न रहें तो यह कितने ही कष्टों से बच जाए, बीमारियों से बचे और डॉक्टर का जो विशेष व्यय लादा जाता है, उससे बचे और धर्मधारण में भी इसका चित्त सही बना रहे आदि लाभ हैं । यह तो है लौकिक लाभ ।

परमार्थ लाभ यह है कि निज ब्रह्मस्वरूप की दृष्टि का वह पात्र रहा करता है । थोड़े समय को वह भोजन विषय के सुख है । देखो तो वही एक बेसन है, उसे बूँदी बनाकर खायें, अलग भुजिया बनाकर खायें, अलग नमकीन सेव बनाकर खाएँ, अलग पपड़ियां बनाकर खायें। इस जिह्वा में कैसी कला भरी है कि कैसे-कैसे, जुदा-जुदा स्वादों को यह लेती रहती है ? यह क्या बात है ? सब एक मामला है । भोजन रस अवश्य है । खाया, पेट भरा, खोया, बह गया। शान शौकत में और भोजन की ऐसी शान में जो व्यय किया जाता है, यदि ऐसा जीवन रहे कि रहन सहन तो वैसा हो, जैसा कि न अधिक धनी, न अधिक गरीब, सधर्मी, पड़ौसी लोग किया करते हैं ।

अच्छा तो रहे रहन सहन और पुण्य के उदय में यदि लक्ष्मी आ पड़ती है तो उसे दान के सदुपयोग में लावें । इससे लाभ क्या होगा ? पैसा क्यों जोड़ रहे हैं लोग ? लाभ हो गया, फिर भी तृष्णा क्यों ? कितना ही धन बढ़ जाए, फिर भी निषेध क्यों नहीं करते कि अब इसका संचय न करें ? क्या वजह है ? वजह यह है कि मैं इस दुनिया में शानदार पोजीशन वाला अच्छा कहलाऊँ । इतनी बात के लिए इतना सारा श्रम किया जा रहा है ।

क्यों भैया जी ! उस धन को यों अटपट न खर्चा जाए, किंतु दान में, उपकार में, संस्था में इन सब बातों को लगाया जाए तो दुनिया में क्या बड़ा न कहलायेगा ? अरे, इसमें तो कीर्ति बहुत दिनों तक रह सकती है और उसमें कीर्ति तो क्या, लोग पीछे गालियां देंगे कि इतना धनी है, मगर है पूरा मक्खीचूस । उस धन के संचय में कहां कीर्ति मिली, लेकिन तृष्णा में यह जीव सत्पथ को भूल जाता है । हां तो रसना इंद्रिय के विषय में यह जीव रत होकर पाप बँध भी करता है, अपनी तृष्णा भी बढ़ाता है और स्वास्थ्य का अलाभ भी करता है ।

कौन सा विषय ऐसा है, जिस विषय में इस आत्मा का हित हो ? अथवा मान लो सात्विक ही खाया और उससे ही चित्त है तो खाये खाये में ही कहां तक पूरा पड़ेगा ? पूरा तो तब पड़ेगा, जब द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म आदि तीनों प्रकार के बंधनों से छुटकारा मिले । इस जीवन में साधन तो अच्छे मिल गए कि घर बैठे ही किराया आ रहा है, ब्याज आ रहा है अथवा दुकान भी ठीक चल रही है, बड़ा मौज हो रहा है, सारा खर्चा भी बड़ी शान से चल रहा है । सारे सुख के साधन हैं, फिर भी इनसे क्या इस आत्मा का पूरा पड़ जाएगा ? इससे ही तो आत्मा का पूरा नहीं पड़ जाएगा ।

कब तक इस तरह से दिन कटेंगे ? मानों इस जीवनभर भी इसी तरह से दिन कट गए तो मरण के बाद में क्या यहां का कुछ साथ न जाएगा ? एक धेला भी मरण के समय साथ न जाएगा । साथ भी जाए, पर मरकर चींटी चींटा हो गए तो फिर वह किस काम आएगा ? क्या फिर इस जीव का पूरा पड़ेगा ? इस जीव का पूरा तो ज्ञानभावना से ही पड़ेगा। मैं ज्ञानमात्र हूं । भूल जावो शरीर के बोझ को और इसे खत्म भी करो । अपने उपयोग में मेरा शरीर भी चिपका है, यह भी ख्याल न रहे – ऐसा अंदर अंदर विहार करके एक ज्ञानज्योतिमात्र को निरखो । मैं ज्ञानज्योतिमात्र हूं – इस भावना में वर्तमानकाल में भी आनंद है और आगे के काल में भी आनंद है ।

तीसरी इंद्रिय का विषय गंध है । इत्र सूँघ लिया, सेंट लगा लिया, कोट की कालरों पर भी कुछ इत्र लगा लिया, फुवा लेकर कान में लगा लिया, सुगंध आ रही है, गुलदस्ता सामने है, बाग में घूम रहे हैं, मन भी बहला रहे हैं । अरे ऐसे कहां तक पूरा पड़ेगा ? आज गंध अच्छी मिली है, कल गंध न मिली तो यों दु:खी हो गए । अगर गंध में ही खूब रहे तो गंध का सुख तो दूर हो जाता है, फिर गंध का सुख नहीं रहता है । इन विषयों के भोगने की आसक्ति, इन विषयों के भोगने का आनंद तो तब होता है, जब विषयों का त्याग बहुत दिन तक रहे ।

जो जीव काम के व्यसनी हैं, वे कुछ ही समय बाद अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। वे फिर कामसेवन के योग्य भी नहीं रहते हैं । जो बहुत काल तक ब्रह्मचर्य रखते हैं अथवा जो बहुत दिनों तक कामसेवन नहीं करते, उनमें कामसेवन की शक्ति रहती है अन्यथा वे बिल्कुल बर्बाद हो जाते हैं । भोजन की भी बात तो देखो कि कुछ समय तक भोजन का त्याग कर दिया गया तो भोजन रुचेगा, पचेगा, अंग लगेगा और कोई खाता ही रहे तो उसे महीनों तक मूँग की दाल और रोटी बतायी जाएगी । हिसाब तो सब ठीक है, चाहे दो दिन खूब पकवान खा लो और चाहे 10 दिन मूँग की दाल पर रहो और चाहे रोज रोज सात्विक भोजन करते जावो मौज से । पैसों का हिसाब ठीक बैठेगा ।

भैया ! भोजन में रुचि तब मिलती है, जब उस भोजन का कुछ त्याग करें । सभी विषयों की यही बात है । उन विषयों के भोगने की सामर्थ्य तब मिलती है, जब उनका कुछ त्याग करें । इत्र बेचने वाले लोग अपनी दुकान पर 8 घंटे बैठे रहते हैं । हम तो समझते हैं कि उन्हें इत्र में मजा रहता होगा, क्योंकि सुगंध का भी आनंद तब आयेगा, जब गंध विषय का कुछ काल तक त्याग करें । आपकी नाक पर गुलाब का फूल अगर 20, 25 मिनिट धरा रहे तो आप थक जायेंगे । उस गंध को सूंघना फिर आप पसंद न करेंगे ।

चौथा विषय है आंख का रूप । क्या रूप किसी की पकड़ में आता है ? रूप को डिब्बी में कोई बंद कर सकेगा क्या ? यदि ऐसा कर सको तो जब आप बंबई जा रहे हों तो अपने बाल-बच्चों और स्त्री के रूप को संग में ले जावो । काहे को आप उनका वियोग सहें ? अरे रूप तो बाहर खड़े खड़े देख लो । इतनी ही बात बनेगी और हाथ लगावो तो रूप न मिलेगा, वहां स्पर्श मिलेगा । जो केवल बाहर से दिखनेमात्र की बात है, उसमें और क्या है ? उस रूप में पुद्गल आदिक के रूप हैं तो वहां कोमलता, कठोरता, रूखापन, स्निग्धता आदि बातें साथ होंगी । और क्या होगा ?

इस मनुष्य गति की पर्याय का यदि रूप है तो होगा – क्या अंदर मिला ? मात्र हड्डी, पसीना, थूक, नाक । जिस मल को देखने से लोग घृणा करते हैं, थूकते हैं वही मल प्रत्येक शरीर के अंदर भरा हुआ है और जिस हड्डी से घृणा करते हैं वह हड्डी भी इस शरीर के ही अंदर है । किसी रूप को देखकर, मुख को देखकर ऐसी कल्पना तो करो कि यह पतला-पतला चमड़ा और मांस यदि न होता तो इसकी शकल कैसी होती ? जैसी मरघट में पड़ी हुई खोपड़ी की शकल । कल्पना करके क्या नहीं देख सकते हैं ? असाररूप जब कल्पना से सर्वस्व मालूम पड़ सकता है तो यहां तो यथार्थ कल्पना करायी जा रही है । क्या वह मरघट की खोपड़ी जैसा चित्रण ज्ञान में न आ सकेगा ? रूप में भी क्या सार है और किस विषय में सार है, कौन सा विषय आत्मा का हित करने वाला है ? कुछ भी तो सोचो ।

अब कर्ण का विषय देखो – शब्द सुन लिया, भला लग गया । अब जहां से जिस पुरुष अथवा स्त्री ने वे शब्द सुने हैं उसके अधीन बनो, सेवक बनो । फिर उन शब्दों की ओर बाट जोहो । इच्छा में, प्रतीक्षा में बाट जोहने में क्लेश ही क्लेश है, आनंद कुछ नहीं है। कौन सा विषय ऐसा है जो इस जीव को सुखकारी हो सके । इंद्रियों को छोड़कर मन की भी बात देखो । मन का भी कोई विषय इस आत्मा का क्षेम कल्याण करने वाला नहीं है । मन के विषय में प्रमुख शब्द है प्रशंसा । जो मनुष्य आपके वश में न होता हो उसे प्रशंसा का विषपान कराकर बेहोश करके अपने वश कर लो । बहुत सरल तरकीब है । किसी से अधिक परेशानियां क्यों उठाते हो ?

वह मेरा विरोधी है, वह मुझसे कषाय रखता है । अरे क्यों तड़फते हो, क्यों परेशान होते हो ? थोड़ी ही तो तरकीब है । स्तवन, प्रशंसा कर बेहोश कर अपने वश बना लो । कहते हैं कि कोई गुड़ से न मरे तो विष खिलावो । जब संसार के ये प्राणी गुड़ से मरने के लिये तैयार बैठे हैं तो इन्हें विष खिलाने की योजना क्यों बनायी जाय ? सारा संसार इस कीर्ति यश, प्रशंसा की तृष्णा में मन के विषय में ग्रस्त है । ये विषय भी अहितकर हैं । अच्छा किसी एक व्यक्ति की एक दो घंटा लगातार प्रशंसा तो करते जावो । देखो वो उबता है या नहीं ? आखिर वह यही कहेगा कि अब प्रशंसा मत करो भाई । अब नहीं सहा जाता है । कितना ही कोई प्रशंसा का भूखा हो, लगातार प्रशंसा सुनही नहीं सकता । इससे यही मालूम होता है कि प्रशंसा भी एक झंझट है । तो कौन सा विषय ऐसा है जो आत्मा में क्षेम उत्पन्न करे ।

यह पूरा जगत् ज्वारियों का अड्डा है । जैसे ज्वारियों की मंडली कहीं पर जुवा खेलती हो और मानो कोई घर से 20 रुपये ही लाया हो, उसमें से 15 रुपया हार गया तो अब वह सोचता है कि 5 ही रुपये शेष बचे हैं, उनको लेकर अब घर चला जाऊं, तो संग वाले कहते हैं । बस हो गये, इतना ही दम था । किसी तरह से उसे उठने नहीं देते हैं, और मान लो 20 रुपये वह जीत गया तो वह चाहता है कि अब 20 रुपये जीत लिए, अब घर चले जायें तो खेलने वाले उसे उठने नहीं देते । वे कहेंगे कि तुम तो बड़े खुदगर्ज हो, आ गये हाथ में पैसे बस चल दिये । जब तक वह पूरा लुट पिट न जाय तब तक उसे उठने नहीं देते हैं । सो यहां पुण्य के फल में जीत, पाप के फल में हार माना जाने वाला यह ज्वारीयों का अड्डा है । यहां सब ये ही ज्वारी खेल रहे हैं ।

भैया ! पुण्य का फल मिला तो मान लेते हैं कि मेरी जीत हो गयी है, कोई पाप की बात आये तो मान लेते हैं कि मेरी हार हो गयी । सो पुण्य पाप, हार जीत की जहां बाजी लग रही है ऐसे इस लोक में यदि कोई प्राणी को किसी समय ज्ञान और वैराग्य की कुछ झलक आये और चाहे कि मैं यहां से हटकर कुछ आत्महित में लगूँ तो ये घर के लोग, पड़ौस के लोग, रिश्तेदार लोग, ये ज्वारी लोग उसे ऐसी बात कहते हैं कि वह वहां से उठ न सकेगा । लुट पिटकर मरे और जाय तो जाय, पर जिंदा तो न ही जाय । ऐसा यहां का बर्ताव है अथवा दूसरे के बर्ताव को क्या बुरा कहा जाय ? यह खुद ही उन बातों को चाहता है और कुछ ज्ञान और वैराग्य की बातें करता है तो वह अन्य लोगों से प्रशंसा लूटने के लिए करता है । जब खुद ही इतना चाव भरे है तो दूसरों को क्या दोष देना ? इन विषयों में कोई भी विषय ऐसा नहीं है जो इस जीव का कल्याण कर सके, किंतु देखो इतने पर भी यह बालक अर्थात् यह मिथ्यादृष्टि जीव अज्ञानभाव के कारण उन ही विषयों में रति करता है । यों खेदपूर्वक आचार्य यह शिक्षा दे रहे हैं कि इंद्रिय के विषयों में प्रीति मत करो ।


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