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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 60

From जैनकोष




बहिस्तुष्यति मूढात्मा पिहितज्योतिरंतरे ।तुष्यत्यंत: प्रबुद्धात्मा बहिर्व्यावृत्तकौतुक:॥60॥

मूढात्मा की मुग्धप्रवृत्ति अप्रतिबोध्यता का कारण – इससे पहिले श्लोक में यह बताया गया था और उससे संबंधित पहिले श्लोक से यह बताते आ रहे थे कि इन अज्ञानी पुरुषों को, मूढ़ आत्मावों को न समझाये जाने पर भी ये अंतस्तत्त्व को नहीं जानते और समझाये जाने पर भी अंत: स्वरूप को नहीं जानते । जो आत्मा है वह समझने और समझाने वाले के उस प्रसंग में ग्रहण में नहीं आता आदि कारणों से कुछ भी समझाना व्यर्थ है, श्रम करना व्यर्थ है। मानो उस ही की पुष्टि में अब यहां यह कह रहे हैं कि मूढ़ आत्मावों की प्रकृति कैसी हुआ करती है जिससे समझाया जाने पर भी व्यामोही पुरुष का आत्मतत्त्व की ओर झुकाव नहीं होता, संतोष नहीं होता ।

मूढात्मा के कल्पित संतोष का स्थान – अंतरंगज्योति जिसकी ढक गयी है, अंतर में ज्ञाननेत्र जिसका बंद हो गया है, विवेक नहीं रहा है ऐसा पर्यायव्यामोही जीव बाहरी-बाहरी बातों में संतुष्ट होता है । विषयों के साधनों की बात हो, उनके उपायों की चर्चा हो तो इसे उस बाह्य बात में ही संतोष का अवगाह हो जाता है, फिर अंतरंग चर्चा में, अंतस्तत्त्व की कहानी में इसको कैसे संतोष होगा ? किंतु जो प्रबुद्ध आत्मा है, जिसका यथार्थ ज्ञान जागृत है स्व और पर के स्वरूप को जो यथार्थ नजर में लिए रहता है उसका झुकाव बाहरी पदार्थों से अलग हो जाता है । इस कारण वह पुरुष अपने अंत: स्वरूप में संतोष करता है ।

अज्ञानी का संतोष और समर्थन – देखो भैया ! धर्म की चर्चा के प्रसंग में जब कोई उनके मन की बात आ जाय, अज्ञानी के मन की नाना बातें आ जायें तो वह उसका समर्थन करता है । हां यह है ठीक । अब शास्त्र की बात, धर्म की बात, ऊँची बात, अंत:स्वरूप की कुछ चर्चा चले, उस ही का जो सहजस्वरुप है उस बाबत कुछ कथन करने के लिए प्रोग्राम चलें, तो उसे वहां संतोष नहीं होता है । यहां कुछ कहा ही नहीं गया है ऐसा उसे विदित होता है । वह अज्ञानी सारभूत अंतस्तत्त्व का ग्रहण नहीं कर सकता । उसकी बाह्य पदार्थों में बुद्धि मोहित हो गयी है ।

यथापद उपदेश – ज्ञानी पुरुष, व्यवहार कुशल परोपकार निरत साधुसंत यथापदवी लोगों को उपदेश करता है तभी धर्मधारण के प्रसंग में अनेक विधियां हो गयी हैं । शुद्ध आत्मतत्त्व का ध्यान करना ये भी तो धर्मपालन की विधि है, अथवा तपस्या करना, उपवास आदिक करना ये सब भी तो धर्मपालन में शामिल है ना । पूजा करना, खूब मनोहारी द्रव्य को चढ़ाना, समारोह करना, जलविहार रथयात्रा करना और जैसे आजकल महावीरजी की यात्रा बहुत प्रचलित है । इस महावीरजी की वजह से भी अनेक लोग कुछ मार्ग को पकड़े हुए हैं । यह भी अच्छा है यथापद योग्य पुरुषों के लिए । धर्मपालन की यहां विभिन्नता होती है, उसका कारण यह है कि कोई अंतस्तत्त्व का रुचिया होता है, कोई बाहरी बातों में ही संतोष कर लेता है ।

यथापद उपदेश पर एक दृष्टांत – कहीं कथानक आई है कि एक बार प्रबुद्ध आचार्य में और एक बड़े शब्दशास्त्र के धुरंधर विद्वान में किसी बात पर बहस हो गयी । उन दोनों में धार्मिक चर्चा पर कुछ विसम्वाद हो गया तो उन दोनों ने यह निर्णय किया कि चलो किसी तीसरे पुरुष से अपनी-अपनी बात कहें, वह जो निर्णय दे उसको मान लें । जो कोई हार जाय वह जीतने वाले की बात स्वीकार कर ले, धर्म मान ले । सो अब वे चले दोनों किसी तीसरे को सुनाने के लिए । तो मानो एक मिल गया गड़रिया । वह शास्त्रज्ञ विद्वान तो संस्कृत की कड़ी झाड़ने लगा और यह साधु बकरी और उनकी सेवा के संबंध में कुछ विधियां बताने लगा । कैसे इनका पालन हो, कैसे इनका रक्षण हो । अब तो गड़रिया बोला कि साधु महाराज जो कहते हैं वह ठीक कहते हैं । अब वह शास्त्रज्ञ बड़ा परेशान हुआ । उसने सोचा कि मैंने तो ऐसी अच्छी कला से इसे ज्ञान बताया, फिर भी यह समर्थन नहीं देता है । फिर चले किसी दूसरे के पास मानो ग्वाले के पास, तो वहां भी वह शास्त्रज्ञ विद्वान संस्कृत की लड़ी झाड़ने लगा और यह साधु पशुपालन गौसेवा के विषय में सब बातें बताने लगा । तो उसने कहा कि जो ये साधु जी कहते हैं सो ठीक कहते हैं । तो जिसको सुनना है उसकी तो बात देखो कि वह किस योग्य है ?

कोमल चिकित्सा – जो बच्चा दवाई खाना ही नहीं चाहता उसे कोई कड़ुवा चूर्ण खिलाये तो वह न खायेगा । उसे तो मां बतासे में रखकर खिलाती हैं और वह खा लेता है । यों ही यथापद धर्म की बातें हैं । पहिले यह तो बन जाये कि कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु, कुधर्म, कुसंगति में नहीं पहुंचना है । यह अज्ञानी तो बाह्य पदार्थों में संतुष्ट रहा करता है । इसे तो बाह्य पदार्थ चाहियें । उनमें ही उसे संतोष होता है, वही इसमें टेव पड़ी हुई है, उन्हीं में यह तोष किया करता है, इसे अपने आपकी सुध ही नहीं रही । कैसे संतोष करेगा ? बाहर में ही अपनी सुध ही नहीं रही । कैसे संतोष करेगा ? बाहर में ही अपनी दृष्टि रखेगा तो अब क्या करना ? कम से कम इतनी भी बात हो जाय कि उस ही बाह्य संतोष को आदत के प्रसंग में ऐसी बुद्धि आ जाय कि पूजा करे, यात्रा करे, तीर्थयात्रा करे, दान दे, विधान करे और उनके लगाव में, प्रसंग में उसे यह बात बैठ जाय कि इससे उन्नति है, वृद्धि है, सांसारिक वैभव भी इससे मिलता है, चलो उसका यह पहिला मोड़ है अन्यथा कितने ही पुरुष तो इतनी विपरीत बुद्धि वाले हैं कि धर्म का ध भी नहीं बोल सकते । रात दिन शौक, विषयसाधन यही धुन रहती है ।

निजदर्शन में अंतस्तोष – यदि ठीक होगा उदय सो ठीक हो जायेगा, उचित मार्ग मिलेगा, पर जब तक पर्याय का मोह रहता है अंतस्तत्त्व का परिचय नहीं हो पाता है तब तक । यह जीव बाह्यबातों में संतोष करता है । और जब अपने आनंद का धाम इसे दिख जाय तब अंतरंग में संतोष करने लगेगा । कोई बच्चा किसी दूसरे बच्चे के हाथ में खिलौना देखकर रोने लगता है, मां उसे कुछ चांटे मारती है । उसके दु:ख को दूर करने का यह उपाय तो सही नहीं बैठ पाता । अरे दु:ख तो उसे खिलौने न मिलने का है, वह चाटों से न मिटेगा । हालांकि यह बात ठीक है कि वह दूसरे का खिलौना है, वह मिल कैसे सकता है ? उसकी चाह करना व्यर्थ है, उसके लिए क्यों रोता है ? यह बात यद्यपि ठीक है, किंतु यह रोना मिटेगा भी तो इसी तरह कि उसका खिलौना लाकर उसे दे दो । वह अपने खिलौने में राजी हो जाएगा और उसका रोना मिट जाएगा । ऐसे ही अज्ञानी प्राणी इन विषयसाधनोंरूप बाहरी खिलौनों को निरखकर इनके लिए ही मरते हैं । इनका यह रोना कैसे मिटे ? बाहरी पदार्थों में निग्रह अथवा अनुग्रह करके उनका संचय अथवा विनाश करके यह रोना न मिटेगा । जीव में तो स्वभाव ही पड़ा है कि यह कुछ जाने । इस जीव में किसी न किसी ओर रमने का स्वभाव पड़ा हुआ है । इसका जो स्वाधीन सहज शुद्ध खिलौना है, अभिन्न चित्स्वभाव है, सहजस्वरूप है । इसी का दर्शन हो जाए तो इन बाहरी खिलौनों का रोना मिट सकेगा ।

विनिश्र्चय की अनुसारिणी वृत्ति – जब तक मिथ्यात्व का उदय है, तब तक इसे अपने सहजस्वरूप का दर्शन हो ही नहीं सकता । जो तीव्र मोही पुरुष है, उसे समझाये जाने पर भी उसमें अंतर नहीं आता है और यहां समझाने वाले ने विकल्प मचाकर अपने आपके आनंदस्वरूप से चिगकर अपना विनाश किया । यह मूढ़ आत्मा बाह्य पदार्थों में ही संतुष्ट होता है कितना ही समझाये जाने पर भी इसे अपने अंतरंग में संतोष नहीं होता और ज्ञानी पुरुष को कितना ही बहकाया जाने पर भी, भुलावा देने पर भी, कुछ असर देने पर भी इसे बाह्य में संतोष नहीं होता । वह अपने अंतरंग में ही संतुष्ट रहता है ।

विनिश्र्चय की अनुसारिणी वृत्ति पर एक दृष्टांत – भला सामने पड़ी हुई रस्सी में यह भ्रम हो जाए कि यह सांप है, तो समझाने से वह मान नहीं सकता है कि यह सांप नहीं है, यह रस्सी है । हां उसे ही कुछ साहस जगे, कुछ बुद्धि चले और धीरे-धीरे परीक्षा करे तो उन परीक्षा की चेष्टावों से वह जान जाएगा कि यह सांप नहीं है, पर कोरे वचनों के कहने मात्र से किसी के मन में बात नहीं बैठती है । उसी पुरुष का अपनी ही हिम्मत के कारण जब वह निकट जाए तो भ्रम समाप्त हो जाता है और स्पष्ट जान ले हाथ से उठाकर भी समझ ले कि यह तो रस्सी है, सांप नहीं है । अबउसे कोई कितना ही बहकाए कि अरे यह तो सांप है तो क्या वह सांप समझ लेगा, क्या कुछ गलत मान लेगा ?

विनिश्र्चय के अनुसार संतोष का आश्रय – ऐसे ही जिन अज्ञानी पुरुषों ने अभी तक अपने सहजस्वरूप को नहीं पहिचाना, उन्हें तो बाहरी पदार्थों में ही संतोष होगा, समझाये जाने पर भी वे सही बात मान न लेंगे और जिसे अपने आपके स्वरूप का अनुभव हुआ है और यह जाना है कि यह अंतस्तत्त्व अनादि अनंत अहेतुक है ऐसा अपने स्वरूप का परिचय हो जाय और उस ही स्वरूपदृष्टि के कारण अनुभव हो जाय, अब उसे कोई कितना ही बहकावे तो क्या विपरीत धारणा में आ जायेगा ? वह तो अंतरंग में ही शांत हुआ करता है । जैसे पुराणों में सुना ही होगा अंतिम अनुबद्धकेवली श्री जंबूस्वामी हो गए हैं, उनको गृहस्थावस्था में सभी लोगों ने दबाकर इस बात पर राजी किया कि वह शादी कर लें, फिर एक दिन बाद जो सोचे सो करें । समझाने वालों को यह विश्वास हुआ था कि जहां स्त्री घर आयी, स्त्री का परिचय हुआ यह स्वयं ही फंसकर रह जायेगा । शादी हुई, रात्रिभर उन सेठानियों ने ऐसी कहानी सुनायी कि जिससे यह शिक्षा मिले जंबू स्वामी को कि वर्तमान में जो सुख मिला है उसको छोड़कर, घर का आराम तजकर और एक कल्पित बहुत आगे भविष्यकाल के सुख की चाह कर रहे हैं, पर उनके उत्तर में जंबूस्वामी भी अपनी उचित कहानी कहें । रात्रि व्यतीत हुई और जंबूस्वामी अपने कल्याण के लिए आगे का रास्ता नापने लगे । जंबूस्वामी विरक्त हो गये । आत्मासाधना में प्रगतिशील को यह उचित ही है ।

प्रबुद्ध का अंत:संतोष – प्रबुद्ध आत्मा अंतरंग में ही संतुष्ट होते हैं किंतु मूढ़ आत्मा बाह्य में ही संतुष्ट होते हैं । ऐसी घटनाएँ होने पर अज्ञानी क्या सोच रहे होंगे कि जंबूस्वामी का कुछ दिमाग फेल तो नहीं हो गया था । कल ही शादी हुई लो आज ही चल दिया । इसकी बुद्धि ठिकाने नहीं है, इसे कुछ दया भी नहीं आई । अनेक बातें कही जा सकती हैं जो सुनने में बहुत युक्तियुक्त भी मालूम होती हैं । क्या यह धर्म नहीं है अपने घर के लोगों को सुखी रखना, उन्हें कोई विपत्ति न आने देना, यह बात सोची जा सकती है, परंतु यहां तो वही हो रहा है जैसा कि निर्णय में होना चाहिए । जिसकी इस अंतरंग चैतन्यस्वभाव में रुचि जगी है वह तो इस चैतन्यस्वभाव की महिमा के लिए ही सब कुछ न्यौछावर करेगा ।

अज्ञान में ही दुरनुभूति – भावों में विपरीतता होना, गंदगी होना, धोखा देने की बात होना―यह हो सकेगा अज्ञान में ही । जैसे कि अंजना के प्रथमदर्शन में पवनंंजय ने पहिले ही यह सोचा था कि ऐसी विमुख अंजना से शादी न करनी चाहिए । फिर सोचा कि अगर शादी न की तो फिर इसे मजा ही क्या चखा पाऊँगा ? फिर इससे एक बात भी न करूँगा । किया उसने ऐसा ही, शादी कर लिया और छोड़ दिया 22 वर्ष तक के लिए । यह है छल वाली बात। अंतस्तत्त्व के वातावरण में छल कहां है ? शुद्ध विचार है, शुद्ध आशय है, ज्ञान के लिए ही गति है ।

इस प्रकरण से शिक्षाग्रहण – ज्ञानी पुरुष बाहर में तुष्ट नहीं होता किंतु अंत:स्वरूप में ही संतुष्ट रहता है, जबकि अज्ञानी जीव बाह्य विषयों में ही संतोष किया करते हैं । यह अज्ञानी और ज्ञानी की प्रकृति कही गयी है । इससे एक तो यह शिक्षा लेना है कि अत्यंत विमोहित पुरुष से, मूढ़ आत्मा से व्यवहार न करना, दूसरी बात यह ग्रहण करना है कि बाह्य साधनों में संतोष करने से मूल में संतोष नहीं आया करता है और अंत:स्वरूप में संतोष होता है तो शांति ही है – ऐसा जानकर बाह्य पदार्थों से कौतुकता छोड़कर अपने आपमें ही अपने आपको खोजो और अपने आपमें ही परमविश्राम लेकर अपने में ये अमूल्य क्षण सफल करो ।


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