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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 59

From जैनकोष




यद् बोधयितुमिच्छामि तन्नाहं यदहं पुन: ।

ग्राह्यं तदपि नान्यस्य तत्किमन्यस्य बोधये॥59॥

जल्परिहार का संकल्प – इससे पहिले के श्र्लोक में यह बताया गया था कि ज्ञानी पुरुष व्यामोही आत्माओं के प्रति यह चिंतन कर रहा है कि यह पर्यायमुग्ध मूढ़ प्राणी आत्मतत्त्व को समझा समझाया भी नहीं जान सकता है । जैसे बिना किए समझे अपने ही पर्यायों में मुग्ध रहा करता हैं, आत्मतत्त्व को नहीं जानता, इसी प्रकार व्यामोह का रंग चढ़ा होने से समझाया जाने पर भी यह इस आत्मतत्त्व को नहीं जान सकता हैं । इसका कारण इनके लिए समझाने में समय और श्रम लगाना, इससे लाभ क्या है ? यों जानकर वह उनसे मध्यस्थ रहा करता है । अब इस श्र्लोक में सभी के प्रति वचनालाप न करने का चिंतन किया जा रहा है ।

प्रतिबोधन का अनवकाश – जो यह (स्वकीय आत्माधिष्ठित देह पिंड अथवा मनुष्य) मैं समझाने को चाहता हूं, वह मैं नहीं हूं और जो मैं हूं, वह अन्य के याने जिसे समझाना चाहता हूं, उसके ग्राह्य नहीं है । तो अब बताओ कि यह कौन मैं अन्य जीवों को समझाऊँ ? जो समझाने जैसी पयार्य में उन्मुख है अथवा चेष्टा कर रहा है, वह मैं नहीं हूं । जो मैं वास्तव हूं, वह कुछ नहीं ग्रहण करा सकता, तब यह कौन मैं अन्य को समझाऊँ ? जो परमार्थ मैं हूं, वह निश्र्चेष्ट विशुद्ध ज्ञानमात्र है और जो लौकिक मैं हूं, वह तो उपचारमात्र का "मैं" है, फिर मैं समझा ही नहीं सकता । अत: समझाने का व्यर्थ परिणाम क्यों करुँ ?

प्रतिबोध्यता का अनवकाश – जिसको मैं समझाने के लिए चाह रहा हूं अर्थात् दृश्यमान यह देह जो मेरी आंखो में दृष्टा हो रहा है, ऐसा यह देह जिसको कि मैं समझाने की चाह करता हूं, वह मैं नहीं हूं । जो मैं हूं वह अन्य को ग्राह्य नहीं, फिर अन्य को क्या समझाऊँ? यहां एक आशंका हो सकती है कि जो आंखों के सामने दिखने वाले देह पिंड हैं, जिनको कि मना किया जा रहा है, उसे यह कहते कि यह आत्मा नहीं है, तो बात युक्त होती, पर जब यों कह रहे हैं कि मैं जिस देहपिंड को समझाना चाहता हूं, वह मैं नहीं हूं । इसका अर्थ क्या है ? तो यहां यह ज्ञानी उस आत्मतत्त्व को निरखने के समय में अन्य भाव नहीं कर रहा है । इस ही कारण से तो परआत्मा में भी परत्वरूप से उपयोग नहीं दे रहा है, किंतु जातिरूप से तक रहा है ।

प्रतिबोधन की अशक्यता – मैं आत्मा स्वतंत्र हूं, मैं किसी पर के द्वारा ग्राह्य नहीं हो सकता, दूसरे लोग मुझे ग्रहण नहीं कर सकते । मैं किसी को समझाने का यत्न करुं तो वस्तुत: मैं किसी को समझाने का यत्न नहीं कर सकता, क्योंकि वे सब भिन्न पदार्थ हैं । मैं दूसरों को कुछ बताना चाहता हूं कि यह मैं हूं । यह मुझे जान जाए, मुझे समझ जाए तो उन दूसरों को जो कुछ दिख रहा है, वह मैं नहीं हूं और जो मैं हूं, वह दूसरों के ग्रहण में आ नहीं सकता । तब फिर मैं दूसरों के लिए क्या संबोधन करुं ? यह समझाने वाला जब व्यवहाररूप से ही सही देखता है, तब समझाने का यत्न करता है ।

किसी को समझाना है, कौन सा तत्त्व बताना है ? जब यह तत्त्व इसके लक्ष्य में रहता है, तब यह तो स्वयं बुझ जाता है, अपने आप में मग्न हो जाता है, पर के प्रति व्यवहार की क्रिया भी समाप्त हो जाती है अथवा यह दूसरा कोई पुरुष जब इस आत्मतत्त्व को समझ बैठे, तब यह भी अपने आपमें मग्न हो जाता है । फिर यह समझने और समझाने का व्यवहार चल कैसे सकता है ।

अज्ञानी का जल्पवाद – अपना यथार्थ तत्त्व जिसको परिज्ञात है, उसे भी परिज्ञात इस तत्त्व के समझाने में कोई विकल्प ही आएगा, निर्विकल्प अंतस्तत्त्व प्रतिबोधन का विषयभूत न होगा फिर तो । किन्हीं पुरुषों को समझाने विषयक धर्मचर्चा भी की जा रही है और अपने कर्तृत्व का आशय भी रखा जा रहा हो तो उस दूसरे पुरुष को समझाना कठिन हो ही जाता है। तभी तो बीच बीच में वह व्यामोही कहता जाता है कि क्यों भाई समझा ना ? क्योंकि उसके चित्त में यह बसा हुआ है कि मैं समझाने वाला हूं और इन लोगों को समझा रहा हूं । सों कह बैठता है कि क्यों भाई समझा ना कुछ ? जरा और विशेष अभिमानी हुआ तो यों कह देता है कि तुम्हारे दिमाग में आया कुछ ? अभिमान हुआ तो यों कह देता है कि तुम्हारे दिमाग में भुस भरा है या हमारी बात भी आई है ? उस व्यामोही के चित्त में ऐसा अहंकार है कि मैं समझाऊं तो यह समझता है । मैं समझाने वाला हूं ।

वचनव्यवहार में ज्ञानी की निरहंकारता – ज्ञानी पुरुष के यह अहंकार नहीं होता है । वह तो यों जानता है कि मैं किसी को समझा नहीं रहा हूं, किंतु मेरे चित्त में एक प्रकार का धर्मानुराग जगा है अथवा उस चर्चा के करने में हमारी भी अभिरुचि है । सो इस प्रसंग में मैं अपनी कषाय को शांत कर रहा हूं, अपनी अभिरुचि को प्रकट कर रहा हूं, अपने ही अंतरंग में अपना ही कार्य कर रहा हूं । मैं समझा क्या सकता हूं और समझाना किसे है ? सभी जीव मेरी ही तरह अथवा प्रभु की तरह हैं, ज्ञानानंदस्वरूप वाले हैं ।

यहां कौन छोटा और कौन बड़ा है ? कौन किसी दूसरे को क्या कर सकता है ? यह तो है एक आध्यात्मिक बात । लोकव्यवहार में भी जो बड़े घराने के पुरुष होते हैं, वे दूसरे को कुछ कहते समय अथवा दूसरे को वह बात समझ में नहीं आती है तो वह समझाने वाला यों कहता है कि भाई मैं तुम्हें बता नहीं सका । मुझमें अयोग्यता है, असामर्थ्य है कि मैं समझा सकने में समर्थ नहीं हूं । बजाय यह कहने के कि तुम्हारी कुछ समझ में ही नहीं आता, इसके एवज में यही कहते हैं कि मैं सही तौर से बता नहीं सका । आध्यात्मिक पुरुष तो इतनी भी अपने आप में तरंग नहीं लाता है । वह जानता है कि मैं केवल अपने आप में अपनी कषायरूप अपना परिणमन कर रहा हूं । मैं किसे समझाता हूं?

पर के द्वारा अन्य को ज्ञान देने की अशक्यता – भैया, कोई पुरुष किसी दूसरे को ज्ञान नहीं देता है । सभी ज्ञानस्वरूप हैं, सो कुछ निमित्त पाकर अपने आप में बसे हुए ज्ञानतत्त्व को प्रकट कर रहे हैं । यदि कोई ज्ञान बांटने लगे, अपना ज्ञान किसी को देने लगे तो 10, 20, 50 शिष्यों को ज्ञान देने पर तो वह गुरु ज्ञानहीन हो जाएगा । अब तो वह गुरुघंटाल रह गया । आप लोग जानते हैं कि गुरुघंटाल किसे कहते हैं ? अब तो यह गाली का शब्द बन गया है । घंटाल उसे कहते हैं, जो दूसरों को हित में लगने की प्रेरणा दे –

"परान् हिते घंटयति प्रेंरयति इति घंटालु: ।"

ऐसा तो एक विवेकी पुरुष ही हो सकता है, किंतु मोहियों की यहां गोष्ठी है, अज्ञानीजनों का समुदाय है । यहां तो किसी को गुरुघंटाल कह दिया जाए तो वह गाली मान लेगा । जैसे किसी कंजूस को कोई कहे कि आइए कुबेर साहब ! तो वह अपनी बढ़ाई न समझेगा, तो वह गाली समझ जाएगा । पर कुबेर शब्द क्या गाली है ? अभी किसी से कह दें कि यह तो बड़ा पुंगा है, पोंगा है तो ऐसा शब्द सुनकर वह बुरा मान जाएगा, पर आप पूजा में रोज रोज पढ़ जाते हो―

"स्वस्ति त्रिलोकगुरवे जिनपुंगवाय ।"

पुंगवाय का अर्थ श्रेष्ठ है । उसी का बिगड़ा शब्द पुंग है । शुद्ध शब्द है पुंगव और पुंगव से बिगड़कर पोंगा या पुंगा, पंगा रह गया । छोटे पुरुषों को बड़ा शब्द यदि बोल दो तो वह गाली समझ लेता है । तो यहां पर घंटाल भी गाली में सामिल हो गया । तो मतलब यह है कि यदि कोई अपना ज्ञान किसी को दे दे तो वह दिया हुआ ज्ञान क्या उसके पास रहा ? किंतु ऐसा नहीं है ।

ज्ञान का अद्भुत भंडार – ज्ञान देने वाले पुरुष जैसे जैसे ज्ञान दान देते रहते हैं, वैसे ही वैसे उनका ज्ञान पुष्ट होता रहता है, ताजा होता रहता है । धन वैभव का भंडार तो ऐसा है कि जैसे जैसे खर्च करो, वैसे ही वैसे कम होता है, पर ज्ञान का भंडार ऐसा है कि ज्यों ज्यों खर्च होता जाता है, त्यों त्यों बढ़ता जाता है ।

अनुभूति की वचनगोचरता – यह ज्ञानी पुरुष जानता है कि मैं किसी को न समझाता हूं, न ज्ञान देता हूं । मैं तो अपनी ही अभिरुचिवश अपनी सभी कषायों के अनुराग में चेष्टा करता हूं । मैं किसी को इस अंतस्तत्त्व को समझाने बैठूँ भी तो बड़ी दिक्कत की बात है । जिस रूप में, जिस शब्द से, जिस विकल्प से, जिस ढंंग से मैं इस अंतस्तत्त्व को समझने चलुं, वह ढंंग, वह रूप, वह विकल्प यह अंतस्तत्त्व नहीं है और जो यह अंतस्तत्त्व है, वह दूसरों के द्वारा इस समझाने के प्रसंग में ग्राह्य नहीं है । इस रहस्य की बात से तो दूर रहो । आपके अनुभव में रोज रोज जो बात आती है, आप उसे ही यथार्थ नहीं समझा सकते हैं ।अच्छा आप बताओ कि अरहर की दाल में कैसा स्वाद होता है ? आप शब्दों द्वारा कुछ बता नहीं सकते हैं कि कैसा स्वाद होता है ? अरे जिसे अरहर का स्वाद बताना है, उसे अरहर की दाल चावल बनाकर खिला दो, उसे अरहर की दाल का स्वाद मालूम हो जाएगा । तो किसी भी अनुभव को मैं शब्दों द्वारा किसी के सामने रख दूं, यह शब्दों में सामर्थ्य नहीं है । मैं कैसे इस परमार्थ अंतस्तत्त्व को समझाऊँ ? यह तो प्रयोगसाध्य बात है ।

हिंसा का परिहार करके यथार्थज्ञानपात्रता का निर्माण – भैया, अपने आप को ऐसा पात्र बना लो, अपनी ऐसी योग्यता बना लो कि पर की ओर से आंखें मींचे, विश्राम लें और निजसहजप्रकाश सामने आ जाए, अनुभव में आ जाए―ऐसी भावना बनाने के लिए बहुत से प्रयोग करने पड़ेंगे । प्रथम तो यह है कि गृहस्थावस्था है तो यहां न्यायनीति से रहना, पांचो पापों का त्याग करते हुए अपना सद्व्यवहार रखना, उत्तम आचरण रखना, पांचो पापरहित व्यवहार रखना आवश्यक है । जो इन पापों में आसक्त है, किसी की जान को जान भी नहीं समझता है, किसी का भी दिल दु:ख जाए, प्राण भी पीड़ित हो जाय, पर अपनी स्वार्थसिद्धि हो, अपनी बात बने- ऐसा जिसके अंदर रौद्र आशय है, वह कैसे पात्र हो सकता है कि अपने अंतस्तत्त्व की बात समझ सके । इस कारण अपना दयामय व्यवहार रखना चाहिए ।

मृषावाद का परिहार करके यथार्थज्ञानपात्रता का निर्माण – जिसने झूठ बोलने की प्रवृत्ति बना ली हो, वह इस अंतस्तत्त्व के दिल का पात्र नहीं हो सकता है । झूठ बोलने की आदत तो व्यर्थ की है । झूठ बोलने वाला कुछ लाभ नहीं प्राप्त कर लेता है । जिसे यह लाभ समझता है, वह तो सच्चाई से भी प्राप्त हो जाता है और फिर कुछ भी काम भी न हो, स्वार्थ भी न हो तो भी झूठ बोलने में बहुत से लोगों को बहुत आनंद आया करता है । झूठी गवाही देना, सच को झूठ जाहिर कर देना, और और भी बहुत सी बातें करके आनंद मनाना, ये तो अपने आपकी बर्बादी के ही कारण हैं । इस कारण मिथ्यावाद का परिहार करके एक अपने आपके शाश्वत प्रकाशमान् प्रभु के दर्शन तो कर लो ।

चोरी का परिहार करके यथार्थज्ञानपात्रता का निर्माण – जिसे चोरी की प्रकृति पड़ गयी है वह अपने आपके अंतस्तत्त्व के दर्शन का पात्र नहीं होता । पर के माल को छिपा लेना यह तो चोरी है ही, पर जो न्यायविरुद्ध बात है ऐसी कुछ भी घटना को घटा लेना, जिसमें छुपकर चलना पड़े वह सब चोरी है । जो बात छुपकर करना पड़े, कोई जान न जाय ऐसा भाव रखकर किया जाय ये सब चोरी है । आपको विदित होगा अचौर्य व्रत भावना में एक भावना भैक्ष्य शुद्धि है । यह साधुओं की बात है कि विधिपूर्वक गृहभिक्षा लेना । चोरी का भैक्ष्यशुद्धि से क्या संबंध है ? संबंध देख लो । भोजन कर रहे हैं उस ही बीच में कोई थोड़ा सा बाल आ गया और वह ऐसी कला कर दे कि किसी जगह सरका कर छुपा दे तो वह भी चोरी है । भार्इ छिपाकर क्यों भोजन कर रहे हो ? उस छिपकर भोजन करने में भी चोरी का दोष है । कोई बड़ा पुरुष ताजे भुने हुए चने मोल लेकर जेब में डालकर चबाता चला जाय और उसी समय कोई दूसरा व्यक्ति उसके पास पहुंच जाय तो वह उन चनों को इस तरह से जेब में छिपाकर रखता है कि वह समझ न सके । अरे भाई तुम चने खा रहे हो, तुमने उन चनों को खरीदा है तो उसमें क्या बात हो गई, क्यों उन्हें छिपाते हो ? ऐसा छिपाने का परिणाम भी चोरी में शामिल है । चोरी के आशय में अंतस्तत्त्व का दर्शन नहीं होता, अत: इस मिथ्याशय को छोड़ो ।

कुशील तृष्णादिका परिहार करके यथार्थ ज्ञानपात्रता का निर्माण – यों ही जान लीजिए कि जैसे चोरी की प्रकृति वाले को आत्मलाभ नहीं होता, इसी तरह कुशील की प्रकृति वाले को, तृष्णालु पुरुष को इस अंतस्तत्त्व के दर्शन नहीं हो पाते हैं । न्याय नीति का व्यवहार हो, सदाचार हो, वस्तुस्वरूप का ज्ञान हो तो इन सर्वसंगतियों से इस अंतस्तत्त्व के दर्शन हो जाते हैं । जिसका आश्रय करने से संसार के समस्त संकट टल जाते हैं ।


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