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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:समाधितंत्र - श्लोक 61

From जैनकोष



न जानंति शरीराणि सुखदु:खान्यबुद्धय:।निग्रहानुग्रहधियं तथाप्यत्रैव कुर्वते॥61॥

मोही प्राणीयों की अचेतन में निग्रह अनुग्रह की बुद्धि – बहिरात्मा की दृष्टि बाह्य में रहती है और उसे बाह्य में ही संतोष हुआ करता है । इस पर आचार्य महाराज खेद प्रकट करते हुए यह बता रहे हैं कि देखो ये शरीर सुख और दु:ख को जानते भी नहीं हैं, लेकिन यह प्राणी इन शरीरों में ही विग्रह और अनुग्रह की बुद्धि करता है । यह सब अज्ञान का फल है । कृपा तो उस पर की जाना चाहिए जो कुछ जानता हो और हमारी कृपा का आभार मान सकता हो और दंड भी उसे देना चाहिए जो दंड का अनुभव कर सकता हो और कुछ तकलीफ भी मान सकता हो । जैसे किसी को चलते हुए में किवाड़ लग जायें, किवाड़ के ऊपर का काठ सिर में लग जाये तो क्या किसी को देखा है कि उस काठ को दंड दे, उसे पीटे, दो चार बेंत मारे ? न देखा होगा और कभी देखा होगा तो उसकी गिनती उन्हीं अविवेकियों की लिस्ट में रख लेना चाहिए । जैसे कि ये संसारी मोही प्राणी इस शरीरादिक में चैतन्य न होने पर भी निग्रह और अनुग्रह की बुद्धि करते हैं ।

मूढ़ या नादान की बुद्धि – अचेतन में निग्रह अनुग्रह की बुद्धिवाला प्राणी या तो कोई मूर्ख होगा, जो इस अचेतन काठ पत्थर को पीटकर, मारकर अपने को संतुष्ट कर सकेगा कि इस किवाड़ ने मुझे मारा, दु:ख दिया तो इस किवाड़ को भी हमने खूब सजा दे दिया फिर नादान बच्चा संतुष्ट हो जायेगा । किसी बच्चे के कुछ लग जाय तो मां उस काठ पत्थर को ही तीन चार मुक्के रैपट मारकर बच्चे को प्रसन्न कर देती है । बच्चा सोचने लगता है कि मुझे इस लकड़ी ने दु:ख दिया, तो मेरी मां ने इस लकड़ी को मार दिया, खूब खबर ले ली । नादान ही इन अचेतन पदार्थों में निग्रह और अनुग्रह की बुद्धि करेगा, किंतु विवेकी इन अचेतन पदार्थों में कृपा और दंड की बुद्धि नहीं करता है, किंतु यह पर्यायमुग्ध प्राणी, अनादिकाल के मोह का रोगी इन बाह्य अचेतन पदार्थों में शरीर में, निग्रह और अनुग्रह की बुद्धि करता है ।

भूख प्यास का कारण शरीर – भैया ! इस शरीर की कितनी भी खुशामद करो, पर यह कृतज्ञ नहीं हो सकता है । पहिली बात तो इसमें जान ही नहीं है । दूसरे अपनी प्रकृति के अनुसार ये दु:ख का ही कारण बनेगा, सुख का कारण नहीं हो सकता है । देखो जितने भी क्लेश होते हैं हम आपको उन सबका कारण यह शरीर है । मोह में न माने यह बात दूसरी है, क्योंकि शरीर में आत्म बुद्धि है या यों कह लो कि संसार से संबंध में ही चैन मानी जा रही है । कितने कष्ट हैं, उन कष्टों को गिन-गिन कर निर्देशन करके सामने रख लीजिए, क्या-क्या कष्ट हुआ करते हैं ? भूख लगती है तो उसमें भी शरीर का कारण पड़ा या नहीं ? शरीर है, पेट है, भीतरी रचनाएँ हैं, क्षुधा होती है और शरीर न हो, केवल यह आत्मा हो, तो किसे लगेगी भूख ? जब यह अमूर्त है, ज्ञानानंदस्वरूप है, भावात्मक है तो भूख नाम की चीज क्या ? प्यास लगे तो उसमें भी यही बात घटा लो कि शरीर ही उसका कारण पड़ता है । कुछ भी क्लेश हो तो उसमें भी कारण यह शरीर ही तो पड़ा ।

ठंड गर्मी जीवन मरण के क्लेश का कारण शरीर – न होता शरीर का संग तो ठंड कहां से लगती ? भावात्मक अमूर्त चैतन्यस्वरूप इस आत्मा में ठंड का प्रवेश नहीं होता है । कभी आकाश को भी ठंड गरमी, भूख, प्यास लगी है क्या ? क्या आपने कभी यह सुना है कि आकाश को लू लग गयी ? तो जैसे आकाश को ठंड, गर्मी, भूख, प्यास, लू आदि नहीं लगती है ऐसे ही आत्मा में जो आत्मस्वरूप है उसकी बात कह रहे हैं । कोई देह को ही जीव मान ले उसकी बात नहीं कह रहे हैं, आत्मा में शीत उष्ण आदि नहीं हैं तो कहां से सर्दी गर्मी लगेगी ? जीवन और मरण के भी क्लेश इस शरीर के संबंध से ही होते हैं । अब नया शरीर मिल गया लो जीवन मान लिया । अब पाये हुए शरीर का वियोग हो गया, लो मरण हो गया । न हो शरीर केवल यही आत्मा हो जो स्वयं सत् है तो इस जीवन का नया क्लेश और मरण का नया क्लेश ? जीवन मरण इस आत्मा में हैं ही नहीं । जो क्लेश हों सामने रख लो ।

धनहानि, कीर्तिहानि व व्याधि के क्लेशों का कारण शरीर – धन चला गया, मान लो यह एक क्लेश है । सरकार ने छीन लिया, डाकू ले गए, व्यापार में टोटा पड़ गया, ये सब क्लेश भी तो इस शरीर के ही संबंध से हैं ना । किसी ने शरीर के संसर्ग में शरीर को अपना लिया कि यह मैं हूं और ऐसे अपने शरीर में भी अपनायत की व दूसरों के शरीर में यह दूसरा आत्मा है – ऐसी अपनायत की । जब यह मान लिया कि यह मैं हूं और यह पर है, तब ये यश, मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, इज्जत, पोजीशन आदि इस शरीर के व्यवहार से लग बैठेंगे । अब उस इज्जत पोजीशन की संभाल के लिए कुछ साधन भी चाहिएँ ना ।

भैया ! वह साधन मुख्य धन वैभव है । तो अब उसके कम रह जाने से यह क्लेश मान लेगा। धन के मिटने का भी जो क्लेश हो, उस क्लेश में भी मूल बात तो निरखिए । शरीर का संबंध ही उस क्लेश का कारण है । रोग हो, उसका भी कारण शरीर ही है । समस्त क्लेशों का कारण शरीर में आत्मबुद्धि है, शरीर का संग होना है ।

अननुग्राह्य शरीर पर मोहीयों की अनुग्रहबुद्धि – इस शरीर को ये मोहीजन कितना पोसते हैं ? देख देखकर खुश होते हैं कि मेरा शरीर इतना बलवान् है, अब इतना गठीला हो गया । चपटी नाक हो और ऐने में अपना मुख देखे तो थोड़ी गर्व की रेखा आ जाएगी । मैं बड़ा रूपवान हूं। इस शरीर को कितना पोसते हैं, कितना आदर करते हैं, किंतु यह शरीर क्लेशों का ही कारण बनता है । तिस पर भी अज्ञानी जीव इस शरीर में ही अनुग्रह बुद्धि करते हैं । बात बात पर कभी झगड़ा हो जाय तो उसका भी कारण देखो शरीर का ही संबंध है । लोग सोचते हैं कि इसने यह क्यों कह दिया मुझसे ? यह देहपिंड जो दूसरों को दिखता है, उससे मतलब नहीं है । मुझसे का वास्तविक मतलब तो चैतन्यस्वरूप से होता है । इस चैतन्यस्वरूप में एक तो बात नहीं पहुंचती और फिर जिसको यह प्रतीति हो जाए कि ऐसा यह मैं अमूर्ततत्त्व हूं, उसको तो इस चैतन्यतत्त्व की ओर से एक भी कल्पना न उठेगी । यह जीव इस शरीर में आत्मबुद्धि किए हुए है, इस कारण इस शरीर पर अनुग्रह बुद्धि करता है ।

व्यामोही जीवों की शरीर पर निग्रह बुद्धि – अब निग्रह की बुद्धि भी देखिए – कोई कोई पुरुष अपने ही हाथ से अपना ही माथा ठोकते हैं, सिर में ही ठोकर मारते हैं । कितने ही पर्यायमुग्ध जीव उनकी जो धर्म की धुन बैठ जाए, उसे ही धर्म कहा करते हैं । यह देह ही मैं हूं, फलाने लाल, फलाने चंद, अमुक प्रसाद यह ही मैं हूं । इस मुझको धर्म करना है तो क्या चाहिए ? तीन चार दिन का अनशन कर लें, यह पयार्यमुग्धियों की बात कह रहे हैं । क्यों करते हो भाई अनशन ? यहां देह से तपस्या करना है । यह देह हमारा साथी नहीं हो रहा है, इसलिए इसे ताड़ना देना है । अब निग्रहबुद्धि कर रहे हैं, दंड दे रहे हैं । यह शरीर ही दु:ख का कारण है―ऐसा जानकर शरीर को सुखा रहे हैं । ज्ञानी पुरुष के तपस्या और अनशनों का मर्म और कुछ है, उनका तो सब सहजवृत्ति से ज्ञान की रक्षा करते हुए तपश्र्चरण होता है ।

व्यामुग्धदेहियों की अन्य शरीरों पर भी निग्रह-अनुग्रहबुद्धि – यह जीव अपने शरीर पर भी निग्रह और अनुग्रह बुद्धि करता है और दूसरों के देह पर भी निग्रह और अनुग्रह की बुद्धि करता है । यह तो बड़ा आसान बन रहा है इन मोही जीवों को । कोई दूसरा शरीर रुच गया तो उसे लालित व शोभित करते हैं । किसी दूसरे ने कष्ट पहुंचाया तो उसको पीटना है, दंड देना है या जान तक ले लेनी है, यह निर्णय व यत्न बन जाता है । यह क्या है ? निग्रहबुद्धि होना । ये देह जिन पर क्रोध किया जा रहा है, ये क्या कुछ जानते हैं ? नहीं जानते हैं ? फिर भी किसी के द्वारा किसी को कष्ट पहुंचता है । बदला लेने में उस देह को ताड़ करके उसकी जान लिया करते हैं ।

वह देह तो कुछ जानता ही नहीं है । उस अचेतन देह को ताड़ने से उस मलिन जीव को वस्तुत: क्या दंड मिला ? रहा भीतर का आत्मा, उसको दंड देना चाहते हो तो देखिए आत्मा को दंड देने का क्या साधन है ? उसमें मुक्के तमाचे लगाना नहीं है या उसे गालियां देकर या ठोक पीटकर चाहो कि उसको दंड मिल जाएगा, यह नहीं है । दंड का अर्थ यह है कि फिर यह दोष न कर सके – ऐसी स्थिति बना देना, इसी का नाम तो दंड है । उस मनुष्य में, उसकी आत्मा में फिर यह दोष न आए, इसका उपाय तो वात्सल्य है, ज्ञान देना है । उसके अनुकूल बनकर याने हितैषी बनकर ऐसा व्यवहार करो, जिससे उसको विश्र्वास हो जाए और फिर उसे शिक्षा दो, उसके दोष मिटेंगे । यह बताओ कि क्या उपाय हो सकता है कि उसको पीड़ा फिर दुबारा न हो ।

शरीर की सजावट से जीव में अभ्युदय का अभाव – यह शरीर जड़ है । इसको सुखी रखने से, शोभित रखने से आत्मा का अनुभव नहीं होता । इस शरीर को कितना ही कसो, परंतु यह नहीं समझ सकता कि मुझे दंड दिया जा रहा है । इस शरीर पर कितनी ही अनुग्रह बुद्धि करें, यह नहीं समझ सकता कि मुझ पर क्रोध किया जा रहा है । आज सुबह देखा कि एक पुरुष तीन घोड़े लादे जा रहा था । उनमें एक घोड़ा बहुत दुबला पतला था । उसकी हड्डी निकल आई थीं, पर उसकी सजावट खूब की गयी थी । अब आप यह बतलाओ कि उस सजावट से क्या घोड़ा खुश है ? अरे वह तो यह चाहता है कि मेरी सजावट में जो खर्च हुआ हो, वह घास, भुस आदि मेरे खाने की चीजों में खर्च कर दिया जाता तो अच्छा था । उसे तो भर पेट भोजन चाहिए । सजावट से उसे क्या लाभ है ? यह तो एक दृष्टांतरूप बात है । यहां तो और भी इससे भी तथ्य की बात कही जा रही है ।

शरीरश्रृंगार से कर्मबंधन का संबंध – यह शरीर तो कुछ भी नहीं जानता है । शरीर को यदि खूब सजा दिया जाए गहनों से, पैरों से लेकर सिर तक कितने ही आभूषण लाद दिये जाएँ, आभूषण का सिर पर मेंढक, कान में ततैया, नाक में मकड़ी, पैरों में अच्छे ढंग की मछली सी पहिन लें, कितना ही कुछ सजा लें, पर उस सजावट से इस शरीर को कुछ चैन मिलती है क्या ? काहे को यह सजावट की जा रही है ? यह सजावट क्यों की जा रही है ? यह सजावट पाप बांधने के लिए की जा रही है । कैसे ? यह तो शरीर मैं हूं और इसकी सजावट होनी चाहिए । शरीर के सजाने का परिणाम लगा हुआ है और श्रृंगार की ओर प्रगति है तो इससे तो पाप ही बांधा उसने । लाभ क्या लूट लिया ? शरीर तो शरीर की जगह है । आत्मा के फायदे की चीज तो ज्ञानभाव है । ज्ञान यथार्थ रहेगा तो शांति रह सकती है । जहां ज्ञान गड़बड़ हुआ, विपरीत हुआ, वहां अशांति आ ही जाएगी । यदि आप आनंद को चाहते हो तो ज्ञानसाधना में ही लगना चाहिए । इस शरीर की निग्रहबुद्धि और अनुग्रहबुद्धि से कुछ लाभ नहीं निकलता ।

ज्ञानी की सहज शोभा – जो ज्ञानी जीव होते हैं, उन्हें शरीर की सजावट की मन में आती ही नहीं है । गृहस्थ ज्ञानी से लेकर साधु ज्ञानी तक देखते जावो, गृहस्थों में भी जो ज्ञानी गृहस्थ हैं, पुरुष हैं अथवा महिला हैं, उनके शरीर के सजावट की मन में नहीं आती है । अब पदवी के अनुसार साधारणतया तो कुछ हो ही जाता है । क्या करें ? गृहस्थ को चलाते हुए पुरुष क्या कुछ कपड़े ही न पहिनें ? कुछ तो पहिनेंगे ही । अब उसी को ही कोई शोभा श्रृंगार मान ले तो उसको क्या करे ? पर देखो ज्ञानी पुरुष मोटा कपड़ा पहिने, बटन खुला भी रहे, कहीं का कालर कहीं जाए तो भी वह शोभा में शामिल हो जाता है । इसका क्या करें ?महात्मा गांधी के चित्रों में देखा होगा, कहीं बटन ही नहीं लगा है, कहीं कमीज खुली है, एक तौलिया सी लपेटे हुए हैं, यह भी शोभा है । जिस ओर लोगों के समुदाय की दृष्टि जाए, वही श्रृंगार है, वही शोभा है ।

निग्राह्य और अनुग्राह्य आंतरिक भाव – यह अज्ञानी जीव गुणों से तो अपनी शोभा, अपना श्रृंगार नहीं करना चाहता । और वस्त्रों से, आभूषणों से या रंग लपेट लिया, मुख में राख लगा लिया, ओंठ लाल कर लिया, इन बातों से शोभा श्रृंगार जताना चाहते हैं । किसी-किसी पुरुष को भी यह शौक हो जाता है । आचार्य महाराज ऐसे मोहियों की दशाओं पर खेद प्रकट कर रहे हैं कि यह शरीर सुख अथवा दु:ख कुछ भी नहीं जानता है । लेकिन यह मूढ़ पुरुष, व्यामोही जीव इस शरीर में निग्रह और अनुग्रह बुद्धि करता है । अरे निग्रह करे तो अपने कषायों का, बुरे विचारों का और अनुग्रह करे तो अपने स्वरूप का ज्ञानादिक गुणों का । इससे तो लाभ मिलेगा, भिन्न वस्तु में निग्रह और अनुग्रह करने से कोई लाभ नहीं है ।


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