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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 57

From जैनकोष




पश्येन्निरंतरं देहमात्मनोऽनात्मचेतसा ।अपरात्मधियाऽन्येषामात्मतत्त्वं व्यवस्थित:॥57॥

स्वपरविवेचक दर्शन – अपने आपको समाधिभाव ही परमशरण है-ऐसी प्रतीति रखने वाला अंतस्तत्त्व का रुचिया ज्ञानीसंत अपने आपको प्रतिबोध रहा है और ऐसे ही भव्य जीवों को भी यह प्रतिबोधन कर रहा है कि हे कल्याणार्थी आत्मन् ! तू देखता तो है देह को, चाहे अपने देह को देख रहा हो, चाहे पर के देह को देख रहा हो, पर इस देखने के प्रसंग में तू इस तरह से जान कि यह जो मेरा देह है ऐसा यह वास्तव में मैं नहीं हूं, अर्थात् यह देह मैं नहीं हूं और इसी तरह से जब तू दूसरे देहों को देखता तब भी यह समझ कि ये अन्य देह भी ये अन्य आत्मा नहीं । जैसे इस देह में रहता हुआ भी यह देह मैं नहीं हूं इस देह से मैं न्यारा हूं, इसी तरह से जब तू दूसरे देहों को देख तब भी यह समझ कि इन अन्य देहों में रहते हुए भी ये देह भी अन्य आत्मा नहीं है । ये दूसरे जीव भी इन देहों से न्यारे हैं । ऐसा देखने से तू आत्मतत्त्व में व्यवस्थित हो जायेगा ।

नि:संकट आत्मस्वरूप – भैया ! इस लोक में संकट एक नहीं है । हम आप सबकी बात कही जा रही है । जो संज्ञी जीव होते हैं, जिनके मन का संयोग है उन जीवों की बात कह रहे हैं । हम और आप को संकट एक नहीं है किंतु जब हम अपने शील को खोकर परवस्तु को अपनाते हैं, उन्हें अपनी मानते हैं बस वहीं इतनी कल्पना में संकटों का जाल बिछ जाता है । क्या है संकट इस जीव को ? मानते जावो संकट और अपने सामने धरते जावो । कोई घर का इष्ट पुरुष मर गया है, लो इस संकट को भी सामने रख लो कुछ धन नष्ट हो गया है, चोर धन चुरा ले गये हैं, इन संकटों को भी सामने रख लो, नुकसान हो गया है, टोटा हो गया है, लोगों ने अपमान कर दिया, गाली दे दिया, इन सारे संकटों को अपने सामने रख लो और अब जरा धीरे से अपने आपके प्रभु से मिलकर यह भी दर्शन करलो कि यह मैं आत्मा आकाश की तरह निर्मल अमूर्त किंतु ज्ञानानंदमात्र सबसे न्यारा हूं । यह मैं आत्मा तो उतना ही हूं जितना कि मेरा स्वरूप है । इतना ही मैं हूं और इतना ही रहूंगा । जरा अपने आपके इस प्रभुताई के दर्शन कर लो, वे सारे संकट जो बहुत दिनों में इकट्ठे हो पाये थे वे सब एक ही साथ दूर हो जाया करते हैं ।

सुगम स्वाधीन अपूर्व साहस की आवश्यकता – भैया ! संकट और विश्राम की पद्धति और है ही क्या ? केवल विचारों की ही तो बात है, एक अंतरंग साहस की ही तो बात है । एक यों ही थोड़ी पुरानी घटना सुनते हैं कि बुंदेलखंड में किसी राज्य में राजा के यहां एक पहलवान आया । जो सब जगह कुश्तियां खेलता हुआ, जीतता हुआ आया और राजा से बोला कि आपके सुभटों में से यदि कोई पहलवान हो तो हम कुश्ती करने आये हैं । सभी लोग बैठे थे । किसी सुभट को हिम्मत न हुई तो एक दुबला पतला गांव का आदमी खड़ा होकर बोला, महाराज हम इससे लड़ेंगे । सब लोग देखकर आश्चर्य करने लगे कि एक धक्के में जो गिर पड़ेगा ऐसा दुर्बल यह कह रहा है कि मैं लड़ूँगा । हां महाराज मैं लड़ूँगा, संदेह क्यों करते हो ? अच्छा भाई, नामकरण हो गया, यह कुश्ती खेलेगा । तो वह दुबला पतला बोलता है कि मैं इस तरह न लड़ूँगा । 15 दिन की इसे मोहलत दे दो, नहीं तो यह हार जायेगा तो कहेगा कि हम थके थे सो हार गये । पहिला रोब तो यों जमाया । 15 दिन की मोहलत उसे दे ही गई । तो अब जब समय आया तो कहा ऐसे न लड़ेंगे, पहिले यह अपनी चेत करे, नहीं तो बहना बनायेगा कि हमारी असावधानी में ऐसा हो गया कि हार गये । और भी एक दो बातें ऐसी कहीं कि उसके दिल को आधा बना दिया और फिर थोड़ी ही देर में अपने दाहिने हाथ को पहलवान की आंखो के सामने से निकाल कर उसके पैर पकड़ कर उसे पछाड़ दिया । साहस की ही तो बात है । यहां हम आप दु:खी हो रहे हैं रात दिन, साहस करलें तो फिर यहां कोई दु:खी ही नहीं है ।

संकटहारी नि:संकट साहस – अच्छा, संकट मेटने के लिये क्या साहस कर लें ? सच्ची बात मान लें, कोई लाग लपेट नहीं रखना है, कोई विडंबना वाली बात नहीं करना है किंतु जो यथार्थ बात हो उसे मानें । मैं ज्ञानानंदस्वरूप हूं, केवल जाननस्वरूप हूं, जितने पृथक मुझसे अन्य सब जीव हैं उतने ही पृथक घर में आये हुए ये दो चार जीव हैं । जितने पृथक जगत् के और सब धन वैभव हैं उतना ही पृथक जिसको अपना मान रक्खा है वह सब वैभव है । ऐसी एक हिम्मत बनानी है, इसी से सुख है, आनंद है । देख जब तू दूसरे देहों को देख ले तब इस तरह से देख कि ये सब देह जुदे हैं और इनमें बसने वाला आत्मा न्यारा है । जैसे कोई मकान को यह कह दे कि यह सेठ जी खड़े हैं तो यह कितनी भद्दी बात है, ऐसे ही इस देह को ही हम यह कह दें कि यह मैं हूं व ये दूसरे आत्मा हैं, यह भी उतनी ही भद्दी बात है । घर में रहने वाला सेठ जैसे घर से जुदा है और कोई घर को निरखकर कहे कि यह सेठ जी खड़े हैं तो कितनी अपमान की बात है ? ऐसे ही इस देह को देखकर यह क्यों कह रहे हो कि यह मैं बैठा हूं, यह मैं खड़ा हूं । जैसे घर में रहने वाला सेठ घर से न्यारा है ऐसे ही देह में रहने वाला यह मैं आत्मा देह से न्यारा हूं ।

देह और आत्मा की परस्पर विलक्षणता – भैया ! इस देह के जितने भी वाचक शब्द हैं उन शब्दों का अर्थ देखो तो उससे ही नि:सारता मालूम होती है । देह उसे कहते हैं जो ढेर रूप बन जाय । शीर्यते इति शरीरं । जो शीर्ण हो, गल जाय उसे शरीर कहते हैं । संचीयते इति काय: । जो संचित किया जाय, खुद यों नहीं है उसे काय कहते हैं । तो समझ लीजिए कि ये सब मायामय है, ये सब शुरू से भी कुछ नहीं है, ये कोई परिपूर्ण स्वतंत्र तत्त्व नहीं हैं, किंतु यह मैं समस्त विश्व का जाननहार ऐसा उत्कृष्ट व्यवस्थापक अनंत एश्वर्यसंपन्न आत्मा हूं।

अंतस्तत्त्व की झलक का आनंद – इस आत्मा के अंत:स्वरूप का वर्णन किया जाना बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी कठिन पड़ता है । हम आप सरीखे मंद बुद्धि वाले उनके विषय में क्या कह सकें ? केवल एक दिशा का अवलोकन जरूर किया जा सकता है । चाहे हम वर्णन न कर सकें किंतु इसका दर्शन हो जाय तो वर्णन करने वाला और वर्णन न कर सकने वाला यह मैं दोनों को ही स्वाद समान ही आयेगा । कोई भोजन में क्या-क्या बना है, कैसा पकाया है आदि व्यवस्था का वर्णन न कर सके और भोजन करे तो उसे भी वह स्वाद आयेगा जो भोजन का बहुत-बहुत वर्णन करके स्वाद ले रहा है । तो जिसके एक दिशा के अवलोकन में भी अतुल आनंद भरा है ऐसा यह मैं आत्मतत्त्व इस देहरूप नहीं, किंतु देह से जुदा हूं ।

दृष्टांत में मजहबी नामों में हितशिक्षण – इस आत्मा को कितने ही शब्दों से कहो वे सब आत्मा की महनीयता बताते हैं । जैसे कि धर्म के जितने भी नाम हैं वे सब नाम धर्म की महनीयता बताते हैं । जैसे शैव जो शिव स्वरूप हो उसे शैव कहते हैं । शिव का अर्थ है कल्याण । जो कल्याणस्वरूप को अनुभवे, जाने उसे शैव कहते हैं । इस शब्द ने भी परमशरणभूत निजअंतस्तत्त्व का संकेत किया । वैष्णव जो विष्णु स्वरूप को माने उसे वैष्णव कहते हैं । विष्णु का अर्थ है जो सर्वत्र व्यापक रहे । व्याप्नोती इत्येवं शील: विष्णु: । खूब छानो, खूब देखो ऐसा कौन सा तत्त्व है जो सब जगह व्याप कर रह सकता है ? वह तत्त्व है ज्ञान । इस समय आपका ज्ञान कहां तक फैला होगा ? यदि बंबई वगैरह की चिंता हो गई होगी तो बंबई तक आपका ज्ञान फैल गया और इसी आंगन में आपका चित्त लगा है तो इतने आंगन में ही आपका व औरों का भी ज्ञान फैल गया । कहीं किसी ज्ञान से किसी ज्ञान की टक्कर तो नहीं लग रही है ? यह ज्ञान स्वभावत: असीम है । इस ही ज्ञानस्वरूप का नाम विष्णु है, इसकी जो श्रद्धा करे उसे ही वैष्णव कहते हैं ।

ईसाई – जो ईश की भक्ति करे, ऐसे लोग ईसाई कहलाते हैं या ईसाई मजहब को कहते हैं। ईश नाम समर्थ का है । जो समर्थ हो, प्रभु हो, गुणविकास मे परिपूर्ण हो, उसकी भक्ति करने वाले ईशाई कहलाते हैं । शब्दों में देखो तो एक उपदेश की दिशा मिलती है । यह बात दूसरी है कि अपने शब्दों के मुताबिक कोई आचरण रक्खे अथवा न रक्खे । मुसलमान मायने मुसले ईमान अथार्त् जो अपनी सच्चाई पर कायम रहे, वह है मुसलमान ।

सच्चाई क्या है ? जो वस्तु का स्वरूप है, उस सही स्वरूप पर कायम रहे, विपरीत आशय न बनाये । देखो शब्दों से कितनी शिक्षा मिल रही है ? जैन―जो रागादिक शत्रुओं को जीते, रागद्वेष की स्फूरणा न होने दे, उसे जिन कहते हैं और जिनोपदेश को जो माने उसे जैन कहते हैं । सनातन कहते हैं अनादिअनंत तत्त्व को, जिसका न कभी आदि है और न अंत है । ऐसा तत्त्व कौन है ? हम आप सभी का स्वभाव दृष्टि से ही निरखा गया अंतस्तत्त्व यह सनातन है । इस सनातन तत्त्व की दृष्टि हो तो उसे कहते हैं सनातनी । जैसे मजहबों के शब्दों में एक एक शिक्षा भरी हुई है । यों ही आत्मस्वभाव के वाचक जितने शब्द हैं, उन शब्दों में भी शिक्षा बसी हुई है ।

आत्मा के अर्थ में हितशिक्षण – इस आत्मा का नाम है आत्मा । ‘‘अतति सततं गच्छति जानति इति आत्मा’’ । जो निरंतर गमन करे, उसे आत्मा कहते हैं । गमन का अर्थ जानना है, क्योंकि सबसे तेज गमन करने वाला ज्ञान है । ज्ञान की गति सबसे तेज होती है । जो निरंतर जाने, उसका नाम आत्मा है । इससे यह जानों कि इस आत्मा का स्वभाव निरंतर जानते रहने का है, यही इसका शील है । जैसे उपदेश हो कि अपने शील की रक्षा करो । तो काहे की रक्षा करोगे ? इस ज्ञातादृष्टापन की रक्षा करो । तुम समस्त पदार्थों के मात्र ज्ञातादृष्टा रहो । इस शील में रहने वाले पुरुष को कभी संकट आ ही नहीं सकता । इस परमार्थशील से चिगे और परपदार्थों में यह मैं हूं, यह मेरा है―ऐसी प्रतीति रखे तो वहां संकट अपनी उद्दंडता के कारण अपने आप ही आएगा ।

ज्ञानयोग – भैया ! ऐसे दुर्लभ मनुष्यभव को पाकर बुद्धिमानी का काम यह होगा कि अपने आपमें गुप्त ही रहकर भीतर में इस धर्म की कमाई कर लो अर्थात् यथार्थ ज्ञान और यथार्थ विश्वास की दृढ़ता बना लो । जब आखिर कुछ साथ रहना नहीं है, सब कुछ विनष्ट होगा, सब कुछ छोड़ कर जाना होगा, तब हम अपने जीवन में ही अपने ज्ञानबल से उन्हें छूटा हुवा जान लें तो अभी ही सुखी हो जाएँ । अन्यथा ऐसी हालत में समझो कि जैसे लोग अपने बाप को जिंदा रहने तक तो सुख से नहीं रहने देते और बाप मर जाए तो हर साल 25, 30 रुपए खर्च करते हैं । कहीं गया जी, कहीं और कहीं । 10, 20 और 50 रुपये खर्च करके श्राद्ध करते हैं । अरे, अब जितना खर्च कर रहे हो, उसका थोड़ा भी कम करके जिंदगी में खर्च किया होता या प्रेम से बोला होता तो यह उस श्राद्ध की अपेक्षा भला था । मरे के बाद खबर लेने की अपेक्षा जिंदगी में कुछ खबर लेना, यह ज्यादा अच्छा था ।

ऐसे ही समझो कि परवश होकर या मरने के कारण या पापोदय के कारण आपका यह धन दौलत परिग्रह छूटता है तो उससे अच्छा यह है कि अपनी राजी खुशी, अपनी प्रसन्नता के साथ स्ववश होकर जीवन में उसे अपने से भिन्न मान लें ।

समागम को भिन्न मान लेने की पहिचान – आपने उसे वास्तव में भिन्न माना, इसकी पहिचान यह है कि योग्य काम देखकर अन्य को दीन दु:खी देखकर या कोई धर्मप्रभावना की बात निरखकर उस धन के खर्च करने में रंच भी संकोच नहीं होना – ऐसी उदारता ही इसकी पहिचान है कि अपने जीते जी जीवन में समस्त अन्य पदार्थों को अपने से न्यारा समझा है । संकट अन्यत्र कहां हैं । जैसे लोग कहते हैं कि गरीब हो या धनी हो, सब अपने अपने घर के बादशाह हैं । साधारण रिक्शा चलाने वाले भी अपनी गद्दी पर बादशाह हैं । जैसे इस सारे लोक में यह बात कहते हैं कि ऐसे ही स्वरूप में यह बात पड़ी हुई है कि प्रत्येक जीव अपने आपमें अपने आपका बादशाह है, सर्वेसर्वा है । अरे निज सहजस्वभाव को निरखो तो वहां आनंद ही आनंद है ।

परिजनों के साथ वास्तविक मित्रता – भैया ! परिवार का संग मिला है तो वास्तविक मित्रता यह होगी कि स्वयं ज्ञानी अधिक विरक्त बनें, ज्ञान और वैराग्य के मार्ग पर चलकर जीवन सफल करें और ऐसे ही मार्ग पर दूसरों को लगावें, तब तो सच्ची मित्रता है अन्यथा विषयकषायों के तो ये जीव प्रकृत्या रुचिया हैं ही, इनका विषयकषायों में चित्त सुगमता से लग जाता है और फिर हमने अनेक विषयकषायों के पोषने की बात कह दी या साधन में जुटा दिया । एक तो वह स्वयं गड्ढे में गिर रहा था, दूसरे अपन ने उसे धक्का लगा दिया तो यह बैर का ही काम किया, मित्रता का काम नहीं किया, परंतु वाह रे मोह ! बैर के काम को तू मित्रता की बात समझता है और वास्तविक मित्रता की बात को तू गैर बात समझता है ।

प्राकरणिक शांतिशिक्षण का उपसंहार – कल्याणार्थी पुरुष अपने देह को यों निरखे कि यह मैं नहीं हूं और दूसरे के देह को यह निरखे कि यह पर का आत्मा भी इन देहोंरूप नहीं है। यों निज और पर के यथार्थस्वरूप को देखो तो वह इस आत्मतत्त्व में व्यवस्थित होकर अपने आपमें शांति प्राप्त कर सकता है । शांति अन्यत्र कहीं भी तो नहीं है । शांति का तो स्वरूप ही यह आत्मा है । इस ओर दृष्टि देने मात्र से ही सारे संकट समाप्त हो जाते हैं ।


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