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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 56

From जैनकोष




चिरं सुसुप्तास्तमसि मूढात्मान: कुयोनिषु।

अनात्मीयात्मभूतेषु ममाहमिति जाग्रति॥56॥

महती विपदा – मोह के प्रेरे प्राणी अनादि से लेकर अब तक खोटी योनियों में ही चिरकाल से भ्रमते हुए अंधकार में सोये हुए हैं और उन अनात्मीय पदार्थों में ये मेरे हैं, इस प्रकार का दृष्टि रूप जागरण कर रहे हैं । अपने से भिन्न पर पदार्थों में ऐसी श्रद्धा होना कि यह मेरा है, इससे बढ़कर जगत में और कोई दूसरी विपदा नहीं है, यह व्यर्थ की विडंबना है । जिस प्रसंग में अपने हाथ कुछ नहीं आना है, अंत में रीते ही रह जाना है, ऐसी जो थोती कल्पनाएँ हैं इन कल्पनावों में यह सारा जगत परेशान हो रहा है । समस्त परपदार्थों से भिन्न अमूर्त ज्ञानमात्र निज आत्मतत्त्व का अनुभव बने, तो यही है वास्तविक धर्मपालन ।

ज्ञानियों की दया – भैया ! मोहियों की चेष्टा पर ज्ञानी को दया आती है । हो गया कोई करोड़पति तो धन के लिप्सु तो उसको महत्व देंगे जो स्वयं की लालसा बढ़ायेंगे, किंतु ज्ञानी पुरुष यों देखता है कि देखो तो, है तो यह ज्ञानमात्र एक चैतन्य पदार्थ, सबसे न्यारा, किसी से भी इसका संबंध नहीं है, किंतु कैसी दृष्टि बन रही है इन बाह्य जड़ पुद्गल ढेरों में कि यह मेरा है इस भ्रम में इसका निरंतर कर्म बंध हो रहा है – बाह्यपदार्थों में यह मेरा है ऐसी श्रद्धा में, ऐसे संस्कार में निरंतर पाप बंध हो रहा है । ये मोही जीव इसी पद्धति को लिए हुए हैं और इसी कारण इन्हें खोटी योनियों में भ्रमण करना पड़ रहा है ।

चिरकालीन विडंबना – इस जीव का आदि निवास निगोद अवस्था है जहां एक सैकेंड में 23 बार जन्म और मरण होता है । दस लाक्षणी के अंगपूजन में कहते हैं ना, दमरी रूँगन भाग बिकाया । यह जब प्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति बना अर्थात् मोटी पत्ती वाली भाजी बना और लोग दमरी की भाजी खरीदते थे, सो उसके रूँगन में जितनी पत्तियां डालीं उनमें अनंत जीव चले गये । अब तो लोग दमरी का नाम ही नहीं जानते । एक दमरी में कितना ही साग आ जाता था और आवश्यकता के लायक चीज एक दमरी में मिल जाती थी और बाद में भी थोड़ी भाजी दे देते थे । कहते कि लो यह तुम्हे रूँगन दे दिया । रूँगन कहते हैं कोई चीज खरीद लेने के बाद प्रयोगात्मक एक ऐहसान का आभार प्रदर्शन करना । भाई तुमने हमारा सौदा लिया है, तुम्हें धन्यवाद है, इतना तुम और ले लो । उस रूंगन में जो पत्ती आयी हैं उस पत्ती में अनंतानंत जीव आ गये, ऐसे हैं साधारण वनस्पति के जीव । एक दमरी के रूंगन में इतने जीव आये । ऐसी ऐसी खोटी योनियों में यह जीव सोया हुआ है, अंधकार में लीन है ।

प्राणी की दयापात्रता – यहां यह मोही प्राणी ऐसा जानता है कि हम बड़े चतुर हैं, हम इतनी दुकान संभालते हैं, ऐसी सुंदर व्यवस्था बनाते हैं, मुझमें बड़ी चतुराई है, पर ज्ञानी की दृष्टि में वह दया का पात्र है, अपने आपके आनंदनिधान चैतन्यप्रभु को बरबाद किये जा रहा है । जीव निगोद से निकला तो बन गया पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय और प्रत्येकवनस्पतिकाय । निगोद तो साधारण वनस्पतिकाय कहलाता है और जो निगोदरहित हरी है जो व्रतियों के लिए भक्ष्य हैं उन सबको कहते हैं प्रत्येकवनस्पति, और इतना ही नहीं, जो हरी खाने में आ सकती हैं, देखने में आ सकती हैं, अव्रती जिसे खाये वह भी प्रत्येकवनस्पति है । अंतर इतना है कि अभक्ष्य प्रत्येकवनस्पति तो सप्रतिष्ठत है, साधारण सहित हैं और व्रतियों के भक्षण के योग्य साधारणरहित प्रत्येकवनस्पति है । आजकल लोक में ऐसा प्रसिद्ध है कि आलू सकरकंद आदि चीजें साधारण वनस्पति हैं । अरे साधारण वनस्पति का तो शरीर दिखने में भी नहीं आता, छूने में भी नहीं आता । आलू वगैरह साधारण वनस्पतिसहित प्रत्येकवनस्पति हैं और अन्य पदार्थ तोरई आदिक ये साधारण वनस्पतिरहित प्रत्येक वनस्पति हैं । तो दमरी रूंगन भाग बिकाया । जो चीज भक्ष्य है वह भी छोटी अवस्था में साधारण सहित रहती है और अत्यंत कोमल भिंडी, तुरई, लौकी हर एक चीज अत्यंत जब छोटी होती है जरुवा उस समय साधारण सहित होती है ।

कुयोनियों की तुलना – अब बतलावो कहां तो यह मनुष्य जैसा जीव और कहां उन पत्ती और सागों में छिपा हुआ साधारणवनस्पति जीव या केवल साधारणवनस्पति जीव । तुलना करो खोटी योनियों की । यह कथा दूसरे की नहीं है । अपनी है, हम आप भी वही जीव थे । वहां से निकला तो पृथ्वी जल आदिक हुआ, स्थावर ही रहा और कुछ विकास हुआ तो दो इंद्रिय जीव हो गया । सो दो इंद्रिय जीवों के भी बड़ी बुरी दशाएँ दिखती हैं, रेंग रहे हैं, पिचल रहे हैं, अब उन पर दया कौन करता है ? तीन इंद्रिय जीव हुआ, चार इंद्रिय हुआ, असंज्ञी पंचेंद्रिय हुआ और सैनी भी हुआ । तो भी जब तक धर्म की वासना नहीं है तब तक तो योनियां ही हैं ।

शिक्षाप्रद प्रश्नोत्तर – एक मुनिराज थे, उन्होनें श्रावक के घर आहार किया, आहार के बाद आंगन में बैठ गए तो कुछ बातें हुईं । तो सेठ की बहू तो होगी 30, 35 साल की, वह कहती है मुनिराज से कि हे महाराज ! तुम इतने सबेरे क्यों आ गये ? अब बतावो चैत बैसाख के दिन, 9 – 10 बजे की धूप और पूछती है कि इतने सबेरे क्यों आ गये ? तो मुनि उत्तर देते हैं कि बेटी समय की खबर न थी । ओह सेठ साहब सब बातें सुन रहे थे । और अपने मन में बहुत कुढ़ रहे थे कि सुनने वाले लोग क्या कहेंगे कि कैसी बेवकूफ बहू लाये । इतने में फिर मुनि बोले – बेटी तुम्हारी उमर कितनी है ? लो अब साधुवों को उमर पूछने का क्या मतलब ? तो वह बहू जवाब देती है महाराज मेरी उमर 5 वर्ष की है । फिर पूछा कि तुम्हारे पति की उमर कितनी है ? तो बहू बोली कि पति की उमर 5 महीने की है और ससुर की उमर ? महाराज ससुर तो अभी पैदा ही नहीं हुए हैं । अच्छा आजकल तुम ताजा खा रही हो या बासी ? बहू बोली महाराज बासा ही खा रहे हैं । सेठ यह सब सुनता हुआ अपने मन में बड़ा दु:खी हो रहा है । सोचता है कि दोनों समय तो कढ़ाही जलती है, ताजी पूड़ियां बनती हैं और यह कह रही है कि बासी खा रहे हैं । और हमें कहती है कि अभी पैदा ही नहीं हुए । साधु महाराज तो चले गए । अब सेठ बहू के ऊपर बिगड़ने लगा । बहू ने कहा कि वहीं मुनि महाराज के पास चलो, सारा निर्णय वहीं हो जायेगा । दोनों वहां पहुंचे । तो क्या निर्णय हुआ सो सुनो ।

उक्त प्रश्नोत्तरों में शिक्षा – बहू ने यह देखा था कि वे मुनि थे छोटी उमर के, सो पूछा कि मुनिपद में तुम इतना जल्दी क्यों आ गए, इतने सबेरे क्यों आ गये ? तो मुनि ने यह जवाब दिया था कि समय की खबर किसी को नहीं है कि कब मरण हो जाय ? सो खबर नहीं थी इस कारण बहुत जल्दी आ गये । ठीक है, पर यह बतावो महाराज ! आपको बहू की उमर पूछने का क्या मतलब था और बहू ने कैसा उल्टा जवाब दिया ? तो वहां यह निष्कर्ष निकला कि बहू को 5 वर्ष से धर्म की श्रद्धा हुई, लौ लगी । सो बहू यह कह रही थी कि हमारी तो असली उमर 5 वर्ष की है । पहिले के 30 वर्ष तो मेरे व्यर्थ में गये । मैं उसे असल की उमर नहीं मानती और पति को 5 माह से धर्म की श्रद्धा हुई, सो उनकी असल की उमर 5 माह की है । अब देखो वहां ससुर साहब को गुस्सा बढ़ रही थी कि हम तो नीचा देख रहे हैं, यहां तो सारा मामला फिट होता जाता है । ससुर ने कहा महाराज ! हमें तो यह बताती है कि अभी पैदा ही नहीं हुए । बाल हमारे सारे सफेद हो गये और बहू कहती है हमें कि अभी पैदा ही नहीं हुए । तो बहू कहती है―महाराज देखो ये अभी तक भी लड़ रहे हैं, बतावो इन्हें पैदा हुआ कौन कहेगा, अभी तक इनकी समझ में नहीं आया । धर्म की वासना अभी तक इनके नहीं जगी तो इन्हें पैदा कैसे कहें ? ठीक है, मगर ताजा बासा का क्या मतलब ? तो बहू ने बताया कि सेठ जी अब कुछ नया धर्म तो नहीं कर रहे हैं, जो पूर्व जन्म में ही करके आये थे, उसके ही पुण्य के प्रताप से आजकल सब आराम भोग रहे हैं ।

वास्तविक जीवन – सो भैया ! जीवन तो वही है जो जीवन धर्म से बसा हुआ हो । धर्मरहित मनुष्य हो कोई, झूठ बोलता हो, परस्त्रीगामी हो, वेश्यागामी हो, निर्दयी हो, अवगुणों से लदा मनुष्य हो तो उसे न वर्तमान में चैन, न कोई भविष्य का ठिकाना, ये ही तो कुयोनियां हैं । धर्म की वासना मिले, सत्संग मिले, उत्तम बात विचारने को हो, सुनने को हो, बोलने को हो, उससे बड़ा और सौभाग्य क्या ? जीवन तो वही है । यह मूढ़ आत्मा बड़ी दुर्लभ मनुष्य अवस्था को भी प्राप्त कर लेता है, किंतु यहां भी अपनी कला का उपयोग विषयवासना में लगाता है । तो यों मूढ़ प्राणी चिरकाल से इस गहन अंधकार में सो रहा है । परपदार्थों से इस जीव का कुछ लेन देन नहीं है, परपदार्थ अपने में परिणमते हैं, यह जीव अपने में परिणमता है लेकिन परपदार्थों में यह संकल्प हो जाना कि यह मेरा है, यह ही है इस जगत् पर घोर संकट । ऐसी संकटमय अज्ञानग्रस्त जिंदगी क्या जिंदगी है ?

पराधीनता – भैया ! अनुभव करके देखलो जितना अलग अपने अपने को अनुभव करेंगे उतनी तो शांति होगी और जितना दूसरों से मिला हुआ हूं ऐसा अनुभव करेंगे बस वही अशांति है । कहते तो हैं सब लोग कि ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं, करि विचार देखेहु मनमाहीं ।’ पराधीन दशा में सुख नहीं होता है, किंतु उस पराधीनता का अर्थ इतना ही लगाकर तुष्ट हो जाते हैं – दूसरों के वश हों अथवा न हों, कोई चीज न मिलती हो, उसकी बाट जोहते हो, किसी परवस्तु को तरसते हों, दूसरे के हाथ में अपने खाने पीने इत्यादि की बातों को यह जीव मानता है कि यह पराधीनता है । और क्यों जी, खूब संपदा है, आय भी खूब हो रही है, घर के लोग भी अनुकूल हैं, सारे ठाठ और आराम हैं, वह पराधीन है या नहीं? अरे वह भी पराधीन है और कहो उस प्रथम व्यक्ति से भी ज्यादा पराधीन हो । उसके राग बढ़ रहा है, स्नेह हो रहा है, अपने आपके महत्व को खो रहा है, अपना सर्वस्व समर्पण करके लुट रहा है । प्रतीति में, मोह में, स्नेह में जैसे लोग बोल देते हैं – हमारे तो तुम्हीं सब कुछ हो अर्थात मैं अपने लिए अपना कुछ नहीं रहा । इतना तक अपने आपको समर्पण कर देते हैं और फिर भी यह मोही जीव उस संपदा में यह मानता है कि मैं स्वाधीन हूं और दूसरे पराधीन हैं ।

पराधीनता की तुलना – कुछ वर्तमान में भी तुलना कर लीजिए । एक पुरुष सर्विस की आजीविका करता है और एक पुरुष दुकान की आजीविका करता है । इन दोनों में से लोग तो यह कहते हैं कि सर्विस वाला पराधीन है और दुकान वाला स्वाधीन है, पर अनुभव करके देखलो लोकदृष्टि से सुख की निगाह से सर्विस वाला स्वाधीन है अपेक्षाकृत उस दुकानदार के । सर्विस वाले ने तो काम किया, उसे उसमें ममता नहीं है । किया काम फिर पीछे उसका ख्याल नहीं, कर्तव्य निभाया और अपने मौज में हैं, पर यहां तो रात दिन सोचना पड़ता है, उसी के सपने हैं । कुछ घाटा हो जाए, कुछ कमी हो जाए, इसका क्लेश है । न भी कुछ कमी हो जाए तो भी कल्पनाएँ करके क्लेश बन रहा है । यहां पर यह निर्णय नहीं दे रहे हैं कि कौन स्वाधीन है और कौन पराधीन है ? यहां तो सभी पराधीन हैं । जब इंद्रिय के विषयों से प्रेम है, विषयसाधनों से मोह है, तब तक यह जीव पराधीन है ।

पराधीनता और परेशानी – जो पराधीन है, वही परेशान है । परेशान का क्या अर्थ है? है तो यह उर्दू शब्द, पर संस्कृत में अर्थ लगा लो इसका – पर ईशान है । ईशान मायने मालिक अर्थात् जो पर को अपना मालिक समझे, उसे परेशान कहते हैं अथवा जिसने पर को अपना स्वामी माना है, उस पुरुष का नाम है परेशान । जहां किसी पर को स्वामी मान ले, वहीं तो सारी हैरानी है । इससे बढ़कर और क्लेश जगत् में कुछ नहीं है कि है तो नहीं मेरा और मान रहे हैं कि मेरा है । सबसे महान् पाप सबसे बड़ा भयंकर, सबसे बड़ी विपदा आदि इतने परिणाम को कहेंगे । है तो भिन्न और मान लिया कि मेरा है, यह बात आराम से प्राय: सुन ली जाती है, किंतु वह कितना दु:खी है, इसे दूसरा क्या जाने । परपदार्थों को कि ये मेरे हैं – ऐसा मानना ही दु:ख का कारण है । जो प्राणी परपदार्थों को अपना मानता है, वह कितना दु:खी है ? कितना पाप में डूब रहा है ? इसकी असली खबर ज्ञानी पुरुष को ही होती है और उनको उस पर बहुत करुणा उत्पन्न होती है ।

परमकरुणा तीर्थंकरप्रकृति का बंध कराने वाली करुणा है । देखो संसार के समस्त जीव स्वरूपदृष्टि से तो प्रभुवत् चैतन्यमात्र शुद्ध ज्ञायकस्वरूप हैं, किंतु क्या अवस्था हो रही है भ्रम के कारण से ? चीज कुछ भी नहीं है और इतनी अत्यधिक दुर्दशाएँ हो रही हैं केवल एक मिथ्या कल्पना के कारण ।

न कुछ का डर – चैत बैसाख के महिने में, जबकि गेहूं कटा करते हैं, शाम के समय खेत काटने वाले चैतुओं से खेत के मालिक ने कहा कि जल्दी चलो, अंधरी आ रही है । हमें जितना डर शेर का नहीं है, उससे अधिक डर अंधेरी का है । यह बात शेर ने सुन ली । शेर ने सोचा कि अरे मुझसे भी कोई डरावना प्राणी अंधेरी होता है । सब लोग तो घर चले गये । अब वहां शेर डर रहा था कि कहीं अंधेरी न आ जाए । उसी समय किसी एक कुम्हार का एक गधा गुम हो गया । सो अंधेरी रात में ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह कुम्हार शेर के पास पहुंचा । उसने समझा कि यही हमारा गधा है, सो उसका एक कान पकड़ा, दो चार डंडे जमाए और बोला कि अरे मैं ढूंढ़ते ढूंढ़ते परेशान हो गया, तू यहां आकर छिपा है । शेर ने समझ लिया कि आ गयी अंधेरी।

अब जैसा चाहा, उस तरह से उसको पकड़ कर वह कुम्हार ले गया । अरे बताओ कि वह अंधेरी क्या है ? उसके हाथ हैं, पैर हैं, क्या हैं ? कुछ भी तो उसमें नहीं है, मगर यह ख्याल बन गया । ऐसा बलवान् शेर भी कुम्हार के चंगुल में फंस गया ।

भ्रम का उन्माद – यों ही जगत् में प्राणीयों का यह ख्याल बन गया है कि यह मेरा है। इस संकल्प का बोझ शिला से भी अधिक है । इस मुझ पर कोई शिला भी पटक दे तो वह भी अच्छा है । इस अमूर्त आत्मा का वह शिला क्या बिगाड़ेगी ? उस शिला से भी भयंकर बोझ इस आत्मा का यह है कि अन्य पदार्थों में यह कल्पना जग गयी है कि यह मेरा है । यह तो अपने विचार और अनुभव से जान लो कि कैसा रंग चढ़ा हुआ है, अपना टूटा फूटा घर है, उसमें ममता लगी है कि यह मेरा है । यहां इतनी मिट्टी निकल गई है, इसे फिर से लीप दें, ठीक कर दें । दूसरे का घर खंडहर पड़ा हो तो उसके ज्ञाता दृष्टा रहते हैं । यह जान लिया है । अपने कुटुंब के बच्चे को और सदस्यों को निरख कर कैसा मोहीजनों को श्रद्धान् होता है कि ये मेरे सब कुछ हैं, इनसे ही मेरा बड़प्पन है । लोग जानेंगे कि यह मेरा सब कुछ है । अरे लोग क्या जानेंगे ? लोग तो असल में केवल निंदा ही करते हैं ।

यदि कोई कह दे कि आप इन्हें पहिचानते हैं, ये अमुक सेठ जी हैं, इनके चार लड़के हैं―एक मिनिस्टर है, एक कलेक्टर है, एक इन्सपेक्टर है और एक डाक्टर है । उसके कहने का मतलब यह हुआ कि सेठ जी कौरे बुद्धू हैं । इनके लड़के बड़े अच्छे हैं । अर्थ तो यह निकला, पर ममता से वह सेठ मान लेता है कि इसने मेरी बड़ी प्रशंसा की ।

स्वतंत्रताकी दृष्टि का आदर – भैया ! कोई किसी की प्रशंसा क्या करेगा ? यदि अपने अंत:गुणों को देखो तो किसी में सामर्थ्य नहीं है कि मेरी कोई प्रशंसा कर सके । मैं तो महतो महनीय हूं, उस स्वभाव को कोई पहिचानता नहीं है । पहिचान भी जाए तो उससे कोई बोलता नहीं, उससे कोई व्यवहार करता नहीं । जब मैं दोनों दोषों पर दृष्टि डालता हूं तो मैं कुछ प्रशंसा के योग्य ही नहीं हूं । परपदार्थों में ‘यह मेरा है’ ऐसी बुद्धि बन जाए तो यह घोर अंधेरा । प्रभु से प्रार्थना करो, अपने अंत: प्रभु से भी भावना करो कि हे नाथ ! कुछ भी कष्ट आयें, कुछ भी विपदा आयें, विपदा तो प्रिय है मुझे । इन विपदावों से तो कुछ सूझ मिलेगी । राग की नींद में सोये हुए प्राणी को विपदा जगाती है । विपदा आये अच्छा है, किंतु परपदार्थों में ‘यह मेरा है’ इस प्रकार का संकल्प मत जगो । एक यह मोह भाव न रहे तो आत्मा को शांति का पथ मिलेगा ।


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